मलयालम साहित्य का इतिहास

इसमें मलयालम में लिखी जाने वाली उन साहित्यिक ग्रंथों, भारतीय राज्य केरल में बोली जाने वाली एक दक्

मलयालम साहित्य का इतिहास शीर्षक पुस्तक के लिए मलयालम साहित्य का इतिहास:परमेश्वरम नायर देखें।


मलयालम् भाषा अथवा उसके साहित्य की उत्पत्ति के संबंध में सही और विश्वसनीय प्रमाण प्राप्त नहीं हैं। फिर भी मलयालम् साहित्य की प्राचीनता लगभग एक हजार वर्ष तक की मानी गई हैं। भाषा के संबंध में हम केवल इस निष्कर्ष पर ही पहुँच सके हैं कि यह भाषा संस्कृतजन्य नहीं है - यह द्रविड़ परिवार की ही सदस्या है। परंतु यह अभी तक विवादास्पद है कि यह तमिल से अलग हुई उसकी एक शाखा है, अथवा मूल द्रविड़ भाषा से विकसित अन्य दक्षिणी भाषाओं की तरह अपना अस्तित्व अलग रखनेवाली कोई भाषा है। अर्थात् समस्या यही है कि तमिल और मलयालम् का रिश्ता माँ-बेटी का है या बहन-बहन का। अनुसंधान द्वारा इस पहेली का हल ढूँढने का कार्य भाषा-वैज्ञानिकों का है और वे ही इस गुत्थी को सुलझा सकते हैं। जो भी हो, इस बात में संदेह नहीं है कि मलयालम् का साहित्य केवल उसी समय पल्लवित होने लगा था जबकि तमिल का साहित्य फल फूल चुका था। संस्कृत साहित्य की ही भाँति तमिल साहित्य को भी हम मलयालम् की प्यास बुझानेवाली स्त्रोतस्विनी कह सकते हैं।

सन् 3100 ईसापूर्व से लेकर 100 ईसापूर्व तक यह प्राचीन तमिळ का एक स्थानीय रूप थी। ईसा पूर्व प्रथम सदी से इसपर संस्कृत का प्रभाव हुआ। तीसरी सदी से लेकर पन्द्रहवीं सदी के मध्य तक मलयालम का मध्यकाल माना जाता है। इस काल में जैनियों ने भी भाषा को प्रभावित किया। आधुनिक काल में सन् 1795 में परिवर्तन आया जब इस राज्य पर अंग्रेजी शासन पूर्णरूपेण स्थापित हो गया।

रामचरितम् काव्य

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मलयालम् साहित्य के इतिहास का प्रभात गीतों से गुजायमान है। इनमें भक्ति, वीररस और हास्यरस के गीतों के साथ साथ प्रौढ़ काव्य भी विद्यमान हैं। इस प्रौढ़ रचनाओं में "रामचरितम्" का स्थान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। इसकी भाषा तमिल के इतने निकट है कि चंद तमिल विद्वान् इसे तमिल की रचना समझ बैठे, परंतु आज यह निस्संदेह सिद्ध हो चुका है कि रामचरितम् मलयालम् काव्य है और उसका रचयिता भी केरलवासी है। इसकी विषयवस्तु रामायण के लंकाकांड की कथा है। केरल के चीरामन नामक कवि ने इसकी रचना की है। अनुसंधानकर्ताओं का यही मत है कि रामचरितम् का रचनाकाल 13वीं शताब्दी है।

पहली से आठवीं सदी ईसवी तक की अवधि में चेर राज्य में, जो आगे चलकर केरल बना, अनेक सुप्रसिद्ध तमिल रचनाओं का जन्म हुआ है। "चिलप्पतिकारम्" इत्यादि उच्च कोटि के काव्यों का उदाहरण हम ले सकते हैं। परंतु रामचरितम् को इस कोटि में, अर्थात् केरलवासी द्वारा रचित तमिल रचनाओं में गिनना भ्रामक होगा। रामचरितम् की रचना उस काल में हुई थी जब संस्कृत का प्रसार केरल में जम चुका था और मणिप्रवालम् नामक मिश्र भाषा विकसित हो रही थी। रामचरितम् में संस्कृत के तत्सम एवं तद्भव शब्दों का प्रयोग प्रचुर मात्रा में मिलता है। परंतु द्रविड़ अक्षरों द्वारा लिखे जाने के कारण इनके रूपों में थोड़ा परिवर्तन आया है।

मणिप्रवाल साहित्य

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सातवीं सदी ईसवी से लेकर आगे कुछ समय तक केरल के सांस्कृतिक क्षेत्र में आर्यवंशज नंपूतिरियों का काफी प्रभाव रहा। अधिकतर अनुसंधाताओं का यही मत है कि वे बहुत पहले ही केरल में आ चुके थे। इन्हीं के प्रभाव से केरल में मणिप्रवालम् नामक मिश्र भाषा का विकास हुआ। 10वीं और 15वीं सदी ईसवी के मध्य मणिप्रवाल साहित्य की अत्यधिक पुष्टि हुई। इसी मणिप्रवाल के माध्यम से संस्कृत के अनेक काव्यरूपों का संक्रमण मलयालम् में हुआ। चंपू काव्य, संदेश काव्य इत्यादि का उदाहरण हम ले सकते हैं। "उण्णियच्ची चरितम", उण्णिच्चिरुतेवीचरितम्" और उण्णियाटी "चरितम्" प्राचीन मणिप्रवाल चंपू हैं। उण्णियच्ची चरितम् का रचनाकाल 14वीं सदी का पूर्वार्ध है। उण्णियाटीचरितम् 1350 ई॰ के आसपस लिखा गया और उसका रचयिता है दामोदर चाक्यार। उण्णियच्ची चरितम् का रचयिता तेवन चिरिकुमान नामक कवि माना जाता है। उण्णिच्चिरुतेवी चरितम्को इन्हीं का समकालीन माना जाता है। परंतु यह किस कवि की रचना है, इस संबंध में कोई जानकारी नहीं है। जैसा इनके नामों से विदित होता है, इनकी विषयवस्तु कुछ विख्यात सुंदरियों की प्रशस्ति है।

संदेश काव्यों में "उष्ण्णुनीलीसंदेशम्" और "कोकसंदेशम्" महत्वपूर्ण हैं। ऐसा माना जाता है कि दोनों का रचनाकाल 14वीं शताब्दी है। इनके रचयिता कवियों के संबंध में कुछ पता नहीं है।

