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संस्कृतियों के परस्पर सम्पर्क आने से सामाजिक परिवर्तन; इस चित्र में एरिजोना के एक जनजाति के तीन पुरुष दिखाये गये हैं। बायें वाला पुरुष परम्परागत पोशाक में है, बीच वाला मिश्रित शैली में है तथा दाहिने वाला १९वीं शदी के अन्तिम दिनों की अमेरिकी शैली में है।

सामाजिक परिवर्तन, समाज के आधारभूत परिवर्तनों पर प्रकाश डालने वाला एक विस्तृत एवं कठिन विषय है। इस प्रक्रिया में समाज की संरचना एवं कार्यप्रणाली का एक नया जन्म होता है। इसके अन्तर्गत मूलतः प्रस्थिति, वर्ग, स्तर तथा व्यवहार के अनेकानेक प्रतिमान बनते एवं बिगड़ते हैं। समाज गतिशील है और समय के साथ परिवर्तन अवश्यंभावी है।

आधुनिक संसार में प्रत्येक क्षेत्र में विकास हुआ है तथा विभिन्न समाजों ने अपने तरीके से इन विकासों को समाहित किया है, उनका उत्तर दिया है, जो कि सामाजिक परिवर्तनों में परिलक्षित होता है। इन परिवर्तनों की गति कभी तीव्र रही है कभी मन्द। कभी-कभी ये परिवर्तन अति महत्वपूर्ण रहे हैं तो कभी बिल्कुल महत्वहीन। कुछ परिवर्तन आकस्मिक होते हैं, हमारी कल्पना से परे और कुछ ऐसे होते हैं जिसकी भविष्यवाणी संभव थी। कुछ से तालमेल बिठाना सरल है जब कि कुछ को सहज ही स्वीकारना कठिन है। कुछ सामाजिक परिवर्तन स्पष्ट है एवं दृष्टिगत हैं जब कि कुछ देखे नहीं जा सकते, उनका केवल अनुभव किया जा सकता है। हम अधिकतर परिवर्तनों की प्रक्रिया और परिणामों को जाने समझे बिना अवचेतन रूप से इनमें शामिल रहे हैं। जब कि कई बार इन परिवर्तनों को हमारी इच्छा के विरुद्ध हम पर थोपा गया है। कई बार हम परिवर्तनों के मूक साक्षी भी बने हैं। व्यवस्था के प्रति लगाव के कारण मानव मस्तिष्क इन परिवर्तनों के प्रति प्रारंभ में शंकालु रहता है परन्तु शनैः उन्हें स्वीकार कर लेता है। वध दल


बिहार में समाजिक परिवर्तन:‌ त्रिवेणी संघ फॉरवर्ड प्रेस MENU HOME मुखपृष्ठ NEWS & POLITICS समाचार और राजनीति INDIAN SOCIETY भारतीय समाज BAHUJAN CULTURE बहुजन संस्‍कृति EMPOWERMENT सशक्तिकरण REPORTS रिपोर्ट ADVICE सलाह FP BOOKS एफपी बुक्स

Search खोज त्रिवेणी संघ : संगठन की ताकत का पहला एहसास आजादी के पूर्व पिछड़ी जातियों के महत्वपूर्ण संगठन त्रिवेणी संघ के इतिहास, खूबियों, खामियों का जायजा ले रहे हैं ओमप्रकाश कश्यप

BY OMPRAKASH KASHYAP ओमप्रकाश कश्यप ON OCTOBER 11, 2016 1 COMMENT READ THIS ARTICLE IN ENGLISH sardar-jagdev-singh सरदार जगदेव सिंह

बुद्धिजीवियों और लेखकों ने 20 वीं शताब्दी के दो बड़े आंदोलनों की भारी उपेक्षा की है। यदि उन्हें समर्थन मिलता तो बात दूसरी होती। कदाचित वे समस्याएं न देखनी पड़तीं, जिनसे हम आज गुजर रहे हैं। उनमें पहले का नाम है—‘त्रिवेणी संघ’।दूसरा ‘अर्जक संघ’। दोनों ही संगठन सामाजिक न्याय की भावना से अनुप्रेत थे। ‘त्रिवेणी संघ’ का गठन शाहाबाद, बिहार तथा ‘अर्जक संघ’ का गठन इलाहाबाद, उत्तरप्रदेश में हुआ था। दोनों का उद्देश्य था, दबी-पिछड़ी जातियों में आत्मसम्मान का भाव जाग्रत करना। उन्हें तथाकथित उच्च जाति के भू-सामंतों, जमींदारों, धर्म के नाम पर ठगी करने वाले पंडा-पुरोहितों से बचाना। ‘त्रिवेणी संघ’ पिछड़ी जातियों को राजनीतिक स्तर पर गोलबंद कर कांग्रेस के वर्चस्व को तोड़ना चाहता था, जो उन दिनों मुख्यतः सर्वर्णों का संगठन था। ‘अर्जक संघ’ का उद्देश्य तंत्र-मंत्र, जादू-टोने, पूजा-पाखंड में धंसे समाज में मानवतावादी, राष्ट्रीयतावादी एवं वैज्ञानिक सोच का विकास करना था।

