संतोष आनंद

संतोष आनंद जी बहुत ही स्वाभिमानी व्यक्ति है ।

अमृतम पत्रिका, ग्वालियर मप्र से साभार.... जीवन में सन्तोष क्या कोई ठोस मान्यता है अथवा कोई भ्रम। ज्यादा सन्तोष ममुशय को अनेकों दोष ओर द्वेष से भर सकता है।

सन्तोष कोई ठोस मान्यता नहीं है। यह हरामखोर, मतकमाऊ इंसानों की खोज है, जो रोज रोजगार से परहेज करते हैं।

संतोषी कभी सुखी नहीं रहता। वह जीवन भर सभी से समझोता करता रहता है। यह सब व्यर्थ की बाते हैं।

कुछ लोग संतोषी माता की पूजा व्रत करते है, तो संतोष के लिए नहीं करते अपितु धन के लिए करते हैं।

संतोष सबसे बड़ा धन वही लोग कहते हैं, जो बड़ी सोच नही रख पाते। हर जगह पैसा बचना, समझौता करना, अपना व बच्चों का मन मारना ही परम सन्तोष बताते हैं

हकीकत उलट है। आज साधु-संतों में सन्तोष नहीं बचा। वे भी असंतोष यानि समृद्धि के नित्य नवीन यरीक़े अपना रहे हैं। सन्तोष इन्ही की देन है।

ज्यादा सन्तोष से खुद में तथा दूसरों मेम दोष देने की मानसिकता बनने लगती है। सन्तोष का भाव द्वेष पैदा करता है। ऐसे लोगों में जोश बिल्कुल नहीं होता, ये डरपोक होते हैं। इन बेहोश व्यक्तियों से 2 नहीं 8 कोस दूर रहना ही सहित है। बहुत सन्तोष की बात करने वाले बाद में अक्सर मोहम्मद गॉ के मकबरे पर भीख मंगमे मिलते हैं

एक शिगूफा ओर चलन मरण है कि-

सदा जीवन-उच्च विचार।

सादा जीवन-उच्च विचार….

इस सूक्ति ने सारे संसार को भ्रमित कर रखा है। यह शब्द कहने, सुनने में बहुत अच्छा लगता है। यह लोभी, कंजूस, लीचड़ लोगों की खोज है। अगर इंसान उच्च जीवन-उच्च विचार रखें, तो इसमें बुराई क्या है।

एक शोध के अनुसार दुनिया में 78 फीसदी

लोग कंजूस-लोभी प्रवृत्ति के हैं, जो सदैव

राम-राम जपना, पराया माल अपना।

वाली विचारधारा को अपनाते हैं। इनकी संख्या अधिक होने से यह विचार जगत प्रसिद्ध हो गया।

यह छोटी सोच से पैर में मोच आ सकती है।

कुछ लोग करोड़पति होने के बाद भी कपड़े पुराने पहनते है, तो सब समझते हैं कि वह व्यक्ति कितना सादा सरल है। जबकि सच्चाई यह है कि-वो महा लोभी, कंजूस होता है। हम उन नीच लोगों को अपना आदर्श मान लेते हैं।

ये भीचु लोग लक्ष्मी यानि बीज को सम्भालकर रखते हैं और दूसरे लोगों को भी जोखिम उठाने से रोकते है।

यहीं से उनके गिरने की शुरुआत होती है।

जिंदगी का सीधा सा गणित है कि-बीज को जमीन में डालोगे, तो वह 100 गुना होकर वापस आएगा।

एक सत्य घटना है कि एक अघोरी गांव में आकर रुक। ग्रामीण भक्तों ने उस साधु की खूब सेवा की। अघोरी जब गांव से चलने लगे, तो प्रसाद-आशीर्वाद फलस्वरूप सभी को 100–100 ग्राम कच्चे चने दिए।

सभी ग्रामवासियों ने उस चने की प्रसादी को अपने पास तिजोरी में रख लिया कि शायद कोई चमत्कार होगा। लेकिन एक-दो भक्तों ने चने को जमीन में बो दिया और ऐसा वे दोनों 15 साल तक करते रहे।

15–16 वर्ष बाद अघोरी पुनः गांव वापस आया। आकर सबसे चने प्रसादी के फायदे, चमत्कार पूछे?

