यादव

भारत का यदुवंशी क्षत्रिय समुदाय

यादव भारत और नेपाल में पाए जाने वाले समुदायों या जातियों के एक समूह को संदर्भित करता है, जो चंद्रवंशी क्षत्रिय वंश के प्राचीन राजा यदु के वंशज हैं। यादव एक पांच इंडो-आर्यन क्षत्रिय कुल है जिनका वेदों में "पांचजन्य" के रूप में उल्लेख किया गया है। यादव आम तौर पर हिंदू धर्म के वैष्णव परंपरा का पालन करते हैं, और धार्मिक मान्यताओं को साझा करते हैं।[1][2][3]

केटलन एटलस में चित्रत यादव ध्वजा
दुर्योधन की सभा में यादव श्रेष्ठ वासुदेव कृष्ण और यादव योद्धा सात्यकि

यदुवंशी क्षत्रिय मूलतः अहीर थे।[4] यादव शब्द अब कई पारंपरिक किसान-चरवाहे जातियों जैसे कि अहीर और महाराष्ट्र के गवली को शामिल करता है। परंपरागत रूप से यादव समूहों को मवेशी पालने से जोड़ा जाता था और इस कारण वह औपचारिक जाति-व्यवस्था के बाहर थे।[5] उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के उत्तरार्ध के बाद से यादव आंदोलन ने अपने घटकों की सामाजिक प्रतिष्ठा को सुधारने के लिए काम किया है। इसमें संस्कृतीकरण, भारतीय और ब्रिटिश सशस्त्र बलों में सक्रिय भागीदारी, अधिक प्रतिष्ठित व्यापारिक क्षेत्रों में शामिल होना और राजनीति में सक्रिय भागीदारी प्रमुख है। यादव नेताओं और बुद्धिजीवियों ने अक्सर यदु और कृष्ण के वंश से होने के अपने दावे पर ध्यान केंद्रित किया है। वे तर्क देते हैं कि इससे उनका क्षत्रिय का दर्जा है।

उत्पत्ति

पौराणिक कथाओं में

यादव शब्द की व्याख्या 'यदु के वंशज' होने के लिए की गई है, जो कि एक पौराणिक राजा है।[6] "बहुत व्यापक सामान्यताओं" का उपयोग करते हुए, जयंत गडकरी कहते हैं कि पुराणों के विश्लेषण से यह "लगभग निश्चित" है कि अंधका, वृष्णि, सातवात और आभीर को सामूहिक रूप से यादवों के रूप में जाना जाता था और वह कृष्ण की पूजा करते थे। गडकरी ने इन प्राचीन रचनाओं के आगे लिखा है कि "यह विवाद से परे है कि प्रत्येक पुराण में किंवदंतियां और मिथक हैं"।

लुकिया मिचेलुत्ती के अनुसार

यादव समुदाय के मूल में वंश का एक विशिष्ट लोक सिद्धांत निहित है, जिसके अनुसार सभी भारतीय देहाती/चारवाही जातियों को यदुवंश ( यादव) से वंशज कहा जाता है जिसमें कृष्ण (एक चरवाहे, और माना जाता है कि एक क्षत्रिय) थे। ... [उनके बीच एक दृढ़ विश्वास है कि सभी यादव कृष्ण वंश के वंश के हैं, यादव आज के मूल और अविभाजित समूह के विखंडन का परिणाम हैं।

पी. एम. चंदोरकर जैसे इतिहासकारों ने उत्कीर्ण लेख-संबंधी और इसी तरह के साक्ष्य का उपयोग यह तर्क देने के लिया किया है कि अहीर और गवली प्राचीन यादवों और आभीरों के प्रतिनिधि हैं जो संस्कृत रचनाओं में वर्णित हैं ।

व्यवसाय

क्रिस्टोफ़ जाफ़रलॉट ने टिप्पणी की है कि

यादव शब्द कई उपजातियों को आच्छादित करता है जो मूल रूप से अनेक नामों से जानी जाती है, हिन्दी क्षेत्र, पंजाब व गुजरात में- अहीर, महाराष्ट्र, गोवा में - गवली, आंध्र व कर्नाटक में- गोल्ला, तमिलनाडु में - कोनर, केरल में - मनियार जिनका सामान्य पारंपरिक कार्य चरवाहे, गोपालक व दुग्ध-विक्रेता का था

हालाँकि, जाफरलॉट ने यह भी कहा है कि अधिकांश आधुनिक यादव खेती करने वाले हैं और एक तिहाई से भी कम आबादी मवेशियों या दूध के व्यवसाय में लिप्त है।[7]