विचार और गठन की प्रक्रिया

‘त्रिवेणी संघ’ का विचार सबसे पहले सरदार जगदेव सिंह के मन में उपजा था। उसे आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने कई नेताओं से बात की। उस समय तक बिहार में सामाजिक न्याय की मांग उठने लगी थी। लेकिन बराबरी और समानता की बात करना भू-सामंतों और पुरोहितों की निगाह में पाप था। पिछड़ी जातियां मान चुकी थीं कि सवर्ण वर्चस्व के विरुद्ध लड़ाई केवल संगठन के बल पर लड़ी जा सकती है। यदुनंदनप्रसाद मेहता और शिवपूजन सिंह ‘जनेऊ आंदोलन’ सहित अनेक समतावादी आंदोलनों में शिरकत कर चुके थे। उनका लोगों पर प्रभाव था। इसलिए सरदार जगदेव सिंह द्वारा संगठन के प्रस्ताव पर दोनों ने अपनी तत्क्षण सहमति दे दी। गंगा, यमुना, सरस्वती की त्रिवेणी के आधार पर उसे नाम दिया गया—‘त्रिवेणी संघ।’ उसके लिए आदर्श वाक्य चुना गया—‘संघे शक्ति कलयुगे।’ इस तरह 30 मई 1933 को बिहार के शाहाबाद जिले की तीन प्रमुख पिछड़ी जातियों यादव, कोयरी और कुर्मी के नेताओं क्रमशः सरदार जगदेव सिंह, यदुनंदन प्रसाद मेहता और शिवपूजन सिंह ने ‘त्रिवेणी संघ’ की नींव रखी। कुछ इतिहासकार उसका गठन 1920 से मानते हैं।

shivpujan-singh शिवपूजन सिंह

आगे की लड़ाई और भी चुनौतियों से भरी थी। ‘त्रिवेणी संघ’ के गठन से पहले तीनों नेता कांग्रेस में सक्रिय थे। उस समय कांग्रेस भारत की समस्त जनता की प्रतिनिधि होने का दावा करती थी, परंतु प्रांत-भर में लगभग सभी राजनीतिक पदों पर सवर्णों का कब्जा था। पिछड़ों को राजनीति से दूर रखने के लिए उन्हें तरह-तरह से हतोत्साहित किया जाता था। उनके लिए चुनावों में हिस्सा लेना आसान भी नहीं था। पूरा समाज सामंतवाद और कुलीनतावाद की जकड़ में था। जिला बोर्ड का चुनाव वही लड़ सकता था जो न्यूनतम 64 रुपये सालाना मालगुजारी का भुगतान करता हो। जबकि बिहार की कुल आबादी के मात्र 0.06 प्रतिशत लोगों की आमदनी ही कर-योग्य थी। इस तरह ब्राह्मण, बनिया, ठाकुर और कायस्थ का आर्थिक साम्राज्यवाद, राजनीतिक साम्राज्यवाद का पूरक और परिवर्धक बना हुआ था। पिछड़ी जाति के नेता कांग्रेस के पास टिकट मांगने जाते तो उनकी खिल्ली उड़ाई जाती थी।

पृष्ठभूमि

‘त्रिवेणी संघ’ के गठन में हालांकि तीन प्रमुख पिछड़ी जातियों का हाथ था, मगर योजना सभी पिछड़ी जातियों को साथ लेकर चलने की थी। दबंग जातियों द्वारा गरीब दलित और पिछड़ी जाति की महिलाओं का यौन शोषण उन दिनों सामान्य बात थी। त्रिवेणी संघ ने बेगार और महिलाओं के यौन शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई। 1937 में विधान सभा चुनावों से पहले टिकट की कामना के साथ संघ के प्रतिनिधि कांग्रेसी नेताओं से मिले। कुछ दिनों बाद उन्होंने डा. राजेंद्र प्रसाद से भी संपर्क किया। सभी ने उन्हें टिकट का आश्वासन दिया। लेकिन हुआ वह जो पहले से तय था, ‘कांग्रेस ने एक न सुनी और सब उम्मीदवार उच्च जातियों के रखे गए.’ (त्रिसबि) कांग्रेसी नेताओं की चालाकी का खुलासा यदुनंदनप्रसाद मेहता ने अपनी पुस्तिका ‘त्रिवेणी संघ का बिगुल’ में किया है—‘पहले ऐलान किया गया कि योग्य व्यक्तियों को लिया जाएगा। जब इन बेचारों ने योग्य व्यक्तियों को ढूंढना शुरू किया तो कहा गया कि खद्दरधारी होना चाहिए। जब खद्दरधारी सामने लाए गए तो कहा गया कि जेल यात्रा कर चुका हो। जब ऐसे भी आने लगे तो कहा गया कि वहां क्या साग-भंटा बोना है….किसी को कहा जाता कि वहां क्या भैंस दुहनी हैं? तो किसी को व्यंग्य मारा जाता कि वहां क्या भेड़ें चरानी हैं?….किसी को यह कहकर फटकार दिया जाता कि वहां क्या नमक-तेल तौलना है!’(त्रिसबि) निराश होकर त्रिवेणी संघ ने अपने प्रतिनिधि खड़े करने का निश्चय किया। किंतु संसाधनों और अनुभव की कमी तथा अपने ही लोगों की कांग्रेसी नेताओं के साथ मिली-भगत के उसके प्रतिनिधि चुनावों में अपेक्षित सफलता अर्जित न कर सके।