2 लोगों को छोड़कर सबने अपने किस्से सुनाए ओर 2 भक्तों ने उन चनों का चमत्कार दिखाने साधु को खेत में ले गए। ये बहुत गरीब थे।

वहां जाकर अघोरी ने देखा, तो लगभग 100 एकड़ में चने की फसल खड़ी थी। उन दोनों भक्त-शिष्यों ने बताया कि- ये आपके चने प्रसादी का ही प्रतिफल, आशीर्वाद है।

उन्होंने बताया कि आपके द्वारा दिये गए चने हमने एक छोटे से किराए के खेत में बो दिया था। बाद में पैदा हुई फसल के बीज, पुनः बो दिए। ऐसे करते-करते हर बार यही करते और फसल इतनी होने लगी कि-हम जमीन खरीदते गए और अपाकी कृपा से हम दरीबों के पास खुद का 100 एकड़ का खेत है।

बात समझने कि यह है कि अंधभक्त लोभी लोगों की तरह उन्होंने घर में उन बीजों को किसी चमत्कार के चक्कर में सुरक्षित नहीं रखा।

आजकल तलाक आदि की एक वजह यह भी है कि- लड़कियां कमाने तथा खर्चने में कोई कंजूसी नहीं करती, परन्तु दुर्भाग्यवश उनका विवाह मितव्ययी परिवार में ही जाता है, जहां फिजूलखर्ची पर रोक एवं जोड़ने पर जोर दिया जाता है। यहीं से मन बिगड़ने लगते हैं। फिर, तन से दूरी बनने लगती है।

सीधी सी बात है मामला धन बचाने हेतु रोज मियां-बीबी में विवाद होते हैं। वाद-विवाद के चलते पुरुष का मवाद (वीर्य) नहीं निकल पाता और हालात ऐसे बन जाते हैं कि तू अपने घर, मैं अपने घर।

सादा जीवन-उच्च विचार वाले महापुरुषों की मानसिकता ऐसी होती है कि-

दिल लेत हैं, मन देत, जरा भी नहीं।

मतलब ये लोभी कंजूस प्राणी केवल हर चीज लेने पर विश्वास करते हैं। देते कुछ भी नहीं।

ये लोग पैसा, व्यवहार लेने में कभी हार नहीं मानते।

ये कंजूस लोग कभी किसी के सारथी नहीं बन्नते अपितु स्वार्थी बनकर जीवन गुजार देते हैं।

अपना चप्पा-अपना नमकीन… आदमी की आकांक्षा आकाश छूने, फैलने ओर विस्तार की होना चाहिए। किंतु लोभी-कंजूस आदमी की सोच अपना

“चप्पा” (पति) अपना “नमकीन” (बच्चे) औऱ थोड़ी सी “बर्फ” (कुछ रिश्तेदार) इन्हीं में रिस-रिस कर, रस-रस कर, रच-रच कर पूरा जीवन व्यतीत हो जाता है । सभी को आसमान छूने का प्रयास करना चाहिए । हमारे सपने ही अपने होते हैं, जो आसमां से भी बड़े होते हैं । लवभ-मोह, लालच त्यागकर“हमें हर हाल में सफल होना है” यही मन्त्र हमारे दुर्भाग्य को दूर करने में सहायता करता है । दिन-रात की मेहनत से नटराज भी एक दिन नतमस्तक हो जाता है । यही विश्वास विश्व में प्रसिद्ध कर, हमें बाबा विश्वनाथ से मिलवा देता है । अपने मनोबल को सदा बढ़ाये रखो । इसी बल के बुते हम दरिद्रता रूपी दल-दल से बाहर निकल पाएंगे। सादा जीवन-उच्च विचार या कंजूसी से नहीं।

निष्कर्ष यही है कि कृपणता में सुख नहीं हो सकता। सुख हो, तो कैसे हो। सुखी होने के लिए जीवन के सारे आधार बदलना जरूरी है।

धन बांटने (व्यापार में लगाने ) से बढ़ता है, जोड़ने से उन्नति के मार्ग बंद कर देता है या न बांटने से घटता है।

रोकने से समाप्त हो जाता है। पैसे को बीज की तरह उपयोग करो, तो तेजी से बढ़ता है। कुछ लोग बच्चों के लिए अथाह धन जोड़कर छोड़ जाते हैं। कंजूसी के कारण ये लोग सन्तति की पढ़ाई भी नहीं करवाते।

