स्नेह सिद्धान्त में जॉन बाल्बी ने मनुष्य की विशेष अन्यों से मज़बूत स्नेह बंधन बनाने की प्रवृत्ति को वैचारिक रूप दिया, तथा विरह से उत्पन्न व्यक्तित्व की समस्याओं व संवेगात्मक पीड़ा के साथ-साथ चिंता, गुस्से, उदासी तथा अलगाव की व्याख्या की।[1] बच्चे के जन्म के समय उसके चारों ओर के वातावरण में माँ की अहम् भूमिका है। बच्चे का पहला सम्बन्ध माँ से आरम्भ होता है। स्मिथ कहते हैं कि कुदरत ने इस रिश्ते को मज़बूत बनाया है, तो समाज, धर्म और साहित्य ने माँ और बच्चे के स्नेह को पवित्रता प्रदान की।[2]

माँ और बच्चा

इस लेख में, समाजशास्त्रियों की मानव समाज में प्रेममूलक सम्बन्धों की दो अवधारणाओं की चर्चा के बाद, स्नेह की वैकल्पिक सोच के संदभ में, लारेन्ज़ के हंस, बतख आदि पक्षियों के चूज़ों, तथा हार्लो के बंदर के बच्चों, पर अध्ययनों का संक्षिप्त वर्णन देकर, बाल्बी के स्नेह सिद्धान्त को रखा गया है। और अंत में स्नेह सिद्धान्त के अन्य क्षेत्रों में बढ़ते दायरे पर नज़र डाली गयी है।

स्नेह की दो प्रचलित अवधारणायें

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बच्चे और माँ का रिश्ता समाज की नीव है, यह विचार अमेरिका के हैरी हार्लो तथा इंग्लैंड के जॉन बाल्बी ने १९५८ में, अलग-अलग शोध पत्रों में प्रस्तुत किया।[3][4] इससे पहले समाजशास्त्रियों में समूह के आधार के बारे में दो अवधारणायें प्रचलित थीं। पहली सीखने के सिद्धान्त से जुड़ी है, और इसका सम्बन्ध व्यवहारवादियों की मान्यता से है कि नवजात बच्चे को दूध चाहिए, जो माँ देती है, इसलिए बच्चा माँ के निकट रहता है। मनोविश्लेषणवादियों ने इसमें काम या sex की प्रवृत्ति को जोड़ा, जिसके कई आयाम हैं, जॉन बाल्बी ने इनका उल्लेख अपने शोध पत्र में विस्तार से किया है।[3] इन दोनों अवधारणाओं के बारे में कोई ठोस सबूत न होने के कारण हार्लो और बाल्बी ने इन्हें नकार दिया, और इसका विकल्प ढूँढने लगे। और दोनों का ध्यान जंतुओं के व्यवहार पर प्राकृतिक वातावरण में हो रहे अध्ययनों पर गया, जिसे इथोलाजी कहते हैं।

इम्प्रिन्टिंग या अध्यंकन

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माँ के पीछे चलते बतख के बच्चे

एक इथोलाजिस्ट लारेंज़ ने कुछ पक्षियों हंस, बतख आदि पर अध्ययनों में देखा था कि चूज़ा अपनी माँ के पीछे साथ-साथ चले इसी में उसकी सुरक्षा है, तथा उसे खाना ढूंडने और तैरने का अनुभव भी होगा।[5] हंस या बतख के चूजों में, लारेंज़ के अनुसार, इस तरह से जल्दी सीखने, अध्यंकन के लिए वातावरण से तीन तरह के उत्तेजक ज़रूरी हैं, (१) चूज़े की आवाज़ के उत्तर में एक किसम की आवाज़; (२) कोई वस्तु चूज़े से दूर जा रही हो; (३) वह वस्तु समय-समय पर आवाज़ निकाले। अक्सर यह वस्तु चूज़े की माँ होगी, क्योंकि चूज़े के अंडे से बाहर निकलते समय वही पास में होती है। माँ की जगह, यदि कोई आदमी हो तो चूज़ा उसी के पीछे चलेगा, पर यह तीनो गुण उसमें होने चाहिए।

