पंचमकार

तांत्रिक परिभाषा
(पंच मकार से अनुप्रेषित)

पंचमकार तंत्र से सम्बन्धित शब्द है जिसका अर्थ ' से आरम्भ होने वाली पाँच वस्तुएँ' है, ये पाँच वस्तुएँ तांत्रिक साधना में उपयोग में लायी जाती हैं-

तंत्र क्रिया सदेव ही प्रकृति के नियमों के अनुरूप चलती है। यह पूरा संसार ही एक तांत्रिक क्रिया है। तांत्रिक क्रिया पञ्च मकार से मिल कर ही पूरी होती है। पञ्च मकार यानि तंत्र क्रिया के पाँच स्तम्भ। मॉस, मतस्य, मुद्रा, मदिरा और मैथुन तांत्रिक क्रिया के पञ्च मकार हैं। तथा बिना इन पञ्च मकार के सम्मिलन से श्रृष्टि में जीवन का सञ्चालन असंभव है। मॉस: इस श्रृष्टि में प्राणी का जनम ही मॉस के लोथडे के रूप में हुआ है। ऐसा कोई भी प्राणी नही है जो पञ्च मकर के प्रथम " म" मॉस से वंचित रह कर जीवन यापन कर सके। मॉस के रूप में ही मनुष्य एवं जीवों की अपने माँ के गर्भ से उत्पत्ति हुई है। हर प्राणी किसी न किसी प्रकार मॉस का उपयोग अपने दैनिक क्रिया में करता है। चाहे वह भोजन में मॉस का लेना हो या फ़िर किसी को छूना, देखना या महसूस करना सभी में मॉस की प्राथमिकता है। जब माँ के गर्भ में जीवन का विकास होता है तब उसका सबसे पहला वजूद मॉस के रूप में ही होता है। इस से सिद्ध होता है की जीवन की शुरुवात ही पञ्च मकार के प्रथम " म " से होती है।

मतस्य: मतस्य का शाब्दिक अर्थ मछली से होता है। परन्तु तंत्र क्रिया में अथवा पञ्च मकार में मतस्य का मतलब चंचलता या गति से होता है। जिस प्रकार मछली अपने जीवनपर्यंत गतिमान रहती है और पानी के विपरीत दिशा में तैरते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करती है उसी प्रकार तंत्र साधना के अनुसार बिना गति के कोई भी जीव इस संसार में रह नही सकता। पञ्च मकार के मॉस गुण के प्राणी में आने के बाद मतस्य गुण का होना एक मॉस को गति प्रदान करता है। पञ्च मकार के दुसरे मकार " मतस्य" से ही संसार में जीवो को हमेशा आगे बढ़ने की इक्षा मिलती हैं । मतस्य गुण ही व्यक्ति को नए कार्यो के प्रति प्रगतिशील बनता है।

मुद्रा: तंत्र में मुद्रा के दो रूप हैं। १> मुद्रा यानी किसी प्रकार की क्रिया जो व्यक्त की जा सके। जैसे योनी मुद्रा, लिंग मुद्रा, ज्ञान मुद्रा। २> मुद्रा का मतलब खाद्य पदार्थ से भी है। जैसे चावल के पिण्ड पञ्च मकार के मॉस, मतस्य गुण धारण करने के बाद जीव में सही मुद्रा (क्रिया) के ज्ञान का होना अति आवश्यक है। और सही क्रिया को करने के लिए सही मुद्रा ( खाद्द्य पदार्थ ) की भी आवश्यकता है। जब गर्भ में जीव गति प्राप्त कर लेता है तब वह अपने हाथ और पैर को अपने गर्दन के चारो और बाँध कर एक मुद्रा धारण करता है। जैसे ही वह अपनी माता द्वारा ग्रहण किया गया भोजन को अपना आहार बनाता है, उसके हाथ पैर में गति आ जाती है। यह पञ्च मकार के तीसरे " म " का श्रेष्ठ उदहारण है।

मदिरा : तंत्र में मदिरा का अर्थ "नशा" है। आम मनुष्य मदिरा पीने वाले नशे को ही तंत्र से जोड़ते हैं। परन्तु सही मायने में पञ्च मकार में मदिरा रुपी नशे को किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए होने वाली लगन को कहते हैं। इश्वर की भक्ति को प्राप्त करने का नशा ही तांत्रिक को कठिन से कठिन साधना पूरा करने के लिए प्रेरित करता है। जीव को आगे बढ़ने के लिए स्वयं में मदिरा गुण को लाना अति आवश्यक है। पञ्च मकार के यह चारों गुन जब साथ मिलते हैं तो वह जीव मॉस (शरीर ), मतस्य (गति),मुद्रा (क्रिया,आहार )और मदिरा (नशा) के आने के बाद अपने जीवन में कोई भी लक्ष्य प्राप्त कर सकता है। जब बालक अपने माँ के गर्भ में बड़ा हो रहा होता है तो वह समय उसके लिए बहुत कष्टकारी होता है। माँ के द्वारा ग्रहण किया गया भोजन उसकी कोमल त्वचा को चोट पहुचाता है। गति आने के बाद और माँ से आहार मिलने के बाद वह जीव स्वयं को इस कष्ट से निकलने के लिए इश्वर से प्राथना करता है। उसके अन्दर मदिरा गुण का प्रवेश होते ही वह अपने कष्ट को दूर करने के लिए इश्वर की प्रार्थना में ली

मैथुन:मैथुन का अर्थ है "मथना " तंत्र में मैथुन का बहुत महत्त्व है। परन्तु इसे किस प्रकार अपने जीवन में अपनाना है वह जानना बहुत जरुरी है। अधिकतर लोगों को तंत्र के बारे में यह भ्रान्ति है की यहाँ तांत्रिक को मैथुन करने की छुट है। मैं यहाँ पञ्च मकार के इस पांचवे और बहुत ही महत्व्य्पूर्ण " म " के बारे में बताना चाहता हूँ। तंत्र में यह कहा गया है की इस संसार में पाई जाने वाली हर वस्तु को यदि सही प्रकार से मथा जाए तो एक नई वस्तु का जनम होता है। जिसका उदहारण हमारे शाश्त्रो में समुन्द्र मंथन से दिया गया है। समुन्द्र मंथन के समय सागर के मंथन से विभिन्न प्रकार की वस्तुओं की जनम हुआ था जिसमे विष और अमृत की उल्लेख प्रमुख्य है। गृहस्त जीवन में भी जब एक पुरूष अपनी स्त्री के साथ मैथुन करता है, अपने वीर्य को स्त्री के बीज के साथ मंथन करता है तो एक बालक के रूप में नए जीवन की निर्माण होता है। इसलिए मैथुन करने से तंत्र में कुछ नया निर्माण करने की बात कही गई है। जब एक तांत्रिक मैथुन करता है तब वह स्वयं अपने शरीर (ब्र्ह्म/ शिव ) तथा अपनी आत्मा ( शक्ति / शिवा) का मंथन करता है। तथा उस मंथन को सही ढंग से करने के उपरांत ही इश्वर को पाने के नए नए रास्तो की निर्माण करता है।