10वीं और 15वीं सदियों के बीच कुछ लघु मणिप्रवाल कृतियों की भी रचना हुई। इनमें से अधिकतर कुछ विलासवती सुंदरियों से संबद्ध श्रृंगारस की रचनाएँ हैं। इलयच्चि, चेरियच्चि, उत्तराचंद्रिका, कौणोत्तरा, मल्लीनिलाव, मारलेखा इत्यादि नायिकाओं का वर्णन इनमें सम्मिलित है, "वैशिकतंत्रम्" एक वैश्यापुत्री को दिए गए कुलधर्मोंपदेश का संग्रह है; इसका रचनाकाल संभवत: 11वीं शताब्दी है। भक्तिप्रधान रचनाएँ भी मणिप्रवाल साहित्य में मिलती हैं। अनंतपुरवर्णनम्, श्रीकृष्णस्तवम्, दशावतारचरितम् इत्यादि इनके उदाहरण हैं। "चंद्रोत्सवम् 15वीं सदी के एक अज्ञातनामा कवि की रचना है। "मेदिनीवेण्णिलाव" नामक गणिका द्वारा मनाए गए चंद्रोत्सव का वर्णन इसकी विषयवस्तु है।

मणिप्रवाल साहित्य के प्रसार ने उस भाषारूप के व्याकरण नियमों एवं साहित्यिक लक्षणों का विवरण देनेवाले एक शास्त्रग्रंथ की रचना की प्रेरणा दी। इस ग्रंथ का नाम है "लीलातिकम्"। यह अनुमान किया जा सकता है कि "लीलातिलकम्" 14वीं सदी में लिखा गया है।

यदि एक तरफ मणिप्रवाल साहित्य का विकास होता गया तो दूसरी तरफ "पाट्टु" (गीत) नामक काव्यशाखा की भी वृद्धि होती गई। जैसा ऊपर कहा गया है, इस शाखा में धार्मिक एवं खेती और अन्य पेशों से संबद्ध अनेक लोकगीत हैं। तोरम् पाट्टु (अवतारगीत--कालीस्तुति), सर्पम् पाट्टु (सर्पस्तुति गीत), अय्यप्प, पाट्टु (अय्यप्प देवता का स्तुतिगीत) इत्यादि का संबंध आचार मर्यादाओं और धार्मिक विषयों से है। कृषिप्पाट्टु (कृषि-गीत), आररुपाट्टु (धान के पौधे लगाते वक्त गाया जानेवाला गीत), वल्लप्पाट्टु (नौका गीत) इत्यादि दूसरे वर्ग में आते हैं। इन गीतों के मूल घटक हैं--स्वर, ताल और लय।

प्रौढ़ गीत लोकगीतों से भिन्न हैं। उपरिलिखित "रामचरितम्" ही इस विभाग में सर्वप्रथम उल्लेखनीय है। लीलातिलकम् में प्रौढ़ पाट्टु काव्य के लिये दी गई परिभाषा इसमें ठीक बैठती है। बाद में लिखे गए "निरणम्" गीतों में प्रयुक्त शब्द केवल द्राविड़ अक्षरों के बने हुए नहीं हैं। इनमें ऐसे संस्कृत पदों की भरमार है जिनसे यह पता चलता है कि संस्कृत के अक्षरों का पर्याप्त प्रचार इस समय तक हो चुका था। इस मत को मान्यता मिली है कि निरणम् गीत 14वीं सदी के उत्तरार्ध और 15वीं सदी के पूर्वार्ध के बीच लिखे गए हैं। रामचरितम् और निरणम् गीतों के कालों में एक या डेढ़ शताब्दियों से अधिक का अंतर नहीं है। फिर भी इन दोनों के बीच का भाषा संबंधी अंतर अत्यधिक स्पष्ट है। इससे यह अनुमान होता है कि यद्यपि रामचरितम् के समय में मणिप्रवाल विकसित हो चुका था तथापि इस काव्य में जान बूझकर केवल तमिल के अक्षरों द्वारा लिखे जाने योग्य पदावली का प्रयोग किया गया था।

निरणम् कवि तीन हैं--माधव पणिक्कर, शंकर पणिक्कर और राम पणिक्कर। माधव पणिक्कर द्वारा अनुदित भगवद्गीता ने भाषा को गौरवान्वित किया--भारत की प्रादेशिक भाषाओं में रचित गीतानुवादों में यही सर्वप्रथम और सर्वप्रमुख हे। इसमें सात सौ श्लोकों का भाषांतरण 328 गीतों में हुआ है। गीता का आशयगांभीर्य और महत्ता का अनुवाद में लेशमात्र भी लोप नहीं हुआ है। शंकर पणिक्कर की रचना "भारतमाला" नामक गानकाव्य है। राम पणिक्कर ने रामायण, भारत और भागवत का संक्षिप्त अनुवाद किया। यह कथन गलत नहीं होगा कि मलयालम् को अपने पाँव पर खड़े होने का बल प्रदान करनेवाले इसी कवि को भाषा का पिता माना जा सकता है--यद्यपि इतिहासकारों की दृष्टि में तुंचत्त एषुत्तच्दन इस उपाधि के अधिकारी हैं; मेरे विचार में कण्णश्शन् के नाम से विख्यात इस राम कवि को उपर्युक्त पदवी प्रदान करने में एषुत्तच्छन को हर्ष ही होगा, क्योंकि एषुत्तच्छन के आचार्यपद के भी वे पात्र हैं।

उपर्युक्त सारे काव्य पुराणकथाओं के पुनराख्यान हैं। परंतु पंद्रहवीं शताब्दी में आविर्भूत "कृष्णगाथा" केवल पुराण का पुनराख्यान मात्र नहीं है। इसमें भागवत के दशम स्कंध में वर्णित कृष्णगाथा का अन्वाख्यान इस प्रकार साबित हुआ है कि संस्कृत महाकाव्यों का रूपशिल्प मंजरी छंद में--जो द्राविड छंदों के परिणत प्रकारों में से एक है--अवतरित हुआ है। अत: कृष्णगाथा को मलयालम् का सर्वप्रथम स्वतंत्र महाकाव्य मान सकते हैं। ऋतुओं के कवि के नाम से प्रख्यात कृष्णगाथाकार ने प्रकृतिवर्णनों द्वारा नूतन सौंदर्य प्रपंचों का साक्षात्कार कराया। सुरीली गानविधा, ललित और कोमल पदावली, चिरनूतन कल्पनाएँ--इनके कारण कृष्णगाथा एक सम्मोहनकारी रचना बन गई है।

प्रसिद्ध कवि एषुत्तच्छन्

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देखें - तुंचत्तु रामानुजन एषुत्तच्छन

