ब्रह्मचर्य योग के आधारभूत स्तंभों में से एक है। ब्रह्मचर्य का अर्थ है सात्विक जीवन बिताना, शुभ विचारों से अपने वीर्य का रक्षण करना, भगवान का ध्यान करना और विद्या ग्रहण करना। यह वैदिक धर्म वर्णाश्रम का पहला आश्रम भी है, जिसके अनुसार यह ०-२५ वर्ष तक की आयु का होता है और जिस आश्रम का पालन करते हुए विद्यार्थियों को भावी जीवन के लिये शिक्षा ग्रहण करनी होती है। ब्रह्मचर्य से असाधारण ज्ञान पाया जा सकता है वैदिक काल और वर्तमान समय के सभी ऋषियों ने इसका अनुसरण करने को कहा है क्यों महत्वपूर्ण है ब्रह्मचर्य- हमारी जिंदगी मे जितना जरुरी वायु ग्रहण करना है उतना ही जरुरी ब्रह्मचर्य है। आज से पहले हजारों वर्ष से हमारे ऋषि मुनि ब्रह्मचर्य का तप करते आय है क्योंकि इसका पालन करने से हम इस संसार के सर्वसुख की प्राप्ति कर सकते है

व्युत्पत्तिसंपादित करें

ये शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है:- ब्रह्म + चर्य , अर्थात ज्ञान प्राप्ति के लिए जीवन बिताना।

योगसंपादित करें

योग में ब्रह्मचर्य का अर्थ अधिकतर यौन संयम समझा जाता है। यौन-संयम का अर्थ अलग-अलग संदर्भों में अलग-अलग समझा जाता है, जैसे विवाहितों का एक-दूसरे के प्रति निष्ठावान रहना, या आध्यात्मिक आकांक्षी के लिये पूर्ण ब्रह्मचर्य।

जैन धर्म में ब्रह्मचर्यसंपादित करें

ब्रह्मचर्य, जैन धर्म में पवित्र रहने का गुण है, यह जैन मुनि और श्रावक के पांच मुख्य व्रतों में से एक है (अन्य है सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह )| जैन मुनि और आर्यिका दीक्षा लेने के लिए मन, वचन और काय से ब्रह्मचर्य अनिवार्य है। जैन श्रावक के लिए ब्रह्मचर्य का अर्थ है शुद्धता। यह यौन गतिविधियों में भोग को नियंत्रित करने के लिए इंद्रियों पर नियंत्रण के अभ्यास के लिए हैं। जो अविवाहित हैं, उन जैन श्रावको के लिए, विवाह से पहले यौनाचार से दूर रहना अनिवार्य है।

आयुर्वेद में ब्रह्मचर्य का महत्वसंपादित करें

आयुर्वेद में कहा गया है कि ब्रह्मचर्य शरीर के तीन स्तम्भों में से एक प्रमुख स्तम्भ (आधार) है।

त्रयः उपस्तम्भाः । आहारः स्वप्नो ब्रह्मचर्यं च सति ।
(तीन उपस्तम्भ हैं। आहार, निद्रा और ब्रह्मचर्य।)

ब्रह्मचारीसूक्तसंपादित करें

अथर्ववेद का ग्यारहवें काण्ड का पाँचवाँ सूक्त ब्रह्मचर्य्य के लिये ही समर्पित है। इसमें तरह-तरह से ब्रह्मचर्य की महिमा वर्णित है।

ब्रह्मचार्येति समिधा समिद्धः कार्ष्णं वसानो दीक्षितो दीर्घश्मश्रुः।
स सद्य एति पूर्वस्मादुत्तरं समुद्रं लोकान्त्संगृभ्य मुहुराचरिक्रत्॥ -- (अथर्ववेद ११.५.१७)
अर्थ-- जो ब्रह्मचारी होता है, वही ज्ञान से प्रकाशित तप और बड़े बड़े केश श्मश्रुओं से युक्त दीक्षा को प्राप्त होके विद्या को प्राप्त होता है। तथा जो कि शीघ्र ही विद्या को ग्रहण करके पूर्व समुद्र जो ब्रह्मचर्याश्रम का अनुष्ठान है, उसके पार उतर के उत्तर समुद्रस्वरूप गृहाश्रम को प्राप्त होता है और अच्छी प्रकार विद्या का संग्रह करके विचारपूर्वक अपने उपदेश का सौभाग्य बढ़ाता है।

ब्रह्मचारी जनयन् ब्रह्मापो लोकं प्रजापतिं परमेष्ठिनं विराजम्।
गर्भो भूत्वामृतस्य योनाविन्द्रो ह भूत्वाऽसुरांस्ततर्ह॥ -- (अथर्ववेद ११.५.१८)
अर्थ-- वह ब्रह्मचारी वेदविद्या को यथार्थ जान के प्राणविद्या, लोकविद्या तथा प्रजापति परमेश्वर जो कि सब से बड़ा और सब का प्रकाशक है, उस का जानना, इन विद्याओं में गर्भरूप और इन्द्र अर्थात् ऐश्वर्ययुक्त हो के असुर अर्थात् मूर्खों की अविद्या का छेदन कर देता है।

ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं वि रक्षति।
आचार्यो ब्रह्मचर्य्येण ब्रह्मचारिणमिच्छते॥ -- (अथर्ववेद ११.५.१९)
अर्थ-- पूर्ण ब्रह्मचर्य से विद्या पढ़ के और सत्यधर्म के अनुष्ठान से राजा राज्य करने को और आचार्य विद्या पढ़ाने को समर्थ होता है। आचार्य उस को कहते हैं कि जो असत्याचार को छुड़ा के सत्याचार का और अनर्थों को छुड़ा के अर्थों का ग्रहण कराके ज्ञान को बढ़ा देता है॥6॥

ब्रह्मचर्य के लाभसंपादित करें

अगर आप मन, वाणी व बुद्धि को शुध्द रखना चाहते है तो आप को ब्रह्मचर्य पालन करना बहुत जरुरी है आयुर्वेद का भी यही कहना है कि अगर आप ब्रह्मचर्य का पालन पूर्णतया 3 महीनो तक करते है तो आप को मनोवल, देहवल और वचनवल मे परिवर्तन महसूस होगा , जीवन के ऊँचे से ऊँचे लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ब्रह्मचर्य का जीवन मे होना बहुत जरुरी है।

ब्रह्मचर्य मनुष्य का मन उनके नियंत्रण में रहता है।
ब्रह्मचर्य का पालन करने से देह निरोगी रहता है।
ब्रह्मचर्य का पालन करने से मनोबल बढ़ता है।
ब्रह्मचर्य का पालन करने से रोग प्रतिरोधक शक्ति बढती है।
ब्रह्मचर्य मनुष्य ककोए काग्रता और ग्रहण करने की क्षमता बढ़ता है।
ब्रह्मचर्य पालन करने वाला व्यक्ति किसी भी कार्य को पूरा कर सकता है।
ब्रह्मचारी मनुष्य हर परिस्थिति में भी स्थिर रहकर उसका सामना कर सकता है।
ब्रम्हचर्य के पालन से शारीरिक क्षमता , मानसिक बल , बौद्धिक क्षमता और दृढ़ता बढ़ती है।
ब्रम्हचर्य का पालन करने से चित्त एकदम शुद्ध हो जाता है।

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

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