एम. एस. ए. राव ने भी जाफरलॉट के जैसी ही राय व्यक्त की और कहा कि मवेशियों के साथ पारंपरिक जुड़ाव, यदु के वंश का होने में विश्वास, यादव समुदाय को परिभाषित करता है।

लुकिया मिचेलुत्ती के विचार से -

यादव लगातार अपने जातिस्वरूप आचरण व कौशल को उनके वंश से जोड़कर देखते आये हैं जिससे उनके वंश की विशिष्टता स्वतः ही व्यक्त होती है। उनके लिए जाति मात्र पदवी नहीं है बल्कि रक्त की गुणवत्ता है, और ये द्रष्टव्य नया नहीं है। अहीर (वर्तमान में यादव) जाति की वंशावली एक सैद्धांतिक क्रम के आदर्शों पर आधारित है तथा उनके पूर्वज, गोपालक योद्धा श्रीकृष्ण पर केंद्रित है, जो कि एक क्षत्रिय थे। [8]

वर्तमान स्थिति

यादव ज्यादातर उत्तरी भारत में रहते हैं और विशेष रूप से हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार में रहते हैं। परंपरागत रूप से, वे एक गैर-कुलीन चरवाहे जाति थे। समय के साथ उनके पारंपरिक व्यवसाय बदल गए और कई वर्षों से यादव मुख्य रूप से खेती में जुड़े हैं,हालांकि मिचेलुत्ती ने 1950 के दशक के बाद से एक "आवर्तक पैटर्न" का उल्लेख किया है, जिसमें आर्थिक उन्नति, मवेशी से जुड़े व्यवसाय में परिवहन और निर्माण से संबंधित है। सेना और पुलिस उत्तर भारत में अन्य पारंपरिक रोजगार के अवसर रहे हैं और हाल ही में उस क्षेत्र में सरकारी रोजगार भी महत्वपूर्ण हो गए हैं। उनका मानना ​​है कि भूमि सुधार कानून के परिणामस्वरूप सकारात्मक भेदभाव के उपाय और लाभ कम से कम कुछ क्षेत्रों में महत्वपूर्ण कारक हैं।

लुकिया मिचेलुत्ती के अनुसार {{quote|औपनिवेशिक नृवंशविज्ञानियों ने नृवंशविज्ञान और नृवंशविज्ञान संबंधी विवरणों के सैकड़ों पन्नों की विरासत को छोड़ दिया, जो अहीर/यादवों को "क्षत्रिय","मार्शल" और "धनी" के रूप में, चित्रित करते हैं।

जे.एस. अल्टर ने कहा कि उत्तर भारत में अधिकांश पहलवान यादव जाति के हैं। वह इसे दुग्ध व्यवसाय और डेयरी फार्मों में शामिल होने के कारण बताते हैं, जो इस प्रकार दूध और घी को एक अच्छे आहार के लिए आवश्यक माना जाता है।

यद्यपि यादव विभिन्न क्षेत्रों में जनसंख्या में काफी अनुपात रखते हैं, जैसे कि 1931 में बिहार में 11% यादव थे। लेकिन चरवाहे गतिविधियों में उनकी रुचि परंपरागत रूप से भूमि के स्वामित्व से मेल नहीं खाती थी और परिणामस्वरूप वे "प्रमुख जाति" नहीं थे। उनकी पारंपरिक स्थिति को जाफरलोट ने "निम्न जाति के किसानों" के रूप में वर्णित किया है। यादवों का पारंपरिक दृष्टिकोण शांतिपूर्ण रहा है, जबकि गायों के साथ उनका विशेष संबंध एवं कृष्ण के बारे में उनकी मान्यताएं हिंदू धर्म में एक विशेष महत्व रखता है।

उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक कुछ यादव सफल पशु व्यापारी बन गए थे और अन्य को मवेशियों की देखभाल के लिए सरकारी अनुबंध मिल गए थे।[9] जाफरलोट का मानना है कि गाय और कृष्ण के साथ उनके संबंधों के धार्मिक अर्थों को उन यादवों द्वारा प्रयोग किया गया। राव बहादुर बलबीर सिंह ने 1910 में अहीर यादव क्षत्रिय महासभा की स्थापना की, जिसमें कहा गया कि अहीर वर्ण व्यवस्था में क्षत्रिय थे, यदु के वंशज थे (जैसे कि कृष्ण) और वास्तव में यादवों के नाम से जाने जाते थे।

