संवत्‌, समयगणना का भारतीय मापदंड। भारतीय समाज में अनेक प्रचलित संवत्‌ हैं। मुख्य रूप से तीन संवत्‌ चल रहे हैं, प्रथम विक्रम संवत्‌ तथा दूसरा शक संवत्‌। तीसरा लोधी संवत भी प्रचलन में आया है

विक्रम संवत्‌ ई. पू. 57 वर्ष प्रारंभ हुआ। यह संवत्‌ मालवगण के सामूहिक प्रयत्नों द्वारा गंधर्वसेन के पुत्र बिक्रमदित्य के नेतृत्व में उस समय विदेशी माने जानेवाले शक लोगो की पराजय के स्मारक रूप में प्रचलित हुआ। जान पड़ता है, भारतीय जनता के देशप्रेम और विदेशियों के प्रति उनकी भावना सदा जागृत रखने के लिए जनता ने सदा से इसका प्रयोग किया है क्योंकि भारतीय सम्राटों ने अपने ही संवत्‌ का प्रयोग किया है। इतना निश्चित है कि यह संवत्‌ मालवगण द्वारा जनता की भावना के अनुरूप प्रचलित हुआ और तभी से जनता द्वारा ग्राह्य एवं प्रयुक्त है। इस संवत्‌ के प्रारंभिक काल में यह कृतसंवत्, तदनंतर मालवसंवत् और अंत में 'विक्रम संवत्‌' रह गया। यही अंतिम नाम इस संवत्‌ के साथ जुड़ा हुआ है। शक संवत्‌ के विषय में बुदुआ का मत है कि इसे उज्जयिनी के क्षत्रप चेष्टन ने प्रचलित किया। शक राज्यों को उज्जैैयनी के राजा बिक्रमादित्य

ने समाप्त कर दिया पर उनका स्मारक शक संवत्‌ अभी तक भारतवर्ष में चल रहा है। शक संवत्‌ 78 ई. में प्रारंभ हुआ। बिक्रमादित्य परमार वंश के प्रतापी राजा हुुए उनके पिता गंधर्वसेन थे और उनके बडै भाई भृतहरि भी महान योगी हुए आज भी उज्जैन मेे उनकी योग गुफा स्थित है

विक्रम संवत्संपादित करें

विक्रम संवत् ई. पू. 57 वर्ष प्रारंभ हुआ। यह संवत् मालव गण के सामूहिक प्रयत्नों द्वारा गर्दभिल्ल के पुत्र विक्रम के नेतृत्व में उस समय विदेशी माने जानेवाले शक लोगों की पराजय के स्मारक रूप में प्रचलित हुआ। जान पड़ता है, भारतीय जनता के देशप्रेम और विदेशियों के प्रति उनकी भावना सदा जागृत रखने के लिए जनता ने सदा से इसका प्रयोग किया है क्योंकि भारतीय सम्राटों ने अपने ही संवत् का प्रयोग किया है। इतना निश्चित है कि यह संवत् मालव गण द्वारा जनता की भावना के अनुरूप प्रचलित हुआ और तभी से जनता द्वारा ग्राह्य एवं प्रयुक्त है। इस संवत् के प्रारंभिक काल में यह कृत, तदनंतर मालव और अंत में विक्रम संवत् रह गया। यही अंतिम नाम इस संवत् के साथ जुड़ा हुआ है।