 
तुंचत्तु रामानुजन एषुत्तच्छन

पाट्टु शाखा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण विभाग "किलिप्पाट्टु" है। तुँचत्त एषुत्तच्छन को इस विधा का संस्थापक मानते हैं। इसमें "किलि" अर्थात् तोते की जबानी कथाख्यान होता है, इसलिए इसे किलिप्पाट्टु कहते हैं। एषुत्तच्छन् का काल 16वीं शताब्दी का पूर्वार्ध है। इस जमाने में केरल एक प्रकार की राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक शिथिलता का अनुभव कर रहा था। इस अध:पतन से केरल का अभ्युत्थान कराने के हेतु अवतरित दिव्य पुरुष के रूप में ही केरल की जनता आज भी एषुत्तच्छन् को मानती है। उन्होंने भक्ति के उद्बोधन से जनता को प्रबुद्ध किया। नामदेव, कबीर, चैतन्य, सूरदास, तुलसीदास, माणिक्कवाचकर, कंपर इत्यादि भक्त कवियों से भास्वर नभोमंडल में केरल की दिशा से उदित तारक एषुत्तच्छन हैं। उन सबकी भाँति एषुत्तछन् भी जनता को जाग्रत एवं उद्बुद्ध करने में सफल हुए। रामायण, भारत और भागवत, इन तीनों के संक्षिप्त अनुवाद के माध्यम से एषुत्तच्छन् ने समस्त केरलवासियों के हृदयों में सीधे प्रवेश पाया। केरली को एक नूतन गारिमा, गंभीरता, शालीनता और स्वावलंबन प्राप्त हुआ। इसी अर्थ में एषुत्तच्छन् को मलयालम् साहित्य का पिता मानते हैं। वे ही ऐसे कवि हैं जो झोपड़ियों और महलों में समान रूप से समादृत हैं।

पाट्टु विभाग में दूसरा भक्तिप्रधान गानकाव्य "पूंतानम्" की "ज्ञानप्पाना" है। पूंतानम् के अन्य स्तोत्र भी ललित, कोमल और भक्तिसुधा से ओतप्रोत है।

इस विभाग की अन्य उल्लेखनीय रचनाएँ कुछ लोकगीत और "वटक्कन पाट्टु" (उत्तरी गीत) तथा "तेक्कन पाट्ट" (दक्षिणी गीत) के नामों से विख्यात कुछ आख्यानात्मक गान काव्य हैं। जैसा नामों से विदित होता है, ये गीत क्रमश: उत्तर और दक्षिण केरल की वीरगाथाएँ हैं। उत्तरी गीतों की भाषा आधुनिक मलयालम् से मिलती जुलती है, परंतु दक्षिणी गीतों में भाषा का तमिल से सामीप्य अधिक है। 16 वीं और 18 वीं सदियों बीच रचे गए दक्षिणी गीतों में तमिल का प्रभाव संभवत: दक्षिण केरल के तमिल प्रदेशों के साथ निकट संपर्क को ही सूचित करता है, न कि भाषा के स्वतंत्र विकास के अभाव को। दक्षिण के कवि द्विभाषा (तमिन और मलयालम्) के विद्वान् थे।

मणिप्रवाल आंदोलन के अंतर्गत चंपू काव्यों का दूसरा चरण 15वीं शताब्दी में पुन: दर्शनीय है। यद्यपि इस काल में तीन सौ से भी अधिक चंपू काव्य रचे गए तो भी इनमें पुनम् नंपूतिरि का रामायण और मषमंगलम् नारायणन् नंपूतिरि का भाषानैषध इत्यादि चंपू ही विशेष ध्यान देने योग्य हैं। पूनम् का काल 15वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में अथवा 16वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में होना चाहिए। नैषधचंपूकार का काल 16वीं शताब्दी का मध्य है। यद्यपि विकासक्रम के अनुसार उत्तम मणिप्रवाल में मलयालम् की ही प्रमुखता होनी चाहिए थी, फिर भी इन चंपुओं में संस्कृतप्रधान भाषा ही अपनाई गई है। ऐसी स्थिति पैदा हुई कि अधिकांश चंपुओं को समझने के लिये संस्कृत का ज्ञान अनिवार्य हो गया। इस कारण मणिप्रवाल साहित्य सामान्य जनता से दूर होता गया।

नृत्यकलारूप : कृष्णनाट्टम, रामनाट्टम

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आट्टक्कथा नृत्यकला से संबद्ध साहित्य विभाग है। इस कलारूप का नाम "कथकली" है। आट्टक्कथा मलयालम् की एक विपुल साहित्यशाखा है। आज कथकली को अतंरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त है। इस कलारूप को यह स्थिति प्रदान करने में इसके आधारभूत साहित्य ने महान योगदान दिया है।

17 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में कोषिक्कोट के मानवेद राजा ने "कृष्णगीति" नामक संस्कृत काव्य की रचना की। इसके आधार पर "कृष्णनाट्टम्" नामक नृत्यकला का भी आविर्भाव हुआ। इसमें श्रीकृष्ण की कथा का आठ दिनों में अभिनय करने की योजना बनाई गई।

कृष्णनाट्टम् की देखा देखी "रामनाट्टम्" नामक दूसरे नृत्यकला-रूप का भी आविष्कार किया गया। इस कला-रूप के आधारभूत साहित्य में रामकथा को आठ रात में खेलने योग्य खंडों में विभक्त किया गया। इसके रचयिता कोट्टारक्करा के राजा है। इनके जीवकाल के संबंध में दो मत हैं। कुछ लोग इन्हें सत्रहवीं शताब्दी के मानते है, दूसरे 15-16वीं शताब्दी के। रामनाट्टम् में आज की कथकली का प्राग्रूप दर्शनीय हैं।

कोट्टयम् के राजा ने, जिनका जीवनकाल 17वीं सदी का अंतिम चरण माना जाता है, रामनाट्टम का संशोधन और परिष्करण करके कथकली के आधुनिक रूप का विकास किया। इनकी रचनाएँ चार हैं--सभी महाभारत के उपाख्यानों पर आधारित हैं। कार्तिक तिरुनाल, अश्ववति तिरुनाल् (अर्थात् इन नक्षत्रों के दिन जात) इत्यादि राजाओं ने भी आट्टक्कथाओं में सर्वोत्तम कृति उण्णायि वारियर रचित "नलचरितम्" है। नलचरितम् चार रातों में अभिनेय है। कुछ विद्वान् उण्णायि वारियर को 16वीं शताब्दी के अंतिम और 17वीं शताब्दी के प्रथम पाद का मानते हैं तो दूसरे 17वीं 18वीं सदियों के अँत्य आद्य पाद के। इस प्रतिभावान् कवि ने आट्टक्कथाओं के लिये एक अमोध पथ का उद्घाटन किया। उच्छृंखल पद-योजन-शैली, अचुंबित कल्पनावैभव और गंभीर जीवन-दर्शन-पटुता से यह कवि अनुगृहीत है।

"गिरिजाकल्याणम्" नामक गीत प्रबंध को भी कुछ विद्वान् उण्णायि वारियर रचित मानते हैं। इसकी रचना किलिप्पाट्टु के छंदों में अनुप्रासयुक्त शैली में हुई है।

