लोकतंत्र

लोक- केन्द्रीय शासन व्यवस्था
(लोकतन्त्र से अनुप्रेषित)

लोकतन्त्र या 'प्रजातन्त्र' एक ऐसी शासन प्रणाली है, जिसके अन्तर्गत जनता अपनी स्वेच्छा से निर्वाचन में आए हुए किसी भी उम्मीदवार को मत देकर अपना प्रतिनिधि चुन सकती है। लोकतन्त्र शासन का एक ऐसा रूप है,जिसमें शासकों का चुनाव लोग करते हैं।[1], तथा उसे विधायिका बन सकती है। लोकतन्त्र दो शब्दों से मिलकर बना है, "लोक + तन्त्र"। लोक का अर्थ है जनता तथा तन्त्र का अर्थ है शासन।[2]

यद्यपि शब्द का प्रयोग राजनीतिक सन्दर्भ में किया जाता है, किन्तु लोकतन्त्र का सिद्धान्त दूसरे समूहों और संगठनों के लिये भी संगत है। मूलतः लोकतन्त्र भिन्न-भिन्न सिद्धान्तों के मिश्रण बनता है, लोकतन्त्र जनता का, जनता के द्वारा तथा जनता के लिए शासन है। लोकतन्त्र में ऐसी व्यवस्था रहती है की जनता अपनी मर्जी से विधायिका चुन सकती है। लोकतन्त्र एक प्रकार का शासन व्यवस्था है, जिसमे सभी व्यक्ति को समान अधिकार होता हैं। एक अच्छा लोकतन्त्र वह है जिसमे राजनीतिक और सामाजिक न्याय के साथ-साथ आर्थिक न्याय की व्यवस्था भी है। देश में यह शासन प्रणाली लोगो को सामाजिक, राजनीतिक तथा धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान करती हैं।

लोकतन्त्र के प्रकार

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लोकतन्त्र की परिभाषा के अनुसार यह "जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन है"। लेकिन अलग-अलग देशकाल और परिस्थितियों में अलग-अलग धारणाओं के प्रयोग से इसकी अवधारणा कुछ जटिल हो गयी है। प्राचीनकाल से ही लोकतन्त्र के सन्दर्भ में कई प्रस्ताव रखे गये हैं, पर इनमें से कई कभी क्रियान्वित नहीं हुए।

प्रतिनिधि लोकतन्त्र

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एक नग्न बालक और एक युवा स्त्री का चित्र - बालक के हाथ में एक पुस्तिका है और वह गणराज्य का प्रतीक है और युवती लोकतन्त्र की।

प्रतिनिधि लोकतन्त्र में जनता विधायिकों/प्रतिनिधियों को सीधे चुनती है। प्रतिनिधि किसी जिले या संसदीय क्षेत्र से चुने जाते हैं या कई समानुपातिक व्यवस्थाओं में सभी मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। कुछ देशों में मिश्रित व्यवस्था प्रयुक्त होती है। यद्यपि इस तरह के लोकतन्त्र में प्रतिनिधि जनता द्वारा निर्वाचित होते हैं, लेकिन जनता के हित में कार्य करने की नीतियाँ प्रतिनिधि स्वयं तय करते हैं। यद्यपि दलगत नीतियाँ, मतदाताओं में छवि, पुनः चुनाव जैसे कुछ कारक प्रतिनिधियों पर असर डालते हैं, किन्तु सामान्यतः इनमें से कुछ ही बाध्यकारी अनुदेश होते हैं।

इस प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जनादेश का दबाव नीतिगत विचलनों पर रोक का काम करता है, क्योंकि नियमित अन्तरालों पर सत्ता की वैधता हेतु चुनाव अनिवार्य हैं[3]

एक तरह का प्रतिनिधि लोकतन्त्र है, जिसमें स्वच्छ और निष्पक्ष चुनाव होते हैं। उदार लोकतन्त्र के चरित्रगत लक्षणों में, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, कानून व्यवस्था, शक्तियों के वितरण आदि के अलावा अभिव्यक्ति, भाषा, सभा, पन्थ और सम्पत्ति की स्वतन्त्रता प्रमुख है।

उदार लोकतान्त्रिक देशों में वंचित वर्ग का सशक्तिकरण किया जाता है, जिससे देश की उन्नति हो। उदार लोकतन्त्र में लोगों का अर्थात नागरिकों को शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं का लाभ देना सरकार या राज्य का कर्तव्य है।

प्रत्यक्ष लोकतन्त्र

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प्रत्यक्ष लोकतन्त्र( में सभी नागरिक सारे महत्वपूर्ण नीतिगत फैसलों पर मतदान करते हैं। इसे प्रत्यक्ष कहा जाता है क्योंकि सैद्धान्तिक रूप से इसमें कोई प्रतिनिधि या मध्यस्थ नहीं होता। सभी प्रत्यक्ष लोकतन्त्र छोटे समुदाय या नगर-राष्ट्रों में हैं। उदाहरण - स्विट्जरलैंड

