महाभारत के अनुसार परीक्षित अर्जुन के पौत्र अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र तथा जनमेजय के पिता थे। जब ये गर्भ में थे तब अश्वत्थामा ने ब्रम्हशिर अस्त्र से परीक्षित को मारने का प्रयत्न कियाथा । ब्रम्हशिर अस्त्र का संबंध भी भगवान ब्रम्हा से है तथा ब्रम्हा के ही महान अस्त्र ब्रह्मास्त्र के समान शक्तिशाली, अचूक और घातक कहा गया है। इस घटना के बाद योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अपने योगबल से उत्तरा के मृत पुत्र को जीवित किया था । महाभारत के अनुसार कुरुवंश के परिक्षीण होने पर जन्म होने से वे 'परीक्षित' कहलाए।

परीक्षित
कुरु
Sage Sukdeva and King Parikshit.png
शुकदेव और राजा परीक्षित
पूर्ववर्तीयुधिष्ठिर (बड़े दादाजी)
उत्तरवर्तीजनमेजय (पुत्र)
जीवनसंगीइरावती अथवा मदरावती
संतानजनमेजय
पिताअभिमन्यु
माताउत्तरा

जन्मसंपादित करें

भागवत पुराण के अनुसार, महाराज परीक्षित जब अपनी माता उत्तरा के गर्भ में अश्वथामा के ब्रह्मास्त्र के तेज से जलने लगे, तब उन्होंने अपने सामने परमेश्वर को देखा, वह अँगूठेभर ऊँचे हैं, वे सुन्दर श्याम वर्ण तथा बिजली जैसा चमकदार पीताम्बर धारण किये हैं। उनकी सुन्दर लम्बी चार भुजाएं थीं, आँखों में लालिमा तथा कानों में सुन्दर स्वर्ण कुण्डल हैं।  भगवान् हाथों में गदा लेकर उसे बार बार घुमाते जा रहे थे एवं शिशु परीक्षित के चारों तरफ घूमते जा रहे थे।

भगवान् की गदा ने उस ब्रह्मास्त्र के तेज को शांत कर दिया।  बालक परीक्षित सोचने लगा की यह पुरुष कौन हैं, इस प्रकार बालक के देखते देखते परमात्मा पुरुषोत्तम भगवान् अंतर्ध्यान हो गए। तत्पश्चात शुभ नक्षत्रों तथा राशि से युक्त समय में तेजस्वी बालक परीक्षित का जन्म हुआ। पौत्र के जन्म से युधिष्ठिर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने धौम्य, कृपाचार्य आदि ब्राह्मणों से मंगल वाचन तथा जातकर्म संस्कार करवाया। महाराज युधिष्ठिर दानके योग्य समय को जानते थे अतः उन्होंने ब्राह्मणों को सुवर्ण, गौएँ, पृथ्वी, गॉवों, उत्तम जाति के हाथी-घोड़े और उत्तम अन्न का दान दिया। ब्राह्मणों ने प्रसन्न हो कर युधिष्ठिर से कहा कि यह बालक विष्णुरात (भगवान द्वारा रक्षित) के नाम से विख्यात होगा तथा यह यशस्वी, भगवान् का परम भक्त एवं महापुरुष होगा।

परीक्षित द्वारा कलियुग का दमनसंपादित करें

पांडवों के महाप्रयाण के पश्चात श्रेष्ठ ब्राह्मणों के आदेशानुसार महाराज परीक्षित पृथ्वी पर शासन करने लगे। एक बार राजा परीक्षित को पता चला की उनके राज्य की सीमा के भीतर कलियुग का प्रवेश हो रहा है।  उन्होंने दिग्विजय करते समय देखा की एक राजवेषधारी शूद्र, एक गाय तथा बैल को डंडे से पीट रहा है जैसे उनका कोई स्वामी न हो।  श्वेत कमल पुष्प जैसा बैल, शूद्र से अत्यधिक भयभीत था, गाय भी अत्यंत दीन हो रही थी। उसके पावों पर पर वह शूद्र प्रहार कर रहा था।