तुल्ललू साहित्य उद्भावक कुंचन नंप्यार

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18वीं सदी के ऊषाकाल में एक महान तेज:पुंज का उदय हुआ--तुल्लल्-साहित्य के उपज्ञाता कुंचन नंप्यार का। संभव है, तुल्लल् जैसे कलारूप पहले भी रहे हों। परंतु इसमें संदेह नहीं कि इसी प्रतिभाशाली कवि ने तुल्लल् को एक आंदोलन के रूप में विकसित किया। एक प्रकार से तुल्लल् को नृत्यात्मक एकाभिनय कह सकते हैं। तुल्लल् गीत इसका आधारस्वरूप साहित्य है। नंप्यार ने तुल्लल् गीतों के कथानक के रूप में पुराणों के उपाख्यान ही लिए हैं। फिर भी वर्णनों में आनेवाला वातावरण पौराणिक न होकर केरल के समसामयिक जनजीवन से मेल खानेवाला है। नंप्यार ने पौराणिक इतिवृत्तों के माध्यम से तत्कालीन जीवन की वैयक्तिक और सामाजिक विकलाताओं पर तीखे व्यंगबाण चलाए हैं। इनके इस परिहास की तेज धार का लक्ष्य समाजशरीर के व्रणों की चीर फाड़ करना था। तुल्लल् साहित्य में सटायर विधा का अत्यधिक संपन्न काव्यालोक दर्शनीय है। इस विषय में कोई भी इनके समक्ष नहीं आता, न इनके पहले, न बाद में। यदि परिहास को सफल बनाना है तो सूक्ष्म, निर्मम और व्यापक मर्मबोध अपेक्षित है। यह सिद्धि प्रचुर मात्रा में होने के कारण नंप्यार का हास्य आदर्श है। उनके हास्य और मर्मोक्तियों में विद्वेष की ज्वाला नहीं चुभती, वरन् हार्दिक सहानुभूति और मानव प्रेम का चैतन्य ही स्फुरित होता है।

पाट्टु शाखा की एक अन्य महत्वपूर्ण रचना 18वीं सदी के पूर्वार्ध (1703-1763) के कवि रामपुरम् वारियर का "कुचेलवृत्तम" वंचिप्पाट्टु (नोकागीत) है। शुरू शुरू में मलयालम् में गद्य साहित्य की खास प्रगति नहीं हुई थी। 10वीं या 11वीं शताब्दी में लिखित "भाषाकौटलीयम्" कूटियाट्टम् के अभिनय के लिये दिग्दर्शन देनेवाली "आट्टप्रकारम्" नामक ग्रंथपरंपरा, 14वीं शताब्दी का "दूतवाक्यम्" गद्य, उसी शताब्दी का "ब्रह्मांडपुराणम्" गद्य, "अंबरीषचरितम्", "देवीभागवतम्" इत्यादि गद्य--इन सभी को गद्य साहित्य के लिये प्राचीन काल की देन मान सकते हैं। तद्देशीय ईसाई धर्मप्रचारकों ने कुछ गद्य ग्रंथ 16वीं, 17वीं तथा 18वीं सदियों में लिख हैं। इनमें "संक्षेप वेदार्थम्" "वेदतर्कम्" इत्यादि सम्मिलित हैं। "वर्तमानप्पुस्तकम्" सर्वप्रथम यात्रासाहित्य (18वीं सदी का अंत) है।

कुंचन नंप्यार के बाद कुछ समय तक की अवधि मलयालम् के लिये अंधकारमय है। करीब आधी शताब्दी तक को इस अवधि में किसी ज्योति का उदय नहीं हुआ। बाद में स्वाति तिरुनाल (राजा) के युग का सुप्रभात हुआ। इरयिम्मन तंपि (1783-1856) किलिमानूर कोयित्तंपुरान इत्यादि आट्टक्कथाकारों ने स्वातितिरुनाल् का प्रश्रय पाया। स्वाति तिरुनाल स्वयं कवि थे और उन्होंने हिंदी में भी गीत लिखे थे।

नाटक, महाकाव्य, तथा उपन्यास

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इसके बाद केरल वर्मा कोयित्तपुरान के काल (1845) से मलयालम् साहित्य के आधुनिक युग का प्रारंभ हो जाता है। साहित्यसार्वभौम की उपाधि से विभूषित इस प्रतिभाशाली लेखक के नेतृत्व में साहित्य में एक नवजागरण आ गया। "मयूरसंदेशम्" नामक संदेश काव्य, "शाकुंतलम्" नाटक का अनुवाद और अकबर नामक उपन्यास उनकी रचनाओं में मुख्य हैं। उनके शाकुंतल अनुवाद के साथ मलयालम् में संस्कृत नाटकों के अनुवादों की बाढ़ सी आई। चात्तुक्कुट्टि मन्नाटियार, कुंजिक्कुट्टन तंपुरान, कोट्टारत्तिल शंकुण्णि इत्यादि ने इस शाखा की पुष्टि की। संस्कृति नाटकों की ही तरह के स्वतंत्र मलयालम् नाटक भी लिखे गए। केरल वर्मा के भागिनेय राजराज वर्मा ने भी कालिदास आदि के ग्रंथों को अनुवाद किया। इन्हीं राजराज वर्मा ने मलयालम् को "केरलपाणिनीयम्" नामक व्याकरण ग्रंथ और "वृत्तमंजरी" नामक छंदशास्त्र ग्रंथ प्रदान किया था। ये भी अपने मातुल की तरह सबके लिये प्रेरणास्त्रोत और मार्गदर्शक रहे। इस जमाने में द्वितीयाक्षर प्राप्त (श्लोक की प्रत्येक पंक्ति के दूसरे अक्षर में आवर्तित होनेवाला अनुप्रास) के पक्षपातियों और विरोधियों में जो घोर विवाद छिड़ गया था उसके प्रवर्तक क्रमश: ये मातुल भागिनेय थे। इस विवाद में स्वच्छंदतावाद के "रूप से भाव की ओर" वाले आह्वान की पहली गूँज सुनाई देती हैं।

इसी अवधि में संस्कृत के महाकाव्यों के अनुकरणों के रूप के मलयालम् महाकाव्यों की रचना हुई थी। कृष्णगाथा के बाद मणिप्रवाल में एक महाकाव्य--"श्रीकृष्णचरितम्"—की रचना हुई (अधिकांश विद्वान् इसे कुंचन नंप्यार की रचना मानते हैं)। इस महाकाव्य के बाद अनुकरणात्मक महाकाव्यों के युग का आरंभ होने तक कम से कम एक शताब्दी बीती होगी। अषकत्त पद्मनाभ कुरुप का "रामचंद्रविलासम्", पंतलम् केरल वर्मा का "रुग्मांगदचरितम्" और "विजयोदयम्", उल्लूर का "उमाकेरलम्", वल्लत्तोल् का "चित्रयोगम्", के॰ सी॰ केशव पिल्ला का "केशवीयम्", कीटुङंल्लूर कोच्चुण्णि तंपुरान का वंचीशवंशम्" और "पांडवोदयम्", वटक्कुम्कूर राजराज वर्मा का "रघुवीरविजयम्" और "राघवाभ्युदयम्", कट्टक्कयम् चेरियान माप्पिला का "श्रीयेशुविजयम्", इत्यादि मलयालम् के प्रमुख महाकाव्य हैं। ये 1902 एवं 1917 के बीच लिखे गए थे।

