मौर्य या मोरी एक राजपूत वंस है जो प्राचीन काल में चित्तौड़गढ़ पे राज करता था , मोरी चंद्रगुप्त मौर्य के वंशज हैं।[1]  और वे  परमार राजपूतों के साथ विवाह करने के कारण, खुद को अग्निवंशी होने का दावा भी करने लगे हैं। [2]

इतिहाससंपादित करें

चित्रांगदा मोरी, एक मोरी राजपूत शासक, ने चित्तौड़गढ़ के किले की नींव रखी।[3][4] मोरी राजपूत चंद्रगुप्त मौर्य के वंशज  हैं।[1] चित्तौड़ के एक मोरी शासक ने चौहान राजपूत विग्रहराज की सहायता  सुल्तान खुसरु मलिक  तुर्क आक्रमणकारियों के खिलाफ लड़ाई में, मोरियों ने कछवाहा राजपूतों के साथ गठबंधन भी किया।[5]

मोरी राजपूतो ने गुहिल(सिसोदिया) वंश से पहले चित्तौड़ किले और आसपास के क्षेत्र को नियंत्रित किया था। 8 वीं शताब्दी में चित्तौड़गढ़ एक अच्छी तरह से स्थापित गढ़ था मोरि राजपूतो के तहत।[6] 713 ce के चित्तौड़गढ़ शिलालेख में चित्तौड़ के मोरी राजपूत शासकों के नाम दिए गए हैं.[7]

मोरी राजपूत मालवा के सम्राट थे।[8] चित्तौड़ के एक मोरी राजा महलोत का उल्लेख चाचा नाम में राय राजवंश के रिश्तेदार के रूप में किया गया है[9]

लखनऊ विश्वविद्यालय के श्याम मनोहर मिश्रा ने कहा कि बप्पा रावल मूल रूप से अंतिम मोरी शासक मनुराज उर्फ मान सिंह मोरी के जागीरदार था। मनुराज अपनी मां, एक माउंट आबू की परमार राजकुमारी के माध्यम से उनके चाचा थे [5] 713 ce के चित्तौड़गढ़ मासरोवर शिलालेख में उल्लिखित मनुराज की पहचान मन्ना से की जाती है भोज का एक पुत्र  बताया गया। [10]मन्ना के परदादा का नाम महेश्वर था।[11]

बप्पा ने संभवतः अरबों के खिलाफ मोरी अभियान का नेतृत्व किया, जिसने उन्हें अपने अधिपति की तुलना में अधिक प्रसिद्ध बना दिया। बाद में, उन्होंने या तो मनुराज को हटा दिया और रईसों की मदद से चित्तौड़ के राजा बन गए[8] या मनुराज के निःसंतान होने के बाद राजा बने.[12] मोरि को चित्तौड़गढ़ से बप्पा रावल द्वारा निष्कासित कर दिया गया था।[13][10][5]

रामचंद्र मजूमदार के अनुसार,  मोरिचित्तौड़ पर शासन कर रहे थे[14] जब अरबों (म्लेच्छों) ने उत्तर-पश्चिमी भारत पर 725 ईस्वी के आसपास आक्रमण किया.[14] अरबों ने मोरि को हराया, और बदले में, एक बड़ी सेना से हार गए जिसमें बप्पा रावल शामिल थे.[15][16]

अरबों द्वारा बार-बार आक्रमण के कारण हाडौती, (690ce) मेवाड़(753ce) और बाड़मेर(837ce) क्षेत्र के मोरिया राजपूत्र  का शासन खत्म हो गया।

अधिकांश मौर्य परमार पहचान में समाहित हो गए हैं, शुद्ध मौर्य राजपूत  मध्य प्रदेश, और सौराष्ट्र  मैं पाए जाते हैं। 1783 में कई अन्य मोरिया या मोरी राजपूत धरमपुर, वलसाड जिले में चले गए, जहाँ उन्हें धरमपुर के गुहिलोट शासक द्वारा 66 गाँवों की सूबेदारियाँ दी गईं। इन्हें नारोली, सिलवासा और गुजरात में भी वितरित पाया जाता है।

सन्दर्भसंपादित करें

  1. Asiatic Society (Calcutta, India), Asiatic Society (Calcutta, India) (1834). Journal: Volume 3. Asiatic Society (Calcutta, India). पृ॰ 343.
  2. Singh, Kumar Suresh (1994). People of India: Dadra and Nagar Haveli. Anthropological Survey of India. पृ॰ 81.
  3. Singh Chib, Sukhdev (1979). Rajasthan. The University of Michigan. पृ॰ 118.
  4. Rajasthan. The University of Michigan. 1962. पृ॰ 44. |firstlast1= missing |lastlast1= in first1 (मदद)
  5. Tod, James (1873). Annals and Antiquities of Rajast'han, Or, The Central and Western Rajpoot States of India Part 36, Volume 1. Higginbotham and Company. पृ॰ 189.
  6. India Tourism Development Corporation, India Tourism Development Corporation (1975). Guide to Rajasthan. India Tourism Development Corporation. पृ॰ 169.
  7. Rajasthan State Gazetteer, Rajasthan State Gazetteer (1995). Rajasthan State Gazetteer: History and culture. Directorate, District Gazetteers, Government of Rajasthan. पृ॰ 322.
  8. Rajputana (Agency), Rajputana (Agency) (1880). The Rajputana Gazetteer Volume 3. Harvard University. पृ॰ 16.
  9. Dahiya, Bhim Singh (1980). Jats, the Ancient Rulers A Clan Study. Sterling. पृ॰ 144.
  10. Calcutta Sanskrit College Research Series, Calcutta Sanskrit College Research Series (1965). Calcutta Sanskrit College Research Series. The University of California. पृ॰ 52.
  11. Singh, R.B (1975). Origin of the Rajputs. Sahitya Sansar Prakashan. पृ॰ 40.
  12. Shyam Manohar Mishra 1977, पृ॰ 48.
  13. Topsfield, Andrew (2001). Court Painting at Udaipur Art Under the Patronage of the Maharanas of Mewar. Artibus Asiae Publishers. पृ॰ 17. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9783907077030.
  14. R. C. Majumdar 1977, पृ॰ 298-299.
  15. Ram Vallabh Somani 1976, पृ॰ 45.
  16. Khalid Yahya Blankinship 1994, पृ॰ 188.

ग्रन्थसूचीसंपादित करें