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टीकमगढ़जिला मुख्यालय टीकमगढ़ है। शहर का मूल नाम 'टेहरी' था, जो अब पुरानी टेहरी के नाम से जाना जाता है। 1783 ई ओरछा विक्रमजीत (1776 - 1817 CE के शासक) ने ओरछा से अपनी राजधानी टेहरी जिला टीकमगढ़ में स्थानांतरित कर दी थी। टीकमगढ़ टीकम (श्री कृष्ण का एक नाम)से टीकमगढ़ पड़ा। टीकमगढ़ जिला बुंदेलखंड क्षेत्र का एक हिस्सा है। यह जामनी, बेतवा और धसान की एक सहायक नदी के बीच बुंदेलखंड पठार पर है।

टीकमगढ़
टेहरी
टीकमगढ़ की तालकोठी
टीकमगढ़ की तालकोठी
देशFlag of India.svg भारत
राज्यमध्य प्रदेश
क्षेत्रबुन्देलखण्ड
जिलाtikamgarh जिला
नाम स्रोतटीकम = कृष्ण
शासन
 • सभानगरपालिका
 • अध्यक्षलक्ष्मी-राकेश गिरि
(BJP)
क्षेत्रफल
 • कुल21 किमी2 (8 वर्गमील)
ऊँचाई349.170 मी (1,145.571 फीट)
जनसंख्या (2011)[1]
 • कुल79
 • घनत्व3,800 किमी2 (9,800 वर्गमील)
Languages
 • Officialहिन्दी, बुन्देली
समय मण्डलIST (यूटीसी+5:30)
PIN472001 (HPO)
Telephone code91 7683
वाहन पंजीकरणMP-36
Coastline0 किलोमीटर (0 मील)
Sex ratio0.911[2] /
Literacy85.02%[3]
Distance from नई दिल्ली500 किलोमीटर (310 मील) N (land)
वेबसाइटtikamgarh.nic.in

इस जिले के अंतर्गत क्षेत्र ओरछा के सामंती राज्य के भारतीय संघ के साथ अपने विलय तक हिस्सा था। ओरछा राज्य रुद्र प्रताप द्वारा 1501 में स्थापित किया गया था। विलय के बाद, यह 1948 में विंध्य प्रदेश के आठ जिलों में से एक बन गया। 1 नवम्बर को राज्यों के पुनर्गठन के बाद, 1956 यह नए नक्काशीदार मध्य प्रदेश राज्य के एक जिले में बन गया। मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले में स्थित एक गाँव है। इस गाँव का नाम यहां स्थित प्रसिद्ध दुर्ग (या गढ़) के नाम पर गढ़-कुंडार पढ़ा है। गढ कुण्डार का प्राचीन नाम गढ कुरार है। गढ़-कुंडार किला उस काल की न केवल बेजोड़ शिल्पकला का नमूना है बल्कि ऐतिहासिक समृद्धि का प्रतीक भी है।इस किले के इतिहास एवं संपूर्ण रुप से जानकारी हेतु जानने के लिये उपन्यासकार वृंदावनलाल वर्मा का लिखा हुआ उपन्यास "गढ़कुँढार" पढ़ा जा सकता है. गढ़कुंडार किले का सम्बन्ध चंदेल और खंगार नरेशों से रहा है, परंतु इसके पुनर्निर्माण और इसे नई पहचान देने का श्रेय खंगारों को जाता है। वर्तमान में खंगार क्षत्रिय समाज के परिवार गुजरात, महाराष्ट्र के अलावा उत्तर प्रदेश में निवास करते हैं। 12वीं शताब्दी में पृथ्वीराज चौहान के प्रमुख सामंत खेतसिंह खंगार ने परमार वंश के गढ़पति शिवा को हराकर इस दुर्ग पर कब्जा करने के बाद खंगार राज्य की नींव डाली थी।

छोटी देवी जी(नन्ही भुवानी) टीकमगढ़।

शहर के बीचों बीच श्री श्री 1008 श्री जानकी रमण मंदिर(श्री ठाकुर गोविंद जू विराजमान) छोटी देवी के अंदर टीकमगढ़ में स्थित हैं। यह मंदिर टीकमगढ़ में पपौरा चौराहा के समीप बुख़ारिया जी की गली में है। छोटी देवी मंदिर में प्रत्येक नवरात्रि में नौ दिनों के लिये भव्य मेला लगाया जाता हैं।