समुदाय के संस्कृतिकरण के लिए आंदोलन में विशेष महत्व आर्य समाज की भूमिका थी जिसके प्रतिनिधि 1890 के दशक के अंत से राव बहादुर के परिवार से जुड़े थे। हालाँकि स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित इस आंदोलन ने एक जाति पदानुक्रम का समर्थन किया और साथ ही साथ इसके समर्थकों का मानना था कि जाति को वंश के बजाय योग्यता पर निर्धारित किया जाना चाहिए। इसलिए उन्होंने पारंपरिक विरासत में मिली जाति व्यवस्था को धता बताने के लिए यादवों को यज्ञोपवीतम् को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया। बिहार में, अहीरों द्वारा धागा पहनने के कारण हिंसा के अवसर पैदा हुए जहाँ भूमिहार और राजपूत प्रमुख समूह थे।[10]

संस्कृतिकरण की प्रक्रिया में अक्सर नया इतिहास बनाना शामिल रहा है। यादवों के लिए पहली बार उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में विट्ठल कृष्णजी खेडकर जो कि स्कूली टीचर ने ऐसा इतिहास लिखा था। खेडेकर के इतिहास ने यह दावा किया कि यादव, आभीर जनजाति के वंशज थे और आधुनिक यादव वही समुदाय थे, जिन्हें महाभारत और पुराणों में राजवंश कहा जाता है।[11] इसी के रूप में अखिल भारतीय यादव महासभा की स्थापना 1924 में इलाहाबाद में की गई थी। इस कार्यक्रम में शराब ना पीने और शाकाहार के पक्ष में अभियान शामिल था। साथ ही स्व-शिक्षा को बढ़ावा देना और गोद लेने को बढ़ावा देना भी शामिल था। यहाँ सभी को अपने क्षेत्रीय नाम, गोत्र आदि के नाम छोड़कर "यादव" नाम को अपनाने का अभियान चला था। इसने ब्रिटिश राज को यादवों को सेना में अधिकारी के रूप में भर्ती करने के लिए प्रोत्साहित करने की कोशिश की और वित्तीय बोझ को कम करने और शादी की स्वीकार्य उम्र बढ़ाने जैसे सामुदायिक प्रथाओं को आधुनिक बनाने की मांग की।[12]

मिचेलुत्ती ने "संस्कृतिकरण" के बजय यादवीकरण कहा। उनका तर्क है कि कृष्णा की कथित सामान्य कड़ी का इस्तेमाल यादव की उपाधि के तहत भारत के कई और विविध विधर्मी समुदायों की आधिकारिक मान्यता के लिए किया गया था, न कि केवल क्षत्रिय की श्रेणी में दावा करने के लिए। इसके अलावा, "... सामाजिक नेताओं और राजनेताओं ने जल्द ही महसूस किया कि उनकी 'संख्या' और उनकी जनसांख्यिकीय स्थिति का आधिकारिक प्रमाण महत्वपूर्ण राजनीतिक उपकरण थे, जिसके आधार पर वे राज्य संसाधनों के 'उचित' हिस्से का दावा कर सकते थे।"

सैन्य वर्ग ( मार्शल रेस )

 
2013 असीर गढ़ किला
 
रेवाड़ी नरेश राव तुलाराम
 
रा 'नवघन' को बचाने के उद्देश्य से देवयत बोधर अहीर द्वारा अपने पुत्र का बलिदान
 
जूनागढ़ किले में देवयत बोधर की मूर्ति
 
महोबा नरेश वीर आल्हा
 
त्रिकूट आभीर सिक्के, From Rapson "Catalog of Indian coin of the British Museum", 1908.
 
वीर अझगू मुतू कोणे

अहीर एतिहासिक पृष्टभूमि की जंगी नस्ल है [13]1920 में अंग्रेजों द्वारा अहीरों को "किसान जाति" के रूप में वर्गीकृत किया गया था जो उस समय "योद्धा जाति" का पर्याय था। ,[14] वे लंबे समय से सेना में भर्ती हो रहे हैं।[15]ब्रिटिश सरकार ने तब अहिरो की चार कंपनियों का निर्माण किया, जिनमें से दो 95वीं रसेल इन्फैंट्री में थीं। [16]1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान 13वीं कुमाऊं रेजीमेंट की अहीर कंपनी द्वारा रेजांगला मोर्चे पर यादव सैनिकों की वीरता और बलिदान की आज भी भारत में प्रशंसा की जाती है। और उनकी वीरता की याद में युद्ध स्थल स्मारक का नाम "अहीर धाम" रखा गया।[17][18]वह भारतीय सेना की "राजपूत रेजिमेंट", "कुमाऊं रेजिमेंट", "जाट रेजिमेंट", "राजपुताना राइफल्स", "बिहार रेजिमेंट", "ग्रेनेडियर्स" में भी भागीदार हैं।[19]अहिरो के एकल सैनिक अभी भी भारतीय सशस्त्र बलों में बख्तरबंद कोनों और तोपखाने में मौजूद हैं। जिसमें उन्हें वीरता के विभिन्न पुरस्कार मिले हैं।[20]