शक संवत्संपादित करें

राष्ट्रीय शाके अथवा शक संवत भारत का राष्ट्रीय कलैण्डर है। यह 78 ईसवी से प्रारम्भ हुआ था। चैत्र 1, 1879 शक संवत[1] को इसे अधिकारिक रूप से विधिवत अपनाया गया। 500 ई. के उपरान्त संस्कृत में लिखित सभी ज्योतिःशास्त्रीय ग्रन्थ शक संवत का प्रयोग करने लगे। इस संवत का यह नाम क्यों पड़ा, इस विषय में विभिन्न एक मत हैं। इसे कुषाण राजा कनिष्क ने चलाया या किसी अन्य ने, इस विषय में अन्तिम रूप से कुछ नहीं कहा जा सका है। यह एक कठिन समस्या है जो भारतीय इतिहास और काल निर्णय की अत्यन्त कठिन समस्याओं में मानी जाती है। वराहमिहिर ने इसे शक-काल तथा शक-भूपकाल कहा है। उत्पल (लगभग 966 ई.) ने बृहत्संहिता की व्याख्या में कहा है - जब विक्रमादित्य द्वारा शक राजा मारा गया तो यह संवत चला। इसके वर्ष चान्द्र-सौर-गणना के लिए चैत्र से एवं सौर गणना के लिए मेष से आरम्भ होते थे। इसके वर्ष सामान्यतः बीते हुए हैं और सन 78 ई. के 'वासन्तिक विषुव' से यह आरम्भ किया गया है। सबसे प्राचीन शिलालेख, जिसमें स्पष्ट रूप से शक संवत का उल्लेख है, 'चालुक्य वल्लभेश्वर' का है, जिसकी तिथि 465 शक संवत अर्थात 543 ई. है। क्षत्रप राजाओं के शिलालेखों में वर्षों की संख्या व्यक्त है, किन्तु संवत का नाम नहीं है, किन्तु वे संख्याएँ शक काल की द्योतक हैं, ऐसा सामान्यतः लोगों का मत है। कुछ लोगों ने कुषाण राजा कनिष्क को शक संवत का प्रतिष्ठापक माना है। पश्चात्कालीन, मध्यवर्ती एवं वर्तमान कालों में, ज्योतिर्विदाभरण में भी यही बात है, शक संवत का नाम 'शालिवाहन' है। किन्तु संवत के रूप में शालिवाहन रूप 13वीं या 14वीं शती के शिलालेखों में आया है। यह सम्भव है कि सातवाहन नाम[5] 'शालवाहन' बना और 'शालिवाहन' के रूप में आ गया। कश्मीर में प्रयुक्त सप्तर्षि संवत एक अन्य संवत है, जो लौकिक संवत के नाम से भी प्रसिद्ध है। राजतरंगिणी के अनुसार लौकिक वर्ष 24 गत शक संवत 1070 के बराबर है। इस संवत के उपयोग में सामान्यतः शताब्दियाँ नहीं दी हुई हैं। यह चान्द्र-सौर संवत है और चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा को ई. पू. अप्रैल 3076 में आरम्भ हुआ। बृहत्संहिता ने एक परम्परा का उल्लेख किया है कि सप्तर्षि एक नक्षत्र में सौ वर्षों तक रहते हैं और जब युधिष्ठर राज्य कर रहे थे तो वे मेष राशि में थे। सम्भवतः यही सौ वर्षों वाले वृत्तों का उद्गम है। बहुत-से अन्य संवत् भी थे, जैसे - वर्धमान, बुद्ध-निर्वाण, गुप्त, चेदि, हर्ष, लक्ष्मणसेन बंगाल में, कोल्लम या परशुराम मलावार में, जो किसी समय कम से कम लौकिक जीवन में बहुत प्रचलित थे।

क्रम माह दिवस मास प्रारम्भ तिथि (ग्रेगोरी)
चैत्र 30/31 22 मार्च
वैशाख 31 21 अप्रैल
ज्येष्ठ 31 22 मई
आषाढ़ 31 22 जून
श्रावण 31 23 जुलाई
भाद्र 31 23 अगस्त
आश्विन 30 23 सितंबर
कार्तिक 30 23 अक्टूबर
मार्गशीर्ष 30 22 नवम्बर
१० पौष 30 22 दिसम्बर
११ माघ 30 23 जनवरी
१२ फाल्गुन 30 20 फ़रवरी