yadunandan-prasad-mehta यदुनंदनप्रसाद मेहता

‘त्रिवेणी संघ’ के नेता परंपरागत धर्म के विरोध में नहीं थे। तथापि उसकी आचारसंहिता पर सोवियत क्रांति के प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता। संघ मानता था कि उसकी असली लड़ाई साम्राज्यवाद से है और उसका लक्ष्य है साम्यवाद—‘त्रिवेणी संघ’ चाहता है, धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक साम्राज्यवादों का अंत तथा उनके स्थान पर धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक साम्यवाद का प्रचार, औद्योगिक क्रांति, जिससे सभी फलफूल सकें’(त्रिसबि)। धार्मिक साम्यवाद से उनका आशय था, धर्म के नाम पर चल रहे सर्वाधिकारवाद और आडंबरों का विरोध। संघ का विश्वास था कि—‘धर्म के ठेकेदार अपनी तोंद फुलाने के लिए धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य, नरक-स्वर्ग तथा मोक्ष आदि के अड़ंगे लगा-लगा, जनता को कूपमंडूक बना-बना उसकी आंखों में धूल झोंक दिन-दोपहर लूट रहे हैं.’ (त्रिसबि)

त्रिवेणी संघ की स्थापना के मूल में जातीय चेतना थी। उसके सिद्धांतकारों का मानना था जातिगत भेदभाव से मुक्ति ही सामाजिक साम्राज्यवाद से मुक्ति है। सिद्धांततः संघ के नेता जातीय समानता और समरसता के समर्थक थे, ‘जन्म से कोई ऊंच है न नीच। लोग अपने-अपने कर्तव्य से ऊंच-नीच हुआ करते हैं.’(त्रिसबि) जाति असमानताकारी व्यवस्था है। यह कुछ लोगों को अत्यधिक अधिकार संपन्न करती है, तो समाज के बड़े हिस्से के निर्णय-सामर्थ्य का हनन कर उसे प्रभुता संपन्न जातियों का दास बना देती है। इतिहास साक्षी है कि जातीय भेदभाव ने भारतीय समाज को हमेशा पीछे की ओर ढकेला है—”ऊंच-नीच और छूत-अछूत की भेद-भावना ने बड़े-बड़े महात्माओं को भी नहीं छोड़ा है। यही कारण है कि हमारे देश में एकता नहीं हो पाती…..त्रिवेणी संघ ऐसे अन्यायों को मिटा देना चाहता है। और इस अछूत शब्द को दुनिया से विदा कर देना चाहता है।’(त्रिसबि) यह त्रिवेणी संघ का प्रभाव ही था जो कांग्रेस को पिछड़ी जातियों को लुभाने के लिए 1937 में अपने भीतर ‘बैकवर्ड कास्ट फेडरेशन’ स्थापना करनी पड़ी थी।

triveni-sangh-ka-bigulइसके बावजूद त्रिवेणी संघ का प्रयोग ज्यादा दिन न चल सका। 1937 के चुनावों की असफलता के पश्चात नेताओं का उत्साह मद्धिम पड़ने लगा। उसके कई कारण थे। पहला यह कि संघ के कुछ नेताओं के कांग्रेसी नेताओं से गहरे संबंध थे। कांग्रेस ने ‘पिछड़ा जाति संघ’ का गठन किया तो उसके कई कद्दावर नेता उसकी शरण में चले गए। दूसरी और महत्त्वपूर्ण बात यह कि साम्राज्यवाद से लड़ाई के लिए संघ के नेता लोकतंत्र को हथियार बनाना चाहते थे। परंतु लोकतंत्र की मूल भावना से तालमेल बनाए रखने का उन्हें अभ्यास न था। लंबे समय तक सामंतवादी संस्कारों तथा जातिवादी परिवेश में जीने के कारण उनका स्वभाव उसी के अनुकूल ढल चुका था। आपसी संवाद द्वारा विरोधों का समाहार करने, असहमतियों के बीच से सामान्य सहमति की राह निकालने की कला से वे अनभिज्ञ थे। एक उदाहरण इसे समझने के लिए पर्याप्त है। चुनावों में त्रिवेणी संघ के उम्मीदवारों की भारी संख्या में पराजय के बाद एक पत्रकार प्रतिक्रिया जानने के लिए उसके यादव नेता से मिला। वह चारपाई पर बैठा हुक्का गुड़गुड़ा रहा था। लाठी बराबर में रखी थी। उस समय बजाय हार के कारणों की समीक्षा करने के नेता ने लाठी पर नजर टिकाते हुए कहा था—‘चुनाव हार गए तो क्या हुआ। हमारी लाठी तो हमारे पास है।’