गद्य-साहितय में उपन्यासों का उदय भी उन्नीसवीं सदी में केरल वर्मा युग में ही हुआ था। प्रथम उपन्यास अप्पु नेटुंङयाटि लिखित "कुदलता" है। एक दो साल में (1889 में) चंतु मेनन ने इंदुलेखा का प्रकाशन किया। चंतु मेनन ने "शारदा" नामक उपन्यास का प्रथम भाग लिखा--और दूसरे भाग की रचना करने के पहले ही स्वर्ग सिधार गए। इंदुलेखा और शारदा आज भी मलयालम् के सामाजिक उपन्यासों की प्रथम श्रेणी में स्थित हैं। सामाजिक उपन्यासकारों में चंतु मेनन की प्रतिभा अद्वितीय है।

तीन ऐतिहासिक उपन्यासों मार्तंड वर्मा (1891) "धर्मराजा" (1913) और "रामराजा बहादुर" (1917-20) के लेखक सी॰ वी॰ रामन पिल्ला ऐतिहासिक उपन्यास के क्षेत्र में विशेष प्रसिद्ध हैं। उनके सामाजिक "प्रेमामृतम्" का महत्व इतना अधिक नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि उनके जीवन का उद्देश्य ही ऐतिहासिक उपन्यासों द्वारा मलयालम् की गरिमा बढ़ाने का था।

केरल वर्मा के समसामयिक कवियों में बहुत से रसिक कवि थे। पूंतोट्टम् नँपूतिरि, वेण्मणि पिता और पुत्र, कोटुंङल्लूर कुंञिक्कुट्टन् तंपुरान्, कोच्चुरिण्ण तंपुरान् इत्यादि कवियों ने मिलकर एक नूतन काव्यरूप को जन्म दिया। ये सभी सरल भाषा के प्रयोग में तत्पर थे। इस प्रवृत्ति को विकास "पच्च मलयालम्" (शुद्ध और संस्कृत से मुक्त भाषा) आंदोलन के रूप में हुआ। कुंञिक्कुट्टन् तंपुरान्, (नल्ल भाषा--अच्छी भाषा) कुंडूर नारायण मेनन् (नालु भाषाकाव्यंङल्--चार भाषा काव्य) इत्यादि इस प्रकार के भाषाप्रयोग में निपुण थे। परंतु खेद है कि "पच्च मलयालम्" आंदोलन समय से पहले ही समाप्त हो गया। फिर भी वेण्मणि आदि कवियों द्वारा अपनाई गई काव्यशैली और दृष्टिकोण ने आगे के कवियों पर अपना प्रभाव डाला है। मणिप्रवाल काल की शृंगार प्रवृत्ति ने इनकी कविता में नए रूप में प्रवेश पाया। इस आंदोलन के शिखरस्थ कवि कुंञिक्कुट्टन तंपुरान इसलिये युगविभूति नहीं माने गए हैं कि उन्होंने शुद्ध मलयालम् में कुछ कविताएँ लिखी हैं; परंतु उसका कारण यह है कि अपने लघु जीवनकाल के मात्र दो सालों के ऊपर की अवधि में उन्होंने एक ऐसा चमत्मकार कर दिखाया जो पुरुषासाध्य नहीं माना जा सकता। यह महान कवि इस छोटे अर्से में संपूर्ण महाभारत का मलयालम् में छंदश: और पदश: अनुवाद करने में सफल हुए। जिस कार्य को संपन्न करने में तेलुगु में तीन पीढ़ियों की साधना की आवश्यकता पड़ी थी उसको पूरा करने में इस कवि ने तीन साल भी नहीं लगाए! उनके मुख से कविता की धारा प्रवाहित होती थी, यह नहीं कि वे कविता "लिखते" थे। उनकी "सरस-द्रुत-कवि-किरीट-मणि" की उपाधि उनके लिये सर्वथा सार्थक थी। उनको "केरल व्यास" कहना भी उचित ही था।

स्वच्छंतावादी आंदोलन

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अब हम मलयालम् के स्वच्छंदतावादी आंदोलन (अर्थात् रोमांटिसिज़्म, जो मलयालम् में काल्पनिक प्रस्थानम् के नाम से प्रसिद्ध है) के युग में आ जाते हैं। वी॰ सी॰ बालकृष्ण पणिक्कर का "ओरु विलापम्" (1895) इत्यादि इस प्रसंग में स्मरणीय हैं। परंतु कुमारन् आशान् का "वीण पूवु" (पतित कुसुम) ही इस आंदोलन की प्रारंभिक रचनाओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। मलयालम् का स्वच्छंदतावाद आशान् की कविताओं के रूप में पल्लवित और पुष्पित हुआ। नलिनि, लीला, चिंताविष्टयाय सीता, चंडालभिक्षुकी, प्ररोदनम्, दुरवस्था, करुणा इत्यादि इनकी मुख्य रचनाएँ हैं। आशान् जिस काव्य प्रपंच को अनावृत्त करने में सफल हुए वह गंभीर दार्शनिकता, जीवनदर्शन का अदम्य कौतूहल और तीव्र भावविभोरता से भास्वर है। आशान् ही वह कवि थे जिन्होंने श्रृंगार को सामान्य धरातल से स्वर्गिक विशुद्धता तक पहुँचाया। आध्यात्मिक प्रेम की सुदर कल्पना ने उनकी कविता को प्रभापूरित किया है।

वल्लत्तोल् की सफलता इसमें थी कि वे मानव के मानसिक भाव को काल्पनिकता का परिधान देकर सुदर रूप में प्रस्तुत कर सके। उन्होंने 1909 में बाल्मीकि रामायण का अनुवाद किया। 1910 में "बधिरविलापम्" नामक विलापकाव्य लिखा। इसके बाद उन्होंने अनेक नाटकीय भावकाव्य लिखे--गणपति, बंधनस्थनाय अनिरुद्धन्, ओरू कत्तु (एक खत), शिष्यनुम् मकनुम् (शिष्य और पुत्री), मग्दलन मरि यम्, अच्छनुम् मकनुम (पिता पुत्री) कोच्चुसीता इत्यादि। सन् 1924 के बाद रचित साहित्यमंजरियों में ही वल्लत्तोल के देशभक्ति से ओतप्रोत वे काव्यसुमन खिले थे जिन्होंने उनको राष्ट्रकवि के पद पर आसीन किया। एन्रे गुरुनाथन (मेरे गुरुनाथ) इत्यादि उन भावगीतों में अत्यधिक लोकप्रिय हैं। जीवन के कोमल और कांत भावों के साथ विचरण करना वल्लत्तोल को प्रिय था। अंधकार में खड़े होकर रोने की प्रवृत्ति उनमें नहीं थी। यह सत्य है कि पतित पुष्पों को देखकर उन्होंने भी आहें भरी हैं, परंतु उनपर आँसू बहाते रहने की बनिस्बत विकसित सुमनों को देखकर आह्लाद प्रकट करने की प्रवृत्ति ही उनमें अधिक हैं।