अनुक्रम

टीकमगढ़संपादित करें

जिले के तीन उप में विभाजित-विभाजन है, जो आगे छह तहसीलें में विभाजित किया जाता है। टीकमगढ़ उप विभाजन शामिल टीकमगढ़ और बल्देवगढ़ तहसीलें. निवाडी और पृथ्वीपुर तहसीलें निवाडी उप विभाजन फार्म जबकि जतारा उप विभाजन जतारा, पलेरा और लिधौरा तहसीलें शामिल हैं। जिले के छह विकास खंडों, अर्थात् टीकमगढ़, बल्देवगढ़, जतारा, पलेरा, निवाडी, पृथ्वीपुर शामिल है।

बेतवा नदी जिले की पूर्वी सीमा के साथ बहती है उसकी सहायक नदियों में से एक के उत्तर पश्चिमी सीमा के साथ बहती है। बेतवा की सहायक नदियों इस जिले से बह जामनी, बागड़ी और बरुआ हैं।

टीकमगढ़ क्षेत्र के कुछ प्रमुख स्थानसंपादित करें

बड़े महादेवसंपादित करें

ग्राम उपरारा जेवर, टीकमगढ़ में यह प्राचीन मंदिर बीच बस्ती में स्थित है, जिसमें शंकरजी की केवल एक पिंडी थी। उस पिंडी के आस-पास कई पिंडियां भूमि से स्वयं प्रकट हो गयीं, जो प्रति वर्ष बढ़ती जाती हैं। संप्रति तीन पिंडियां बहुत बड़ी हैं, तीन मझोली हैं और दो निकल रही हैं। यह स्थान रानीपुर रोड स्टेशन से ४ मील दक्षिण में है। (निवाडी जिले में)

तथा इसके साथ ही महावीरन मन्दिर की मान्यता अत्यधिक है क्योंकि यहाँ सर्प से कटे हुए व्यक्तियों का सही हो जाना विख्यात हैं। जो उपरारा ग्राम पंचायत का मन्दिर है तथा रानीपुर मार्ग पर स्थित हैं।

इसके अलावा ग्राम पंचायत उपरारा के नाम के साथ ही एक कवि का नाम जुड़ता है जो युवाओ एवं समाज के लिए चेतना का काम करता है । जो अजबेन्द्र खंगार के नाम से अपने बुंदेलखंड मे बेशुमार हस्तियों मे से एक है।

बगाज माता मंदिर वकपुरा सुन्दरपुरसंपादित करें

टीकमगढ़ जिला मुख्यालय से बुडेरा मार्ग पर वकपुरा नामक एक गांव स्थित है। इसी गांव के पास हरी भरी पहाडि़यों के बीच विद्या की देवी सरस्वती जी का मंदिर है। जिसे बगाज माता के नाम से जाना जाता है। यह करीब 1100 वर्ष प्राचीन है। देवी मंदिर गांव से करीब 2 कि0मी0 दूर पहाडि़यों के बीच है। माना जाता है कि आज से करीब 500 वर्ष पूर्व वकपुरा गांव के लोगों ने इस पवित्र स्थल की पहचान कर यहां आना जाना शुरु किया।

अहार जीसंपादित करें

बल्देवगढ़ तहसील का यह गांव जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर दूर टीकमगढ़-छतरपुर रोड पर स्थित है। यह गांव जैन तीर्थ का प्रमुख केन्द्र कहा जाता है। अनेक प्राचीन जैन मंदिर यहां बने हैं, जिनमें शांतिनाथ मंदिर प्रमुख है। इस मंदिर में शांतिनाथ की 20 फीट की प्रतिमा स्थापित है। एक बांध के साथ चंदेल काल का जलकुंड यहां देखा जा सकता है। इसके अलावा श्री वर्द्धमान मंदिर, श्री भेरू मंदिर, श्री चन्द्रप्रभु मंदिर, श्री पार्श्‍वनाथ मंदिर, श्री महावीर मंदिर, बाहुबली मंदिर और पंच पहाड़ी मंदिर यहां के अन्य लोकप्रिय मंदिर हैं। बाहुबली मंदिर में भगवान बाहुबली की 15 फीट ऊंची मूर्ति स्थापित है।