 
कानराड लारेंज़

अध्यंकन का मतलब नवजात शिशु के मन पर माँ या देख-भाल करने वाले की आकृति की छाप पड़ने से है। लारेंज़ ने यह खोज १९३५ में की थी।[2] जब एक बार चूज़े में यह ठप्पा या imprint पड़ जाता है, इसमें परिवर्तन आसानी से नहीं होता। अर्थात हंस के चूज़े में यदि अंडे से बाहर निकलने के एकदम बाद यदि हंस का ठप्पा लग जाये तो वह जीवन भर हंस के पीछे चलेगा। यदि चूज़े में पहली छवि आदमी की बनी तो वह आदमी के पीछे चलेगा, हंस के पीछे नहीं। वह आदमी पतली लड़की हो या बूढा मर्द, कोई फरक नहीं पड़ेगा। सबसे चौंकाने वाली बात, लारेंज़ के लिए थी, हंस के चूज़े को पालने वाली माँ यदि दूसरी प्रजाति की थी, कुछ सालों बाद जब यह चूज़ा व्यस्क हुआ, तो प्रजनन के लिए उसी प्रजाति के पक्षी को चुना जो पालने वाली माँ की प्रजाति का था, हंस नहीं।[5] यही परिणाम बाद में भेड़ में भी देखे गए, जिनका वर्णन नीचे किया गया है।

लारेंज़ ने लिखा है कि, यद्यपि अध्यंकन सीखने के अंतर्गत आता है, किन्तु इसमें अधिगम या सीखने की तरह प्रलोभन की ज़रुरत नहीं है।[5] यह जंतुओं में एक ऐसी प्रक्रिया है जो प्राकृतिक अवस्था में बच्चे का माँ से प्रगाढ़ सम्बन्ध बनाने में सहायक है और इसका दूरगामी असर होता है।

लारेंज़ की अध्यंकन की खोज तथा इथोलाजी का असर जॉन बाल्बी की सोच पर भी पड़ा।[6] इसके साथ एक महत्पूर्ण बात जो स्नेह सिद्धान्त की आधारशिला मज़बूत करने में सहायक हुई, वह थी हार्लो और बाल्बी के बीच विचारों का आदान-प्रदान। इसमें माध्यम थे इथोलाजिस्ट राबर्ट हाइंड,[7] जो उस समय इंग्लैंड में बंदरों में माँ और बच्चे के व्यवहार का अध्ययन कर रहे थे।[8] हार्लो और बाल्बी इस बात से प्रभावित थे कि नवजात शिशु के सहज व्यवहार उसे माँ से जोड़ते हैं। हार्लो ने इसे बंदर के बच्चे पर प्रयोंगो से सिद्ध किया तथा बाल्बी ने मनुष्य के बच्चों पर जानकारी इकट्ठी की और इसे वैचारिक रूप दिया।

