नन्द के अत्याचारों से रवाना हुए कुछ रवानी क्षत्रिय राजपूत बुंदेलखंड आकर बसे उनमें से एक रवानी राजपूत राजा नन्नुक ने चंदेल वंश की स्थापना की थी।

जेजाकभुक्ति के चन्देल,चंदेला

९वीं शाताब्दी–१३वीं शताब्दी ई. 30px
१२०० ई. में भारत का मानचित्र. चन्देल साम्राज्य मध्य भारत में दर्शित
राजधानी महोबा
खजुराहो
कालिंजर
भाषाएँ संस्कृत
धर्म हिन्दू धर्म
जैन धर्म
शासन राजवाद
राष्ट्रपति
 -  ८३१ - ८४५ ई. नन्नुक
 -  १२८८ - १३११ ई. हम्मीरवर्मन
ऐतिहासिक युग परम्परागत भारत
 -  स्थापित ९वीं शाताब्दी
 -  अंत १३वीं शताब्दी ई.
आज इन देशों का हिस्सा है: Flag of India.svg भारत
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चन्देला वंश भारत का प्रसिद्ध राजवंश हुआ, जिसने 08वीं से 12वीं शताब्दी तक स्वतंत्र रूप से यमुना और नर्मदा के बीच, बुंदेलखंड तथा उत्तर प्रदेश के दक्षिणी-पश्चिमी भाग पर राज किया। चंदेल वंश के शासकों का बुंदेलखंड के इतिहास में विशेष योगदान रहा है। उन्‍होंने लगभग चार शताब्दियों तक बुंदेलखंड पर शासन किया। चन्देल शासक न केवल महान विजेता तथा सफल शासक थे, अपितु कला के प्रसार तथा संरक्षण में भी उनका महत्‍वपूर्ण योगदान रहा। चंदेलों का शासनकाल आमतौर पर बुंदेलखंड के शांति और समृद्धि के काल के रूप में याद किया जाता है। चंदेलकालीन स्‍थापत्‍य कला ने समूचे विश्‍व को प्रभावित किया उस दौरान वास्तुकला तथा मूर्तिकला अपने उत्‍कर्ष पर थी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं खजुराहो के मंदिर ईस वश का प्रथम राजा नन्नु्क चंदेल था

शासन, संस्कृति एवं कलासंपादित करें

चंदेल शासन परंपरागत आदर्शों पर आधारित था। यशोवर्मन् के समय तक चंदेल नरेश अपने लिये किसी विशेष उपाधि का प्रयोग नहीं करते थे। धंग ने सर्वप्रथम परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर परममाहेश्वर कालंजराधिपति का विरुद धारण किया। कलचुरि नरेशों के अनुकरण पर परममाहेश्वर श्रीमद्वामदेवपादानुध्यात तथा त्रिकलिंगाधिपति और गाहड़वालों के अनुकरण पर परमभट्टारक इत्यादि समस्त राजावली विराजमान विविधविद्याविचारवाचस्पति और कान्यकुब्जाधिपति का प्रयोग मिलता है।

हम्मीरवर्मन् की साहि उपाधि संभवत: मुस्लिम प्रभाव के कारण थी; राजवंश के अन्य व्यक्तियों को भी शासन में अधिकार के पद मिलते थे। कुछ अभिलेखों से प्रतीत होता है कि कुछ मंत्रियों को उनके पद का अधिकार वंशगत रूप में प्राप्त हुआ था। मंत्रियों के लिये मंत्रि, सचिव और अमात्य का प्रयोग बिना किसी विशेष अंतर के किया गया है। मंत्रिमुख्य के अतिरिकत अधिकारियों में सांधिविग्रहिक, प्रतिहार, कंचुकि, कोशाधिकाराधिपति, भांडागाराधिपति, अक्षपटलिक, कोट्टपाल, विशिष, सेनापति, हस्त्यश्वनेता, पुरबलाध्यक्ष आदि के नाम आते हैं। शासन के कुछ कार्य पंचकुल और धर्माधिकरण जैसे बोर्डो के हाथ में था। राज्य विषय, मंडल, पत्तला, ग्रामसमूह और ग्रामों में विभक्त था। शासन में सामंत व्यवस्था कुछ रूपों में उपस्थित थी। एक अभिलेख में एक मंत्री को मांडलिक भी कहा गया है। विशिष्ट सैनिक सेवा के लिये गाँव दिए जाते थे। युद्ध में मरे सैनिकों के लिये किसी प्रकार के पेंशन अथवा मृत्युक वृत्ति की भी व्यवस्था थी। चंदेल राज्य की भौगोलिक और प्राकृतिक दशा के कारण दुर्गों का विशेष महत्व था और उनकी ओर विशेष ध्यान दिया जाता था। अभिलेखों में राज्य द्वारा लिए गए करों की सूची में भाग, भोग, कर, हिरण्य, पशु, शुल्क और दंडादाय का उल्लेख है।

