विक्रमादित्य

भारत के प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व राजा गर्दभिल्ल पुत्र सम्राट विक्रमादित्य भील

"विक्रमादित्य" (102 ईसा पूर्व - 19 ईसवी), लोकप्रिय रूप से विक्रमसेन के रूप में जाना जाता है, यह भारतीय उपमहाद्वीप के आदित्य राजवंश के सम्राट थे। उनके साम्राज्य में भारतीय उपमहाद्वीप का एक बड़ा हिस्सा शामिल था, जो पश्चिम में वर्तमान सऊदी अरब से लेकर पूर्व में वर्तमान चीन तक फैला हुआ था, जिसकी राजधानी उज्जैन थी।

विक्रमादित्य
चक्रवर्ती सम्राट
विक्रमादित्य के सिक्के
विक्रमादित्य के सिक्के
आदित्य सम्राट
शासनावधिल. 82 ईसा पूर्व - 19 ईसवी
राज्याभिषेकल. 82 ईसा पूर्व
पूर्ववर्तीसम्राट गर्दभिल्ल
उत्तरवर्तीसम्राट देवभक्त
जीवनसंगीमदनलेखा, चंद्रवती, कलिंगसेना, मदनसुंदरी, गुनवती
संतानदेवभक्त
राजवंशआदित्य
पितागर्दभिल्ल
धर्महिंदु धर्म

विक्रमादित्य ने विक्रम संवत की शुरुआत 57 ई.पू. में शकों को हराने के बाद की, और कालिदास द्वारा लिखित ज्योतिर्विदभरणम के अनुसार राजा विक्रमादित्य ने रोमन राजा जूलियस सीजर को भी हराया था।

उन्होंने पूरे एशिया पर अपना शासन व्यवस्थित किया था। अरब पर इनके शासन का प्रमाण सायार-उल-ओकुल ग्रंथ के पृष्ठ संख्या 315 से मिलता है, इस ग्रंथ की रचना अरबी कवि जरहाम कितनोई ने की। यह ग्रंथ वर्तमान में इस्तांबुल शहर के प्रसिद्ध पुस्तकालय मकतब-ए-सुल्तानिया में स्थित है, जिसे अब गलाटसराय लिसेसी स्कूल का नाम दिया गया है ।[[1]]। इनके पिता का नाम राजा गर्दभिल्ल था[1][2]। सम्राट विक्रमादित्य ने शको को पराजित किया था। उनके पराक्रम को देखकर ही उन्हें महान सम्राट कहा गया और उनके नाम की उपाधि कुल १४ भारतीय राजाओं को दी गई। "विक्रमादित्य" की उपाधि भारतीय इतिहास में बाद के कई अन्य राजाओं ने प्राप्त की थी, जिनमें गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय और सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य (जो हेमु के नाम से प्रसिद्ध थे) उल्लेखनीय हैं। राजा विक्रमादित्य नाम, 'विक्रम' और 'आदित्य' के समास से बना है जिसका अर्थ 'पराक्रम का सूर्य' या 'सूर्य के समान पराक्रमी' है।उन्हें विक्रम या विक्रमार्क (विक्रम + अर्क) भी कहा जाता है (संस्कृत में अर्क का अर्थ सूर्य है)। "सम्राट विक्रमादित्य ने लगभग सम्पूर्ण एशिया को जीत लिया था।" उस समय उनका साम्राज्य आधुनिक चीन, मध्य एशिया और दक्षिण पूर्वी एशिया के कुछ भाग तक फैला हुआ था जो कि अभी तक के इतिहास का सबसे बड़ा साम्राज्य है।

विक्रमादित्य की पौराणिक कथासंपादित करें

अनुश्रुत विक्रमादित्य, संस्कृत और भारत के क्षेत्रीय भाषाओं, दोनों में एक लोकप्रिय व्यक्तित्व है। उनका नाम बड़ी आसानी से ऐसी किसी घटना या स्मारक के साथ जोड़ दिया जाता है, जिनके ऐतिहासिक विवरण अज्ञात हों, हालांकि उनके इर्द-गिर्द कहानियों का पूरा चक्र फला-फूला है। संस्कृत की सर्वाधिक लोकप्रिय दो कथा-श्रृंखलाएं हैं वेताल पंचविंशति या बेताल पच्चीसी ("पिशाच की 25 कहानियां") और सिंहासन-द्वात्रिंशिका ("सिंहासन की 32 कहानियां" जो सिहांसन बत्तीसी के नाम से भी विख्यात हैं)। इन दोनों के संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाओं में कई रूपांतरण मिलते हैं।