बंदरों में बच्चे और माँ का सम्बन्ध

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हार्लो ने व्यवहारवादियों और मनोविश्लेषकों पर प्रहार करते हुए कहा, हालाँकि यह सही है कि माँ बच्चे की दूध की ज़रुरत पूरी करती है इसलिए उससे सम्बन्ध बन सकता है, परन्तु ऐसे सम्बन्ध किसी भी वस्तु से बन सकते हैं और वह जल्दी टूट भी जाते हैं।[4] इसलिए उन सहज व्यवहारों का अध्ययन होना चाहिए जो माँ को स्नेह के रिश्तों में बांधते हैं। उन्होंने आगे लिखा, क्योंकि मानव के नवजात शिशु पर इस तरह के प्रयोग नहीं हो सकते, इसलिए बंदर के बच्चों को चुना। तब तक हार्लो प्रयोगशाला में बंदर के बच्चों को ६ से १२ घंटे के भीतर माँ से अलग कर, उनको पालने में सफल हो चुके थे। नए प्रयोगों में हार्लो को, बाल्बी द्वारा मनुष्य के बच्चों में देखे गए दो सहज व्यवहार के बारे में, बंदर के बच्चों में पर्याप्त समानता मिली, जैसे, नवजात शिशु का नरम वस्तु से चिपकना तथा उसके साथ ज्यादा समय बिताना। इतना ही नहीं, हार्लो ने पाया कि लगभग ३०० दिन की उम्र के बंदर के बच्चे नरम कपड़े से लिपटी माँ का पर्याय या cloth mother surrogate को निहारने में भी ज्यादा समय देने लगे।[4] अगले कई सालों में जो प्रयोग हुए उनका सारांश मार्ग्रेट हार्लो और हैरी हार्लो ने १९६६ में एक शोध पत्र में दिया है।[9] इस शोध पत्र में उन्होंने लिखा कि काम या sex की सहज प्रवृत्ति मानव और बंदर में समूह को बांधने का आधार खो चुकी है। वह आगे लिखते हैं कि बंदर के बच्चे के सामाजिक विकास पर विस्कान्सिन विश्वविद्यालय में जो खोज हुई है उससे पांच प्रेममूलक तंत्रों या affectional systems का पता लगा, जो इन बंदरों में सामाजिक सम्बन्धों का आधार है। यह पांच प्रेममूलक तंत्र हैं—बच्चा-माँ स्नेह तंत्र; बच्चा-बच्चा स्नेह तंत्र; विषम लिंगी स्नेह तंत्र; मातृत्व स्नेह तंत्र; तथा पितृत्व स्नेह तंत्र। अंत में उन्होंने लिखा है कि यह पांच स्नेह तंत्र नर-वानर समूह या primates के विकास में महत्वपूर्ण रहे होंगे। इनसे समूह के सदस्यों में मेल-जोल बनाए रखने में मदद मिली होगी, जिससे समूह में सहयोग पनपा, बाहरी ताकतों से जूझने की क्षमता बढ़ी, और बच्चे को सीखने का वातावरण मिला। स्नेह के दूरगामी परिणामों के बारे में इससे भी और अधिक जानकारी बंदरों पर हुए उन प्रयोगों से मिली जो हैरी हार्लो और उनके साथियों ने बंदर के बच्चों को उनकी माँ से अलग कर, विस्तार में कई सालों तक देखे, जिनका वर्णन हार्लो और मीअर्स ने एक किताब में किया है,[10] तथा मनुष्य में बाल्बी ने माँ से अलगाव और माँ के विलोप का बच्चे पर असर स्नेह सिद्धांत के खण्ड-२ और खण्ड-३ में किया जिसका परिचय अगले भाग में दिया गया है।

बाल्बी का स्नेह सिद्धान्त

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डर से माँ में आश्रय लेते बच्चे

बाल्बी ने लिखा है कि स्नेह सिद्धान्त पर कार्य १९५६ में शुरू हुआ और अनेक शोधपत्रों में इससे जुडी वैज्ञानिक समस्याओं पर १९५३ से १९६३ तक विवेचना की गयी, लेकिन स्नेह सिद्धान्त का मुख्य प्रारूप स्नेह और विलोप या Attachment and Loss तीन खण्डों में—१९६९(१९९७) में खण्ड-१; १९७३ में खण्ड-२; तथा, १९७८ में खण्ड-३, छपा।[11] बाल्बी और उनकी सहयोगी एन्स्वर्थ ने इन तीन खण्डों में छपे मुख्य विचारों तथा इससे जुड़ी खोजों के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए लिखा कि वह दोनों शैक्षिक व्यवसाय में आने से पहले ही बच्चों के व्यक्तित्व के विकास में माता-पिता के योगदान पर काम कर रहे थे, विशेषकर वह बच्चे जो अकेले रह जाते हैं, जिन्हें माँ का प्रेम नहीं मिलता।[6] वह आगे लिखते हैं, कि बाल्बी का पहला अध्ययन जो ४४ यूवा चोरों पर था, पता चला कि इन बच्चों में अधिकतर ऐसे थे जिन्हें स्नेह नहीं मिला। इसके बाद विश्व स्वस्थ्य संगठन के लिए बाल्बी ने एक रिपोर्ट तैयार की, जो मातृत्व का बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य में योगदान से जुड़ी थी, और इसका मुख्य उद्देश्य बच्चे की परवरिश से स्नेह का विकास करना था।

