यह पृष्ठ महाभारत लेख के सुधार पर चर्चा करने के लिए वार्ता पन्ना है। यदि आप अपने संदेश पर जल्दी सबका ध्यान चाहते हैं, तो यहाँ संदेश लिखने के बाद चौपाल पर भी सूचना छोड़ दें।

लेखन संबंधी नीतियाँ

महाभारत का संदूक तैयार करेसंपादित करें

{{सन्दूक महाभारत}}

इसका संदूक तो बनाया हुआ है, वैसे उस पर और सुधार कर दिया जायेगा।--मयुर बंसल वार्ता १६:२५, ५ मई २०१० (UTC)

ब्राह्मी भाषा?संपादित करें

इस लेख में लिखा गया है कि "उस समय संस्कृत ऋषियों की भाषा थी और ब्राह्मी आम बोलचाल की भाषा हुआ करती थी। " परन्तु ब्राह्मी तो एक लिपि है ना की भाषा| इस वाक्य का तात्पर्य क्या है?--Eukesh १४:४६, ५ मई २०१० (UTC)


युकेश जी आप के ध्यान के लिये साधुवाद,कदचित आप ब्राह्मी भाषा को ब्राह्मी लिपि समझ बेठे, मैने यह संदर्भ महाभारत से ही लिया है जिसमें यह साफ लिखा है कि प्राचीन वैदिक भारत में ब्राह्मी भाषा बोली जाती थी। मै आपको वह श्लोक लिख देता हुँ,
राजवद् रुप्वेषौ ते ब्राह्मी वाचं विभर्षि च|
को नाम त्वं कुत च असि कस्य पुत्र च शंस मे॥(महाभारत आदिपर्व ८१/१३)
अर्थात आपके रुप और वेष राजा के समान है और ब्राह्मी वाणी बोल(वाचं) रहे है। मुझे बताइये कि आपका नाम क्या है, कहाँ से आये है और किसके पुत्र है?
यह बातचित देवयानी और ययाति के बीच होती है, वैसे मेरी ही गलती थी कि मैने कोई संदर्भ नहीं दिया इसका, अब आपका संदेह दूर हो गया है क्योंकि उपर साफ लिखा है ब्राह्मी वाचं अर्थात ब्राह्मी वाणी या भाषा--मयुर बंसल वार्ता १५:५४, ५ मई २०१० (UTC)
अर्थ स्पष्ट करने के लिए धन्यवाद। --युकेश २०:१७, ५ मई २०१० (UTC)

ग्रन्थ लेखनसंपादित करें

महाभारत एक धार्मिक महाकाव्य है। इस में उल्लेख हुए ग्रन्थ लेखन की कथा को मेरे विचार में "ग्रन्थ लेखन की कथा" शिर्षक में रखना चाहिए ना कि "ग्रन्थ लेखन" मे। महाभारत के ग्रन्थ लेखन में ग्रन्थ का ऐतिहासिक तथ्य अगर उपलब्ध है, तो उन्हे रखना चाहिए। --Eukesh १५:०२, ५ मई २०१० (UTC)