पिशाच (बेताल) की कहानियों में बेताल, पच्चीस कहानियां सुनाता है, जिसमें राजा बेताल को बंदी बनाना चाहता है और वह राजा को उलझन पैदा करने वाली कहानियां सुनाता है और उनका अंत राजा के समक्ष एक प्रश्न रखते हुए करता है। वस्तुतः पहले एक साधु, राजा से विनती करते हैं कि वे बेताल से बिना कोई शब्द बोले उसे उनके पास ले आएं, नहीं तो बेताल उड़ कर वापस अपनी जगह चला जाएगा| राजा केवल उस स्थिति में ही चुप रह सकते थे, जब वे उत्तर न जानते हों, अन्यथा राजा का सिर फट जाता| दुर्भाग्यवश, राजा को पता चलता है कि वे उसके सारे सवालों का जवाब जानते हैं; इसीलिए विक्रमादित्य को उलझन में डालने वाले अंतिम सवाल तक, बेताल को पकड़ने और फिर उसके छूट जाने का सिलसिला चौबीस बार चलता है। इन कहानियों का एक रूपांतरण कथा-सरित्सागर में देखा जा सकता है।

सिंहासन के क़िस्से, विक्रमादित्य के उस सिंहासन से जुड़े हुए हैं जो खो गया था और कई सदियों बाद धार के परमार राजा भोज द्वारा बरामद किया गया था। स्वयं राजा भोज भी काफ़ी प्रसिद्ध थे और कहानियों की यह श्रृंखला उनके सिंहासन पर बैठने के प्रयासों के बारे में है। इस सिंहासन में 32 पुतलियां लगी हुई थीं, जो बोल सकती थीं और राजा को चुनौती देती हैं कि राजा केवल उस स्थिति में ही सिंहासन पर बैठ सकते हैं, यदि वे उनके द्वारा सुनाई जाने वाली कहानी में विक्रमादित्य की तरह उदार हैं। इससे भोज की 32 कोशिशें (और 32 कहानियां) सामने आती हैं और हर बार भोज अपनी हीनता स्वीकार करते हैं। अंत में पुतलियां उनकी विनम्रता से प्रसन्न होकर उन्हें सिंहासन पर बैठने देती हैं। राजा भोज के बाद कोई भी उस सिंहासन पर नही बैठ पाया। इसका उल्लेख हमें उज्जैन के साहित्य मे मिलता है।

विक्रम और शनिसंपादित करें

शनि से संबंधित विक्रमादित्य की कहानी को अक्सर कर्नाटक राज्य के यक्षगान में प्रस्तुत किया जाता है। कहानी के अनुसार, विक्रम नवरात्रि का पर्व बड़े धूम-धाम से मना रहे थे और प्रतिदिन एक ग्रह पर वाद-विवाद चल रहा था। अंतिम दिन की बहस शनि के बारे में थी। ब्राह्मण ने शनि की शक्तियों सहित उनकी महानता और पृथ्वी पर धर्म को बनाए रखने में उनकी भूमिका की व्याख्या की। समारोह में ब्राह्मण ने ये भी कहा कि विक्रम की जन्म कुंडली के अनुसार उनके बारहवें घर में शनि का प्रवेश है, जिसे सबसे खराब माना जाता है। लेकिन विक्रम संतुष्ट नहीं थे; उन्होंने शनि को महज लोककंटक के रूप में देखा, जिन्होंने उनके पिता (सूर्य), गुरु (बृहस्पति) को कष्ट दिया था। इसलिए विक्रम ने कहा कि वे शनि को पूजा के योग्य मानने के लिए तैयार नहीं हैं। विक्रम को अपनी शक्तियों पर, विशेष रूप से अपने देवी मां का कृपा पात्र होने पर बहुत गर्व था। जब उन्होंने नवरात्रि समारोह की सभा के सामने शनि की पूजा को अस्वीकृत कर दिया, तो शनि भगवान क्रोधित हो गए। उन्होंने विक्रम को चुनौती दी कि वे विक्रम को अपनी पूजा करने के लिए बाध्य कर देंगे। जैसे ही शनि आकाश में अंतर्धान हो गए, विक्रम ने कहा कि यह उनकी खुशकिस्मती है और किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए उनके पास सबका आशीर्वाद है। विक्रम ने निष्कर्ष निकाला कि संभवतः ब्राह्मण ने उनकी कुंडली के बारे में जो बताया था वह सच हो; लेकिन वे शनि की महानता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। विक्रम ने निश्चयपूर्वक कहा कि "जो कुछ होना है, वह होकर रहेगा और जो कुछ नहीं होना है, वह नहीं होगा" और उन्होंने कहा कि वे शनि की चुनौती को स्वीकार करते हैं।