बाल्बी के तीन खंडों में स्नेह सिद्धान्त की जो मुख्य बातें हैं, वह एन्स्वर्थ और बाल्बी के अनुसार यह हैं।[6] खण्ड-१ के पहले और दूसरे भाग में स्नेह सिद्धान्त से जुड़े उद्विकास के विचारों तथा सहज व्यवहारों के अध्ययन का विस्तार में वर्णन है। इसके अतिरिक्त स्नेह की शारीरिक आवश्यकताओं से जुड़े सिद्धान्त (भूख, प्यास, काम आदि की पूर्ती) को नकार कर, उसकी जगह ऐसे व्यवहार तंत्र तथा संचालन तंत्र जिनका कोई विशेष उद्देश्य हो, जैसे लारेंज़ का अध्यंकन और हार्लो के प्रेममूलक तंत्र। इनके अतिरिक्त, बाल्बी ने लिखा है कि मनुष्यों में, बच्चे के विकास के साथ-साथ स्नेह से जुड़े माँ एवं अन्य व्यक्तियों की छवि तथा उसका सहज व्यवहारों से सम्बन्ध आन्तरिक कार्यकारी प्रारूपों को जन्म देते हैं, जिनका स्नेह सिद्धांत में विशेष स्थान है।

खंड-१ के पांचवे भाग के आरंभ में स्नेह के विकास की चार अवस्थाएं बताई गई हैं।[11] अवस्था-१, आरंभ की इस अवस्था में नवजात बच्चा एक विशेष प्रकार से लोगों से व्यवहार करता है (पहचानता नहीं): व्यक्ति की ओर मुड़ना, आँखों से पीछा करना, पकड़ना, पहुंचना, हंसना, आदि। अवस्था-२, उपरोक्त व्यवहारों का और ज्यादा प्रयोग, परन्तु माँ की तरफ विशेष ध्यान देना। अवस्था-३, बच्चा लोगों को पहचानने लगता है, माँ को विशेष रूप से देखता है, और नए लोगों से व्यवहार अलग हो जाता है। अवस्था-४, स्नेह की वस्तु या माँ से नजदीकी सम्बन्ध, और उससे जुड़े व्यवहारों में सुधार करना।

बाल्बी के खण्ड-२ में बच्चे के उन सहज व्यवहारों पर विशेष ध्यान दिया गया है जो स्नेह की वस्तुओं से अलगाव के कारण पैदा होते हैं, और साथ में ऐसी स्थितियां जिन में स्नेह तंत्र कार्यान्वित होते हैं।[12] बाल्बी के अनुसार यह बच्चों के अलग-अलग व्यक्तित्व के विकास का आधार है, जैसे कुछ बच्चे डरपोक होगे, या कुछ में स्नेह से जुड़ी चिंता ज़्यादा होगी। इसके अतिरिक्त बच्चे के सामान्य विकास में स्नेह के मज़बूत आधार पर भी बल दिया गया है।

बाल्बी के खण्ड-३ के शुरू में संज्ञान की उन प्रक्रियाओं का वर्णन है जो सूचनाओं के अचेतन रूप से संयोजन में सहायक हैं। इनका आन्तरिक कार्यकारी प्रारूपों के विकास में विशेष महत्त्व बताया गया है।[13] इस खण्ड में मुख्य ध्यान व्यस्क व्यक्ति में शोक पर है। स्नेह की वस्तु के विलोप या चले जाने से व्यक्ति चार अवस्थाओं से गुजरेगा—सुन्नता; स्नेह की वस्तु की तरस और गुस्सा; अव्यवस्था और निराशा; तथा, पुनःसंयोजन का प्रयास और उदासी।