महाभारत एक धार्मिक महाकाव्य बाद में है पहले सभी वैदिक ग्रंथों में दिये संदर्भों के अनुसार एक इतिहास है न कि कोई पोराणिक कहानी, इसे सभी वैदिक ग्रंथों में इतिहास लिखा गया है न कि कोई धार्मिक महाकाव्य, हाँ बाद कि हिन्दू प्रथाओ ने इसे धार्मिक महाकाव्य की तरह देखा परन्तु यह ग्रंथ एक वैदिक इतिहास को दर्शाता है न कि कोई धार्मिक महाकाव्य
ग्रन्थ लेखन भी एक बार फिर महाभारत को ही संदर्भ बनाकर दिया गया है, ऐतिहासिक तथ्य इससे अलग नीचे मूल काव्य रचना इतिहास में दिये गये है दोनो को अलग रखा गया क्योंकि एक तो महाभारत ग्रंथ में है और दूसरा ऐतिहासिक तथ्य पर ज्यादा अधारित है।--मयुर बंसल वार्ता १६:२०, ५ मई २०१० (UTC)
हिन्दू/बौद्ध/जैन/सिख मान्यता अनुसार महाभारत "इतिहास" के अन्तर्गत का ग्रन्थ है। यह हमारी मान्यता है। परन्तु, विश्व इतिहास में इसे एक इतिहास से संबन्धित साहित्यिक/धार्मिक ग्रन्थ के रुप में लिया जाता है। आधुनिक इतिहास तथ्यौं पर आधारित होता है और तथ्य प्रमाण पर आधारित होता है। प्रमाण शोध का परिणाम होते है। महाभारत में लिखे गए सभी वर्णन का शोध अभी नहीं हो पाया है। पाश्चात्य जगत में इलियाड और ओडिसी भी तो इतिहास के रुप में ही तो लिखा गया था, इन पर अनेकन शोध पश्चात समकालीन आधुनिक इतिहासकार इन्हे ऐतिहासिक और इतिहास से संबंधित ग्रन्थ के रुप में ग्रहण करते है। में यहाँ वेद, पुराण वा अन्य महान ग्रन्थौं की आलोचना नहीं कर रहा हुं। परन्तु ज्ञानकोष उन तथ्यौं पर आधारित होते है जिन को सम्बन्धित विषय के विज्ञौं ने प्रमाणिकृत तथ्य पर सिद्ध किया है। महाभारत से भारतवर्ष के बारे में वृहद जानकारी प्राप्त होता है, परन्तु हमारे समकालीन विश्व के इतिहासकार क्या इन जानकारीयौं को तथ्य के रुप में मानते है? क्या चिनिया वा ब्राजीली लोग के लिए भी महाभारत में लिखे गए जानकारी उतना ही तथ्य है जितना कि हमें है? अतः, अगर "ग्रन्थ लेखन" में प्रस्तुत जानकारी वैज्ञानिक इतिहासकारौं के निमित्त तथ्य है तो इस खण्ड को लेख के परिचय में रखना सान्दर्भिक हो सकता है, नहीं तो इस खण्ड को महाभारत की कहानी में रखना ज्यादा उचित होगा। धन्यवाद।--युकेश २१:१०, ५ मई २०१० (UTC)
