बल्लाल सेन बंगाल के सेन राजवंश के (1158-79 ई.) प्रमुख शासक थे। उन्होंने उत्तरी बंगाल पर विजय प्राप्त की और मगध के पाल वंश का अन्त कर दिया और विजय सेन के उत्तराधिकारी बन गए[1]

'लघुभारत' एवं 'वल्लालचरित' ग्रंथ के उल्लेख से प्रमाणित होता है कि वल्लाल का अधिकार मिथिला और उत्तरी बिहार पर था। इसके अतिरिक्त राधा, वारेन्द्र, वाग्डी एवं वंगा वल्लाल सेन के अन्य चार प्रान्त थे। वल्लाल सेन कुशल प्रशासक होने के साथ-साथ संस्कृत के ख्यातिप्राप्त लेखक थे। उन्होंने 'स्मृति दानसागर' नाम का लेख एवं खगोल विज्ञान पर 'अद्भुतसागर' लेख लिखा। उन्होंने जाति प्रथा एवं कुलीन को अपने शासन काल में प्रोत्साहन दिया। उनकी 'गौड़ेश्वर' तथा 'निशंकर' की उपाधि से उसके शैव मतालम्बी होने का आभास होता है। उनका साहित्यिक गुरु विद्वान अनिरुद्ध थे। जीवन के अन्तिम समय में वल्लालसेन ने सन्यास ले लिया। उन्हें बंगाल के ब्राह्मणों और कायस्थों में 'कुलीन प्रथा' का प्रवर्तक माना जाता है।

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  1. चित्ता रंजन मिश्रा, Vallalasena Archived 2014-09-14 at the Wayback Machine, बांग्लापूडीया: द नेशनल एनसाइकलोपीडिया ऑफ़ बांग्लादेश, एसिटिक सोसाइटी ऑफ़ बांग्लादेश, ढाका, अभिगमन तिथि: २८ जून २०१४
पूर्वाधिकारी
विजय सेन
सेन राजवंश के राजा
११६०–११७९
उत्तराधिकारी
लक्ष्मण सेन