पपौरा जीसंपादित करें

टीकमगढ़ से ५ किलोमीटर दूर सागर टीकमगढ़ मार्ग पर पपौरा जी जैन तीर्थ है, जो कि बहुत प्राचीन है और यहाँ १०८ जैन मंदिर हैं जो कि सभी प्रकार के आकार मैं बने हुए जैसे रथ आकार और कमल आकार यहाँ कई सुन्दर भोंयरे है।

बंधा जीसंपादित करें

एक बार एक संवत् 1890 में कलाकार मूर्तियों को बेचने के लिए 'बम्होरी जा रहा था। अचानक बैलगाड़ी बम्होरी के पास एक पीपल का पेड़ के पेड़ के पास रुक गई और उसने अनपे सभी प्रयासों को बेकार पाया और गाड़ी को आगे नहीं ले जा पाया पर जब कलाकार ने फैसला किया कि वह में मूर्ति स्थापित 'बंधा जी क्षेत्र' में स्थापित करेगा और उसकी गाड़ी बंधा जी की ओर बढ़ शुरू कर दिया यह मूर्ति अब भी बंधा जी के विशाल मंदिर में स्थापित है।

अछरू मातासंपादित करें

टीकमगढ़-निवाड़ी रोड पर स्थित तहसील पृथ्वीपुर के पास मडिया ग्राम से 3 किलोमीटर दूर पहाड़ी पर स्थित अछरू माता का मंदिर है। इस पहाड़ी पर स्थित अछरू माता का मंदिर बहुत चर्चित है। मंदिर एक कुंड के लिए भी प्रसिद्ध है जो सदैव जल से भरा रहता है। हर साल नवरात्रि के अवसर पर ग्राम पंचायत की देखरेख में मेला लगता है। जहां हजारों की संख्या में भीड़ आती है। जिसमें दूर-दूर से लोग आकर शिरकत करते हैं। माना जाता है कि इस कुंड से माता अपने भक्तों को कुछ न कुछ देती है जैसे गरी,दही,फल आदि। जिस भक्त को माता रानी के द्वारा (कुंड के माध्यम से) कुछ ना कुछ फल दिया जाता है उस का कार्य पूरा होता है। ग्राम मडिया,तहसील पृथ्वीपुर,जिला टीकमगढ़ में है। यहां मूर्ति नहीं है, एक कुंड के आकार का गड्ढा है। यहां चैत्र-नवरात्र में प्राचीनकाल से मेला लगता आ रहा है।

बल्देवगढ़संपादित करें

यह नगर टीकमगढ़-छतरपुर सड़क पर टीकमगढ़ से 26 किलोमीटर दूर स्थित है। खूबसूरत ग्वाल सागर कुंड के ऊपर बना पत्थर का विशाल किला यहां का मुख्य आकर्षण है। इस किले का विशाल मुख्य द्वार आकर्षक है एवं सात द्वार किले में प्रवेश हेतु बनाये गये थे.प्रथम प्रवेश द्वार के पहले एक पहरेदारकक्ष एवं संकरा पुल जो किले के तीन तरफ बनी खाई को पाटकर अंदर किले में ले जाता था.खाई में काँटेदार केक्टस,केवड़ा आदि जलीय पेड़ लगाये गये थे ताकि दुश्मन प्रवेश करे तो पुल पर से नीचे गिरा दिया जाये .वहाँ इन पेड़ों में जहरीले अजगर,विभिन्न सर्प मौजूद रहा करते थे.तालाब का पानी इस खाई में भरा रहने से किला अभेद्य होता था . अगला दूसरा द्वार पहरेदारों के खड़े होने के लिये काफी चौड़ा था फिर तीन द्वार और पीछे तक जाने के लिये बने हैं वहाँ एक काला खड़ा पहाड़ है जो तालाब को गहराई देता है.एक पुरानी और विशाल बंदूक आज भी किले में देखी जा सकती है। यहाँ पर एक बड़ी तोप जिसका नाम गर्भगिरावनी तोप था, क्योंकि कहा जाता है कि जब यह तोप युद्ध के समय चलती थी,तब इसके वेग से गर्भवती माताओं के गर्भ गिर जाते थे.एवं कुछ अन्य छोटीं तोपें,इनके ऐतिहासिक महत्व एवं सुरक्षा को देखते हुये भोपाल के म्यूजियम में पहुँचा दीं गईं हैं.इसी तोप के नाम पर यहाँ कहावत बनी "बल्देवगढ़ की तोप अर्थात बहुत बड़ी हस्ती, किले के दक्षिणी छोर पर तालाब के तट पर खंडहर होते हुये हिस्से में अत्यंत प्राचीन बलदेव जी का मंदिर है जिनके नाम से बलदेवगढ़ पड़ा.किले ऊपरी हिस्से में सात मढ़ियाँ बनी हुयीं हैं जिनसे झाँटने पर चारोंओर का नजारा लिया जा सकता है.यहाँ से 4 कि.मीं. दूर टीकमगढ़ रोड पर विंध्यवासिनी देवी मंदिर बलदेवगढ़ का लोकप्रिय मंदिर है। चैत के महीने में सात दिन तक चलने वाले विन्ध्यवासिनी मेला यहां लगता है। यहां पान के पत्तों का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता है।यदि इस स्थान को पर्यटन की दृष्टि से सुरक्षित किया जाये यहाँ बहुत सुँदर पुरातत्व से भरपूर किला,बावड़ी एवं सामग्री मिल सकती है