उन गधों को भी सादा जीवन उच्च विचार वाले पिताओं को फादर्स डे की शुभकामनाएं।

जिनके बच्चे कुछ बाप की दुलत्ती की बजह से बाकी अपनी मेहनत की दम पर आज इंसान बन चुके हैं। दुलत्ती के बाद भी पान का पत्ता खाकर मस्त रहते हैं।

बाद में आगे की पीढ़ी सब तबाह कर देती है। क्योंकि उन्हें केवल जोड़ना सिखाया। आगे कुछ आता नहीं। कंजूस लोगों के बच्चों में अनुभवों की अमूल्य धरोहर नहीं होती।

अपने देखा होगा कि दारू-शराब पीने वाले, जिन्हें उच्च विचार वाला समाज असभ्य शराबी कहता है। ये लोग बहुत दिलेर होते है। इनके पास अच्छी मित्र मण्डली का भंडार होता है। खर्च में कंजूसी नहीं करते और पैसा भी अच्छा कमाते हैं।

मैं उन पियक्कड़ की बात नहीं कर रहा, जो अव्वल दर्जे के मजदूर शराबी होते हैं।

दुनिया में 78 प्रतिशत कंजूस केवल कांटे बुनते हैं, तारे नहीं। उनकी सोच ही नहीं बन पाती कि-हमें इस धरती पर कुछ करके जाना है। सोच बड़ी न होने उन्हें शौच यानि कब्ज की समस्या होने लगती है। निगेटिव विचार बने रहते हैं।

अंत में इतना ही कहेंगे कि-

सोच को बदलोगे, तो सितारे बदल जाएंगे।

नजरों को बदलेंगे, तो नजारे बदल जाएंगे।।

संतोष आनंद (सन्तोष आनन्द) हिंदी (हिन्दी) फिल्मों के क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित गीतकार के रूप में जाने जाते हैं। इनके पुत्र संकल्प गृह मंत्रालय में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को समाजशास्त्र और अपराध शास्त्र की शिक्षा देते थे। वे काफी समय से मानसिक रूप से परेशान चल रहे थे. उन्होंने आत्महत्या से पहले 10 पृष्ठ का आत्महत्या पत्र भी लिखा था। इस आत्महत्या पत्र में केंद्रीय होम डिपार्टमेंट के कई वरिष्ठ अधिकारी और डीआईजी पुलिस संदीप मित्तल का नाम शामिल था। संकल्प ने आरोप लगाया था कि करोड़ों के फण्ड में गड़बड़ी के चलते इन अधिकारियों ने उन्हें सुसाइड के लिए मजबूर किया।

संकल्प आनंद 15 अक्टूबर 2014 को अपनी पत्नी के साथ ही दिल्ली से मथुरा पहुँचे थे। दोनों ने कोसीकलाँ कस्बे के पास रेलवे ट्रैक पर पहुँचकर मथुरा की ओर से आने वाली इंटरसिटी एक्सप्रेस के सामने कूदकर प्राण दे दिए। इस हादसे में उनकी बेटी के प्राण किसी तरह बच गए। ट्रेन के आगे कूदने से पहले उन्हें रेलवे के एक कर्मचारी गिरिराज सिंह ने ट्रैक के पास जाने से मना किया था। गिरिराज सिंह ने इस पूरी घटना को रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स और गर्वनमेंट रेलवे पुलिस को रिपोर्ट किया था। दोनों के पास से दो मोबाइल फोन और 65000 हजार रुपए  भी मिले थे।

27/08/19- जमशेदपुर (झारखंड) भारत पिछले दिनों जमशेदपुर झारखण्ड में श्री गोविंद जी द्वारा संयोजित कार्यक्रम,आदरणीय संतोष आनंद जी ने लगभग 2 घण्टे काव्यपाठ किया।'एक प्यार का नगमा है,दिल दीवानों का डोला' और भी कई गीत, श्रोताओं ने खड़े होकर उनका अभिनंदन किया व्हील चेयर पर होने के बावजूद संतोष जी ने खड़े होकर उत्साह से श्रोताओं के प्यार को स्वीकार किया।

अब बात आती है मुख्य बिन्दु की – अखबारों में उन्हें स्थान दिया गया प्रमुखता से, पर उन बातों के साथ जो उन्होंने कही ही नहीं। वे बोले एंड्रॉइड फोन नहीं चला पाता हाथ में कंपन की वजह से, अखबार लिखता है गुमनाम हुए वे होटल के जिस रूम में ठहरे थे वह अखबार के लिए चिकित्सालय का कक्ष हो गया, रानू मण्डल का जिक्र आये बिना ही संतोष जी का वक्तव्य छप गया कि 'रानू मेरे गीत गाकर प्रसिद्ध हुई और मै गुमनाम'।