ऐतिहासिकता केवल समकालिन विद्वानों की सोच और समकालिन उपलब्ध प्रमाणों प‍र टिकी है, जैसे आज से १५०० वर्ष पूर्व आर्यभट और वराहमिहिर जैसे विद्वानों ने महाभारत युद्ध ३१०० ईसा पूर्व बताया, यह मत लगातार १५०० वर्षों तक भारत में चला, परन्तु जैसे ही १९ वी शताब्दी आयी कई पाश्चात्य विद्वानो ने इसकी प्रमाणिकता को नकार दिया, फिर धीरे धीरे जब कुछ पुरात्त्व प्रमाण सामने आये तो इस युद्ध को १००० ईसा पूर्व से १५०० ईसा पूर्व माना जाने लगा, अब जब कम्पयूटर ने क्रांति लायी तो कुछ पाश्चात्य और देशी विद्वानों ने महाभारत में वर्णित अकाशिय गणणाओ के अधार पर इसे ३१००-५६०० ईसा पूर्व भी बता दिया, सरस्वती नदी की खोज ने इसकी पुष्टि भी की।
ऐसे ही ताजमहल का उदाहरण ले सकते है जिसे समस्त इतिहासकार १६००-१७०० शताब्दी में बना बताते है ,परन्तु वहां की गयी पुरात्त्व जाँच में उसकी डेटिंग १२००-१३०० शताब्दी सिद्ध हुई। पहली बात की मुशकिल से ही कोई ऐसा विषय होता है जिस पर समस्त इतिहासकार एक साथ सहमत हो जैसे आर्य भारत आये,ऋग्वेद का रचना काल यह अभी बहुत विवादित है, आज हुई नई खोजों में समुद्र में डुबी द्वारका मिली जिससे महाभारत को १७०० ईसा पूर्व हुआ भी माना गया
हाँ, कितुं ऋग्वेद और मुख्य उपनिषदों को सभी इतिहासकार प्रमाणिक रुप से देखते है, स्वयं महाभारत मे इसके रचियता का वर्णन है--मयुर बंसल वार्ता २१:१८, ५ मई २०१० (UTC)
वेदव्यासजी का तो ऐतिहासिक तथ्य पुष्टि समकालीन समय में सायद हो सकें पर गणेश जी के ऐतिहासिकता को प्रमाणित करने के लिए तो हमे बहुत समय लग सकता है।--युकेश २२:०४, ५ मई २०१० (UTC)
आप की बात उत्तम लगी, लेकिन ऐसा नहीं है इस पर भी भाषाई विश्लेषण करने वाले इतिहासकारों में विवाद है कि प्राचीन काल में गणेश, लिखने वाले लेखकों को कहा जाता था जो कुशल लेखन का काम करते थे, इस बात को भी मैने ऐसा कहकर लिखा है कि महाभारत में ऐसा वर्णन आता है कि ,,,,,,, आदि, क्योंकि यह बात अभी विवादित है--मयुर बंसल वार्ता २२:१७, ५ मई २०१० (UTC)