एक दिन एक घोड़े बेचने वाला उनके महल में आया और कहा कि विक्रम के राज्य में उसका घोड़ा खरीदने वाला कोई नहीं है। घोड़े में अद्भुत विशेषताएं थीं - जो एक छलांग में आसमान पर, तो दूसरे में धरती पर पहुंचता था। इस प्रकार कोई भी धरती पर उड़ या सवारी कर सकता है। विक्रम को उस पर विश्वास नहीं हुआ, इसीलिए उन्होंने कहा कि घोड़े की क़ीमत चुकाने से पहले वे सवारी करके देखेंगे. विक्रेता इसके लिए मान गया और विक्रम घोड़े पर बैठे और घोड़े को दौडाया. विक्रेता के कहे अनुसार, घोड़ा उन्हें आसमान में ले गया। दूसरी छलांग में घोड़े को धरती पर आना चाहिए था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। इसके बजाय उसने विक्रम को कुछ दूर चलाया और जंगल में फेंक दिया। विक्रम घायल हो गए और वापसी का रास्ता ढूंढ़ने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि यह सब उनका नसीब है, इसके अलावा और कुछ नहीं हो सकता; वे घोड़े के विक्रेता के रूप में शनि को पहचानने में असफल रहे। जब वे जंगल में रास्ता ढ़ूढ़ने की कोशिश कर रहे थे, डाकुओं के एक समूह ने उन पर हमला किया। उन्होंने उनके सारे गहने लूट लिए और उन्हें खूब पीटा. विक्रम तब भी हालत से विचलित हुए बिना कहने लगे कि डाकुओं ने सिर्फ़ उनका मुकुट ही तो लिया है, उनका सिर तो नहीं। चलते-चलते वे पानी के लिए एक नदी के किनारे पहुंचे। ज़मीन की फिसलन ने उन्हें पानी में पहुंचाया और तेज़ बहाव ने उन्हें काफ़ी दूर घसीटा.

किसी तरह धीरे-धीरे विक्रम एक नगर पहुंचे और भूखे ही एक पेड़ के नीचे बैठ गए। जिस पेड़ के नीचे विक्रम बैठे हुए थे, ठीक उसके सामने एक कंजूस दुकानदार की दुकान थी। जिस दिन से विक्रम उस पेड़ के नीचे बैठे, उस दिन से दुकान में बिक्री बहुत बढ़ गई। लालच में दुकानदार ने सोचा कि दुकान के बाहर इस व्यक्ति के होने से इतने अधिक पैसों की कमाई होती है और उसने विक्रम को घर पर आमंत्रित करने और भोजन देने का निर्णय लिया। बिक्री में लंबे समय तक वृद्धि की आशा में, उसने अपनी पुत्री को विक्रम के साथ शादी करने के लिए कहा. भोजन के बाद जब विक्रम कमरे में सो रहे थे, तब पुत्री ने कमरे में प्रवेश किया। वह बिस्तर के पास विक्रम के जागने की प्रतीक्षा करने लगी। धीरे- धीरे उसे भी नींद आने लगी। उसने अपने गहने उतार दिए और उन्हें एक बत्तख के चित्र के साथ लगी कील पर लटका दिया। वह सो गई। जागने पर विक्रम ने देखा कि चित्र का बत्तख उसके गहने निगल रहा है। जब वे अपने द्वारा देखे गए दृश्य को याद कर ही रहे थे कि दुकानदार की पुत्री जग गई और देखती है कि उसके गहने गायब हैं। उसने अपने पिता को बुलाया और कहा कि वह चोर है।

