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डूंगरपुर राजस्थान के दक्षिण में बसा एक नगर है। यहां से होकर बहने वाली सोम और माही नदियां इसे उदयपुर और बांसवाड़ा से अलग करती हैं। पहाड़ों का नगर कहलाने वाला डूंगरपुर में जीव-जन्तुओं और पक्षियों की विभिन्न प्रजातियां पाई जाती हैं। डूंगरपुर, वास्तुकला की विशेष शैली के लिए जाना जाता है जो यहां के महलों और अन्य ऐतिहासिक भवनों में देखी जा सकती है।

डूंगरपुर
नगर
डूंगरपुर का हवाई दृष्य
डूंगरपुर का हवाई दृष्य
डूंगरपुर की राजस्थान के मानचित्र पर अवस्थिति
डूंगरपुर
डूंगरपुर
राजस्थान में डूंगरपुर की स्थिति
डूंगरपुर की भारत के मानचित्र पर अवस्थिति
डूंगरपुर
डूंगरपुर
डूंगरपुर (भारत)
निर्देशांक: 23°50′N 73°43′E / 23.84°N 73.72°E / 23.84; 73.72निर्देशांक: 23°50′N 73°43′E / 23.84°N 73.72°E / 23.84; 73.72
देशFlag of India.svg भारत
राज्यराजस्थान
जिलाडूंगरपुर
संस्थापकराजा डूंगर सिंह
नाम स्रोतदूंगर सिंह
शासन
 • सभाडूंगरपुर नगरपालिका
ऊँचाई225 मी (738 फीट)
जनसंख्या (2011)
 • कुल47
भाषाएँ
 • आधिकारिकहिन्दी
 • Spokenवागडी
समय मण्डलIST (यूटीसी+5:30)
Telephone code02964 ******
वाहन पंजीकरणRJ 12
Sex ratio1:1 /
वेबसाइटdungarpur.rajasthan.gov.in

अनुक्रम

इतिहाससंपादित करें

इसकी स्थापना 13 वी शताब्दी मे राजा डूँगरीया भील ने की थी। रावल वीर सिंह नेे भील प्रमुख डुंगरिया को हराया जिनके नाम पर इस जगह का नाम डूंगरपुर पड़ा था। 1818 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने इसे अपने अधिकार में ले लिया। यह जगह डूंगरपुर प्रिंसली स्टेट की राजधानी थी।

मुख्य आकर्षणसंपादित करें

 
डूंगरपुर की हवेली जूना महल

जूना महलसंपादित करें

सफेद पत्थरों से बने इस सातमंजिला महल का निर्माण १३वीं शताब्दी में हुआ था। इसकी विशालता को देखते हुए यह महल से अधिक किला प्रतीत होता है। इसका प्रचलित नाम पुराना महल है। इस महल का निर्माण तब हुआ था जब मेवाड़ वंश के लोगों ने अलग होकर यहां अपना साम्राज्य स्थापित किया था। महल के बाहरी क्षेत्र में बने आने जाने के संकर रास्ते दुश्मनों से बचाव के लिए बनाए गए थे। महल के अंदर की सजावट में कांच, शीशों और लघुचित्रों का प्रयोग किया गया था। महल की दीवारों और छतों पर डूंगरपुर के इतिहास और 16वीं से 18वीं शताब्दी के बीच राजा रहे व्यक्तियों के चित्र उकेरे गए हैं। इस महल में केवल वे मेहमान की आ सकते हैं जो उदय विलास महल में ठहरे हों।

देव सोमनाथसंपादित करें

 
देव सोमनाथ मंदिर

दियो सोमनाथ डूंगरपुर से 24 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में स्थित है। दियो सोमनाथ सोम नदी के किनार बना एक प्राचीन शिव मंदिर है। मंदिर के बार में माना जाता है कि इसका निर्माण विक्रम संवत 12 शताब्दी के आसपास हुआ था। सफेद पत्थर से बने इस मंदिर पर पुराने समय की छाप देखी जा सकती है। मंदिर के अंदर अनेक शिलालेख भी देखे जा सकते हैं।

संग्रहालयसंपादित करें

इस संग्रहालय का पूरानाम है राजमाता देवेंद्र कुंवर राज्य संग्रहालय और सांस्कृतिक केंद्र। यह संग्रहालय 1988 में आम जनता के लिए खोला गया था। यहां एक खूबसूरत शिल्प दीर्घा है। इस दीर्घा में तत्कालीन वगद प्रदेश की इतिहास के बार में जानकारी मिलता है। यह वगद प्रदेश आज के डूंगरपुर, बंसवाड़ा और खेड़वाड़ा तक फैला हुआ था। समय: सुबह 10 बजे-शाम 4.30 बजे तक, शुक्रवार और सरकारी अवकाश के दिन बंद

