chipko andolan

पेड को काटने से बचाने के लिये उससे चिपकी ग्रामीण महिला

चिपको आन्दोलन एक पर्यावरण-रक्षा का आन्दोलन है। यह भारत के उत्तराखण्ड राज्य (तब उत्तर प्रदेश का भाग) में किसानो ने वृक्षों की कटाई का विरोध करने के लिए किया था। वे राज्य के वन विभाग के ठेकेदारों द्वारा वनों की कटाई का विरोध कर रहे थे और उन पर अपना परम्परागत अधिकार जता रहे थे। वन विभाग नने खेल-सामग्री निर्माता के एक निनिर्माता को ज़मीन व्यवसायिक इस्तेमाल के लिए आबंटित कर दिया ,इससे गांव वालों में रोष पैदा हो गया ।

यह आन्दोलन तत्कालीन उत्तर प्रदेश के चमोली जिले के भगवानपुर रैनी गॉव् में सन 1972 में प्रारम्भ हुआ। एक दशक के अन्दर यह पूरे उत्तराखण्ड क्षेत्र में फैल गया था। चिपको आन्दोलन की एक मुख्य बात थी कि इसमें स्त्रियों ने भारी संख्या में भाग लिया था। इस आन्दोलन की शुरुवात 1973 में भारत के प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुन्दरलाल बहुगुणा, कामरेड गोविन्द सिंह रावत, चण्डीप्रसाद भट्ट तथा श्रीमती गौरादेवी के नेत्रत्व मे हुई थी। यह भी कहा जाता है कि कामरेड गोविन्द सिंह रावत ही चिपको आन्दोलन के व्यावहारिक पक्ष थे, जब चिपको की मार व्यापक प्रतिबंधों के रूप में स्वयं चिपको की जन्मस्थली की घाटी पर पड़ी तब कामरेड गोविन्द सिंह रावत ने झपटो-छीनो आन्दोलन को दिशा प्रदान की। चिपको आंदोलन वनों का अव्यावहारिक कटान रोकने और वनों पर आश्रित लोगों के वनाधिकारों की रक्षा का आंदोलन था रेणी में 2400 से अधिक पेड़ों को काटा जाना था, इसलिए इस पर वन विभाग और ठेकेदार जान लडाने को तैयार बैठे थे जिसे गौरा देवी जी के नेतृत्व में रेणी गांव की 27 महिलाओं ने प्राणों की बाजी लगाकर असफल कर दिया था।

'चिपको आन्दोलन' का घोषवाक्य है-

क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार।
मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार।

सन 1987 में इस आन्दोलन को सम्यक जीविका पुरस्कार (Right Livelihood Award) से सम्मानित किया गया था!

Maharaja Abhay Singh Ko apni Mahal ke liye ek baar Lakadi ki jarurat Padi aur jab unhen Maloom Hua ki khejroli Gaon Mein paryapt Matra Mein Lakadi hai. To unhone laharon ko bhej diya. Lakadhare khejroli Gaon Mein Lakadi kaatne Lage Ek Mahila Amrita bhai ne indrakaran ko lalkara aur chetavni De ki yah ped nahin kar sakte hain. Yadi yah ped kaatna Hai To to pahle Mujhe kaatna hoga. Maharaja ki Hukum Se Laga darane Amrita bhai ko hatane ke liye Kaha Lekin Amrita bhai Nahin Hoti to use Kat Diya Mamla Shant Nahin hua Amrita bhai ke Baat Unki beti turant ped se Chipak gai Lakadi beti ko bhi Kat Diya is Prakar Amitabh bhai ke 3 betiyon ko Kat Diya Gaya ek ek Karke 363 lo ko Kat Diya Gaya lekin khesari ka ped nahin kar saka. Ise Raja talent bijali to vah aur Apna nirnay Badal liya Rajya Ne ped kaatne Ka Hukum Wapas le liya

आन्दोलन का प्रभावसंपादित करें

इस आंदोलन की मुख्य उपलब्धि ये रही कि इसने केंद्रीय राजनीति के एजेंडे में पर्यावरण को एक सघन मुद्दा बना दिया चिपको के सहभागी तथा कुमाऊँ विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर डॉ.शेखर पाठक के अनुसार, “भारत में 1980 का वन संरक्षण अधिनियम और यहाँ तक कि केंद्र सरकार में पर्यावरण मंत्रालय का गठन भी चिपको की वजह से ही संभव हो पाया।”

उत्तर प्रदेश (वर्तमान उत्तराखण्ड) में इस आन्दोलन ने 1980 में तब एक बड़ी जीत हासिल की, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने प्रदेश के हिमालयी वनों में वृक्षों की कटाई पर 15 वर्षों के लिए रोक लगा दी। बाद के वर्षों में यह आन्दोलन पूर्व में बिहार, पश्चिम में राजस्थान, उत्तर में हिमाचल प्रदेश, दक्षिण में कर्नाटक और मध्य भारत mमें विंध्य तक फैला गया था। उत्तर प्रदेश में प्रतिबंध के अलावा यह आन्दोलन पश्चिमी घाट और विंध्य पर्वतमाला में वृक्षों की कटाई को रोकने में सफल रहा। साथ ही यह लोगों की आवश्यकताओं और पर्यावरण के प्रति अधिक सचेत प्राकृतिक संसाधन नीति के लिए दबाब बनाने में भी सफल रहा।[1]

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

सन्दर्भसंपादित करें

  1. कुमार, सुनील. "चिपको आन्दोलन". स्टडीफ्राई.

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें