यादवों की एक पल्टन, दिल्ली 1868

यादव भारत में पारंपरिक रूप से गैर-कुलीन किसान-चरवाहे समुदायों या जातियों का एक समूह को संदर्भित करता शब्द है। 19वीं और 20वीं शताब्दी से वह सामाजिक और राजनीतिक पुनरुत्थान के आंदोलन के भाग के रूप में पौराणिक राजा यदु के वंश से होने का दावा करते हैं।[1][2][3][4]

यादव शब्द अब कई पारंपरिक किसान-चरवाहे जातियों जैसे कि अहीर और महाराष्ट्र की गवली को शामिल करता है। परंपरागत रूप से यादव समूहों को मवेशी पालने से जोड़ा जाता था और इस कारण वह औपचारिक जाति व्यवस्था के बाहर थे।[5] उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के उत्तरार्ध के बाद से यादव आंदोलन ने अपने घटकों की सामाजिक प्रतिष्ठा को सुधारने के लिए काम किया है। इसमें संस्कृतीकरण, भारतीय और ब्रिटिश सशस्त्र बलों में सक्रिय भागीदारी, अधिक प्रतिष्ठित व्यापारिक क्षेत्रों में शामिल होना और राजनीति में सक्रिय भागीदारी प्रमुख है। यादव नेताओं और बुद्धिजीवियों ने अक्सर यदु और कृष्ण के वंश से होने के अपने दावे पर ध्यान केंद्रित किया है। वे तर्क देते हैं कि इससे उनका क्षत्रिय का दर्जा है।

उत्पत्ति

पौराणिक कथाओं में

यादव शब्द की व्याख्या 'यदु के वंशज' होने के लिए की गई है, जो कि एक पौराणिक राजा है।[6] "बहुत व्यापक सामान्यताओं" का उपयोग करते हुए, जयंत गडकरी कहते हैं कि पुराणों के विश्लेषण से यह "लगभग निश्चित" है कि अंधका, वृष्णि, सातवात और आभीर को सामूहिक रूप से यादवों के रूप में जाना जाता था और वह कृष्ण की पूजा करते थे। गडकरी ने इन प्राचीन रचनाओं के आगे लिखा है कि "यह विवाद से परे है कि प्रत्येक पुराण में किंवदंतियां और मिथक हैं"।

लुकिया मिचेलुत्ती के अनुसार

यादव समुदाय के मूल में वंश का एक विशिष्ट लोक सिद्धांत निहित है, जिसके अनुसार सभी भारतीय देहाती/चारवाही जातियों को यदुवंश ( यादव) से वंशज कहा जाता है जिसमें कृष्ण (एक चरवाहे, और माना जाता है कि एक क्षत्रिय) थे। ... [उनके बीच एक दृढ़ विश्वास है कि सभी यादव कृष्ण वंश के वंश के हैं, यादव आज के मूल और अविभाजित समूह के विखंडन का परिणाम हैं।

पी. एम. चंदोरकर जैसे इतिहासकारों ने उत्कीर्ण लेख-संबंधी और इसी तरह के साक्ष्य का उपयोग यह तर्क देने के लिया किया है कि अहीर और गवली प्राचीन यादवों और आभीरों के प्रतिनिधि हैं जो संस्कृत रचनाओं में वर्णित हैं ।

व्यवसाय

क्रिस्टोफ़ जाफ़रलॉट ने टिप्पणी की है कि

यादव शब्द कई उपजातियों को आच्छादित करता है जो मूल रूप से अनेक नामों से जानी जाती है, हिन्दी क्षेत्र, पंजाब व गुजरात में- अहीर, महाराष्ट्र, गोवा में - गवली, आंध्र व कर्नाटक में- गोल्ला, तमिलनाडु में - कोनर, केरल में - मनियार जिनका सामान्य पारंपरिक कार्य चरवाहे, गोपालक व दुग्ध-विक्रेता का था

हालाँकि, जाफरलॉट ने यह भी कहा है कि अधिकांश आधुनिक यादव खेती करने वाले हैं और एक तिहाई से भी कम आबादी मवेशियों या दूध के व्यवसाय में लिप्त है।[7]

एम. एस. ए. राव ने भी जाफरलॉट के जैसी ही राय व्यक्त की और कहा कि मवेशियों के साथ पारंपरिक जुड़ाव, यदु के वंश का होने में विश्वास, यादव समुदाय को परिभाषित करता है। डेविड मंडेलबौम के अनुसार मवेशियों के साथ यादव (और उनकी घटक जातियाँ, अहीर और ग्वाला) की संगति ने उन्हें सामान्य रूप से शूद्र के रूप में परिभाषित किया है। हालांकि समुदाय के सदस्य अक्सर क्षत्रिय के उच्च दर्जे का दावा करते हैं।

लुकिया मिचेलुत्ती के विचार से -

यादव लगातार अपने जातिस्वरूप आचरण व कौशल को उनके वंश से जोड़कर देखते आये हैं जिससे उनके वंश की विशिष्टता स्वतः ही व्यक्त होती है। उनके लिए जाति मात्र पदवी नहीं है बल्कि रक्त की गुणवत्ता है, और ये द्रष्टव्य नया नहीं है। अहीर (वर्तमान में यादव) जाति की वंशावली एक सैद्धांतिक क्रम के आदर्शों पर आधारित है तथा उनके पूर्वज, गोपालक योद्धा श्रीकृष्ण पर केंद्रित है, जो कि एक क्षत्रिय थे। [8]

वर्तमान स्थिति

यादव ज्यादातर उत्तरी भारत में रहते हैं और विशेष रूप से हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार में रहते हैं। परंपरागत रूप से, वे एक गैर-कुलीन चरवाहे जाति थे। समय के साथ उनके पारंपरिक व्यवसाय बदल गए और कई वर्षों से यादव मुख्य रूप से खेती में जुड़े हैं,हालांकि मिचेलुत्ती ने 1950 के दशक के बाद से एक "आवर्तक पैटर्न" का उल्लेख किया है, जिसमें आर्थिक उन्नति, मवेशी से जुड़े व्यवसाय में परिवहन और निर्माण से संबंधित है। सेना और पुलिस उत्तर भारत में अन्य पारंपरिक रोजगार के अवसर रहे हैं और हाल ही में उस क्षेत्र में सरकारी रोजगार भी महत्वपूर्ण हो गए हैं। उनका मानना ​​है कि भूमि सुधार कानून के परिणामस्वरूप सकारात्मक भेदभाव के उपाय और लाभ कम से कम कुछ क्षेत्रों में महत्वपूर्ण कारक हैं।

लुकिया मिचेलुत्ती के अनुसार

औपनिवेशिक नृवंशविज्ञानियों ने नृवंशविज्ञान और नृवंशविज्ञान संबंधी विवरणों के सैकड़ों पन्नों की विरासत को छोड़ दिया, जो अहीर/यादवों को "क्षत्रिय","मार्शल" और "धनी" के रूप में, या "शूद्रों," चरवाहों "," दूध बेचने वालों "और निम्न दर्ज़े की स्थिति के रूप में चित्रित करते हैं। संक्षेप में अहीर जाति/जनजाति की प्रकृति पर कोई सहमति नहीं बनी है।

जे.एस. अल्टर ने कहा कि उत्तर भारत में अधिकांश पहलवान यादव जाति के हैं। वह इसे दुग्ध व्यवसाय और डेयरी फार्मों में शामिल होने के कारण बताते हैं, जो इस प्रकार दूध और घी को एक अच्छे आहार के लिए आवश्यक माना जाता है।

यद्यपि यादव विभिन्न क्षेत्रों में जनसंख्या में काफी अनुपात रखते हैं, जैसे कि 1931 में बिहार में 11% यादव थे। लेकिन चरवाहे गतिविधियों में उनकी रुचि परंपरागत रूप से भूमि के स्वामित्व से मेल नहीं खाती थी और परिणामस्वरूप वे "प्रमुख जाति" नहीं थे। उनकी पारंपरिक स्थिति को जाफरलोट ने "निम्न जाति के किसानों" के रूप में वर्णित किया है। यादवों का पारंपरिक दृष्टिकोण शांतिपूर्ण रहा है, जबकि गायों के साथ उनका विशेष संबंध एवं कृष्ण के बारे में उनकी मान्यताएं हिंदू धर्म में एक विशेष महत्व रखता है।

उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक कुछ यादव सफल पशु व्यापारी बन गए थे और अन्य को मवेशियों की देखभाल के लिए सरकारी अनुबंध मिल गए थे।[9] जाफरलोट का मानना है कि गाय और कृष्ण के साथ उनके संबंधों के धार्मिक अर्थों को उन यादवों द्वारा प्रयोग किया गया। राव बहादुर बलबीर सिंह ने 1910 में अहीर यादव क्षत्रिय महासभा की स्थापना की, जिसमें कहा गया कि अहीर वर्ण व्यवस्था में क्षत्रिय थे, यदु के वंशज थे (जैसे कि कृष्ण) और वास्तव में यादवों के नाम से जाने जाते थे।

समुदाय के संस्कृतिकरण के लिए आंदोलन में विशेष महत्व आर्य समाज की भूमिका थी जिसके प्रतिनिधि 1890 के दशक के अंत से राव बहादुर के परिवार से जुड़े थे। हालाँकि स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित इस आंदोलन ने एक जाति पदानुक्रम का समर्थन किया और साथ ही साथ इसके समर्थकों का मानना था कि जाति को वंश के बजाय योग्यता पर निर्धारित किया जाना चाहिए। इसलिए उन्होंने पारंपरिक विरासत में मिली जाति व्यवस्था को धता बताने के लिए यादवों को यज्ञोपवीतम् को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया। बिहार में, अहीरों द्वारा धागा पहनने के कारण हिंसा के अवसर पैदा हुए जहाँ भूमिहार और राजपूत प्रमुख समूह थे।[10]

संस्कृतिकरण की प्रक्रिया में अक्सर नया इतिहास बनाना शामिल रहा है। यादवों के लिए पहली बार उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में विट्ठल कृष्णजी खेडकर जो कि स्कूली टीचर ने ऐसा इतिहास लिखा था। खेडेकर के इतिहास ने यह दावा किया कि यादव, आभीर जनजाति के वंशज थे और आधुनिक यादव वही समुदाय थे, जिन्हें महाभारत और पुराणों में राजवंश कहा जाता है।[11] इसी के रूप में अखिल भारतीय यादव महासभा की स्थापना 1924 में इलाहाबाद में की गई थी। इस कार्यक्रम में शराब ना पीने और शाकाहार के पक्ष में अभियान शामिल था। साथ ही स्व-शिक्षा को बढ़ावा देना और गोद लेने को बढ़ावा देना भी शामिल था। यहाँ सभी को अपने क्षेत्रीय नाम, गोत्र आदि के नाम छोड़कर "यादव" नाम को अपनाने का अभियान चला था। इसने ब्रिटिश राज को यादवों को सेना में अधिकारी के रूप में भर्ती करने के लिए प्रोत्साहित करने की कोशिश की और वित्तीय बोझ को कम करने और शादी की स्वीकार्य उम्र बढ़ाने जैसे सामुदायिक प्रथाओं को आधुनिक बनाने की मांग की।[12]

मिचेलुत्ती ने "संस्कृतिकरण" के बजय यादवीकरण कहा। उनका तर्क है कि कृष्णा की कथित सामान्य कड़ी का इस्तेमाल यादव की उपाधि के तहत भारत के कई और विविध विधर्मी समुदायों की आधिकारिक मान्यता के लिए किया गया था, न कि केवल क्षत्रिय की श्रेणी में दावा करने के लिए। इसके अलावा, "... सामाजिक नेताओं और राजनेताओं ने जल्द ही महसूस किया कि उनकी 'संख्या' और उनकी जनसांख्यिकीय स्थिति का आधिकारिक प्रमाण महत्वपूर्ण राजनीतिक उपकरण थे, जिसके आधार पर वे राज्य संसाधनों के 'उचित' हिस्से का दावा कर सकते थे।"

सन्दर्भ

  1. सन्दर्भ त्रुटि: <ref> का गलत प्रयोग; Bayly2001-p383 नाम के संदर्भ में जानकारी नहीं है।
  2. Bayly, Susan (2001). Caste, Society and Politics in India from the Eighteenth Century to the Modern Age. Cambridge University Press. पृ॰ 200. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-521-79842-6. मूल से 29 सितंबर 2013 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 1 जुलाई 2020. Quote: "In southern Awadh, eastern North-Western Provinces, and much of Bihar, non-labouring gentry groups lived in tightly knit enclaves among much larger populations of non-elite 'peasants' and labouring people. These other grouping included 'untouchable' Chamars and newly recruited 'tribal' labourers, as well as non-elite tilling and cattle-keeping people who came to be known by such titles as Kurmi, Koeri and Goala/Ahir."
  3. Luce, Edward (2008). In Spite of the Gods: The Rise of Modern India. Random House Digital, Inc. पृ॰ 133. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-1-4000-7977-3. मूल से 29 सितंबर 2013 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 1 जुलाई 2020. Quote: "The Yadavs are one of India's largest 'Other Backward Classes,' a government term that covers most of India's Sudra castes. Yadavs are the traditional cowherd caste of North India and are relatively low down on the traditional pecking order, but not as low as the untouchable Mahars or Chamars."
  4. Michelutti, Lucia (2004), "'We (Yadavs) are a caste of politicians': Caste and modern politics in a north Indian town", Contributions to Indian Sociology, 38 (1–2): 43–71, डीओआइ:10.1177/006996670403800103 Quote: "The Yadavs were traditionally a low-to-middle-ranking cluster of pastoral-peasant castes that have become a significant political force in Uttar Pradesh (and other northern states like Bihar) in the last thirty years."
  5. Hutton, John Henry (1969). Caste in India: its nature, function and origins. Oxford University Press. पृ॰ 113. मूल से 27 जून 2014 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 1 जुलाई 2020. Quote: "In a not dissimilar way the various cow-keeping castes of northern India were combining in 1931 to use the common term of Yadava for their various castes, Ahir, Goala, Gopa, etc., and to claim a Rajput origin of extremely doubtful authenticity."
  6. Rao, M. S. A. (1979). Social movements and social transformation: a study of two backward classes movements in India. Macmillan. पृ॰ 124. मूल से 1 जनवरी 2014 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 1 जुलाई 2020.
  7. Jaffrelot, Christophe (2003). India's silent revolution: the rise of the lower castes in North India. London: C. Hurst & Co. पृ॰ 188. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-1-85065-670-8. मूल से 31 दिसंबर 2013 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 1 जुलाई 2020.
  8. Gupta, Dipankar; Michelutti, Lucia (2004). "2 ‘We (Yadavs) are a caste of politicians’: Caste and modern politics in a north Indian town". प्रकाशित Dipankar Gupta (संपा॰). Caste in Question: Identity or hierarchy?. Contributions to Indian Sociology. नई दिल्ली, California, London: Sage Publications. पपृ॰ 48/Lucia Michelutti. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0-7619-3324-7. |chapter= में 3 स्थान पर C1 control character (मदद)
  9. Mandelbaum, David Goodman (1970). Society in India. 2. Berkeley: University of California Press. पृ॰ 443. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-520-01623-1. मूल से 8 जून 2020 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 1 जुलाई 2020.
  10. Mandelbaum, David Goodman (1970). Society in India. 2. Berkeley: University of California Press. पृ॰ 444. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-520-01623-1. मूल से 8 जून 2020 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 1 जुलाई 2020.
  11. सन्दर्भ त्रुटि: <ref> का गलत प्रयोग; Jaffrelot2003pp194-196 नाम के संदर्भ में जानकारी नहीं है।
  12. Jaffrelot, Christophe (2003). India's silent revolution: the rise of the lower castes in North India. London: C. Hurst & Co. पृ॰ 196. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-1-85065-670-8. मूल से 31 दिसंबर 2013 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 2011-08-16.