नारनौल (Narnaul) भारत के हरियाणा राज्य के महेंद्रगढ़ ज़िले में स्थित एक नगर है। यह ज़िले का मुख्यालय भी है। शहर का दूरभाष कोड 91-1282, पिनकोड 123001 और वाहन रेजिस्ट्रेशन कोड HR 35 है।[1][2][3]

नारनौल
Narnaul
नारनौल का जल महल
नारनौल का जल महल
नारनौल is located in हरियाणा
नारनौल
नारनौल
हरियाणा में स्थिति
निर्देशांक: 28°02′38″N 76°06′22″E / 28.044°N 76.106°E / 28.044; 76.106निर्देशांक: 28°02′38″N 76°06′22″E / 28.044°N 76.106°E / 28.044; 76.106
देश भारत
राज्यहरियाणा
ज़िलामहेंद्रगढ़ ज़िला
जनसंख्या (2001)
 • कुल74,581
भाषा
 • प्रचलितहरियाणवी, पंजाबी, हिन्दी
समय मण्डलIST (यूटीसी+5:30)
महावीर चौक

नारनौल के इतिहास और नामकरण को लेकर कोई प्रमाणीक तथ्य नही मिलते, इसलिए विद्वान एकमत नही है। लेकिन यह एक एतहासिक नगर है, इस बात से सभी इतफाक रखते है। इसकी स्थापना और नामकरण को लेकर अनेक किवदंतयां और गाथाएं प्रचत है। यहाँ के प्राचीन सूयानारायण मंदिर मे मिले एक शिलालेख मे इसका नामोलेख नंदिग्राम् के रूप मे किया गया है। भागवत पुराण मे भी नंदिग्राम् का जिक्र है। इसलिए इस नगर को द्वापर-कालीन कहा जाता है। पौराणीक गाथाओं के अनुसार नारनौल नगर महाभारत काल नरराश्ट्र् के रूप मे जाना जाता था। यह भी प्रचलित है कि यह इलाका पहले भारजंगल से ढका हुआ था और शेरो का ठिकाना था| जंगल साफ़ करके यहाँ नगर बसाया गया इसलिए इसका नाम नाहर नौल रखा गया जो कालांतर मे नारनौल हो गया।

एक मान्यता यह भी है कि करीब एक हजार वषपूर्व दिल्ली के शासक अनंगपाल तंवर के रिस्तेदार राजा नूनकरण ने इस नगर को आबाद किया। राजा नूनकरण के समय नारनौल एक व्यापारिक केन्द्र् के रूप मे जाना जाता था। मुग़ल बादशाह बाबर ने अपनी पुतक 'तुज़क-ए-बाबरी' मे यहाँ कपास मंडी होने का उल्लेख किया है, जिससे यह जाहिर होता है कि यहाँ कपास कि खेती होती थी। बाबर ने यहाँ के बाजारों का चर्चा "गुदड़ी" के नाम से किया है। बारहवीं शताब्दी के पहले दो दशक तक यहाँ राजपूतों का शासन रहा 12वीं शताब्दी के तीसरे दशक मे मुस्लिम संत हजरत तुर्कमान यहाँ आया और उसके साथ ही मुसलमानो का यहाँ प्रभाव बढ़ने लगा, और नारनौल मुस्लिम के आधिपत्य मे आ गया।

पंद्रहवीं शताब्दी के नारनौल मुगलो के हाथो से निकल कर सूर अफगानो के नियंत्रण मे आ गया। सबसे पहले शेरशाह सूरी के दादा इब्राहिम खान यहाँ आये उन्हे फिरोज़-ए-हिसार के शासक ने नारनौल और इसके आसपास का क्षेत्र दिया था। इब्राहिम सूर का मकबरा आज भी नारनौल मे मौजूद है, और नारनौल के सभी स्मारको से बेहतर स्थिति में है। इब्राहिम सूर की मौत के बाद उसका बेटा और शेरशाह सूर का पिता हसनखान नारनौल का जागीरदार बना। इतहासकार वी.स्मिथ के अनुसार शेरशाह का जन्म भी नारनौल मे हुआ था।