"उमाकेरलम्" नामक महाकाव्य की रचना करके काव्यजगत् में अपना नाम अमर करनेवाले उल्लूर ने अनेक खंडकाव्यों और भावगीतों की भी रचना की। पिंगला, कर्णभूषणम्, भक्तिदीपिका, चित्रशाला इत्यादि खंडकाव्यों और किरणावली, ताराहारम् तरंगिणि इत्यादि कवितासंग्रहों द्वारा उन्होंने मलयालम् की श्रीवृद्धि की है। परंतु इस महाविद्वान् और भाषाभिमानी साहित्यकार की स्मृति मलयालम प्रेमियों के हृदयों में शायद केरल साहित्य चरित्रम् के लेखक के रूप में ही मुख्य रूप से रहेगी।

इस समय के अन्य कुछ कवियों के नाम ये हैं - नालप्पाट्टु नारायण मेनन (इनकी सर्वश्रेष्ठ रचना कण्णुनीरतुल्लि अश्रुबिंदु नामक विलापकाव्य है); करिरप्पुरत्त, केशवन नायर (काव्योपहारम् नव्योपहारम् इत्यादि भावगीत संग्रह); के के राजा (अनेक भावगीत और एक विलापकाव्य, बाष्पांजली, इन्होंने लिखी है), इत्यादि।

जी शंकर कुरुप, वेण्णिक्कलुम् गोपाल कुरुप, पी कुंञिरामन् नायर इत्यादि कवियों का जन्म 20वीं सदी के प्रथम दशक में हुआ है। इटप्पल्लि कविद्वय (इटप्पल्लि राघवन पिल्ला और चडङंपुषा कृष्ण पिल्ला), वैलोप्पिल्लि श्रीधर मेनन इत्यादि इनके थोड़े ही साल बाद के हैं। इटप्पल्लि कवियों ने, खासकर चङङम्पुषा ने डेढ़ दशाब्दियों की अवधि में जितना कार्य करके संसार से बिदा ली है उतना पूर्ण पुरुषायु में भी किसी कार्य के द्वारा असाध्य है। मलयालम् के स्वच्छंतावाद के आंदोलन के लिये उनकी देन अमोध है। जी॰ शंकर कुरुप, बालामणि अम्मा, पी॰ कुंञिरामन् नायर इत्यादि ने भी इस आंदोलन को संपन्न किया है।

प्रथम ज्ञानपीठ पुरस्कार के विजेता जी॰ शंकर कुरुप के भावगीतों में 20वीं सदी के भारतीय जनजीवन में अनुभूत पीड़ाओं, व्यामोहों, मोहभंगों, प्रतीक्षाओं, अभिलाषाओं, इच्छा साक्षात्कारों का ऐसा चित्रण हुआ है कि वे अंतरात्मा की गहराइयों तक पहुँच जाते हैं। इसके अतिरिक्त वे गीत मानव की आध्यात्मिक एवं मानसिक भावानुभूतियों को प्रतीकात्मक या अन्य रूप में व्यक्त करते हैं। मलयालम् की आत्मगीत शाखा को आज की ऊँचाइयों तक उठानेवाले कवियों की श्रेणी में जी॰ शंकर कुरुप का स्थान सर्वोपरि है। (ओटक्कुषल, पाथेयम्, जीवनसंगीतम् इत्यादि जी॰ के मुख्य कवितासंग्रह हैं। विश्वदर्शनम् नामक संग्रह ने साहित्य अकादमी का पुरस्कार पाया है। बालामणि अम्मा, पी॰ कुंजिरामन् नायर, इटप्पलि कविद्वय और वैलोप्पिल्लि ने भी इस शाखा को लगभग अपना सर्वस्व भेंट किया है। बालामणि अम्मा का काव्यसाम्राज्य मातृत्व का दिव्य प्रपंच है। उनकी रचनाएँ एक ऐसे अनुभूति मंडल का साक्षात्कार कराती हैं जो मलयालम् में अदृष्टपूर्व है। (उनके काव्यसंग्रहों में "सोपानम्" मुख्य है। मतश्शि (दादी) नामक संग्रह को अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ है।) कुंञिरामन् नायर अत्यधिक प्रभावशाली कवि हैं। वे वैयक्तिक अनुभूति मंडल पर विहरण करने में ही रुचि रखते हैं, न कि व्यक्ति के सामाजिक संबंधों पर विचार करने में। (काव्यसंग्रहों में "पूक्कलम" (फूलों की क्यारी) और तामरत्तोणि (कमल नौका) प्रसिद्ध हैं। इटश्शेरि यथार्थवादी दृष्टिकोण को अपनानेवाले कवि हैं। उनकी रचनाओं में मलयालम् की पहली श्रेणी की क्रांतिकारी कविताएँ आती हैं।

चङङम्पुषा मलयालम् के 'गान गंधर्व' कहलाते हैं। किसी भी अन्य कवि ने कविता में इतना अधिक स्वरमाधुर्य नहीं घोला है। उनका नाटकीय भावकाव्य "रमणन्" एक क्लासिक बन गया है। रमणन् की जितनी प्रतियाँ बिकी हैं उतनी शायद एषुत्तच्छन् के अध्यात्म रामायण को छोड़कर और किसी रचना नहीं बिकी होंगी। उनकी कई पंक्तियाँ प्रत्येक केरलवासी को कंठस्थ हैं।

वैज्ञानिक जीवन विश्लेषण, जीवन की अनश्वरता का बोध और मानव जीवन की ओर क्रांतिकारी दृष्टिकोण के कारण साहित्य में वैलोप्पिल्लि का स्थान महत्वपूर्ण है। मलयालम् के क्रांतिवादी काव्यों में इनके "कुटियोषिक्कल" (घर निकाला) का स्थान अद्वितीय है। मध्यवर्गीय कवि के अंत:करण की वेदना का इतना मार्मिक चित्रण और कोई नहीं कर पाया है।