जतारासंपादित करें

टीकमगढ़ से 40 किलोमीटर दूर टीकमगढ़-मऊरानीपुर रोड पर यह नगर स्थित है। नगर की मदन सागर झील काफी खूबसूरत है। इस लंबी-चौड़ी झील पर दो बांध बने हैं। इन बांधों को चन्देल सरदार मदन वर्मन ने 1129-67 ई. के आसपास बनवाया था। जतारा में अनेक मुस्लिम इमारतों को भी देखा जा सकता है। यहाँ सुल्ताने बुन्देलखण्ड हजरत ख्वाजा रूकनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है जहा प्रतिवर्ष उर्स होता है! यही पर शेरे बुन्देलखण्ड हजरत शेख अब्दुल राशिद "अब्दाल शाह बाबा" की पैदाइस हुई जिनकी दरगाह चन्देरी में स्थित है। यहाँ हजरत मुश्किले आसान, कदम रसूल, ताल बाले बाबा, मामू सैय्यद, हजरत अब्दुल्लाह सैय्यद आदि मजारे है। यहाँ किलेवाली शाही मस्जिद जो 700 से 900 साल पुरानी मानी जाती है !

माँ गिद्धवाहिनी मंदिर गढ़कुडारसंपादित करें

यह निवाड़ी तहसील का लोकप्रिय गांव है। यह प्रथम स्थल है जिसे बुन्देलों ने खांगरों से हासिल किया था। 1539 तक यह स्थान राज्य की राजधानी था। इस गांव में एक छोटी पहाड़ी के ऊपर महाराज बीरसिंह देव द्वारा बनवाया गया किला देखा जा सकता है। देवी महा माया ग्रिद्ध वासिनी मंदिर भी यहीं स्थित है। मंदिर में सिंह सागर नाम का विशाल कुंड है। हर सोमवार को यहां बाजार लगता है।

कुंडेश्‍वरसंपादित करें

टीकमगढ़ से 5 किलोमीटर दक्षिण में जामदर नदी के किनारे यह गांव बसा है। गांव कुंडदेव महादेव मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि मंदिर के शिवलिंग की उत्पत्ति एक कुंड से हुई थी। गांव के दक्षिण में बारीघर नामक एक खूबसूरत पिकनिक स्थल और आकर्षक ऊषा वाटर फॉल है। विनोबा संस्थान और पुरातत्व संग्रहालय भी यहां देखा जा सकता है

मडखेरासंपादित करें

सूर्य मंदिर के लिए विख्यात मडखेरा टीकमगढ़ से 20 किलोमीटर उत्तर पश्चिमी हिस्से में स्थित है। मंदिर का प्रवेशद्वार पूर्व दिशा की ओर है तथा इसमें भगवान सूर्य की प्रतिमा स्थापित है। इसके निकट ही एक पहाड़ी पर बना विन्ध्य वासिनी देवी का मंदिर भी देखा जा सकता है।