ब्राह्मणों में द्विवेदी, त्रिवेदी, चतुर्वेदी, श्रोत्रिय, अग्निहोत्री, पंडित, दीक्षित और भट्ट के सथ ही राउत और ठक्कुर का भी उपयोग मिलता है। ब्राह्मणों ने अपने को परंपरागत आदर्शों और जीविकाओं तक ही सीमित नहीं रखा था। क्षत्रियों में जाति के स्थान पर कुल का गौरव बढ़ रहा था। 11वीं शताब्दी तक कायस्थों के उल्लेख आते हैं। चंदेल राज्य में इनकी संख्या अधिक थी। वैश्य और शूद्र अपने वर्ण के स्थान पर अपने व्यवसाय का ही उल्लेख करते हैं। सजातीय विवाह का ही प्रचलन था। बहुविवाह की भी प्रथा थी।

अभिलेखों में रूपकार, रीत्तिकार, पित्तलकार, सूत्रधार, वैद्य, अश्ववैद्य, नापित और धीवर के उल्लेख मिलते हैं। उद्योगों में कुशलता के स्तर के अनुसार शिल्पिन्, विज्ञाविन् और वैदाग्धि की उपाधियाँ होती थीं। कृषि की सुविधा के लिये सिंचाई की व्यवस्था की जाती थी। व्यापार प्रधानत: जैनियों के हाथ में था। श्रेष्ठि का राज्य में भी गौरव था। कीर्तिवर्मन् पहला चंदेल नरेश था जिसने सिक्के बनवाए।

चंदेल राज्य में पौराणिक धर्म की जनप्रियता बढ़ रही थी। चंदेल राजा और उनके मंत्री तथा अन्य अधिकारियों के द्वारा प्रतिमा और मंदिर के निर्माण के कई उल्लेख मिलते हैं। विष्णु के अवतारों में वराह, वामन, नृसिंह, राम और कृष्ण की पूजा का अधिक प्रचलन था। चंदेल राज्य से हनुमान की दो विशाल प्रतिमाएँ मिली हैं और कुछ चंदेल सिक्कों पर उनकी आकृति भी अंकित हैं किंतु विष्णु की तुलना में शिव की पूजा का अधिक प्रचार था। धंग के समय से चंदेल नरेश शैव बन गए। शिवलिंग के साथ ही शिव की आकृतियाँ भी प्राप्त हुई हैं। शिव के विभिन्न स्वरूपों के परिचायक उनके अनेक नाम अभिलेखों में आए हैं। शक्ति अथवा देवी के लिये भी अनेक नामों का उपयोग हुआ है। अजयगढ़ में अष्टशक्तियों की मूर्तियाँ अंकित हैं। सूर्य की पूजा भी जनप्रिय थी। गणेश और ब्रह्मा की मूर्तियाँ यद्यपिं मिली हैं लेकिन उनके पूजकों के पथक् संप्रदायों के अस्तित्व का प्रमाण नहीं मिलता। अन्य देवता जिनके उल्लेख हैं या जिनकी प्रतिमाएँ मिलती हैं। उनके नाम हैं- लक्ष्मी, सरस्वती, इंद्र, चंद्र और गंगा। बुद्ध, बोधिसत्व और तारा की कुछ प्रतिमाएँ मिलती हैं। ब्राह्मण धर्म की भाँति जैन धर्म का भी प्रचार था, विशेष रूप से वैश्यों में। किंतु सांप्रदायिक कटुता के उदाहरण नहीं मिलते। चंदेल नरेशों की नीति इस विषय में उदार थी।