यद्यपि ओ एन वी कुरुप के काव्यजीवन का आरंभ क्रांतिकारी कवि के रूप में हुआ, तो भी आज वे स्वच्छंदतावादी हैं। तिरुनल्लूर् करुणाकरन् और पुनलूर् बालन् क्रांतिकारीकविता के मण्ट्ल में अन्य दो विशिष्ट कवि हैं- फिर उन्के शैली विभिन्न हैं। जीवन की ओर सुगतकुमारी का दृष्टिकोण दार्शनिक है। विष्णु नारायणन नंपूतिरि, रामकृष्णन् इत्यादि उदीयमान कवि हैं। पी॰ भास्करन और वयलार रामवर्मा क्रांतिकारी कवियों के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त करने के बाद फिल्मी गीतों के क्षेत्र में चले गए। एन॰ एन॰ कक्काट, माधवन् अय्यप्पत्त, अय्यप्प पणिक्कर और एन॰ एन॰ पालूर अंग्रेजी के नवीनतम उन्मुक्त काव्यविधाओं का प्रयोग मलयालम् में करने में सिद्धहस्त हैं। काव्यशास्त्र में नवीनतम सिद्धांत यह है कि चौंकाकर ध्यान आकर्षित करना कविता का लक्ष्य है। उपर्युक्त कवियों की कविताओं में यही विधा अपनाई गई। अक्कित्तम् अच्युतन नंपूतिरि इटश्शेरि और एन॰ वी॰ कृष्ण वारियर द्वारा प्रशस्त किए गए पथ पर चित्रण करनेवाले कवि हैं। उनका काव्य "इरुपताम् नुररांटिंरे इतिहासम्" (20वीं सदी का महाकाव्य) वैलोप्पिल्लि के कुटियोषिक्कल की ही भाँति महत्वपूर्ण हैं। किसी लक्ष्य के अभाव में क्रांति के महान आदर्श को भी भ्रामक पाकर भटकनेवाले आधुनिक मानव की संभ्रांत आत्मा की कराहें इस काव्य में सुनाई देती हैं।

आधुनिक गद्य साहित्य

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मलयालम् के उपन्यास साहित्य, नाटक साहित्य और कहानी साहित्य का विकास भी 20वीं सदी में हुआ। चंतु मेनन और सी॰ वी॰ रामन पिल्ला के बाद कुछ समय तक उपन्यास शाखा में अनुकरणों का प्रधानता रही। अप्पन् तंपुरान् द्वारा लिखित "भूतरायर" नामक ऐतिहासिक उपन्यास और "भास्कर मेनन" नामक जासूसी उपन्यास, टी॰ रामन नंपीशम का केरलेश्वरन्, केदृएम॰ पणिक्कर के "केरलसिंहम्" और "परंकिपटयालि" (पुर्तगाली सैनिक) इत्यादि इस जमाने के मुख्य उपन्यास हैं।

सामाजिक उपन्यासों का दूसरा युग आधुनिक उपन्यासकारों के साथ प्रारंभ होता है। मूत्तिरिंङोट का "आप्फन्रे मकन" (चाचा की बेटी) यहाँ विशेष उल्लेखनीय है। तकषि, बशीर, केशव देव, पोन्कुन्नम वर्कि, ललितांबिका अंतर्जनम्, पी॰ सी॰ कुट्टिकृष्णन् इत्यादि शुरू में विख्यात कहानीकार थे। इनमें से तकषि, बशीर, केशवदेव और कुट्टिक्कृष्णन बाद में उपन्यासकारों के रूप में भी मशहूर हुए। तकषि के "चेम्मीन" की ख्याति अंतरराष्ट्रीय है (यह उपन्यास साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत है)। पी॰ सी॰ कुट्टिकृष्णन के उपन्यास "उम्माच्चु" और अकादमी द्वारा पुरस्कृत "सुंदरिकलुम् सुंदरन्मारुम्" (सुंदर सुंदरियाँ) प्रथम श्रेणी के हैं। केशवदेव का "ओटयिल निन्नु (गंदे नाले से) प्रसिद्ध उपन्यास है। इनके अद्यतन उपन्यास "अयल्कार" (पड़ोसी) ने अकादमी पुरस्कार पाया है। बशीर की "बाल्यकालसखी", "नरुपुप्पाक्कोरानेंटार्नु" (मेरा दादा हाथी पालता था) इत्यादि उच्च स्तर के उपन्यास हैं। तकषि का रंटिटङङषि" (दो सेर), पोररेक्काट की विषकन्यका नई पीढ़ी के एम॰ टी॰ वासुदेवन नायर का नालुकेट्टु (पुराने ढंग का घर), असुरवितु (आसुर बीज), मंजु (बरफ) इत्यादि मलयालम् के गिने माने उपन्यास हैं। आधुनिक उपन्सासकारों में वासुदेवन् नायर प्रथम स्थानीय हैं। "तालम्", काट्टुकूरङङु (जंगली बंदर) "सुजाता" सीमा इत्यादि के लेखक के॰ सुरेंद्रन् का नाम उल्लेखनीय है।

मलयालम् का कहानी साहित्य भारत के किसी भी कहानी साहित्य की तुलना में ऊँचा स्थान प्राप्त कर सकता है। बशीर, अंतर्जनम्, वर्कि इत्यादि कहानीकार सामाजिक अनाचारों और अत्याचारों के विरुद्ध क्रांति की आवाज उठानेवाले लेखक हैं। वे अपनी जातियों में पाई जानेवाली अनैतिकाओं को प्रकाश में लाने में सफल हुए। तकषि केशवदेव इत्यादि कहानीकारों ने मनुष्य की सामाजिक और आर्थिक परतंत्रताओं तथा व्यक्ति की दुर्बलताओं और परिमितियों को अपनी कहानियों का विषय बनाया। स्वर्गीय ए॰ बालकृष्ण पिल्ला ने इन कहानीकारों के व्यक्तित्व को विकसित करने में जो योगदान किया है वह महत्वपूर्ण है। मोपासाँ प्रभृति फ्रांसीसी साहित्यकारों और चेखव प्रभृति रूसी साहित्यकारों द्वारा प्रशस्त किए गए मार्गों में हमारे कहानीकारों को ले जाने का श्रेय इन्हीं बालकृष्ण पिल्ला को है। इन्हीं से मलयालम् के ख्यातनामा कथाकरों को सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक क्रांति के बोध को प्रवर्तित करनेवाली और मनोवैज्ञानिक तत्वों को प्रकट करनेवाली कहानियाँ लिखने की प्रेरणा मिली। आज कहानी के क्षेत्र में एक ऐसी पीढ़ी अग्रसर हो रही है जो इन प्रशस्त कहानीकारों के पदचिन्हों का अनुसरण कर उनसे भी आगे बढ़ने का प्रयत्न कर रही है। सरस्वती अम्मा, राजलक्ष्मी इत्यादि इन पूर्ववर्तियों के प्रभावक्षेत्र से परे खड़ी हैं। सरस्वती अम्मा बीती हुई पीढ़ी का और स्वर्गीय राजलक्ष्मी नवीन पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती हैं। नई पीढ़ी में बालामणि अम्मा की पुत्री माधविक्कुट्टि का नाम भी उल्लेखनीय है। नंतनार, कोविलन इत्यादि द्वारा रचित सैनिक जीवन की कहानियाँ प्रसिद्ध हैं। पारप्पुरम ने इस शाखा को दो उपन्यास "निणमणिंज काल्पाटुकल्" (रुधिराद्र्र पदचिन्ह) और "आद्यकिरणंङल्" एवं कई कहानियाँ भेंट की हैं। पुरानी पीढ़ी के कहानीकारों में तीन उल्लेखनीय नाम हैं--वेट्टूर रामन् नायर, कारूर नीलकंठ पिल्ला और पोंजिक्कर राफी। आजकल नैशनल बुक स्टाल नामक प्रकाशन संस्था दस कहानीकारों की चुनी हुई कहानियों का संग्रह प्रकाशित कर रही है। (ये दस कहानीकार हैं--तकषि, देव, बशीर, पोन्कुन्नम् वर्कि, अंतर्जनम्, वेट्ट्रर रामन नायन नायर, कारूर नीलकंठ पिल्ला, पोंत्रिक्कर राफी, पी॰ सी॰ कुट्टिक्कृष्णन और पोररेक्काट। पी॰ सी॰ कुट्टिक्कृष्णन को छोड़कर बाकी सबके संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं!)