पानीपत की दूसरी लड़ाई के बाद यह इलाका अकबर के नियंत्रण में था। उसने सम्राट हेमू को गिरफ्तार करने के इनाम के तौर पर इसे शाह कुल खान को दे दिया। इस प्रकार शाह कुली खान यहाँ का जागीरदार बना, जिसने नारनौल में जलमहल का निर्माण करवाया। अकबर के शासनकाल मे यहाँ राय बालमुकुन्द के छत्ते का निर्माण हुआ, जिसे बीरबल का छत्ता के नाम से जाना जाता है। अकबर के ज़माने मे नारनौल मे सिक्के बनाने की टकसाल भी स्थापित की गई थी, जिसका कामकाज देखने के लिए राजा टोडरमल भी यहाँ आते-जाते थे।

औरंगजेब के शासन तक यहाँ अमन और शान्ति थी, किन्तु औरंगजेब के शासन मे यहाँ कि हिन्दू प्रजा पर मुस्लिम जागीरदारों ने ज्यादतियां करनी शुरु कर दी, तो यहाँ के सतनामियों ने बगावत कर दी। शीघ्र ही यहाँ की जनता हिन्दू-मुस्लिम दो खेमो मे बंट गई और यहाँ के मुस्लिम फौजदार ताहिर बेग को विद्रोहियो ने मारकर नगर पर कब्जा कर लिया। मुगलकाल के दौरान नारनौल में हुए सतनामी विद्रोह ने औरंगजेब शासन को इस कदर हिला दिया था कि उसके बाद उसने अपने गवर्नरों को उनके प्रांतों में सभी महत्वपूर्ण मंदिर ध्वस्त करने का आदेश दे दिया था। जन भागीदारी से हुए इस आंदोलन का असर इतना अधिक हुआ कि विद्रोह के तीन दशकों पश्चात ही मुगल साम्राज्य भरभराकर गिरने लगा, किंतु इतिहासकारों ने नारनौल के सतनामियों के संघर्ष और बलिदान को भारतीय इतिहास में वह स्थान नहीं दिया, जो उन्हें मिलना चाहिए।

इतिहास बताता है कि नारनौल तथा इसके आसपास के क्षेत्रों में मुगलकाल में सतनामी पंथ के अनुयायी बहुतायत में बसते थे। यह लोग सत्य पर चलने वाले तथा शांतिप्रिय थे। औरंगजेब ने दिल्ली से शाही सेना को भेजा जिसे सतनामियों ने नाथ पंथ के अनुयायियों की सहायता से परास्त करके भगा दिया। इस प्रकार कई बार शाही सेना को खदेड़ा गया तथा सतनामियों ने धौला कुआं तक के क्षेत्र पर अधिकार करने के साथ ही कर संग्रहण की चौकियां स्थापित करते हुए अपना प्रशासन नियुक्त कर दिया। पूरा क्षेत्र 6 महीने तक सतनामियों के अधिकार में रहा जिसका संचालन सतनामियों के गुरु वीरभान ने किया। औरंगजेब ने एक बार फिर भारी शाही सेना भेजी, जिसने आराम करते हुए सतनामियों पर भारी हमला करके उन्हें मार डाला और क्षेत्र को अपने अधिकार में ले लिया। इसके बाद बहुत सारे सतनामी मौत के घाट उतार दिए और जो बचे वह सभी गुरु वीरभान के साथ मध्य भारत में पलायन कर गए। इतने वर्षों बाद भी सतनामी अपने मूल स्थान नारनौल को नहीं भूले हैं तथा वह आज भी अपने गीतों के माध्यम से नारनौल, ढोसी तीर्थ तथा इसके आसपास के क्षेत्रों को याद करते हैं। हरियाणा के दक्षिण में नारनौल नाम का एक कस्बा है। आज यह महेंद्रगढ़ जिले में पड़ता है। इसके पास ही बीजासर नाम का गांव है। 16वीं सदी में इस गांव में बीरभान नाम का आदमी रहता था। वह किसान परिवार से था। वह बहुत सच्चा और भला आदमी था। भक्ति में उसकी बड़ी रुचि थी। लोग उसके भजन और उपदेश सुनने आते थे। धीरे-धीरे बीरभान भक्त कहलाने लगे। लोगों ने उन्हें गुरु मान लिया। बस बढऩे लगा उसके भक्तों का परिवार। जल्दी ही खड़ा हो गया एक सम्प्रदाय। इसे सतनामी सम्प्रदाय कहा गया। यह सन् 1657 में पैदा हुआ माना जाता है। सतनामी ईश्वर के नाम को ही सच मानते थे और उसी का ध्यान करते थे। ये लोग फकीरों की तरह रहते थे। इसीलिए ये साधु कहलाते थे। सतनामी आंदोलन का संबंध भक्ति आंदोलन के महान संत रैदास से था। रैदास का एक चेला उधा था। उधा का इस क्षेत्र में बड़ा प्रभाव था। यही बीरभान के गुरु थे