ओरछासंपादित करें

बेतवा नदी तट पर बसा पृथ्वीपुर तहसील के यह बगल में यह तहसील उत्तर प्रदेश के झाँसी से 15 किलोमीटर की दूरी पर है। काफी लंबे समय तक राज्य की राजधानी रहे ओरछा की स्थापना महाराजा रूद्र प्रताप ने 1531 ई. में की थी। ओरछा को हिन्दुओं का प्रमुख धार्मिक केन्द्र माना जाता है। राजा राम मंदिर, जहाँगीर महल, चतुर्भुज मंदिर, लक्ष्मी मंदिर, फूलबाग, शीशमहल, कंचन घाट, चन्द्रशेखर आजाद मैमोरियल, हरदौल की समाधि, बड़ी छतरी, राय प्रवीन महल और केशव भवन ओरछा के प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं।

हजरत इलहान शाह बाबा रहमत उल्लाह अलैह नजरबागसंपादित करें

मुस्लिम श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केन्द्र हजरत इलहान शाह बाबा रहमत उल्लाह अलैह सन् 1802 में टीकमगढ़ में तशरीफ लाये और नजरबाग में अपना मुकाम बना लिया। वह बाबा साहब के पास जो श्रद्धालु जाते बाबा साहब की दुआओं से उनकी मनोकामएं पूर्ण होती।

हजरत ख्वाजा रुकुनुद्दीन चिश्ती रहमत उल्लाह अलैह जतारासंपादित करें

हजरत ख्वाजा रुकुनुद्दीन चिश्ती रहमत उल्लाह अलैह सन् 1200 में जतारा तशरीफ लाये ओर नगर के किनारे से बहने वाली नहर के पास एक जगह अपना मकाम बनाया। जतारा नगर के रहने वाले शेख परिवार के एक हजरत, ख्वाजा की खिदमत किया करते थे। कई वर्षों के बाद शेख साहब ने ख्वाजा साहब से मुराद मांगी की उन्हें भी अपनी दुआओं से नवाज दिया जाए।

हजरत दाता इलाहीशाह बाबा रहमत उल्लाह अलैह बड़ी मजार टीकमगढ़संपादित करें

हजरत दाता इलाहीशाह बाबा रहमत उल्लाह अलैह एक ऐसे बली थे जिनके दर पर सदैव समाज के हर वर्ग के लोग अपनी मन्नतें लेकर आते और बाबा साहब की दुआओं से उनकी मनोकामनायें कबूल होती। आज भी यह एक ऐसा स्थान है जहां हिन्दू-मुस्लिम व सभी धर्मो के लोग अपनी मनोकामनायें लेकर श्रृद्धापूर्वक जाते और उनकी मनोकामनायें पूर्ण होती। पिछले 68 वर्षों से बाबा साहब की दरगाह पर 4-5 व 6 अप्रैल को उर्स का आयोजन किया जाता है।

हजरत अब्दाल शाह बाबासंपादित करें

हजरत अब्दाल शाह का पूरा नाम हजरत शेख अब्दुल रासिद है जिनकाजन्म 900 साल पहले जतारा शरीफ हुआ था। इनकी चिल्लागाह अब्दालिया मौहल्ला में है। यहीं पर एक मस्जिद अब्दालिया तथा मदरसा आजाद ईस्लामिसा दारुल उलुम स्थित है। अब्दालिया मौहल्ले में प्रतिवर्ष एक मेले का आयोजन होता है। माना जाता है कि ये मेला 900 सालों से यानि अब्दाल साहब के जन्म के बाद से लगाया जाता! इनका मेला मुबारक शहर से 5 किमी दूर अब्दा पहाड़ी पर लगाया जाता है। यही पर बाबा की इबादतगाह और घर है जो ठीक हालात में है। इसी पहाड़ी पर शेर की गुफा , बाबा के घोड़े की टाप, कुण्ड आदि है।

bhelsi Khargapur

सन्दर्भसंपादित करें

  1. http://www.censusindia.gov.in/pca/SearchDetails.aspx?Id=481687
  2. "Tikamgarh Population Census 2011". Census 2011 - Census of India.
  3. "Tikamgarh Population Census 2011". Census 2011 - Census of India.

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें