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इण्डोनेशिया के बाली द्वीप के उबुद में अर्जुन की प्रतिमा

महाभारत के मुख्य पात्र हैं। महाराज पाण्डु एवं रानी कुन्ती के वह तीसरे पुत्र थे। द्रौपदी, कृष्ण और बलराम की बहन सुभद्रा, नाग कन्या उलूपी और मणिपुर नरेश की पुत्री चित्रांगदा इनकी पत्नियाँ थीं। इनके भाई क्रमशः युधिष्ठिर, भीम, नकुल, सहदेव

अर्जुन सबसे अच्छे धनुर्धर और द्रोणाचार्य के प्रमुख शिष्य थे। जीवन में अनेक अवसर पर उन्होने इसका परिचय दिया। इन्होने द्रौपदी को स्वयंवर में जीता था। कुरूक्षेत्र युद्ध में ये प्रमुख योद्धा थे। अर्जुन ने ही कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण से अलौकिक प्रश्न किये जो गीता में वर्णित हैं।

महाराज पाण्डु की दो पत्नियाँ थी कुन्ती तथा माद्री।मुनि दुर्वासा के वरदान द्वारा धर्मराज, वायुदेव तथा इंद्र का आवाहन कर तीन पुत्र माँगे। इंद्र द्वारा अर्जुन का जन्म हुआ।[1]

द्रोणाचार्य को एेसे योद्धाओं की आवश्यकता थी जो राजा द्रुपद से प्रतिशोध ले सके। इसी कारण वे हस्तिनापुर के 105 राजकुमारों को शिक्षा देने लगे जिसमें से एक अर्जुन भी था। [2]

विवाहसंपादित करें

द्रौपदीसंपादित करें

महर्षि वेदव्यास के कहने पर पाण्डव माता कुन्ती के साथ पांचाल चले गए जहाँ राजा द्रुपद की कन्या द्रौपदी का स्वयंवर रखा गया था। अर्जुन वहाँ ब्राह्मण के भेस में गया और देखा कि महा सभा लगी है, पूरे भारत से राजकुमार आए हैं परन्तु कोई भी लक्ष्य भेद नहीं पा रहा था व राधेय कर्ण जब यह लक्ष्य भेद करने वाले थे तब ही द्रौपदी ने उन्हें रोक दिया। इस लक्ष्य को केवल तीन पुरूष ही साध सकते थे। अर्जुन और कर्ण के अतिरिक्त स्वयं वासुदेव श्रीकृष्ण यह करने में सक्षम थे। तब अर्जुन ने लक्ष्य भेदन कर द्रौपदी को जीता था। द्रौपदी से इनका पुत्र श्रुतकर्मा हुअा जिसे अश्वत्थामा ने मारा।

 
लक्ष्यभेदन करते हुए अर्जुन

सुभद्रासंपादित करें

सुभद्रा भगवान कृष्ण तथा बलराम की बहन थी जिसे कृष्ण के कहने पर अर्जुन द्वारिका से भागा ले गए थे। सुभद्रा से इनका अभिमन्यु नामक पुत्र हुआ जो कुरुक्षेत्र युद्ध में मारा गया।[3]

 
अर्जुन और सुभद्रा, राजा रवि वर्मा की कृति

इसके दोनो पुत्र वीरगति को प्राप्त हुए। अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित ने इनका वंश आगे बढ़ाया।

बृहन्नलासंपादित करें

 
अर्जुन को उर्वशी का श्राप।

संस्कृत में 'ल' और 'र' को समान माना गया है इस अनुसार बृहन्नल को बृहन्नर भी कह सकते हैं जिसका संधि विच्छेद बृहद् + नर होगा। अज्ञातवास में वो वेश बदल कर विराट नगर में वास करते थे जहाँ उर्वशी के श्राप के कारण अर्जुन को बृहन्नला बनकर विराट नगर की राजकुमारी उत्तरा को नृत्य सिखाना पड़ा।[4]

अर्जुन और लुटेरो का युद्धसंपादित करें

जब अर्जुन द्वारका से लौट रहे थे उनका सामना कुछ लुटेरो से हुआ । तब अर्जुन अस्त्रो के मंत्र भुल जाते है और लुटेरो को देखकर अर्जुन धनुष तक उठा नही पाये । लुटेरो ने बासकी बनी लाठीया उठाई और अर्जुनको पिट दिया । कुछ स्त्रियोने अर्जुनकी रक्षाके लिए खुदको लुटेरोको समर्पित कर दिया । अर्जुन के सामने स्त्रियोको घसीटा गया तब अर्जुन समझ गये की समय के आगे कोई नही होता । अर्जुन अपनी प्राणो की रक्षा के सारी स्त्रियो को लुटेरो के सामने छोड वहा से भाग गये।

