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विक्रमशिला, ज़िला भागलपुर, बिहार में स्थित है। विक्रमशिला में प्राचीन काल में एक प्रख्यात विश्वविद्यालय स्थित था, जो प्रायः चार सौ वर्षों तक नालन्दा विश्वविद्यालय का समकालीन था।[1] कुछ विद्वानों का मत है कि इस विश्वविद्यालय की स्थिती भागलपुर नगर से 19 मील दूर कोलगाँव रेल स्टेशन के समीप थी। कोलगाँव से तीन मील पूर्व गंगा नदी के तट पर 'बटेश्वरनाथ का टीला' नामक स्थान है, जहाँ पर अनेक प्राचीन खण्डहर पड़े हुए हैं। इनसे अनेक मूर्तियाँ भी प्राप्त हुई हैं, जो इस स्थान की प्राचीनता सिद्ध करती हैं।

स्थापनासंपादित करें

अन्य विद्वानों के विचार में विक्रमशिला, ज़िला भागलपुर में पथरघाट नामक स्थान के निकट बसा हुआ था। बंगाल के पाल नरेश धर्मपाल ने 8वीं शती ई. में इस प्रसिद्ध बौद्ध महाविद्यालय की नींव डाली थी। यहाँ पर लगभग 160 विहार थे, जिनमें अनेक विशाल प्रकोष्ठ बने हुए थे। विद्यालय में सौ शिक्षकों की व्यवस्था थी। नालन्दा की भाँति विक्रमशिला विश्‍वविद्यालय भी बौद्ध संसार में सर्वत्र सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। इस महाविद्यालय के अनेक सुप्रसिद्ध विद्वानों में 'दीपांकर श्रीज्ञान अतीश' प्रमुख थे। ये ओदंतपुरी के विद्यालय के छात्र थे और विक्रमशिला के आचार्य। 11वीं शती में तिब्बत के राजा के निमंत्रण पर ये वहाँ पर गए थे। तिब्बत में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में इनका योगदान बहुत महत्वपूर्ण समझा जाता है।

मुस्लिम आक्रमणसंपादित करें

विक्रमशिला विश्‍वविद्यालय बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा का प्रमुख केन्द्र था। यहाँ न्याय, तत्वज्ञान एवं व्याकरण की शिक्षा दी जाती थी। 12वीं शती में यह विश्वविद्यालय एक विराट् शिक्षा–संस्था के रूप में प्रसिद्ध था। इस समय में यहाँ पर तीन सहस्र विद्यार्थियों की शिक्षा के लिए समुचित व्यवस्था थी। संस्था का एक प्रधान अध्यक्ष तथा छः विद्वानों की एक समीति मिलकर विद्यालय की परीक्षा, शिक्षा, अनुशासन आदि का प्रबन्ध करती थी। 1203 ई. में मुसलमानों ने जब बिहार पर आक्रमण किया, तब नालन्दा की भाँति विक्रमशिला को भी उन्होंने पूर्णरूपेण नष्ट–भ्रष्ट कर दिया। बख़्तियार ख़िलजी ने 1202-1203 ई. में विक्रमशिला महाविहार को नष्ट कर दिया था। यहाँ के विशाल पुस्तकालय को आग के हवाले कर दिया था, उस समय यहाँ पर 160 विहार थे जहां विद्यार्थी अध्ययनरतथे। इस प्रकार यह महान विश्वविद्यालय, जो उस समय एशिया भर में विख्यात था, खण्डहरों के रूप में परिणत हो गया। नालंदा विश्विद्यालय हो या विकर्मशीला , ये भारत देश की धरोहर थी, भारत की आन बाण और शान , ये वो गौरव को महसूस करवाती है जो भारतीयों को पूर्वजो ने उनके लिए बनवाया था , जिसे मुस्लिम आक्रमणकारी ने नस्ट कर दिया , ये इस देश की बिडम्बना ही है बिडम्बना ही कहा जायेगा आज भी इस देश के लोग सेक्युलर बन कर मुस्लिमों को भाई मानते हैं जबकि मुस्लिमों ने भारत की धरती को छति ही पहुचाया है , देश भर में बहोत सारे मंदिर है जो इस देश की धरोहर थी उससे तोड़कर मस्जिद बनवा डाला, देश की गौरव के रूप में मौजूद , नालंदा विश्विद्यालय, विकर्मशीला विश्विद्यालय, को नस्ट कर दिया अगर ये नस्ट नहीं किया गया होता तो आज भारत , ज्ञान विज्ञानं, कला संस्कृति, हर छेत्र में दुनिआ को लोहा मनवा रही होती , भारत आज भी इस ज्ञान विज्ञानं, कला संस्कृति, छेत्र में दुनिआ के सबसे पुरानी सभ्यता का प्रतिक है।

खुदाई कार्यसंपादित करें

विक्रमशिला के बारे में सबसे पहले राहुल सांकृत्यायन ने सुल्तानगंज के क़रीब होने का अंदेशा प्रकट किया था। उसका मुख्य कारण था कि अंग्रेज़ों के जमाने में सुल्तानगंज के निकट एक गांव में बुद्ध की प्रतिमा मिली थी। बावजूद उसके अंग्रेज़ों ने विक्रमशिला के बारे में पता लगाने का प्रयास नहीं किया। इसके चलते विक्रमशिला की खुदाई पुरातत्त्व विभाग द्वारा 1986 के आसपास शुरू हुई।

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

  • विक्रमशिला का इतिहास , लेखक : परशुराम ठाकुर ब्रह्मवादी , प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली।

सन्दर्भसंपादित करें

  1. "विक्रमशिला के खंडहरों से झांकता इतिहास".