गैब सागर झीलसंपादित करें

इस झील के खूबसूरत प्राकृतिक वातावरण में कई पक्षी रहते हैं। इसलिए यहां बड़ी संख्या में पक्षियों को देखने में रुचि रखने वाले यहां आते हैं। झील के पास ही श्रीनाथजी का प्रसिद्ध मंदिर है। मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर के अलावा कई छोटे-छोटे मंदिर हैं। इनमें से एक मंदिर विजय राज राजेश्वर का है जो भगवान शिव को समर्पित है।

निकटवर्ती दर्शनीय स्थलसंपादित करें

बड़ौदासंपादित करें

(41 किलोमीटर) डूंगरपुर से 41 किलोमीटर दूर बड़ौदा वगद की पूर्व राजधानी थी। यह गांव अपने खूबसूरत और ऐतिहासिक मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। इनमें से सबसे ज्यादा लोकप्रिय है सफेद पत्थरों से बना शिवजी का प्राचीन मंदिर। इस मंदिर के पास एक कुंडली है जिस पर संवत 1349 अंकित है। गांव के बीच में एक पुराना जैन मंदिर है जो मुख्य रूप से पार्श्‍वनाथ को समर्पित है। मंदिर की काली दीवारों पर 24 जन र्तीथकरों को उकेरा गया है।

बानेश्वरसंपादित करें

(60 किलोमीटर)

बानेश्वर मंदिर डूंगरपुर से 60 किलोमीटर दूर है। इस मंदिर में इस क्षेत्र का सबसे प्रसिद्ध और पवित्र शिवलिंग स्थापित है। यह मंदिर सोम और माही नदी के मुहाने पर बना है। इस दो मंजिला भवन में बारीकी से तराशे गए खंबे और दरवाजे हैं। माघ शुक्ल एकादशी से माघ शुक्ल पूर्णिमा तक यहां एक मेला लगता है। शिव मंदिर के पास ही भगवान विष्णु का मंदिर है। एक अनुमान के अनुसार इस मंदिर का निर्माण 1793 ई. में हुआ था। इस मंदिर के बारे में माना जाता है कि इसी जगह भगवान कृष्ण के अवतार माव्जी ने ध्यान लगाया था। यहां पर एक और मंदिर भी है जो ब्रह्माजी को समर्पित है।

गलीयाकोटसंपादित करें

(58 किलोमीटर) माही नदी के किनार बसा गलीयाकोट गांव डूंगरपुर से 58 किलोमीटर दक्षिण पूर्व में स्थित है। एक जमाने में यह परमारों की राजधानी हुआ करता था। आज भी यहां पर एक पुराने किले के खंडहर देखे जा सकते हैं। यहां पर सैयद फखरुद्दीन की मजार है। उर्स के दौरान पूरे देश से हजारों दाउद बोहारा श्रद्धालु आते हैं। यह उर्स प्रतिवर्ष माहर्रम से 27वें दिन मनाया जाता है। सैयद फखरुद्दीन धार्मिक व्यक्ति थे और घूम-घूम कर ज्ञान का प्रचार-प्रसार करते थे। इसी क्रम में गलीकोट गांव में उनकी मृत्यु हुई थी। इस मजार के अलावा भी इस जिले में अन्य महत्वपूर्ण स्थान भी हैं जैसे मोधपुर का विजिया माता का मंदिर और वसुंधरा का वसुंधरा देवी मंदिर।

आवागमनसंपादित करें

वायु मार्ग

निकटतम हवाई अड्डा उदयपुर (110 किलोमीटर)

रेल मार्ग
डूंगरपुर में रेलवे स्टेशन है, नजदीकी में उदयपुर रेलवे स्टेशन है जो कि 106 किलोमीटर पर है। दूसरा नजदीकी रेलवे स्टेशन रतलाम (184 किलोमीटर, मध्यप्रदेश में) है जो देश के सभी प्रमुख शहरों से जुड़ा है।
सड़क मार्ग

डूंगरपुर को राजस्थान के अन्य शहरों और उत्तर भारत के राज्यों से जोड़ने वाली अनेक सड़कें हैं। राज्य परिवहन की बसें और निजी बसें इन शहरों से डूंगरपुर के बीच चलती हैं।