विक्रम को वहां के राजा के पास ले जाया गया। राजा ने निर्णय लिया कि विक्रम के हाथ और पैर काट कर उन्हें रेगिस्तान में छोड़ दिया जाए. जब विक्रम रेगिस्तान में चलने में असमर्थ और ख़ून से लथपथ हो गए, तभी उज्जैन में अपने मायके से ससुराल लौट रही एक महिला ने उन्हें देखा और पहचान लिया। उसने उनकी हालत के बारे में पूछताछ की और बताया कि उज्जैनवासी उनकी घुड़सवारी के बाद गायब हो जाने से काफी चिंतित हैं। वह अपने ससुराल वालों से उन्हें अपने घर में जगह देने का अनुरोध करती है और वे उन्हें अपने घर में रख लेते हैं। उसके परिवार वाले श्रमिक वर्ग के थे; विक्रम उनसे कुछ काम मांगते हैं। वे कहते हैं कि वे खेतों में निगरानी करेंगे और हांक लगाएंगे ताकि बैल अनाज को अलग करते हुए चक्कर लगाएं. वे हमेशा के लिए केवल मेहमान बन कर ही नहीं रहना चाहते हैं।

एक शाम जब विक्रम काम कर रहे थे, हवा से मोमबत्ती बुझ जाती है। वे दीपक राग गाते हैं और मोमबत्ती जलाते हैं। इससे सारे नगर की मोमबत्तियां जल उठती हैं - नगर की राजकुमारी ने प्रतिज्ञा कि थी कि वे ऐसे व्यक्ति से विवाह करेंगी जो दीपक राग गाकर मोमबत्ती जला सकेगा। वह संगीत के स्रोत के रूप में उस विकलांग आदमी को देख कर चकित हो जाती है, लेकिन फिर भी उसी से शादी करने का फैसला करती है। राजा जब विक्रम को देखते हैं तो याद करके आग-बबूला हो जाते हैं कि पहले उन पर चोरी का आरोप था और अब वह उनकी बेटी से विवाह के प्रयास में है। वे विक्रम का सिर काटने के लिए अपनी तलवार निकाल लेते हैं। उस समय विक्रम अनुभव करते हैं कि उनके साथ यह सब शनि की शक्तियों के कारण हो रहा है। अपनी मौत से पहले वे शनि से प्रार्थना करते हैं। वे अपनी ग़लतियों को स्वीकार करते हैं और सहमति जताते हैं कि उनमें अपनी हैसियत की वजह से काफ़ी घमंड था। शनि प्रकट होते हैं और उन्हें उनके गहने, हाथ, पैर और सब कुछ वापस लौटाते हैं। विक्रम शनि से अनुरोध करते हैं कि जैसी पीड़ा उन्होंने सही है, वैसी पीड़ा सामान्य जन को ना दें। वे कहते हैं कि उन जैसा मजबूत इन्सान भले ही पीड़ा सह ले, पर सामान्य लोग सहन करने में सक्षम नहीं होंगे। शनि उनकी बात से सहमत होते हुए कहते हैं कि वे ऐसा कतई नहीं करेंगे। राजा अपने सम्राट को पहचान कर, उनके समक्ष समर्पण करते हैं और अपनी पुत्री की शादी उनसे कराने के लिए सहमत हो जाते हैं। उसी समय, दुकानदार दौड़ कर महल पहुंचता है और कहता है कि बतख ने अपने मुंह से गहने वापस उगल दिए हैं। वह भी राजा को अपनी बेटी सौंपता है। विक्रम उज्जैन से लौट आते हैं और शनि के आशीर्वाद से महान सम्राट के रूप में जीवन व्यतीत करते हैं।

नौ रत्न और उज्जैन में विक्रमादित्य का दरबारसंपादित करें

भारतीय परंपरा के अनुसार धन्वन्तरि, क्षपनक, अमरसिंह, शंकु, खटकरपारा, कालिदास, वेतालभट्ट (या (बेतालभट्ट), वररुचि और वराहमिहिर उज्जैन में विक्रमादित्य के राज दरबार का अंग थे। कहते हैं कि राजा के पास "नवरत्न" कहलाने वाले नौ ऐसे विद्वान थे।