लोधी संवतसंपादित करें

लोधी संवत जिस तहर न्यायप्रिय शासक महाराज विक्रमादित्य के समय विक्रम संवत का उल्लेख मिलता है। उसी तरह महाराज विक्रमादित्तय के बाद महाराज ब्रहा्रस्वरुप लोधी के राज्याभिषेक के समय प्रारंभ हुआ था। लोधी संवत का उल्लेख अब से 1832 वर्ष पूर्व (अर्थात 160 ई॰ पु॰) राज सिंहासन पर विराजमान राजा शालिवाहन ने, मैसूर के मुम्मड़े नामक नगर में शिलालेख में उत्कीर्ण कराया था।

यह शिलालेख प्राकृत, संस्कृत, पाली तथा तेलगू भाषा में उत्कीर्ण है। इस में महाराज विक्रमादित्य के पश्चात महाराज ब्रहा्रस्रुप लोधी के राज्यारोहरण पर लोधी संवत के उसके राज्य में प्रचलन का वर्णन खुदा हुआ है। लोधी संवत की प्रारंभ तिथि के बारे में विद्वानों के मत अलग-अलग है। पं. काशीलाल जायसवाल, जुगल किशोर मुख्तार, डा॰ हेमन्त जेकोवी इन सभी के मतों का समाधान करते हुए, जार्ज जामान्टियर ने ब्रहा्रस्वरुप लोधी के राज्याभिषेक को ही प्रमाण मानकर लोधी संवत का प्रारंभ काल माना है। लोधी क्षत्रिय बृहत् इतिहास के लेखक लोधी खेमसिंह वर्मा के मतानुसार, लोधी संवत प्रचलन काल ईस्वी सन की पहली या दूसरी शताब्दी रहा होगा। यहां पर सभी के मतों व समीपवर्तीय संवतों को ध्यान मे रखकर इतिहासकारों के मतानुसार अनुमानित तारीख इस प्रकार है। वीर संवत का प्रचलन 76 ई॰ पू॰ हुआ, तथा विक्रम संवत का प्रचलन 57/58 ई॰ पू॰ हुआ तथा लोधी संवत का प्रचलन इसके बाद हुआ और लोधी संवत के पश्चात शक संवत प्रचलन में आया। जिसका प्रचलन काल सन् 78 ई॰ बताया जाता है। और इन दोनों संवतों के मध्य के समय में विक्रमादित्य के पुत्र चन्द्रसेन व पौत्र शालिवाहन ने शासन किया, क्योंकि शालिवाहन ने ही शकों पर विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य में शक संवत चलाया तथा सन् 160 ई॰ में उपयुक्त संवतों का उल्लेख शिलालेखों पर अंकित कराया, जो प्रमाणस्वरुप आज भी देखे जा सकते है। दोनों पीढि़यों का शासन काल 50-60 वर्ष मान लिया जाये और कुछ समय ब्रहा्रस्वरुप लोधी का शासनकाल जोड़कर देखा जाए, तो लोधी संवत का प्रचलनकाल अनुमानित ईस्वी सदी का दूसरा दशक का मध्यान्तरण् रहा होगा।

इस हिसाब से सन् 2004 लोधी संवत 1990 हो सकता है। बोद्धकाल में बौद्ध धर्म की प्रगति व प्रसार और वैदिक धर्म के पतन के कारणों से चिन्तित आर्य ऋषियों ने बौद्ध धर्म के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिये समस्त क्षत्रियो राजाओं को आमंत्रित कर आबू पर्वत पर एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। जिसमें अनेक राजाओं को यज्ञाग्नि के समक्ष दीक्षित कर उन्हें राजपूत नाम दिया। तभी से अग्निवंशी क्षत्रियों की उत्पत्ति हुई। तभी से यज्ञ में सम्मिलित चन्द्रवंशी लोधी क्षत्रियों नें बड़ी संख्या में अपने उपनाम के रुप में राजपूत शब्द अपनाया। और वे अपने को लोधी राजपूत कहने लगे। आजकल क्षत्रिय और राजपूत दोनो

इन्हें भी देखेंसंपादित करें