वेदव्याससंपादित करें

हमारी मान्यता अनुसार महाभारत के रचयिता वेदव्यास थे। परन्तु इसका ऐतिहासिक प्रमाण अभी तक उपलब्ध नहीं हुआ है। अतः
"इस काव्य के रचयिता वेदव्यास जी ने॰॰॰"
को बदलकर
"हिन्दू परम्परा अनुसार इस ग्रन्थ के रचयिता वेदव्यास है। हिन्दू परम्परा में ऐसा माना जाता है की वेदव्यास जी ने॰॰॰"
लिखना ज्ञानकोष के दृष्टिकोण से सायद ज्यादा उपयुक्त होगा।--Eukesh १५:१५, ५ मई २०१० (UTC)


ऐतिहासिकता केवल समकालिन विद्वानों की सोच और समकालिन उपलब्ध प्रमाणों प‍र टिकी है, जैसे आज से १५०० वर्ष पूर्व आर्यभट और वराहमिहिर जैसे विद्वानों ने महाभारत युद्ध ३१०० ईसा पूर्व बताया, यह मत लगातार १५०० वर्षों तक भारत में चला, परन्तु जैसे ही १९ वी शताब्दी आयी कई पाश्चात्य विद्वानो ने इसकी प्रमाणिकता को नकार दिया, फिर धीरे धीरे जब कुछ पुरात्त्व प्रमाण सामने आये तो इस युद्ध को १००० ईसा पूर्व से १५०० ईसा पूर्व माना जाने लगा, अब जब कम्पयूटर ने क्रांति लायी तो कुछ पाश्चात्य और देशी विद्वानों ने महाभारत में वर्णित अकाशिय गणणाओ के अधार पर इसे ३१००-५६०० ईसा पूर्व भी बता दिया, सरस्वती नदी की खोज ने इसकी पुष्टि भी की।
ऐसे ही ताजमहल का उदाहरण ले सकते है जिसे समस्त इतिहासकार १६००-१७०० शताब्दी में बना बताते है ,परन्तु वहां की गयी पुरात्त्व जाँच में उसकी डेटिंग १२००-१३०० ईसा पूर्व सिद्ध हुई। पहली बात की मुशकिल से ही कोई ऐसा विषय होता है जिस पर समस्त इतिहासकार एक साथ सहमत हो जैसे आर्य भारत आये,ऋग्वेद का रचना काल यह अभी बहुत विवादित है, आज हुई नई खोजो मे समुद्र में डुबी द्वारका मिली जिससे महाभारत को १७०० ईसा पूर्व हुआ भी माना गया
पूरे महाभारत में तथा शिलालेखों मे यह कई बार दोहराया गया है कि इसके सब तरह के redactions के लेखक वेदव्यास ही थे, अंग्रेजी विकी में भी यह लिखा गया है, हम तो केवल महाभारत के संदर्भ पर चल रहे है। हाँ इसको हिन्दू परम्परा अनुसार इस ग्रन्थ के रचयिता वेदव्यास है। संदर्भ बनाकर दे सकते है, वैसे इसकी जरुरत नहीं कयोंकि महाभारत तथा अन्य वैदिक ग्रंथों मे यह कई बार लिखा गया है कि ग्रन्थ के रचयिता वेदव्यास है, हाँ इसकी आधुनिक अवस्था का लेखक कोई और हो सकता है जो लेख में लिखा गया है कि पहले व्यास, फिर वैशम्पायन, फिर सौति फिर किसी और ने इसे आधुनिक अवस्था में पाण्डुलिपियों मे लिखा, मतलब कि जो महाभारत हम आज देखते है यह वही वाली महाभारत नहीं है जिसकी रचना व्यास जी ने की थी--मयुर बंसल वार्ता १६:०३, ५ मई २०१० (UTC)
अंग्रेजी में प्रायः "महाभारत का श्रेय वेदव्यास को दिया जाता है" प्रकार के वाक्य लिखे होते है। यह वाक्य यह नहीं कहता की महाभारत वेदव्यास की रचना है परन्तु यह भी नहीं कहता की यह वेदव्यासजी की रचना नहीं है। सभी उपलब्ध शिलालेख और प्रमाण महाभारत पर ही आधारित है। अगर महाभारत से बाहर वेदव्यासजी के ऐतिहासिक तथ्य उपलब्ध हों तो "महाभारत वेदव्यास द्वारा रचित है" लिखना उचित होगा। (जैसे कि बुद्ध के अस्तित्व के विषय में बहुत विवाद था और नेपाल के लुम्बिनी में बुद्ध जन्म से सम्बन्धित शिलालेख १९वीं शताब्दी में प्राप्त होने के बाद उन्हे ऐतिहासिक व्यक्ति के रुप में प्रमाणित करने के लिए बहुत सहायता हुआ)। धन्यवाद।--युकेश २१:४२, ५ मई २०१० (UTC)