स्नेह सिद्धान्त का प्रसार

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स्नेह सिद्धान्त के जंतुओं में बढ़ते आधार को देखकर, एलिसन जौली लिखती है, उद्विकास की प्रक्रिया में बच्चे और माँ के बीच एक सशक्त, प्रचुर और व्यक्तिगत सम्बन्ध का चयन होता है, जिसका नाम शायद प्यार है।[14] यद्यपि हार्लो ने इन प्रेममूलक सम्बंधों को बंदर में बच्चे और माँ, तथा बाल्बी ने मनुष्य में बच्चे और उसकी देखभाल करने वाले व्यक्ति, तक सीमित रखा, पर उन्होंने, जौली कहती है, स्नेह को सामाजिक जीवन का आधार बताया। लेख के इस भाग में, हार्लो और बाल्बी के विचारों के बढ़ते आधार का अंदाज़ा, स्तनधारियों में चूहे से लेकर बंदर, और मनुष्यों में भक्त और उसके अराध्य देव के रिश्ते, पर होने वाले अध्ययनों से लग जायेगा।

स्तनधारियों में आपसी मेल-जोल

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केंडल के अनुसार मनुष्यों, और वास्तव में सभी स्तनधारियों में बच्चे के आरंभ के वातावरण का सबसे मुख्य अंग माँ है।[15] वह आगे लिखते हैं कि द्वितीय विश्व युद्ध के समय परिवार के टूटने से बच्चों का माँ-बाप से रिश्तों का अभाव, उनके विकास के लिए दुर्भाग्यपूर्ण था। केंडल लिखते हैं, हार्लो द्वारा बंदर के बच्चों पर किये गए प्रयोंगों से इस विचार को वैज्ञानिक आधार मिला, परन्तु इसमें मुख्य योगदान बाल्बी का रहा।

चूहों पर हुए प्रयोग

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सफेद चूहे (mice) के बच्चे माँ के साथ

दो महत्वपूर्ण बातें जिनकी ओर केंडल ने ध्यान दिलाया है।[15] एक, माँ-बाप अपने बच्चे के व्यवहार से संवेगात्मक रूप से जुड़े होते हैं, जिसमें मुख्य बात है बच्चे को ख़ुशी और दुःख देने वाली घटनाओं का निवारण। दो, मनुष्य और जंतुओं में पहले २-३ साल तक बच्चा नीहित स्मृति तंत्र पर निर्भर रहता है जो अचेतन होता है, उम्र बढ़ने के साथ उसमें जो परिवर्तन होते हैं वह चेतन या स्पष्ट स्मृति तंत्र बनाते हैं। यह दोनों बातें, केंडल के अनुसार, मनुष्यों और जंतुओं में स्नेह के तंत्रों के लिए महत्वपूर्ण हैं। केंडल ने बताया कि चूहे (rats and mice) में जब बच्चे को माँ से अलग किया जाता है, तो उनमें ऐसे व्यवहार देखे गए जैसे आदमी के बच्चे में माँ से अलग करने पर देखे गए, मुख्यतः पहले विरोध, और फिर उदासी की अवस्था। इसका असर हाईपोथेलेमिक-पिटयुईटेरी-एड्रिनल तंत्र में देखा गया। यह परिवर्तन ऐसी रासायनिक प्रक्रियाओं को जन्म देते हैं जो बच्चे के चेतन या स्पष्ट स्मृति तंत्र में बाधा डालती है। अर्थात यह स्मृति तंत्र या तो विकसित नहीं हो पाता, या ठीक से नियंत्रण नहीं कर पता जब भी तनाव की परिस्थिति हो।

भेड़-बकरियों के रेवड़

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नया पैदा हुआ मेमना और माँ

भेड़ और बकरियां, प्राकृतिक और पालतू दोनों अवस्थाओं, में समूह या रेवड़ में रहती हैं। मेमने का समूह के साथ लगाव हो यह मेमने और समूह दोनों के लिए ज़रूरी समझा गया है। स्मिथ ने इस लगाव या सम्बन्ध के विकास का भेड़ में अध्ययन के दौरान देखा कि मेमना जन्म के थोड़े समय बाद खड़ा होकर अपने सिर को ऐसी वस्तु के नीचे डालता है जो उसके कन्धों के बराबर है।[2] आम तौर से यह भेड़ की अगली या पिछली टांगों के बीच की जगह होती है, इसके साथ-साथ भेड़ भी मेमने का चाटती ओर सूंघती है, तथा सिर और मूंह से सहलाती है। स्मिथ ने इन व्यवहारों का वर्णन करते हुए लिखा है कि इस सम्पर्क से एक ओर माँ अपने बच्चे की छवि अपने मस्तिष्क में बनती है, दूसरी ओर मेमना का माँ से सम्बन्ध बनता है। यदि मेमने और भेड़ या बकरी के बीच यह सम्बन्ध आरम्भ में नहीं बन पाता तो भेड़ या बकरी मेमने को नकार देगी और मेमना समूह के साथ नहीं चलता। इस सम्बन्ध का दूरगामी असर भी देखा गया। आम तौर से भेड़ और बकरियां एक रेवड़ में रहती है, व्यस्क होने पर भेड़ प्रजनन के लिए भेड़ को ही चुनेगी और बकरी अपनी प्रजाति का साथी। केंड्रिक और उनके साथियों ने देखा कि, यदि पैदा होने के बाद से भेड़ के बच्चे को बकरी पाले, तथा बकरी के बच्चे को भेड़ पाले, तो व्यस्क होने पर, भेड़ जो बकरी के साथ पली है प्रजनन के लिए बकरी चुनेगी, तथा बकरी जिसे भेड़ ने पाला है प्रजनन के लिए भेड़ चुनेगी।[16] इसके अतिरिक्त केंड्रिक ने यह भी देखा कि भेड़ें अन्य भेड़ों के चेहरे, लगभग ५० तक, काफी देर तक याद रख सकती है।[17]

नर-वानर समूह

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लंगूर: माँ और बच्चा

एलिसन जौली के अनुसार नर-वानर समूह में स्नेह सम्बन्धों की निम्न मुख्य विशेषताएं हैं।[14] नर-वानर समूह की पहली विशेषता है कि बच्चा शारीरिक और संवेगात्मक रूप से माँ से जुड़ा है, और यह सम्बन्ध लेमर से लेकर मनुष्य तक और अधिक जटिल होता जाता है। माँ से बच्चे के इस सम्बन्ध का जीवन के आरंभिक काल में सामाजिक व्यवहार के प्रशिक्षण में विशेष महत्त्व है। दूसरे, जौली के अनुसार, माँ जब तक बच्चे को विशेष रूप में नहीं देखे वह ठीक से जी नहीं पायेगा, या उसके सामाजिक व्यवहार में कमी रह जाएगी। जैसे, यह ज़रूरी है कि, माँ अपने बच्चे को अपनी गोदी में बिठाए, उसे स्तनपान करने दे, उसकी सफाई करे, और उसे सहलाए और उसकी मदद करे। बच्चे के सहज व्यवहार, जैसे, चिपकना, रेंगना, जड़ता, तथा चूसना इस सम्बन्ध को मज़बूत बनाते हैं। इनके साथ-साथ कई किसम की आवाजें माँ और बच्चे को एक दूसरे की तरफ आकर्षित करती हैं। तीसरे, जौली का कहना है कि जॉन बाल्बी ने सशक्त रूप से लारेंज़ के अध्यंकन के सिद्धान्त को मानव के विकास के सन्दर्भ में रखा। यही नहीं, बाल्बी ने बच्चे को असहाय अवस्था से बाहर निकलकर उद्विकास के सन्दर्भ में देखने की पहल की। अर्थात बच्चे में ऐसे व्यवहारों का चयन हुआ जिससे वह माँ के सम्पर्क में रहे, उसे पहचाने, अजनवी से डरे, और खतरा होते ही माँ के पास जाये। चौथे, जौली का मानना है कि यह ज़रूरी नहीं कि नर-वानर समूह में बच्चा माँ के अभाव में मर जाए, बच्चे का व्यवहार समूह के अन्य सदस्यों में मातृत्व की भावना जगाने में सक्षम है। जौली का कहना है कि सामाजिक व्यवहार में एक स्तर पर यदि चूक हो जाए, उसकी भरपाई की कई संभावनाएं हैं। बच्चे के संगी-साथी और अन्य व्यस्क नर व मादा इसमें सहायता करते हैं। अंत में, जौली का मानना है कि प्राकृतिक अवस्था में ऐसी असंख्य घटनाएं घटती हैं जिनका प्रयोगशाला में अंदाजा लगाना कठिन है। यह घटनाएं बच्चे को सशक्त करती हैं, जैसे, बच्चे के बड़े होने पर, स्तनपान छुड़ाना, गोद से दूर रखना, पेड़ से कूदने में मदद, खतरे का अहसास, आदि।