चंदेल राज्य अपनी कलाकृतियों के कारण भारतीय इतिहास में प्रसिद्ध हैं। चंदेल मंदिरों में से अधिकांश खजुराहो में हैं। कुछ महोबा में भी हैं। इनका निर्माण मुख्यत: 10वीं शताब्दी के मध्य से 11वीं शताब्दी के मध्य के बीच हुआ है। ये शैव, वैष्णव और जैन तीनों ही धर्मों के हैं। इन मंदिरों में अन्य क्षेत्रों की प्रवत्तियों का प्रभाव भी ढूँढ़ा जा सकता है किंतु प्रधान रूप से इनमें चंदेल कलाकार की मौलिक विशेषताएँ दिखलाई पड़ती हैं। एक विद्वान् का कथन है कि भवन-निर्माण-कला के क्षेत्र में भारतीय कौशल को खजुराहों के मंदिरों में सर्वोच्च विकास प्राप्त हुआ है। ये मंदिर विशालता के कारण नहीं बल्कि अपनी भव्य योजना और समानुपातिक निर्माण के लिये प्रसिद्ध हैं। मंदिर के चारों ओर कोई प्राचीर नहीं होती। मंदिर ऊँचे चबूतरे (अधिष्ठान) पर बना होता है। इसमें गर्भगृह, मंडप, अर्धमंडप, अंतराल और महामंडल होते हैं। इक मंदिरों की विशेषता इनके शिखर हैं जिनके चारों ओर अंग शिखरों की पुनरावृत्ति रहती है।

इन मंदिरों की मूर्तिकला भी इनकी विशेषता है। इन मूर्तियों की केवल संख्या ही स्वंय उल्लेखनीय है। इनके निर्माण में सूक्ष्म कौशल के साथ ही अद्भुत सजीवता दिखलाई पड़ती है। इन कृतियों के विषय भी विविध हैं : प्रधान देवी देवता, परिवारदेवता, गौण देवता, दिक्पाल, नवग्रह, सुरसुंदर, नायिका, मिथुन, पशु और पुष्पलताएँ तथा रेखागणितीय आकृतियाँ। इन मंदिरों में मिथुन आकृतियों की इतनी अधिक संख्या में उपस्थिति का कोई सर्वमान्य हल नहीं बतलाया जा सकता। महोबा से प्राप्त चार बौद्ध प्रतिमाएँ अतीव सुंदर हैं। इनमें से सिंहनाद अवलोकितेश्वर की मूर्ति तो भारतीय मूर्तिकला के सर्वोत्कृष्ट नमूनों में से एक है।

साहित्य के क्षेत्र में कोई विशेष उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई। कुछ चंदेल अभिलेखकाव्य की दृष्टि से अच्छे हैं। चंदेलों के कुछ मंत्रियों और अधिकारियों को लेखों में कवि, बालकवि, कवींद्र, कविचक्रवर्तिन् आदि कहा गया है जिससे चंदेल राजाओं की कवियों को प्रश्रय देने की नीति का बोध होता है। श्रीकृष्ण मिश्र रचित प्रबोधचंद्रोदय नाटक चंदेल राजा कीर्तिवर्मन् के समय की रचना है।


वंशावलीसंपादित करें

सन्दर्भ ग्रन्थसंपादित करें

  • बी.ए. स्मिथ : अलीं हिस्ट्री ऑव इंडिया;
  • सी.वी.वैद्य : हिस्ट्री ऑव मेडिवल हिंदू इंडिया;
  • एन.एस. बोस: हिस्ट्री ऑव दि चंदेलाज;
  • डाइनैस्टिक हिस्ट्री ऑव इंडिया, भाग 2;
  • केशवचंद्र मिश्र : चन्देल और उनका राजत्वकाल;
  • हेमचंद्र रे, मजुमदार तथा पुसालकर : दि स्ट्रगिल फॉर दि एंपायर;
  • एस.के.मित्र : दि अर्ली रूलर्ज ऑव खजुराहो;
  • कृष्णदेव : दि टेंपुल ऑव खजुराहो; ऐंशेंट इंडिया, भाग 15
  • नेमाई साधन बोस : हिस्ट्री ऑव दि चंदेलाज;
  • शिशिरकुमार मित्र : अलीं रूलर्ज ऑव खजुराहो।

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें

खजुराहो के शिलालेख