त्रिवेणी संघ के पराभव का चौथा और महत्त्वपूर्ण कारण यह था कि संघ के गठन से पहले यादव, कुर्मी और कोयरी जातियों के अपने-अपने महासंघ थे। सब अपनी-अपनी ऐंठ में रहते थे। यादव कृष्ण का वंशज होने का दावा करते थे तो कुर्मियों का मानना था कि वे राम के वंशज क्षत्रिय हैं। जातीय क्षत्रपों का निजी अहंकार अंततः ‘त्रिवेणी संघ’ को भारी पड़ा। उसकी एकता बिखरने लगी। हालांकि ‘अखिल भारतीय कुर्मी क्षत्रिय सभा’ के तीसवें सत्र में कुछ नेताओं ने सभा से ‘क्षत्रिय’ शब्द हटाकर कोयरियों के साथ जातीय गठबंधन को मजबूत करने की बात उठाई थी। मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। संघ अपनी चमक खो चुका था। आज की बहुजन राजनीति त्रिवेणी संघ के उस बिखराब से सबक ले सकती है।

संदर्भ:

(त्रिसबि: त्रिवेणी संघ का बिगुल, स्रोत—भारत में सामाजिक परिवर्तन के कुछ आयाम, लेखक प्रसन्न कुमार चौधरी/श्रीकांत)

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Omprakash Kashyap ओमप्रकाश कश्यप साहित्यकार एवं विचारक ओमप्रकाश कश्यप की विविध विधाओं की तैतीस पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। बाल साहित्य के भी सशक्त रचनाकार ओमप्रकाश कश्यप को 2002 में हिन्दी अकादमी दिल्ली के द्वारा और 2015 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के द्वारा समानित किया जा चुका है। विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में नियमित लेखन

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Touchstone of Aesthetics Bahujan aesthetics should be the considered the touchstone or else every OBC expressing himself would be contributing to OBC literature


'ओबीसी विमर्श से हिन्दी साहित्य बेचैन क्यों' पिछले दिनों देश की राजधानी में एक दिशा-प्रवर्तक विमर्श हुआ-ओबीसी साहित्य विमर्श। इसकी शुरुआत 2006 में महाराष्ट्र में हुई थी, इसकी यात्रा 10 सालों में देश की राजधानी तक पहुँच गई। इस विमर्श के भागीदार प्रवक्ताओं ने क्या कहा और विमर्श किन निष्कर्ष-संकेतों के साथ आगे के लिए स्थगित हुआ, बता रहे हैं उत्पलकांत अनीस

“Why does OBC discourse unsettle the Hindi literary world?” The national capital was recently witness to a path-breaking discussion on OBC literature. A decade had passed since the first of such discussions was held in Maharashtra. Utpalkant Anish writes about what the participants said and the conclusions they reached


बहुजन साहित्य की रूपरेखा फॉरवर्ड बुक्स के द्वारा प्रकाशित किताब ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’ की समीक्षा करते हुए ओमप्रकाश कश्यप बता रहे हैं कि दलित साहित्य, ओबीसी साहित्य, आदिवासी साहित्य और स्त्री साहित्य के सहज संयोग से ‘बहुजन साहित्य’ बनता है। ओमप्रकाश कश्यप यह बता रहे हैं कि ओबीसी साहित्य इन सभी अस्मिताओं के साहित्य सबसे नया और प्राथमिक अवस्था में है। यह आलेख किताब के बहाने भारत के बहुजन-चिंतन-परंपरा को व्याखायित कर रहा है

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ONE RESPONSE pratap December 18, 2016 Reply Comment Text*kurmi to kshatriya hai or wo kshatriyon me suryvanshi kshatriya hai.