व्यक्तित्व का विकास

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सुरक्षित आधार और व्यक्तित्व का विकास, राधा और कृष्ण

बाल्बी ने खण्ड-१ के अंत में कुछ बातों को रेखांकित किया है।[11] सबसे पहले, स्नेह की प्रवृत्ती और स्नेह व्यवहारों में अन्तर स्पष्ट किया। दूसरे, उन्होंने कहा बच्चे का स्नेह वस्तु के साथ व्यवहार स्नेह बन्धन का आधा भाग है। माँ का बच्चे से व्यवहार, और फिर पिता व अन्य सदस्यों का इसमें योगदान, इसे पूर्ण करता है। तीसरे, बच्चों के व्यक्तित्व में स्नेह के अनेक नमूने या प्रारूप मिलते हैं, मानसिक स्वास्थ्य में योगदान के लिए इन्हें समझना अत्यधिक ज़रूरी होगा।

बाल्बी के अनुसार स्नेह सिद्धान्त के तीनों खण्ड, वस्तु से स्नेह सम्बन्ध बनाना, स्नेह वस्तु से अलगाव, तथा स्नेह वस्तु का विलोप, संयुक्त रूप से स्नेह को समझने के लिए ज़रूरी हैं।[11] स्नेह सिद्धान्त के ऊपर जो अध्ययन हुए हैं, तेंक्रेडे और फ्रेले के अनुसार, उन में स्नेह को समग्र रूप से देखा गया है, चाहे वह बच्चे और माँ के बीच हो, व्यस्क नर और नारी में प्रेम, या भक्त और उसका अराध्य देव।[18] तेंक्रेडे और फ्रेले ने स्नेह सिद्धान्त की चार मुख्य विशेषतायें या कसौटियां बतायी, स्नेह की वस्तु से नजदीकी या proximity maintenance, स्नेह की वस्तु से अलगाव का विरोध और विरह वेदना या separation distress, स्नेह की वस्तु एक सुरक्षित आधार या secure base, तथा स्नेह की वस्तु एक सुरक्षित स्वर्ग या safe haven। परन्तु खोज के लिए इनसे जुड़े किसी एक पहलू पर ध्यान देना स्वाभाविक है, जैसे आन्तरिक कार्यकारी प्रारूप।[19][20]