बेचारे संतोष जी बिना किसी लाग लपेट वाले मस्त फकीर उन्हें दुनिया की चालबाजी से मतलब नहीं है।



संतोष जी इंडियन आइडल के शो पर आए थे 21/02/2021 को, अपनी ज़िंदगी से जुड़े कुछ भावुक पल दर्शकों के साथ साझा करते हुए भावुक हो गए, गायिका नेहा कक्कड़ ने भेंट स्वरूप 5 लाख रु देने का कहा तो संतोष जी ने कहा,"धन्यवाद बेटी! पर मैं बहुत स्वाभिमानी हूँ किसी से पैसा नहीं लेता भले ही पैसे की तंगी हो, फिर नेहा ने कहा अपनी पोती समझ के रख लीजिए, तो संतोष जी ने भावुक होते हुए हामी भर दी।

संतोष आनंद (सन्तोष आनन्द) हिंदी (हिन्दी) फिल्मों के क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित गीतकार के रूप में जाने जाते हैं। इनके पुत्र संकल्प गृह मंत्रालय में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को समाजशास्त्र और अपराध शास्त्र की शिक्षा देते थे। वे काफी समय से मानसिक रूप से परेशान चल रहे थे. उन्होंने आत्महत्या से पहले 10 पृष्ठ का आत्महत्या पत्र भी लिखा था। इस आत्महत्या पत्र में केंद्रीय होम डिपार्टमेंट के कई वरिष्ठ अधिकारी और डीआईजी पुलिस संदीप मित्तल का नाम शामिल था। संकल्प ने आरोप लगाया था कि करोड़ों के फण्ड में गड़बड़ी के चलते इन अधिकारियों ने उन्हें सुसाइड के लिए मजबूर किया।

संकल्प आनंद 15 अक्टूबर 2014 को अपनी पत्नी के साथ ही दिल्ली से मथुरा पहुँचे थे। दोनों ने कोसीकलाँ कस्बे के पास रेलवे ट्रैक पर पहुँचकर मथुरा की ओर से आने वाली इंटरसिटी एक्सप्रेस के सामने कूदकर प्राण दे दिए। इस हादसे में उनकी बेटी के प्राण किसी तरह बच गए। ट्रेन के आगे कूदने से पहले उन्हें रेलवे के एक कर्मचारी गिरिराज सिंह ने ट्रैक के पास जाने से मना किया था। गिरिराज सिंह ने इस पूरी घटना को रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स और गर्वनमेंट रेलवे पुलिस को रिपोर्ट किया था। दोनों के पास से दो मोबाइल फोन और 65000 हजार रुपए  भी मिले थे।

27/08/19- जमशेदपुर (झारखंड) भारत पिछले दिनों जमशेदपुर झारखण्ड में श्री गोविंद जी द्वारा संयोजित कार्यक्रम,आदरणीय संतोष आनंद जी ने लगभग 2 घण्टे काव्यपाठ किया।'एक प्यार का नगमा है,दिल दीवानों का डोला' और भी कई गीत, श्रोताओं ने खड़े होकर उनका अभिनंदन किया व्हील चेयर पर होने के बावजूद संतोष जी ने खड़े होकर उत्साह से श्रोताओं के प्यार को स्वीकार किया।

अब बात आती है मुख्य बिन्दु की – अखबारों में उन्हें स्थान दिया गया प्रमुखता से, पर उन बातों के साथ जो उन्होंने कही ही नहीं। वे बोले एंड्रॉइड फोन नहीं चला पाता हाथ में कंपन की वजह से, अखबार लिखता है गुमनाम हुए वे होटल के जिस रूम में ठहरे थे वह अखबार के लिए चिकित्सालय का कक्ष हो गया, रानू मण्डल का जिक्र आये बिना ही संतोष जी का वक्तव्य छप गया कि 'रानू मेरे गीत गाकर प्रसिद्ध हुई और मै गुमनाम'।

बेचारे संतोष जी बिना किसी लाग लपेट वाले मस्त फकीर उन्हें दुनिया की चालबाजी से मतलब नहीं है।