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सामाजिक परिवर्तन का अर्थसंपादित करें

सामाजिक परिवर्तन के अन्तर्गत हम मुख्य रूप से तीन तथ्यों का अध्ययन करते हैं-

  • (क) सामाजिक संरचना में परिवर्तन,
  • (ख) संस्कृति में परिवर्तन एवं
  • (ग) परिवर्तन के कारक।

सामाजिक परिवर्तन के अर्थ को स्पष्ट करने के लिए कुछ प्रमुख परिभाषाओं पर विचार करेंगे।

मकीवर एवं पेज (R.M. MacIver and C.H. Page) ने अपनी पुस्तक सोसायटी (society) में सामाजिक परिवर्तन को स्पष्ट करते हुए बताया है कि समाजशास्त्री होने के नाते हमारा प्रत्यक्ष संबंध सामाजिक संबंधों से है और उसमें आए हुए परिवर्तन को हम सामाजिक परिवर्तन कहेंगे।

डेविस (K. Davis) के अनुसार सामाजिक परिवर्तन का तात्पर्य सामाजिक संगठन अर्थात् समाज की संरचना एवं प्रकार्यों में परिवर्तन है।

एच0 एम0 जॉनसन (H.M. Johnson) ने सामाजिक परिवर्तन को बहुत ही संक्षिप्त एवं अर्थपूर्ण शब्दों में स्पष्ट करते हुए बताया कि मूल अर्थों में सामाजिक परिवर्तन का अर्थ संरचनात्मक परिवर्तन है। जॉनसन की तरह गिडेन्स ने बताया है कि सामाजिक परिवर्तन का अर्थ बुनियादी संरचना (Underlying Structure) या बुनियादी संस्था (Basic Institutions) में परिवर्तन से है।

ऊपर की परिभाषाओं के संबंध में यह कहा जा सकता है कि परिवर्तन एक व्यापक प्रक्रिया है। समाज के किसी भी क्षेत्र में विचलन को सामाजिक परिवर्तन कहा जा सकता है। विचलन का अर्थ यहाँ खराब या असामाजिक नहीं है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक, नैतिक, भौतिक आदि सभी क्षेत्रों में होने वाले किसी भी प्रकार के परिवर्तन को सामाजिक परिवर्तन कहा जा सकता है। यह विचलन स्वयं प्रकृति के द्वारा या मानव समाज द्वारा योजनाबद्ध रूप में हो सकता है। परिवर्तन या तो समाज के समस्त ढाँचे में आ सकता है अथवा समाज के किसी विशेक्ष पक्ष तक ही सीमित हो सकता है। परिवर्तन एक सर्वकालिक घटना है। यह किसी-न-किसी रूप में हमेशा चलने वाली प्रक्रिया है। परिवर्तन क्यों और कैसे होता है, इस प्रश्न पर समाजशास्त्री अभी तक एकमत नहीं हैं। इसलिए परिवर्तन जैसी महत्वपूर्ण किन्तु जटिल प्रक्रिया का अर्थ आज भी विवाद का एक विषय है। किसी भी समाज में परिवर्तन की क्या गति होगी, यह उस समाज में विद्यमान परिवर्तन के कारणों तथा उन कारणों का समाज में सापेक्षिक महत्व क्या है, इस पर निर्भर करता है। सामाजिक परिवर्तन के स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए यहाँ इसकी प्रमुख विशेषताओं की चर्चा अपेक्षित है।

सामाजिक परिवर्तन की विशेषताएँसंपादित करें

विशेषतायें निम्नलिखित हैं।

  • (1) सामाजिक परिवर्तन एक विश्वव्यापी प्रक्रिया (Universal Process) है। अर्थात् सामाजिक परिवर्तन दुनिया के हर समाज में घटित होता है। दुनिया में ऐसा कोई भी समाज नजर नहीं आता, जो लम्बे समय तक स्थिर रहा हो या स्थिर है। यह संभव है कि परिवर्तन की रफ्तार कभी धीमी और कभी तीव्र हो, लेकिन परिवर्तन समाज में चलने वाली एक अनवरत प्रक्रिया है।
  • (2) सामुदायिक परिवर्तन ही वस्तुतः सामाजिक परिवर्तन है। इस कथन का मतलब यह है कि सामाजिक परिवर्तन का नाता किसी विशेष व्यक्ति या समूह के विशेष भाग तक नहीं होता है। वे ही परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन कहे जाते हैं जिनका प्रभाव समस्त समाज में अनुभव किया जाता है।
  • (3) सामाजिक परिवर्तन के विविध स्वरूप होते हैं। प्रत्येक समाज में सहयोग, समायोजन, संघर्ष या प्रतियोगिता की प्रक्रियाएँ चलती रहती हैं जिनसे सामाजिक परिवर्तन विभिन्न रूपों में प्रकट होता है। परिवर्तन कभी एकरेखीय (Unilinear) तो कभी बहुरेखीय (Multilinear) होता है। उसी तरह परिवर्तन कभी समस्यामूलक होता है तो कभी कल्याणकारी। परिवर्तन कभी चक्रीय होता है तो कभी उद्विकासीय। कभी-कभी सामाजिक परिवर्तन क्रांतिकारी भी हो सकता है। परिवर्तन कभी अल्प अवधि के लिए होता है तो कभी दीर्घकालीन।
  • (4) सामाजिक परिवर्तन की गति असमान तथा सापेक्षिक (Irregular and Relative) होती है। समाज की विभिन्न इकाइयों के बीच परिवर्तन की गति समान नहीं होती है।
  • (5) सामाजिक परिवर्तन के अनेक कारण होते हैं। समाजशास्त्री मुख्य रूप से सामाजिक परिवर्तन के जनसांख्यिकीय (Demographic), प्रौद्योगिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक कारकों की चर्चा करते हैं। इसके अलावा सामाजिक परिवर्तन के अन्य कारक भी होते हैं, क्योंकि मानव-समूह की भौतिक (Material) एवं अभौतिक (Non-material) आवश्यकताएँ अनन्त हैं और वे बदलती रहती हैं।
  • (6) सामाजिक परिवर्तन की कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है। इसका मुख्य कारण यह है कि अनेक आकस्मिक कारक भी सामाजिक परिवर्तन की स्थिति पैदा करते हैं।