मलयालम् का नाटक साहित्य संपन्न है। संस्कृति नाटकों के अनुकरण और अनुवाद के युग के उपरांत गद्य नाटकों के भी कुछ अनुकरण आ गए। आधुनिक गद्य नाटकों के पूर्वगामी के रूप में सी॰ रामन् पिल्ला इत्यादि के प्रहसन, बाद में एन॰ पी॰ चेल्लक्कपन नायर आदि हास्य नाटककारों के लिये प्रेरणास्त्रोत बने। कैनिक्कर कुमार पिल्ला, कैनिक्कर पद्मनाभ पिल्ला इत्यादि ने गंभीर नाटक भी लिखे। इब्सन की नाट्य विधा को अपनाकर लिखे हुए समस्यामूलक नाटकों की दिशा में एन॰ कृष्ण पिल्ला ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। सामाजिक समस्या को विषयवस्तु बनानेवाले नाटकों में वी॰ टी॰ भट्टतिरिप्पाट का "अटुक्कलयिल् निन्नु अरंङतेक्कु" (रसोईघर से रंगमंच की ओर) और राजनीतिक नाटकों में "पाट्टबाकी" (बकाया लगान) उल्लेखनीय हैं। आज के नाटकाकारों में टी॰ ए॰ गोपिनाथन् नायर, तायर, नागवल्लि आर॰ एन॰ कुरुप, केशवदवे, एन॰ पी॰ चेल्लप्पन नायर, के॰ टी॰ मुहम्मद, तोप्पिल भासि, जी॰ शंकर पिल्ला इत्यादि प्रमुख हैं। तोप्पिल भासि के "निंङलेन्ने कम्युनिस्टाक्की" (तुम लोगों ने मुझे कम्युनिस्ट बनाया) "मुटियानाय पुत्रन्" (धूर्त पुत्र), सर्वेक्कल (सीमा का पत्थर) इत्यादि और मुहम्मद के "करवरर पशु" (दुग्ध बंद गाय) "मनुष्यन् कारा गृहत्तिलाणु" (मनुष्य कारावास में हैं) इत्यादि प्रसिद्ध हैं।

मलयालम् में आलोचना साहित्य भी किसी भी अन्य शाखा की तरह संपुष्ट हे। जोसेफ मुंटश्शेरि और कुट्टिकृष्ण मारार ने आलोचना साहित्य में अपने अपने विशेष मत चलाए। पहले ने पश्र्चिमी साहित्यिक दार्शनिकों और दूसरे ने प्राचीन भारतीय साहित्यमर्मज्ञों से प्रेरणा ग्रहण की। दोनों अपने अपने क्षेत्र में प्रभावशाली हैं। इनमें कुट्टिक्कृष्ण मारार हाल में अकादमी द्वारा पुरस्कृत हुए हैं। स्वर्गीय एम॰ पी॰ पॉल ने मलयालम् के आलोचना साहित्य को एक प्रकार का अपनत्व प्रदान किया। मुंटश्शेरि, सी॰ जे॰ तॉमस इत्यादि उन्हीं के दीपक से अपनी दीपशिखा जलानेवाले हैं। पॉल के "नोवल साहित्यम्" और "सौंदर्यवीक्षणम्" मुंटश्शेरि की "काव्यपीठिका", "माररोलि" (प्रतिध्वनि), "अंतरीक्षम्", "मानदंडम्" और "रूपभद्रता" मारार के "राजांकणम्", "कलयुम् जीवतिवुम्" और "साहित्यविद्या" विशेष उल्लेखनीय हैं। स्वर्गीय उल्लाट्टिल गोविंदन् कुट्टि नायर संतुलित विचारों के समीक्षक थे। आज आलोचकों में एस॰ गुप्तन् नायर, कुरिरप्पुष कृष्ण पिल्ला, एन॰ कृष्ण पिल्ला, एम्॰ गोविंदन, एम्॰ कृष्णन् नायर, एम्॰ श्रीधर मेनन, एम्॰ अच्युतन, एम्॰ एन्॰ विजयन, के॰ एन॰ एषुत्तच्छन्, षणमुखदास, जी॰ बी॰ मोहनन् इत्यादि प्रमुख हैं। गुप्तन् नायर के आधुनिक साहित्यम्, समालोचना, इसंङ लकप्पुरम (वादों से परे) इत्यादि पठनीय हैं। के॰ एन॰ एषुत्तच्छन् विद्वतापूर्ण एवं गवेषणात्मक लेख लिखते हैं। एन॰ कृष्ण पिल्ला सरस समालोचना लिखने में निपुण हैं। क्रांतिकारी विचारधारा का वीरतापूर्ण दृष्टिकोण कुरिरप्पुष कृष्ण पिल्ला की विशेषता है। मनोवैज्ञानिक तत्वों के आधार पर साहित्यिक रचनाओं का विश्लेषण करने की नूतन पद्धति को विजयन् ने अपनाया है।

ऊपर के अनुच्छेदों में मलयालम् साहित्य का बहुत ही संक्षिप्त परिचय दिया गया है। आज मलयालम् साहित्य भारत की किसी अन्य भाषा के साहित्य से पीछे नहीं है। काव्य और कहानी के क्षेत्रों में शायद मलयालम् साहित्य अन्य भाषा साहित्यों से उच्चतर स्थान पाने के लिये होड़ सी कर रहा है। पिछले कुछ वर्षों में मलयालम् साहित्य की श्रीवृद्धि के लिये बहुत सी योजनाएँ बनी हैं और बहुत सी संस्थाएँ भी कायम की गई हैं। विज्ञान परिषद्, इतिहास परिषद्, संगीत परिषद्, कला परिषद्, आदि अच्छी योजना बनाकर काम कर रही हैं। इसके अलावा केरल विश्वविद्यालय तथा केरल सरकार मलयालम् विश्वकोश बनाने की बहुत बड़ी योजनाएँ चला रही हैं। केरल में बहुत से युवक विद्वान् रचनाकार्य में लगे हुए हैं और मलयालम् साहित्य का भविष्य बहुत ही उज्जवल है।

इन्हें भी देखें

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बाहरी कड़ियाँ

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