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सारनाथ से प्राप्त अशोक स्तम्भ पर निर्मित धर्मचक्र
थाइलैण्ड के द्वारावती की कला में धर्मचक्र


धर्मचक्र, भारतीय धर्मों (सनातन धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म आदि) में मान्य आठ मंगलों (अष्टमंगल) में से एक है। बौद्धधर्म के आदि काल से ही धर्मचक्र इसका प्रतीकचिह्न बना हुआ है। यह प्रगति और जीवन का प्रतीक भी है। बुद्ध ने सारनाथ में जो प्रथम धर्मोपदेश दिया था उसे धर्मचक्र प्रवर्तन भी कहा जाता है। पारी अखंड भारत में

अनुक्रम

इतिहाससंपादित करें

बौद्ध कथाएँ हमें बतलाती हैं कि शक्र और महाब्रह्मा की प्रार्थना को स्वीकार कर बुद्ध वज्रासन से उतर पड़े और वाराणसी की ओर चले। वहां पर सारनाथ में, जिसे उस समय इसिपतन कहते थे, उन्हें उनके पुराने पांच साथी मिल जो आगे चल कर 'पंच भद्रवर्गीय भिक्षु' कहलाये। इन भिक्षुओं को उन्होंने सर्वप्रथम 'बहुजनहिताय बहुजनसुखाय' अपना अमूल्य उपदेश दिया और इस प्रकार अपने धर्मचक्र को गति दी।

रुपकात्मक भाषा का प्रयोग करते हुए ललितविस्तर बतलाता है कि इस प्रकार बारह तिल्लियों वाले, तीन रत्नों से सुशोभित धर्मचक्र को कौडिन्य, पंच भद्रवर्गीय, छह करोड़ देवता तथा अन्यान्य लोगों के सम्मुख भगवान बुद्ध द्वारा चलाया गया।

महत्व एवं प्रतीकसंपादित करें

 
धर्मचक्र का एक सरलीकृत रूप

धम्मचक्र के आठ पहिये तथागत बुद्ध के बताए हुए अष्टांगिक मार्ग को दर्शाते है।

  • सिक्किम के राष्ट्रीय-ध्वज में धर्मचक्र का एक विशेष रूप स्वीकार किया गया है।
  • यूनिकोड में धर्मचक्र के लिये एक संकेत प्रदान किया गया है और उसका यूनिकोड है - U+2638 (☸).

विविध प्रसंगों में धर्मचक्रसंपादित करें

सनातन धर्म मेंसंपादित करें

 
सुदर्शन चक्र धारी विष्णु

पुराणों के अनुसार केवल २४ ऋषि ही गायत्री की सम्पूर्ण शक्ति को प्राप्त कर सके। गायत्री मन्त्र के २४ वर्ण इन २४ ऋषियों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

महात्मा बुद्ध ने अपने शिष्यों (सन्तों) के लिए २४ गुण बताए जो अशोक चक्र के २४ तिल्लियों के रूप में निरूपित किये गये हैं।

  1. अनुराग
  2. पराक्रम
  3. धैर्य
  4. शान्ति
  5. महानुभावत्व
  6. प्रशस्तत्व
  7. श्रद्धान
  8. अपीदान
  9. निःसंग
  10. आत्मनियन्त्रण
  11. आत्माहवान
  12. सत्यवादिता
  13. धार्मिकत्व
  14. न्याय
  15. अनृशंस्य
  16. छाया (Gracefulness)
  17. अमानिता (Humility)
  18. प्रभुभक्ति (Loyalty)
  19. करुणावेदिता (Sympathy)
  20. आध्यात्मिकज्ञान (Spiritual Knowledge)
  21. महोपेक्षा (Forgiveness)
  22. अकल्कता(Honesty)
  23. अनादित्व (Eternity)
  24. अपेक्षा (Hope)

भगवद्गीता के श्लोकों में भी चक्र का उल्लेख हुआ है ( अध्याय ३ के श्लोक संख्या 14, 15 और 16 में )।

चित्रदीर्घासंपादित करें

इन्हें भी देखेंसंपादित करें