विलबर्ट इ॰ मोर (Wilbert E. Moore, 1974) ने आधुनिक समाज को ध्यान में रखते हुए सामाजिक परिवर्तन की विशेषताओं की चर्चा अपने ढंग से की है, वे हैं-

  • (1) सामाजिक परिवर्तन निश्चित रूप से घटित होते रहते हैं। सामाजिक पुनरुत्थान के समय में परिवर्तन की गति बहुत तीव्र होती है।
  • (2) बीते समय की अपेक्षा वर्तमान में परिवर्तन की प्रक्रिया अत्यधिक तीव्र होती है। आज परिवर्तनों का अवलोकन हम अधिक स्पष्ट रूप में कर सकते हैं।
  • (3) परिवर्तन का विस्तार सामाजिक जीवन के सभी क्षेत्रों में देख सकते हैं। भौतिक वस्तुओं के क्षेत्र में, विचारों एवं संस्थाओं की तुलना में, परिवर्तन अधिक तीव्र गति से होता है।
  • (4) हमारे विचारों एवं सामाजिक संरचना पर स्वाभाविक ढंग और सामान्य गति के परिवर्तन का प्रभाव अधिक पड़ता है।
  • (5) सामाजिक परिवर्तन का अनुमान तो हम लगा सकते हैं, लेकिन निश्चित रूप से हम इसकी भविष्यवाणी नहीं कर सकते हैं।
  • (6) सामाजिक परिवर्तन गुणात्मक (Qualitative) होता है। समाज की एक इकाई दूसरी इकाई को परिवर्तित करती है। यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है, जब तक पूरा समाज उसके अच्छे या बुरे प्रभावों से परिचित नहीं हो जाता।
  • (7) आधुनिक समाज में सामाजिक परिवर्तन न तो मनचाहे ढंग से किया जा सकता है और न ही इसे पूर्णतः स्वतंत्र और असंगठित छोड़ दिया जा सकता है। आज हर समाज में नियोजन (Planning) के द्वारा सामाजिक परिवर्तन को नियंत्रित कर वांछित लक्ष्यों की दिशा में क्रियाशील किया जा सकता है।

सामाजिक परिवर्तन के मुख्य स्रोतसंपादित करें

कुछ समाजशास्त्रियों का कहना है कि सामाजिक परिवर्तन के कुछ मुख्य स्रोत हैं। ये इस प्रकार हैं-

  • (1) खोज (Discovery) : मनुष्य ने अपने ज्ञान एवं अनुभवों के आधार पर अपनी समस्याओं को सुलझाने और एक बेहतर जीवन व्यतीत करने के लिए बहुत तरह की खोज की है। जैसे शरीर में रक्त संचालन, बहुत सारी बीमारियों के कारणों, खनिजों, खाद्य पदार्थों, पृथ्वी गोल है एवं वह सूर्य की परिक्रमा करती है आदि हजारों किस्म के तथ्यों की मानव ने खोज की, जिनसे उनके भौतिक एवं अभौतिक जीवन में काफी परिवर्तन आया।
  • (2) अविष्कार (Invention) : विज्ञान और प्रौद्यागिकी के जगत में मनुष्य के आविष्कार इतने अधिक हैं कि उनकी गिनती करना मुश्किल है। आविष्कारों ने मानव समाज में एक युगान्तकारी एवं क्रान्तिकारी परिवर्तन ला दिया है।
  • (3) प्रसार (Diffusion) : सांस्कृतिक जगत के परिवर्तन में प्रसार का प्रमुख योगदान रहा है। पश्चिमीकरण, आधुनिकीकरण, एवं भूमंडलीकरण जैसी प्रक्रियाओं का मुख्य आधार प्रसार ही रहा है। आधुनिक युग में प्रौद्योगिकी का इतना अधिक विकास हुआ है कि प्रसार की गति बहुत तेज हो गयी है।
  • (4) आन्तरिक विभेदीकरण (Internal Differentiation) : जब हम सामाजिक परिवर्तन के सिद्धान्तों को ध्यान में रखते हैं, तो ऐसा लगता है कि परिवर्तन का एक चौथा स्रोत भी संभव है- वह है आन्तरिक विभेदीकरण। इस तथ्य की पुष्टि उद्विकासीय सिद्धान्त (Evolutionary Theory) के प्रवर्तकों के विचारों से होती है। उन लोगों का मानना है कि समाज में परिवर्तन समाज के स्वाभाविक उद्विकासीय प्रक्रिया से ही होता है। हरेक समाज अपनी आवश्यकताओं के अनुसार धीरे-धीरे विशेष स्थिति में परिवर्तित होता रहता है। समाजशास्त्रियों एवं मानवशास्त्रियों ने अपने उद्विकासीय सिद्धान्त में स्वतः चलने वाली आन्तरिक विभेदीकरण की प्रक्रिया पर काफी बल दिया है।