आदिवासीसंपादित करें

राजस्थान के डूंगरपुर, बांसवाड़ा और उदयपुर का मिला जुला क्षेत्र "वागड़" कहलाता है। वागड़ प्रदेश अपने उत्सव प्रेम के लिए जाना जाता है। यहां की मूल बोली "वागड़ी" है। जिस पर गुजराती भाषा का प्रभाव दिखाई देता है। वागड़ प्रदेश की बहुसंख्यक आबादी भील आदिवासियों की है। वहा पर कलाल समाज के भी लोग रहते है| यह इलाका पहाड़ों से घिरा हुआ है| इन्हीं के तो बीच इन आदिवासियों का घेरा है|

इन लोगो के बारे में कहा जाए तो, वे दुनिया की बातों से अजनबी है| वे अपने ही लोगो में रहते है| जैसे कहा गया है की, वे दुनिया के वास्तविकता से कोई तालुक्कात नहीं करते लेकिन, गुजरात पास में है तो काम के सिलसिले में अहमदाबाद में पलायन होता है और नेशनल हाईवे की स्थित में ही इलाका होने के नाते लोग अब जानने लगे है|

इनमे देखा जाए तो वे एक दुसरे के लिए हमेशा मदद के लिए तैयार होते है| यही इनकी विशेषता है| जैसे शादी की बात की जाए तो लोगो के मदद की वजह से शादी की विधि पूरी की जाती है| शादी के हल्दी की रस्म में जो कोई हल्दी लगाने दूल्हा या दुल्हन को लगाने आते है, हर कोई अपने अपने हिसाब से पैसे देते है और उसीसे से शादी की आगे की रस्म पूरी की जाती है|

हमारी भारतीय संस्कृती पुरुषप्रधान मानी जाती है| लेकिन इन्ही लोगो में औरते और पुरुष एक जैसे ही माने जाते है| लड़के और लडकियों को अपने पसंदीदार व्यक्ति को चुनने की संमती होती है| जैसे अप्रैल महीने में “भगोरिया” नाम का त्यौहार होता है| इनमे लड़के लडकिया मेले में आते है आते है, इस मेले में वे अपने पसंदीदार व्यक्ति को चुनके शादी की जाती है|

भाषा

यहाँ की भाषा अगर जानो तो वागडी में बोली में बोली जाती है| यह भाषा थोडीसी गुजराती तथा हिंदी भाषा से मिलती-जुलती है| वैसे तो पास में ही २५ किलोमीटर की दुरी पर गुजरात है| इस वजह से भाषा उनसे मिलती जुलती है|

यहाँ पर महुआ नाम की शराब बनाई जाती है| जब महुआ के पेड़ पर फूल आते है, तो बड़े से लेकर छोटे बच्चो तक महुआ के फूलो को बिनते है और उसके बाद उसपर महुआ जाती है|

शिक्षा अब इन्ही लोगोमे बढ़ रही है, स्कूल में लडकियों की संख्या ज्यादा से ज्यादा दिखेगी | ज्यादा करके बच्चे वहापर शिक्षक-शिक्षक की बनने की रूचि रखते है|

बिच्छिवारा के इलाके में नागफणी नाम का मंदिर है जो जैन धर्म लोगो के दैवत है| चुंडावाडा और कनबा नाम के गाव लोगो में जानामाना है क्योंकि वहा का हर घर पढ़ा-लिखा है| कनबा गाव में ज्यादा से ज्यादा शिक्षको के घर स्थित है| उसके अलावा वकील, डाक्टरी की हुई लोग भी वहापर रहते है| चुंडावाडा में चुंडावाडा नाम का महल जानामाना है|

पर्व

इनके लिए होली यह सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है, होली के पंधरा दिन पहले ही ढोल बजाये जाते है| होली दे दिन में लड़के-लडकिया नृत्य करते है, जिसे गैर नाम से जाना जाता है।

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

  • पाटीदार समाज-

डूंगरपुर, बांसवाड़ा व उदयपुर में पाटीदार समाज भी है, जो कि गुजरात से यहां पर स्थापित हुआ है। इनमे लऊवा पाटीदार व कडुआ पाटीदार दोनों ही निवास करते है। गांवों में यह समाज बहुतायात स्थापित है।

  • ब्राह्मण समाज -

डूंगरपुर, बांसवाड़ा व उदयपुर में ब्राह्मण समाज भी है, जो कि जोशी, पंड्या, उपाध्याय, पुरोहित, शर्मा इस प्रकार कई ब्राह्मण रहते है।

बाहरी कड़ियांसंपादित करें