सैन्य पुरस्कार विजेता यादव सैनिक

(सूची यादव उपनाम ​​पर आधारित)

  • कैप्टन योगेन्द्र सिंह यादव ,परम वीर चक्र[21]
  • नवल कमांडर बी. बी। यादव, महावीर चक्र[22]
  • लांस नायक चंद्रकेत प्रसाद यादव, वीर चक्र[23]
  • मेजर जनरल जय भगवान सिंह यादव, वीर चक्र[24]
  • विंग कमांडर कृष्ण कुमार यादव, वीर चक्र[25]
  • नायक गणेश प्रसाद यादव, वीर चक्र[26]
  • नायक कौशल यादव, वीर चक्र[27]
  • जगदीश प्रसाद यादव, अशोक चक्र (मरणोपरांत)[28]
  • सुरेश चंद यादव, अशोक चक्र (मरणोपरांत)[29]
  • स्क्वाड्रन लीडर दीपक यादव, कीर्ति चक्र (मरणोपरांत)[30]
  • सूबेदार महावीर सिंह यादव, अशोक चक्र (मरणोपरांत)[31]
  • पायनियर महाबीर यादव, शौर्य चक्र (मरणोपरांत) [32]
  • पैराट्रूपर, सूबे सिंह यादव, शौर्य चक्र[33]
  • नायक सूबेदार राम कुमार यादव, शौर्य चक्र (मरणोपरांत)[34]
  • सैपर आनंदी यादव, इंजीनियर्स, शौर्य चक्र (मरणोपरांत)[35]
  • नायक गिरधारीलाल यादव, शौर्य चक्र (मरणोपरांत)[36]
  • हरि मोहन सिंह यादव, शौर्य चक्र[37]
  • कैप्टन वीरेंद्र कुमार यादव, शौर्य चक्र[38]
  • पैटी अफसर महिपाल यादव, शौर्य चक्र[39]
  • कैप्टन बबरू भान यादव, शौर्य चक्र[40]
  • मेजर प्रमोद कुमार यादव, शौर्य चक्र[41]
  • रमेश चंद्र यादव, शौर्य चक्र[42]
  • मेजर धर्मेश यादव, शौर्य चक्र[43]
  • लेफ्टिनेंट मानव यादव, शौर्य चक्र[44]
  • मेजर उदय कुमार यादव, शौर्य चक्र[45]
  • कैप्टन कृष्ण यादव, शौर्य चक्र[46]
  • कैप्टन सुनील यादव, शौर्य चक्र[47]
  • यादव अर्बेशंकर राजधारी, शौर्य चक्र[48]
  • कमलेश कुमारी अशोक चक्र संसद भवन हमला 2001

ऐतिहासिक यादव (अहीर) राजा और कबीले प्रशासक

आल्हा ऊदल

 
महोबा नरेश चंद्रवंशी वीर अहीर आल्हा

आल्हा और ऊदल चंदेल राजा परमाल की सेना के एक सफल सेनापति दशराज के पुत्र थे, जिनकी उत्पत्ति बनाफर अहीर[113] जाति से हुई थी,वे बाणापार बनाफ़र अहीरों के समुदाय से ताल्लुक रखते थे। और वे पृथ्वीराज चौहान और माहिल जैसे राजपूतों के खिलाफ लड़ते थे । भविष्य पुराण में कहा गया है कि न केवल आल्हा और उदल के माता पिता अहीर थे, बल्कि बक्सर के उनके दादादादी भी हैहयवंशी अहीर थे।

इन्हें भी देखें

सन्दर्भ

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  2. Brahmachary, K. C. (2004). We and Our Administration (अंग्रेज़ी में). Mittal Publications. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-7099-916-4.
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  4. Soni, Lok Nath (2000). The Cattle and the Stick: An Ethnographic Profile of the Raut of Chhattisgarh (अंग्रेज़ी में). Anthropological Survey of India, Government of India, Ministry of Tourism and Culture, Department of Culture. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-85579-57-3.
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  10. Mandelbaum, David Goodman (1970). Society in India. 2. Berkeley: University of California Press. पृ॰ 444. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-520-01623-1. मूल से 8 जून 2020 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 1 जुलाई 2020.
  11. सन्दर्भ त्रुटि: <ref> का गलत प्रयोग; Jaffrelot2003pp194-196 नाम के संदर्भ में जानकारी नहीं है।
  12. Jaffrelot, Christophe (2003). India's silent revolution: the rise of the lower castes in North India. London: C. Hurst & Co. पृ॰ 196. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-1-85065-670-8. मूल से 31 दिसंबर 2013 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 2011-08-16.
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