सामाजिक परिवर्तन से सम्बद्ध कुछ अवधारणाएँसंपादित करें

सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया कई रूपों में प्रकट होती हैं, जैसे- उद्विकास, प्रगति, विकास, सामाजिक आन्दोलन, क्रांति इत्यादि। चूँकि इन सामाजिक प्रक्रियाओं का सामाजिक परिवर्तन से सीधा संबंध है या कभी-कभी इन संबंधों को सामाजिक परिवर्तन का पर्यायवाची माना जाता है, इसलिए इन शब्दों के अर्थ के संबंध में काफी उलझनें हैं। इनका स्पष्टीकरण निम्नलिखित हैं।

उद्विकाससंपादित करें

उद्विकास’ (Evolution) शब्द का प्रयोग सबसे पहले जीवविज्ञान के क्षेत्र में चार्ल्स डार्विन ने किया था। डार्विन के अनुसार उद्विकास की प्रक्रिया में जीव की संरचना सरलता से जटिलता (Simple to Complex) की ओर बढ़ती है। यह प्रक्रिया प्राकृतिक चयन (Natural Selection) के सिद्धान्त पर आधारित है। आरंभिक समाजशास्त्री हरबर्ट स्पेन्सर ने जैविक परिवर्तन (Biological Changes) की भाँति ही सामाजिक परिवर्तन को भी कुछ आन्तरिक शक्तियों के कारण संभव माना है और कहा है कि उद्विकास की प्रक्रिया धीरे-धीरे निश्चित स्तरों से गुजरती हुई पूरी होती है।[1]

उद्विकास की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए मकीवर एवं पेज ने लिखा है कि उद्विकास एक किस्म का विकास है। पर प्रत्येक विकास उद्विकास नहीं है क्योंकि विकास की एक निश्चित दिशा होती है, पर उद्विकास की कोई निश्चित दिशा नहीं होती है। किसी भी क्षेत्र में विकास करना उद्विकास कहा जाएगा। मकीवर एवं पेज ने बताया है कि उद्विकास सिर्फ आकार में नहीं बल्कि संरचना में भी विकास है। यदि समाज के आकार में वृद्धि नहीं होती है और वह पहले से ज्यादा आन्तरिक रूप से जटिल हो जाता है तो उसे उद्विकास कहेंगे।

प्रगतिसंपादित करें

परिवर्तन जब अच्छाई की दिशा में होता है तो उसे हम प्रगति (Progress) कहते हैं। प्रगति सामाजिक परिवर्तन की एक निश्चित दिशा को दर्शाता है। प्रगति में समाज-कल्याण और सामूहिक-हित की भावना छिपी होती है। ऑगबर्न एवं निमकॉफ ने बताया है कि प्रगति का अर्थ अच्छाई के निमित्त परिवर्तन है। इसलिए प्रगति इच्छित परिवर्तन है। इसके माध्यम से हम पूर्व-निर्धारित लक्ष्यों को पाना चाहते हैं। मकीवर एवं पेज आगाह करते हुए कहा है कि हम लोगों को उद्विकास और प्रगति को एक ही अर्थ में प्रयोग नहीं करना चाहिए। दोनों बिल्कुल अलग-अलग अवधारणाएँ हैं।

विकाससंपादित करें

जिस प्रकार उद्विकास के अर्थ बहुत स्पष्ट एवं निश्चित नहीं हैं, विकास (Development) की अवधारणा भी बहुत स्पष्ट नहीं है। समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य में विकास का अर्थ सामाजिक विकास से है। प्रारंभिक समाजशास्त्रियों विशेषकर कौंत, स्पेन्सर एवं हॉबहाउस ने 'सामाजिक उद्विकास', 'प्रगति', एवं 'सामाजिक विकास' को एक ही अर्थ में प्रयोग किया था। आधुनिक समाजशास्त्री इन शब्दों को कुछ विशेष अर्थ में ही इस्तेमाल करते हैं।