कालिदास प्रसिद्ध संस्कृत राजकवि थे। वराहमिहिर उस युग के प्रमुख ज्योतिषी थे, जिन्होंने विक्रमादित्य की बेटे की मौत की भविष्यवाणी की थी। वेतालभट्ट एक धर्माचार्य थे। माना जाता है कि उन्होंने विक्रमादित्य को सोलह छंदों की रचना "नीति-प्रदीप" ("आचरण का दीया") का श्रेय दिया है।

विक्रमार्कस्य आस्थाने नवरत्नानि

धन्वन्तरिः क्षपणकोऽमरसिंहः शंकूवेताळभट्टघटकर्परकालिदासाः।
ख्यातो वराहमिहिरो नृपतेस्सभायां रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य॥

नौ रत्नो के नाम

महाराज विक्रमादित्य ने अपने सभा में नवरत्नों को रखने का प्रचलन सर्वप्रथम किया था उनको देखकर ही आने वाले  राजाओं ने भी अपनी सभाओ में नवरत्नों को रखने का प्रचलन हुआ उनके नवरत्न धनवंतरी, क्षणपक, अमर सिंह, कालिदास, वैतालभट्ट, शंकु, वररुचि, घटकर्पर, और वराहमिहिर थे। ये सभी नवरत्न अपने क्षेत्र में माहिर और विद्वान थे

धनवंतरी:– धनवंतरी एक आयुर्वेदिक वैद्य थे, धन्वंतरि ने एक बार युद्ध में विक्रामिदत्य गंभीर रूप से घायल हो गए थे उनके जीवन की कोई उम्मीद नहीं बची थी धन्वंतरि ने अपनी चमत्कारिक औषधी से राजा विक्रामिदत्य के प्राण बचाये थे। तब  के उन्होंने कई सारे ग्रंथ भी लिखे महाराज विक्रमादित्य की सभा में नौरत्न में से एक थे। आज के समय में भी किसी आयुर्वेदिक वैद्य की प्रशंसा करनी हो तो उन्हें धनवंतरी की उपमा दी जाती है

क्षपनक:- नवरत्नों में दूसरे रत्न क्षणपक थे, यह एक वह एक सन्यासी थे जो बौद्ध धर्म को मानते थे उन्होंने भिक्षा टन तथा नानार्थकोश जैसे ग्रंथ भी लिखें, जिनका उद्देश्य मनुष्य जाती को निति, अहिंसा और धर्म के मार्ग पर चलना सिखाया।

अमर सिंह:- अमर सिंह एक महान विद्वान थे जिनको पंडितों का पिता कहां जाता था उन्होंने ही शब्दकोश का निर्माण किया बोधगया के मंदिर में अमर सिंह का शिलालेख यह बताता है कि उन्होंने ही मंदिर का निर्माण करवाया था उनके अमरकोश नाम के ग्रंथ में अष्टाध्याई को पंडितों की माता का कहा गया है यदि कोई भी मनुष्य अमरकोश को पढ़ ले तो वह एक महान पंडित की मन जाता है।

शंकु:- सम्राट विक्रमादित्य के राज्य में नीति शास्त्र के सबसे बड़े ज्ञानी शंकु को ही कहा जाता है वह एक रस आचार्य थे जिनका पूरा नाम शङ्ग्कूक था,  जिनका काव्य ग्रंथ भुवनाभ्युदम बहुत प्रसिद्ध है।

वैतालभट्ट:- वैतालभट्ट (बेतालभट्ट) एक धर्माचार्य थे, और यह माना जाता है कि उन्होंने ही सम्राट विक्रमादित्य को 16 छंद यानी नीति आचरण सिखाया था यह युद्ध कौशल के महारथी भी थे जो हमेशा सम्राट विक्रमादित्य के निकट ही रहते थे इन्हें द्वारपाल भी कहा जाता था। वैतालभट्ट ने ही विक्रम तथा बेताल की कहानी की वेताल पंचतवती की कहानी लिखी थी जिसकी लोकप्रियता पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है।