सतनामी साधु भक्ति आंदोलन के मुख्य सिद्धांतों को मानते थे। उनका विश्वास था कि ईश्वर एक है। वही सत्य है। इसलिए वे ईश्वर को सतनाम कहकर पुकारते थे। इसी से उनका नाम सतनामी पड़ा। वे अपने सारे बाल मुंडवाते थे। यहां तक कि भौहें भी साफ करवा डालते थे। बोलचाल की भाषा में लोग उन्हें मुंडिया भी कहते थे। उत्तर भारत में यह पंथ कई जगह फैल गया, परन्तु 17वीं सदी में नारनौल सतनामियों का गढ़ बन गया। यह कस्बा दिल्ली के दक्षिण पश्चिम में 75 मील दूर स्थित है। गुरु बीरभान अंधश्विास और रूढि़वाद का खंडन करते थे। वे मूर्ति पूजा के विरोधी थे और जाति प्रथा का विरोध करते थे। शरीर और मन की शुद्धि पर उनका खास जोर था। वे सच और सदाचार को जीवन के लिए जरूरी मानते थे। धन और सम्पति से दूर रहने का उपदेश देते थे। वे सारे संसार को अपना घर और दुनियाभर के लोगों को अपना परिवार मानते थे। वे बड़े सरल स्वभाव के थे और साफ कहते थे कि धार्मिक कर्मकांड की बजाए अच्छे व्यवहार में ही धर्म का मर्म है। सतनामी अपने काम-धंधों से लोभ, मोह और अहंकार को दूर रखते थे। पसीने की कमाई से गुजर-बसर करना उनका सिद्धांत था। वे हिन्दू और मुसलमाना में फर्क नहीं करते थे। वे मानते थे कि ईश्वर की कृपा से ही दुखों से छुटकारा पाया जा सकता है। इसलिए वे मनुष्य को धीरज रखने का उपदेश देते थे।

सतनामी सम्प्रदाय में जाट, चमार, खाती आदि जातियों के लोग शामिल थे। परन्तु उन्होंने अपने जातिगत भेद मिटा दिए थे। वे सादा भोजन करते और फकीरों जैसा बाना पहनते थे। सतनामी हर प्रकार के उत्पीड़न के खिलाफ थे। इसलिए अपने साथ हथियार लेकर चलते थे। दौलतमंदों की गुलामी करना उन्हें बुरा लगता था। उनका उपदेश था कि गरीब को मत सताओ। जालिम बादशाह और बेईमान साहूकार से दूर रहो। दान लेना अच्छा नहीं। ईश्वर के सामने सब बराबर हैं। इन विचारों पर आधारित सिद्धांत बड़ा शक्तिशाली था। इससे कमजोर तबकों में आत्मसम्मान और हिम्मत जागी। उनमें जागीरदारों के उत्पीड़न और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस पैदा हुआ। दूसरी कई जगहों की तरह हरियाणा के नारनौल क्षेत्र में भी 17वीं सदी के सतनामियों ने एक शक्तिशाली विद्रोह किया। प्रशासन के उत्पीडऩ के खिलाफ पैदा हुए आंदोलन ने मुगल हुकूमत को हिलाकर रख दिया।