आज समाजशास्त्र के क्षे त्र में विकास से हमारा तात्पर्य मुख्यतः सामाजिक विकास से है। इसका प्रयोग विशेषकर उद्योगीकरण एवं आधुनिकीकरण के चलते विकसित एवं विकासशील देशों के बीच अन्तर स्पष्ट करने के लिए होता है। सामाजिक विकास में आर्थिक विकास का भी भाव छिपा होता है और उसी के तहत हम परम्परागत समाज (Traditional Society), संक्रमणशील समाज (Transitional Society) एवं आधुनिक समाज (Modern Society) की चर्चा करते हैं। आधुनिक शिक्षा का विकास भी एक प्रकार का सामाजिक विकास है। उसी तरह से कृषि पर आधारित सामाजिक व्यवस्था से उद्योग पर आधारित सामाजिक व्यवस्था की ओर अग्रसर होना भी सामाजिक विकास कहा जाएगा। दूसरे शब्दों में, सामन्तवाद (Feudalism) से पूँजीवाद (Capitalism) की ओर जाना भी एक प्रकार का विकास है।

सामाजिक आन्दोलनसंपादित करें

सामाजिक आन्दोलन सामाजिक परिवर्तन का एक बहुत प्रमुख कारक रहा है। विशेषकर दकियानूसी समाज में सामाजिक आन्दोलनों के द्वारा काफी परिवर्तन आए हैं। गिडेन्स के अनुसार सामूहिक आन्दोलन व्यक्तियों का ऐसा प्रयास है जिसका एक सामान्य उद्देश्य होता है और उद्देश्य की पूर्ति के लिए संस्थागत सामाजिक नियमों का सहारा न लेकर लोग अपने ढंग से व्यवस्थित होकर किसी परम्परागत व्यवस्था को बदलने का प्रयास करते हैं।

गिडेन्स ने कहा है कि कभी-कभी ऐसा लगता है कि सामाजिक आन्दोलन और औपचारिक संगठन (Formal Organization) एक ही तरह की चीजें हैं, पर दोनों बिल्कुल भिन्न हैं। सामाजिक आन्दोलन के अन्तर्गत नौकरशाही व्यवस्था जैसे नियम नहीं होते, जबकि औपचारिक व्यवस्था के अन्तर्गत नौकरशाही नियम-कानून की अधिकता होती है। इतना ही नहीं दोनों के बीच उद्देश्यों का भी फर्क होता है। उसी तरह से कबीर पंथ, आर्य समाज, बह्मो समाज या हाल का पिछड़ा वर्ग आन्दोलन (Backward Class Movement) को सामाजिक आन्दोलन कहा जा सकता है। औपचारिक व्यवस्था नहीं।

क्रांतिसंपादित करें

सामाजिक आन्दोलन से भी ज्यादा सामाजिक परिवर्तन का सशक्त माध्यम क्रांति (Revolution) है। क्रांति के द्वारा सामाजिक परिवर्तन के अनगिनत उदाहरण मौजूद हैं। लेकिन पिछली दो-तीन शताब्दियों में मानव इतिहास में काफी, बड़ी-बड़ी क्रांतियाँ आई हैं, जिससे कुछ राष्ट्रों में राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में युगान्तकारी परिवर्तन हुए हैं। इस संदर्भ में 1775-83 की अमेरिकी क्रांति एवं 1789 की फ्रांसीसी क्रांति विशेष रूप से उललेखनीय हैं। इन क्रांतियों के चलते आज समस्त विश्व में स्वतंत्रता (Liberty), सामाजिक समानता और प्रजातंत्र की बात की जाती है। उसी तरह से रूसी क्रांति और चीनी क्रांति का विश्व स्तर पर अपना ही महत्व है। अब्राम्स (Abrams, 1982) ने बताया है कि विश्व में अधिकांश क्रांतियाँ मौलिक सामाजिक पुनर्निमाण के लिए हुई हैं। अरेंड (Nannah Arendt, 1963) के अनुसार क्रांतियों का मुख्य उद्देश्य परम्परागत व्यवस्था से अपने-आपको अलग करना एवं नये समाज का निर्माण करना है। इतिहास में कभी-कभी इसका अपवाद भी देखने को मिलता है। कुछ ऐसी भी क्रांतियाँ हुई हैं, जिनके द्वारा हम समाज को और भी पुरातन समय में ले जाने की कोशिश करते हैं।

सन्दर्भसंपादित करें

  1. [हर्बर्ट स्पेंसर : First Principles of a New System of Philosophy (1862)]

इन्हें भी देखेंसंपादित करें