बच्चे को आत्मनिर्भर बनाना

स्नेह सिद्धान्त के बारे में कुछ लोगों का विचार है कि जहाँ जॉन बाल्बी ने स्नेह को नयी सोच देकर वैज्ञानिक स्तर पर ला खड़ा किया, वहीँ एन्स्वर्थ ने इसके विचारों की पुष्टि के लिए प्रमाण एकत्र किये।[21] एन्स्वर्थ और उनके साथियों ने माँ और बच्चे के बारे में दो विधियों—गृह निरिक्षण तथा अनोखी परिस्थिति—से आंकड़े इकट्ठे किये।[6][11][22] पहली विधि में घर जाकर माँ और बच्चे के व्यवहार का अध्ययन, तथा दूसरी विधि में बच्चे को माँ से अलग कर एक कमरे में रखना और एक अजनवी महिला से मुलाकात, और फिर बच्चे का माँ से पुनर्मिलन के समय व्यवहार देखना। इस परिक्षण से बच्चों की तीन श्रेणियाँ सामने आई। सुरक्षित या secure बच्चे माँ से पुनर्मिलन के समय खुश रहते, शांत हो जाते और खेलने लगते। अन्य बच्चे दो श्रेणियों में बंट गए, एक असुरक्षित परिहारी या insecure-avoidant, जो पुनर्मिलन के समय माँ से दूसरी ओर मूंह मोड़ लेते, न कोई ख़ुशी, तथा खेल में कोई रुचि नहीं, तथा दूसरे असुरक्षित विरोधी/उभयभावी या insecure –resistant/ambivalent, जो पुनर्मिलन के समय माँ से गुस्से में रहते पर संपर्क भी करते, न कोई ख़ुशी, तथा खेल में कोई रुचि नहीं। स्टील के अनुसार पिछले ५० सालों में एन्स्वर्थ के यह तीन नमूने या श्रेणियाँ बच्चों के नैदानिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण साबित हुए हैं। उसने एक चौथे नमूने का भी उल्लेख किया, जिसमें बच्चा अपने माता-पिता के सामने सदैव असामान्य रूप से भयभीत रहता है।[23] बारथोलोमेव ने बाल्बी के स्नेह सिद्धान्त का वयस्कों में अध्ययन किया और व्यक्तित्व में स्नेह के चार प्रारूप खोजे—सुरक्षित या secure, चिंतित या preoccupied, खारिजी या dismissing, और डरपोक या fearful।[24] हालाँकि व्यक्तित्वों के इन चार प्रारूपों को लेकर कई दिशाओं में अध्ययन किये गए हैं, स्टील का कहना है कि एक नयी दिशा है पिता का बच्चे के विकास में योगदान।[23]

भक्त और उसका अराध्य देव

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विरह वेदना: कृष्ण को खोजती गोपियाँ

खोज कर्ताओं ने स्नेह बन्धन की उपरोक्त चार मुख्य कसौटियों, नजदीकी रखना, विरह वेदना, सुरक्षित आधार, तथा सुरक्षित स्वर्ग, को भक्त का उसके अराध्य देव से सम्बन्ध समझने के लिए रूपांतरण किया। उनकी अवधारणा है, जिसे सबसे पहले किर्कपेट्रिक ने विस्तार में रखा, कि भगवान से सम्बन्ध को स्नेह बन्धन मान सकते हैं।[25][26] भक्त का भगवान से सम्बन्ध अनेक रूपों में मिलेगा, बालक, प्रेमी, सखा, आश्रय देने वाला, आदि। सिसिरेली ने इन चार कसौटियों को इस प्रकार रखा, भगवान से नजदीकी सम्बन्ध बनाना, भगवान से अलगाव का दुःख, भगवान एक सुरक्षित आधार, तथा भगवान एक सुरक्षित स्वर्ग।[27] सिसिरेली आगे लिखते हैं कि किर्कपेट्रिक का मानना है कि भगवान से सम्बन्ध दो तरह से बन सकता है, एक तो वह लोग जिनका माँ से विश्वसनीय सम्बन्ध है, इसको सीधे भगवान पर स्थानांतरित कर सकते हैं, दूसरे वह लोग जिनका माँ से विश्वसनीय सम्बन्ध नहीं है, इसकी पूर्ती के लिए भगवान से नाता जोड़ेंगे। ग्रेंक्विस्ट और उनके साथियों का विचार है कि जब स्नेह तंत्र बाहरी या आतंरिक वातावरण की घटनाओं से उत्तेजित होता है तो व्यक्ति भगवान से नजदीकी ढूँढेगा या महसूस करेगा।[28]


इन्हें भी देखें

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