सतनामियों का विद्रोह

संपादित करें

नारनौल के निकट सन् 1672 में एक प्यादे और सतनामी किसान के बीच झगड़ा हो गया। प्यादे ने सतनामी के सिर में लाठी मार दी। किसान बुरी तरह जख्मी हो गया। कहते हैं कि दूसरे सिपाहियों ने सतनामियों की झोंपड़ी में आग लगा दी। सतनामी इस पर भड़क उठे। लोग इकट्ठे होने लगे। उन्होंने प्यादे को पीट-पीट कर मार डाला। दूसरे सिपाहियों को भी पीटा। उनके हथियार भी छीन लिए। बस, फिर क्या था, यह खबर आग की तरह फैल गई। नारनौल का फौजदार सुनकर आग-बबूला हो गया। सतनामियों को पाठ पढ़ाने और उनको गिरफ्तार करने के लिए उसने अपने घुड़सवार और प्यादे भेजे। परन्तु सतनामी केवल साधु नहीं थे। वे अन्याय के खिलाफ लड़ने वाले वीर भी थे। बड़ी तादाद में इकट्ठे हो गए, फिर बोल दिया सरकारी फौज पर धावा। देखते ही देखते उन्हें मार गिराया। कुछ सिपाही जख्मी हो गए और पकड़ भी लिए गए। फौजदार के लिए यह अपमान सहन कर पाना मुश्किल था। उसने नए घुड़सवार और सिपाही भर्ती किए। आसपास के हिन्दू और मुसलमान जमींदारों और जागीरदारों से भी फौजें मंगवाई। इस तरह पूरी तैयारी के साथ उसने सतनामियों के खिलाफ कूच किया। सतनामियों ने भी सरकारी फौज का डटकर मुकाबला किया। वे बड़ी बहादुरी से लड़े। वे क्यों डरते? उनके पास खोने के लिए था भी क्या? सरकारी फौज के बहुत से सिपाही मारे गए। फौजदार खुद लड़ाई में काम आया। उसकी फौजें भाग निकलीं। बस क्या था, सतनामियों ने नारनौल शहर पर कब्जा कर लिया। देहात में लगान वसूल करना शुरू कर दिया और कानून व

किसी लोक कवि का यह दोहा इसकि पुष्टि करता है-

सतनामी सत से लडे, ले हाथो मे तेग
नारनौल के गौरवे, मारयो ताहिर बेग

औरंगजेब कि मौत के बाद, नारनौल पर जयपुर के राजपूतो ने कब्ज़ा कर लिया, लेकिन वह अधिक दिन नहीं रह सके। फ्रान्सीसी जनरल डे-बोएगेन ने उन्हे हरा दिया। कुछ ही समय मे एक बार फिर मुसलामानो का नारनौल पर आधिपत्य हो गया जब मुर्तजा खान बडैच यहाँ के जागीरदार बने। कालान्तर मे उनके वारिस अब्दुल रहमान का यहाँ नियंत्रण रहा। अब्दुल रहमान झज्जर के नवाब थे, जिन्होने 1857 मे ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह मे भाग लिया था। प्रथम स्वतन्त्रता सन्ग्राम के बाद अंग्रेजो ने नारनौल पटियाला के राजा नरेन्द्र सिहं को दे दिया। नरेन्द्र सिहं ने इस युद्ध मे ब्रिटिश सेना की मदद की थी।

यहाँ सुभाष पार्क जहां चोर गुंबद बना है काफी दर्शनीय है।

नारनौल में रेल परिवहन की अच्छी सुविधा है। यहाँ से सबसे नजदीक रेलवे जंक्शन रेवाड़ी है। नारनौल से निकलने वाली ट्रेन की सूची में लगभग 12 ट्रेन है।

इन्हें भी देखें

संपादित करें
  1. "General Knowledge Haryana: Geography, History, Culture, Polity and Economy of Haryana," Team ARSu, 2018
  2. "Haryana: Past and Present Archived 2017-09-29 at the वेबैक मशीन," Suresh K Sharma, Mittal Publications, 2006, ISBN 9788183240468
  3. "Haryana (India, the land and the people), Suchbir Singh and D.C. Verma, National Book Trust, 2001, ISBN 9788123734859