संतोष जी इंडियन आइडल के शो पर आए थे 21/02/2021 को, अपनी ज़िंदगी से जुड़े कुछ भावुक पल दर्शकों के साथ साझा करते हुए भावुक हो गए, गायिका नेहा कक्कड़ ने भेंट स्वरूप 5 लाख रु देने का कहा तो संतोष जी ने कहा,"धन्यवाद बेटी! पर मैं बहुत स्वाभिमानी हूँ किसी से पैसा नहीं लेता भले ही पैसे की तंगी हो, फिर नेहा ने कहा अपनी पोती समझ के रख लीजिए, तो संतोष जी ने भावुक होते हुए हामी भर दी।

पुरस्कारसंपादित करें

१९७५ व १९८३ में वे अपने गीतों के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार जीत चुके हैं।

1974 में, फिल्म रोटी कपड़ा और मकान के गीत- मैं न भूलूंगा, 1983 में प्रेमरोग फिल्म गीत मुहब्बत हैं, क्या चीज के लिए फिल्म फेयर अवार्ड से सम्मानित किया गया।

2016 में यश भारती


प्रसिद्ध रचनाएंसंपादित करें

  • मुहब्बत है क्या चीज....(फ़िल्म: प्रेम रोग)
  • इक प्यार का नगमा है।.... (फ़िल्म: शोर)
  • जिंदगी की ना टूटे लड़ी .... (फ़िल्म: क्रांति)
  • मारा ठुमका बदल गई चाल मितवा .... (फ़िल्म: क्रांति)
  • मेधा रे मेधा रे मत जा तू परदेश (फ़िल्म: प्यासा सवान)
  • मैं न भूलूंगा, इन रस्मों को, इन कसमों को (फ़िल्म: रोटी कपड़ा और मकान)
  • ओ रब्बा कोई तो बताए (फ़िल्म: संगीत)
  • आप चाहें तो हमको (फ़िल्म: संगीत )
  • जिनका घर हो अयोध्या जैसा (फ़िल्म: बड़े घर की बेटी)
  • दिल दीवाने का ढोला (फ़िल्म: तहलका)
  • जिंदगी की ना टूटे लड़ी( फ़िल्म: क्रांति)
  • चना जोर गरम....(फ़िल्म: क्रांति)
  • ये शान तिरंगा (फ़िल्म: तिरंगा)
  • पीले पीले ओ मोरे राजा... (फ़िल्म: तिरंगा)
  • मैंने तुमसे प्यार किया ...(फ़िल्म: सूर्या)

जैसे भावुक कर देने वाले गीत लिखने वाले संतोष आनंद जी को पूरा भारतीय समाज कभी नहीं भूल सकता। उनके अनमोल योगदान को बॉलीवूड को भी कभी नहीं भूलना चाहिए।

सन्दर्भसंपादित करें

संतोष आनंद फिल्म इंडस्ट्री के सबसे चहेते प्रसिद्ध गीतकार रहें हैं। इन्होंने कई फ़िल्मों में गीतों की रचना की।।

(1) पूरब और पश्चिम (1971)

(2) शोर (1972)

(3) रोटी कपड़ा और मकान (1974)

(4) पत्थर से टक्कर (1980)

(5) क़्रांति (1981)

(6) प्यासा सवान (1981)

(7) प्रेम रोग (1982)

(8) गोपीचंद सावन (1982)

(9) जख़्मी शेर (1984)

(10) मेरा ज़बाब (1985)

(11) पत्थर दिल (1985)

(12) लव 86 (1986)

(13) मज़लूम (1986)

(14) बड़े घर की बेटी (1989)

(15) नाग नागिन (1989)

(16) सूर्या (1989)

(17) दो मतवाले (1991)

(18) नागमणि (1991)

(19) रणभूमि (1991)

(20) जूनुन (1992)

(21) संगीत (1992)

(22) तहलका (1992)

(23) तिरंगा (1993)

(24) संगम हो के रहेगा (1994)

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें

इनके गीतों को लता मंगेशकर, महेंद्र कुमार, मोहम्मद अजीज, कुमार सानू, कविता कृष्णमूर्ति जैसे अनेक गायकों ने आवाज दी।

हिंदी फिल्मों के शोमैन कहे जाने वाले राज कपूर, मनोज कुमार जैसे अभिनेताओं की फिल्मों के लिए गीतों की रचनाएं की।।
दुखद यह की भारत सरकार ने उनको पदम श्री के लिए नहीं चुना ! उनके पुत्र की आत्महाया के पीछे के कारणों को गृह मंत्रालय ने क्या करवाही की ???