खटकपारा /घटकर्पर:- खटकपारा एक संस्कृत विद्वान थे उन्होंने यह प्रतिज्ञा ली थी कि जो भी उन्हें अनुप्रास और यमक में हरा देगा वह उनके घर पर फूटे हुए घड़े से पानी भरेंगे क्योंक उस समय तक उनसे बड़ा कोई भी संस्कृतिक विद्यान नहीं था उन्होंने अपने कविता पुस्तक घटकर्पर काव्यम में निति सार को संस्कृत में लिखा था।

कालिदास:- नवरत्नों में सबसे प्रसिद्ध कालिदास ही थे आज भी लोग कालिदास को एक संस्कृत महाकवि मानते हैं वह राजा विक्रमादित्य के प्राण प्रिय कवि थे। कालिदास जी की कहानी अत्यंत रोचक होती है उन्होंने मां काली से तपस्या करके सिद्धि प्राप्त की थी। शकुंतलम जैसी प्रसिद्ध नाटक में कालिदास की कृति को दिखाया गया है।

वराह मिहिर :- वराह मीर उस युग के सबसे प्रमुख ज्योतिषियों में से एक थे उन्होंने विक्रमादित्य के बेटे की मृत्यु की भविष्यवाणी पहले ही कर दी थी उन्होंने ही विष्णु स्तंभ का निर्माण करवाया जिसे मुगलों ने आक्रमण के बाद कुतुब मीनार में बदल दिया था।

वररूचि:- वररूचि एक कवि और व्याकरण के ज्ञाता माने जाते थे उन्हें शास्त्रीय संगीत का पूर्ण ज्ञान था कालिदास की भांति इन्हें भी काव्यकर्ताओ में एक माना जाता था।

नौ रत्नों के चित्रसंपादित करें

मध्यप्रदेश में स्थित उज्जैन-महानगर के महाकाल मन्दिर के पास विक्रमादित्य टिला है। वहाँ विक्रमादित्य के संग्रहालय में नवरत्नों की मूर्तियाँ स्थापित की गई हैं।

विक्रमादित्य के नवरत्न
कालिदास 
वराहमिहिर 
घटर्खपर 
बेतालभट्ट 
क्षपणक 
वररुचि 
शंकु 
अमरसिंह 
धनवंतरी 

विक्रम संवत्संपादित करें

भारत और नेपाल की हिंदू परंपरा में व्यापक रूप से प्रयुक्त प्राचीन पंचाग हैं विक्रम संवत् या विक्रम युग। कहा जाता है कि ईसा पूर्व 56 में शकों पर अपनी जीत के बाद राजा ने इसकी शुरूआत की थी।

सन्दर्भसंपादित करें

  • द कथा सरित सागर, या ओशन ऑफ़ द स्ट्रीम्स ऑफ़ स्टोरी, सी.एच टॉने द्वारा अनूदित, 1880
  • विक्रम एंड द वैम्पायर रिचर्ड आर. बर्टन द्वारा अनूदित, 1870
  • द इनरोड्स ऑफ़ द स्काइथियंस इनटू इंडिया, एंड द स्टोरी ऑ कलकाचार्य, रॉयल एशियाटिक सोसायटी की मुंबई शाखा की पत्रिका, VVol. IX, 1872
  • विक्रमाज़ एडवेंचर्स ऑर द थर्टी-टू टेल्स ऑफ़ द थ्रोन, संस्कृत मूल के चार अलग संपादित पाठ संशोधन (विक्रम-चरित या सिंहासन-द्वात्रिंशिका), फ्रेंकलिन एजरटॉन द्वारा अनूदित, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1926.

सन्दर्भसंपादित करें

  1. बसंत, पीके (2012). The city and the country in early India : a study of Malwa. नई दिल्ली: प्रिमुस बुक्स. OCLC 796082082. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-93-80607-15-3.
  2. व्यास, सूर्यनारायाण (2019). पं॰ सूर्यनारायाण व्यास: प्रतिनिधि रचनाएँ. प्रभाकर श्रोत्रिय, राजशेखर व्यास (संस्करण प्रथम संस्करण). नई दिल्ली. OCLC 1122800194. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-93-5322-621-3.

इन्हें भी देखेंसंपादित करें