राजा परीक्षित ने गंभीर वाणी से बोले "तुम हो कौन, जो बलवान प्रतीत होते हुए भी मेरे राज्य में दुर्बल प्राणियों को बलपूर्वक मार रहे हो, वेष से राजा परन्तु कार्यों से क्षत्रियों के सिद्धांतों का उल्लंघन कर रहे हो, चूंकि तुम इस निर्दोष को एकांत स्थान में मार रहे हो अतः अपराधी हो तथा वध के योग्य हो। महाराज परीक्षित ने धर्म रुपी बैल तथा पृथ्वी रुपी गाय को सांत्वना दी तथा अधर्म के कारणरूप कलियुग को मारने के लिए तलवार निकाली। कलियुग ने भयभीत हो कर उनके चरणोंमे अपना सिर रख दिया। परीक्षित ने कलियुग को शरणागत हुआ देख उसको मारा नहीं।  कलियुग ने परीक्षित से प्रार्थना करी कि वे उसके रहने का स्थान निश्चित कर दें।महाराज परीक्षित ने कलियुग के रहने के चार स्थान निश्चित कर दिए - जहाँ जुआ खेलना, शराब पीना, वैश्यावृत्ति, पशु वध होतें हैं। कलियुग ने और भी स्थान मांगे तो राजा ने उसे उस स्थान पर रहने की अनुमति प्रदान कर दी जहाँ स्वर्ण उपलब्ध होता है, इस प्रकार कलियुग के रहने के पांच स्थान हो गए - झूठ, मद, काम, वैर और रजोगुण।

दैहिक त्यागसंपादित करें

एक दिन राजा परीक्षित वन में शिकार करते हुए, हिरणों का पीछा करते हुए अत्यंत थक गए। जलाशय की खोज करते हुए वे शमीक ऋषि के आश्रम पहुंचे। उन्होंने देखा कि वहां आँखें बंद करके शांत भाव से एक मुनि बैठे हुए हैं। वे संसारसे ऊपर उठ गए थे तथा निर्विकार ब्रह्मरूप तुरीय रूप में स्थित थे। राजा परीक्षितने ऐसी ही अवस्थामें उनसे जल माँगा, क्यूंकि वे प्यास से व्याकुल थे। आसन, बैठने का स्थान, जल तथा मधुर वचनों के द्वारा स्वागत न किये जाने पर राजा क्रुद्ध हो गए। वे भूख-प्यास से व्याकुल थे अतः उन्हें ब्राह्मण के प्रति ईर्ष्या एवं क्रोध हो आया।  उनके जीवन में ऐसा अवसर पहली बार था। राजाने लौटते समय अपने धनुष से एक मृत सर्प उठाया और क्रोधवश उसे मुनि के कंधे पर रख दिया और अपने राजमहल लौट आये।

उन शमीक मुनि के तेजस्वी पुत्र ने जब सुना कि राजाने मेरे पिताके साथ दुर्व्यवहार किया है, तब उस क्रोध से लाल आँखों वाले ऋषिपुत्र ने कौशिक नदी के जल का आचमन करके शब्दरूपी वज्र छोड़ा। उस ब्राह्मण पुत्र ने राजा को इस प्रकार श्राप दिया: आज से सातवें दिन महाराज परीक्षित को तक्षक सर्प डँस लेगा, क्यूंकि इसने मेरे पिता का अपमान करके मर्यादा का उल्लंघन किया है। शमीक मुनि ने अपने पुत्र द्वारा राजा परीक्षित को दिया श्राप जानकर पछताने लगे कि उनके पुत्र ने भगवत्स्वरूप राजा को श्राप दिया तथा तुच्छ अपराध के लिए इतना भारी दंड दिया। महात्मा स्वभाव मुनि ने राजा द्वारा किये गए अपमान पर ध्यान ही नहीं दिया।

घर लौटकर राजा को अपने निंदनीय कर्म के लिए पश्चाताप हुआ, इस प्रकार चिंता करते हुए उन्हें मालूम हुआ - ऋषिकुमारके शापसे तक्षक द्वारा मेरी मृत्यु होगी। राजा ने इसे शुभ समाचार के तौर पर ग्रहण किया। वे सोचने लगे कि बहुत दिनों से मैं संसारमें आसक्त हो रहा हूँ, अब मुझे शीघ्र वैराग्य प्राप्त होने का अवसर मिला। वे भगवान् श्री कृष्ण के चरणकमलोंकी सेवाको सर्वोपरि मान कर उपवास करने गंगा तट पर बैठ गए।