कर्ण और अर्जुन के पिछले जन्म की कथासंपादित करें

कर्ण और अर्जुन के पिछले जन्म की कथा का वर्णन पद्म पुराण मे अता है एक बार भगवान ब्रह्मा और महादेव के बिच युद्ध होता है, महादेव ब्रह्माजी के पांचवें सर को काट देते है। क्रोधित ब्रह्मदेव के शरीर से पसिना निकलता है। और पसीने से एक वीर योद्धा उत्पन्न होता है। जो स्वेद से जन्मा इसलिए स्वेदजा के नाम से जाना जाता है। स्वेदजा पिता ब्रह्मा के आदेश से महादेव से युद्ध करने जाता है। महादेव भगवान विष्णु के पास क्रोधित ब्रह्मा द्वारा जन्म लेने वाले स्वेदजा का कुछ उपाय बताने को कहते हैं। भगवान विष्णु अपने रकत से एक वीर को जन्म ‌देते है। रक्त से जन्मा इसलिए उसे रक्तजा के नाम से जाना जाता है। स्वेदजा 1000 कवच के साथ जन्मा था और रकतजा 1000 हाथ और 500 धनुष के साथ । भगवान ब्रह्मा भी विष्णु से हाय उत्पन्न हुज थे इसलिए स्वेदजा भी भगवान विष्णु का अंशा था। स्वेदजा और रुक्तजा में भायंकर युद्ध होता हे। स्वेदजा रक्तजा के 998 हाथ कट देता है और 499 धनुष तोड़ देता हे। वही रक्तजा स्वेदजा के 999 कवच तोड़ देता है। रक्तजा बस हारने ही वाला होता है। भगवान विष्णु समज जाते हैं की‌ रक्तजा से हार जाएगा। इसलिए वे उस युद्ध को शांत करवाते हैं। स्वेदजा दानवीरता दिखाते हुए रक्तजा को जिवनदान देता है। भगवान विष्णु ‌स्वेदजा की जवाबदेही सुर्यनारायण को सोंपते है, और रक्तजा की‌ इंद्रदेव को। वह इंद्रदेव को वचन देते है की अगले जन्म में ‌रक्तजा अपने प्रतिद्वंद्वी स्वेदजा का वध अवश्य करेगा। द्वापर युग में ‌रक्तजा अर्जून और संवेदना कर्ण के रुप में जन्म लेते हैं। और अर्जून अपने सबसे महान प्रतिद्वंद्वी कर्ण‌की युद्ध के नियमों के विरुद्ध हत्या करते हैं।

अन्य नामसंपादित करें

  • पार्थ (कुन्ती का अन्य नाम -'पृथा' है ; पार्थ = पृथा का पुत्र)
  • जिष्णु (जीतने वाला)
  • किरीटिन् ( इन्द्र द्वारा उपहार में मिला चमकते मुकुट 'किरीट' वाला)
  • श्वेतवाहन ( जिसके श्वेत रथ में श्वेत अश्व जुड़े हों)
  • भीभस्तु (गोरा योद्धा)
  • विजय (सदा जीतने वाला)
  • फाल्गुन (उत्तर फाल्गुण नक्षत्र में जन्मा)
  • सव्यसाची (दोनों हाथों से से बाण चलाने में सक्षम)
  • धनञ्जय (जहाँ भी जाय वहाँ सम्पत्तियाँ लाए, वह)
  • गाण्डीवधन्वन् (गांडीव नामक धनुष धारण करने वाला)
  • कृष्ण (श्याम त्वचा वाला)
  • कपिध्वज (जिसके ध्वज पर वानर हो)
  • गुडाकेश (निद्रा को जीतने वाला, भयंकर काली रात्रि में धनुर्विद्या का अभ्यास करने से यह नाम पड़ा)
  • परन्तप (परम तप करने वाला)
  • बीभत्सु (जो सदा धर्मसम्मत युद्ध करता है)
  • गाण्डीवधर
  • कौन्तेय (कुन्ती का पुत्र)
  • मध्यपाण्डव (जन्मक्रम के अनुसार पाण्ण्डवों में मध्य में जन्मा ; युधिष्ठिर और भीम से छोटे, किन्तु नकुल और सहदेव से बड़े)

चित्रवीथीसंपादित करें

सन्दर्भसंपादित करें

महावीर अर्जुन कुन्ती और पाण्डु के पुत्र थे. भगवान इंद्र के आशीर्वाद से उत्पन्न हाेने के कारण इन्द्र भी उनके पिता थे. अर्जुन इंद्र के समान ही प्रतापी और पराक्रमी थे. पांडवाें सबसे अधिक युद्ध कुशल और वीर वही थे. महाभारत युद्ध में पांडव पक्ष का सबसे बड़ा याेद्धा [1] ही थे, जिन्हाेने परम वीर काैरव याेद्धावाें से टक्कर ली और विजय हासिल की.संपादित करें