"इस काव्य के रचयिता वेदव्यास जी ने॰॰॰" यह वाक्य महाभारत से लिया गया है, इसके लिये इस वाक्य को संदर्भ के साथ दिया गया है, वैसे इतनी प्राचीन(३०००-६०० ईसा पूर्व) हस्तियों के शिलालेख मिल पाना तो बहुत मुश्किल है, हम तो केवल हमारे पास उपलब्ध ग्रंथों और अन्य ऐतेहासिक रचनाओं का भाषाई विश्लेषण करके ही प्राचिन समय की जानकारी प्राप्त कर सकते है, इसमें त्रुटियों की भी संभावना है परन्तु आधुनिक इतिहासकार तो पुरात्त्व प्रमाणो से ज्यादा भाषाई विश्लेषण को अधिक महत्व देते है, इस प्रकार यदि हम महाभारत को देखे या अन्य कई वैदिक ग्रंथ जिन्में वेद्व्यास को महाभारत का रचियता निर्विवादित रुप से बताया गया है, कहीं भी ऐसा नहीं आता कि किसी और ने इस काव्य की रचना की, इस बात से यह सिद्ध होता है कि किसी वेदव्यास नाम के पुरुष ने इस काव्य की रचना की,हाँ वह पुरुष किस काल में था यह इतिहास कारों के लिये विवादित विषय है--मयुर बंसल वार्ता २२:००, ५ मई २०१० (UTC)
मेरा उद्देश्य महाभारत किसी और द्वारा लिखित प्रमाणित करना वा सुझाव करना नहीं है। मेरा उद्देश्य सिर्फ यह कहना है कि महाभारत में बहुत वैज्ञानिक-ऐतिहासिक शोध करना अभी भी बांकी है। अगर प्राचीनतम महाभारत के पाण्डुलिपि में ही "इस काव्य के रचयिता वेदव्यास जी ने॰॰॰" ही (संस्कृत में) लिखा है तो यह एक प्रकार का प्रमाण अपनेआप में हो सकता है। अन्य लेखौं में सायद इतना संवाद संभव नही होता परन्तु यह लेख अन्तरजाल, हिन्दी भाषा व भारतवर्ष जब तक रहेगा तब तक ज्ञानकोष के किसी रुप में सदा महत्त्वपूर्ण ही रहेगा। अतः, मेरे विचार में यह लेख इस विकिपीडिया का एक महत्त्वपूर्ण लेख है। धन्यवाद।--युकेश २२:२४, ५ मई २०१० (UTC)
बिल्कुल सही, महाभारत के प्राचीनतम पाण्डुलिपि ७००-१५०० शताब्दी तक के उपलब्ध है, इसके अतिरिक्त संस्कृत की प्रथम शताब्दी की सबसे प्राचीन पाण्डुलिपि में भी महाभारत के १८ पर्वों की सूची है, महाभारत इतना प्रसिद्ध हुआ कि यह दूर दूर तक पाण्डुलिपियों(७००-१५००) के रुप में सुरक्षित रखा गया, कई पाण्डुलिपियों मे कुछ नये संदर्भ व कहानियाँ भी जोड़ी गयी, इसलिये इण्डोनेशिया, जावा, थाईलेण्ड, कशमीर की महाभारत के पाण्डुलिपियों मे कुछ अलग -अलग कहानियाँ मिलती है, परन्तु इस समस्या के निदान के लिये पुणे में स्थित भांडारकर प्राच्य शोध संस्थान ने पूरे दक्षिण एशिया में उपलब्ध महाभारत की सभी पाण्डुलिपियों (लगभग १०, ०००) का शोध और अनुसंधान करके उन सभी में एक ही समान पाये जाने वाले लगभग ७५,००० श्लोकों को खोजकर उनका सटिप्पण एवं समीक्षात्मक संस्करण प्रकाशित किया, इसे शुद्धतम पाण्डुलिपि माना जा सकता है जिसमें न्यूनतम कचरा होगा, इस संस्करण में भी लगभग २०-३० अलग -२ स्थलो पर व्यास को ही इस काव्य का रचयिता बताया गया है, धन्यवाद--मयुर बंसल वार्ता २२:४३, ५ मई २०१० (UTC)

महाभारत की टीकासंपादित करें

महाभारत की टीका सर्वप्रथम पं० राम प्रसाद 'बिस्मिल' ने लिखी थी जिसे भाई हनुमान प्रसाद पोद्दार जी ने महाभारत का संक्षिप्त परिचय और उसकी महत्ता शीर्षक देकर पण्डित जी के उपनाम राम के साथ छापा था। मेरी १९९७ में प्रकाशित ग्रन्थावली सरफरोशी की तमन्ना के भाग-४ में पृष्ठ सं० १०१ से १०९ तक वह पूरी की पूरी टीका अक्षरश: दी हुई है। यदि आप चाहें तो उसे अपने लेख में उद्धृत कर सकते हैं। इससे आपके लेख की गरिमा ही बढेगी।:डॉ०'क्रान्त'एम०एल०वर्मा (talk•Email)Krantmlverma (वार्ता) 07:10, 1 जुलाई 2011 (UTC)

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