उस समय त्रिलोकीको पवित्र करनेवाले बड़े बड़े ऋषि मुनि वहां पधारे। वहां अत्रि, वसिष्ठ, च्यवन, शरद्वान, परशुराम, भृगु, भारद्वाज, गौतम, नारद आदि कई श्रेष्ठ ऋषि आये। राजाने सबका सत्कार किया तथा उनके चरणों पर सर रखकर वंदना की। राजाने उनके समक्ष आमरण अनशन करने का संकल्प बताया। राजाने ऋषियों से प्रश्न किया की थोड़े ही समयमें मरनेवाले पुरुषों के लिए अंतःकरण तथा शरीर द्वारा करनेयोग्य विशुद्ध कर्म कौन सा है।

उसी समय व्यासदेव के पुत्र शुकदेव गोस्वामी का वहां आगमन हुआ तथा महाराज परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से श्रीमद भागवतम का श्रवण किया तथा उन्होंने दिव्य अभय पद प्राप्त किया।

ऐतिहासिकतासंपादित करें

माइकल विटजेल 12 वीं -11 वीं शताब्दी ईसा पूर्व में कुरु साम्राज्य के पौरिकिता राजवंश से संबंधित हैं। एच.सी. रायचौधरी ने नौवीं शताब्दी ईसा पूर्व में परीक्षित से मुलाकात की। [12] वह अपने बेटे जनमेजय द्वारा सफल हो गया था।

वैदिक साहित्य में केवल एक परीक्षित का उल्लेख है; हालांकि, उत्तर-वैदिक साहित्य (महाभारत और पुराण) इस नाम से दो राजाओं के अस्तित्व का संकेत देते हैं, जो कुरुक्षेत्र युद्ध से पहले रहते थे, पांडवों के पूर्वज थे, और एक जो बाद में रहते थे और एक वंशज थे। इतिहासकार एच‌‌. सी. रायचौधुरी का मानना है कि दूसरे परीक्षित का वर्णन वैदिक राजा से बेहतर ढंग से मेल खाता है, जबकि पहले के बारे में उपलब्ध जानकारी बहुत कम और असंगत है, लेकिन रायचौधरी सवाल करती है कि क्या वास्तव में कुछ अलग राजा थे?

अन्य परीक्षितसंपादित करें

इनके अतिरिक्त 'परीक्षित' नाम के चार अन्य राजा और हुए हैं जिनमें तीन कुरुवंशीय थे और एक इक्ष्वाकुवंशीय। पहले तीनों में प्रथम वैदिककालीन राजा थे। इनके राज्य की समृद्धि और शांति का उल्लेख अथर्ववेद (२०. १२७, ७-१०) में हुआ है। इनकी प्रशस्ति में आए मंत्र 'पारिक्षित्य मंत्र', के रूप में प्रसिद्ध हैं (ऐतरेय ब्राह्मण. ६, ३२, १०)। दूसरे राजा, अरुग्वत् तथा मागधी अमृता के पुत्र और शंतनु के प्रपितामह थे (महाभारत, आदिपर्व, ९०, ४३-४८)। तीसरे कुरु अविक्षित और वहिन के ज्येष्ठ पुत्र थे (महाभारत आदिपर्व, ८९/४५-४६)। चौथे परिक्षित् अयोध्या के इक्ष्वाकुवंशीय नरेश थे जिनका विवाह मंडूकराज आयु की कन्या सुशोभना से इस शर्त पर हुआ कि वह जल नहीं देखेगी और दिखाई पड़ जाने पर उसे छोड़कर चली जाएगी। किंतु वह शर्त निभ न सकी और वह एक दिन सरोवर का जल देखते ही लुप्त हो गई। राजा बहुत क्रुद्ध हुए और उन्होंने मंडूकवध का सत्र आरंभ कर दिया। अंत में मंडूकराज आयु से उसे पुन: प्राप्त करने पर वे सत्र से विरत हुए (महाभारत वनपर्व, १९०)।