भारत में लोकतन्त्र के प्राचीनतम प्रयोग

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प्राचीन काल मे भारत में सुदृढ़ व्यवस्था विद्यमान थी। इसके साक्ष्य हमें प्राचीन साहित्य, सिक्कों और अभिलेखों से प्राप्त होते हैं। विदेशी यात्रियों एवं विद्वानों के वर्णन में भी इस बात के प्रमाण हैं।

प्राचीन गणतान्त्रिक व्यवस्था में आजकल की तरह ही शासक एवं शासन के अन्य पदाधिकारियों के लिए निर्वाचन प्रणाली थी। योग्यता एवं गुणों के आधार पर इनके चुनाव की प्रक्रिया आज के दौर से थोड़ी भिन्न जरूर थी। सभी नागरिकों को वोट देने का अधिकार नहीं था। ऋग्वेद तथा कौटिल्य साहित्य ने चुनाव पद्धति की पुष्टि की है परंतु उन्होंने वोट देने के अधिकार पर रोशनी नहीं डाली है।

वर्तमान संसद की तरह ही प्राचीन समय में परिषदों का निर्माण किया गया था जो वर्तमान संसदीय प्रणाली से मिलता-जुलता था। गणराज्य या संघ की नीतियों का संचालन इन्हीं परिषदों द्वारा होता था। इसके सदस्यों की संख्या विशाल थी। उस समय के सबसे प्रसिद्ध गणराज्य लिच्छवि की केन्द्रीय परिषद में 7707 सदस्य थे। वहीं यौधेय की केन्द्रीय परिषद के 5000 सदस्य थे। वर्तमान संसदीय सत्र की तरह ही परिषदों के अधिवेशन नियमित रूप से होते थे।

किसी भी मुद्दे पर निर्णय होने से पूर्व सदस्यों के बीच में इस पर खुलकर चर्चा होती थी। सही-गलत के आकलन के लिए पक्ष-विपक्ष पर जोरदार बहस होती थी। उसके बाद ही सर्वसम्मति से निर्णय का प्रतिपादन किया जाता था। सबकी सहमति न होने पर बहुमत प्रक्रिया अपनायी जाती थी। कई जगह तो सर्वसम्मति होना अनिवार्य होता था। बहुमत से लिये गये निर्णय को ‘भूयिसिक्किम’ कहा जाता था। इसके लिए वोटिंग का सहारा लेना पड़ता था। तत्कालीन समय में वोट को 'छन्द' कहा जाता था। निर्वाचन आयुक्त की भान्ति इस चुनाव की देख-रेख करने वाला भी एक अधिकारी होता था जिसे 'शलाकाग्राहक; कहते थे। वोट देने के लिए तीन प्रणालियां थीं-

(1) गूढ़क (गुप्त रूप से) – अर्थात अपना मत किसी पत्र पर लिखकर जिसमें वोट देने वाले व्यक्ति का नाम नहीं आता था।

(2) विवृतक (प्रकट रूप से) – इस प्रक्रिया में व्यक्ति सम्बन्धित विषय के प्रति अपने विचार सबके सामने प्रकट करता था। अर्थात खुले आम घोषणा।

(3) संकर्णजल्पक (शलाकाग्राहक के कान में चुपके से कहना) - सदस्य इन तीनों में से कोई भी एक प्रक्रिया अपनाने के लिए स्वतन्त्र थे। शलाकाग्राहक पूरी मुस्तैदी एवं ईमानदारी से इन वोटों का हिसाब करता था।

इस तरह हम पाते हैं कि प्राचीन काल से ही हमारे देश में गौरवशाली लोकतन्त्रीय परम्परा थी। इसके अलावा सुव्यवस्थित शासन के संचालन हेतु अनेक मन्त्रालयों का भी निर्माण किया गया था। उत्तम गुणों एवं योग्यता के आधार पर इन मन्त्रालयों के अधिकारियों का चुनाव किया जाता था।

मन्त्रालयों के प्रमुख विभाग थे-

(1) औद्योगिक तथा शिल्प सम्बन्धी विभाग

(2) विदेश विभाग

(3) जनगणना

(4) क्रय-विक्रय के नियमों का निर्धारण

मन्त्रिमण्डल का उल्लेख हमें अर्थशास्त्र, मनुस्मृति, शुक्रनीति, महाभारत, इत्यादि में प्राप्त होता है। यजुर्वेद और ब्राह्मण ग्रन्थों में इन्हें 'रत्नि' कहा गया। महाभारत के अनुसार मन्त्रिमण्डल में 6 सदस्य होते थे। मनु के अनुसार सदस्य संख्या 7-8 होती थी। शुक्र ने इसके लिए 10 की संख्या निर्धारित की थी।

इनके कार्य इस प्रकार थे:-

(1) पुरोहित- यह राजा का गुरु माना जाता था। राजनीति और धर्म दोनों में निपुण व्यक्ति को ही यह पद दिया जाता था।

(2) उपराज (राजप्रतिनिधि)- इसका कार्य राजा की अनुपस्थिति में शासन व्यवस्था का संचालन करना था।

(3) प्रधान- प्रधान अथवा प्रधानमन्त्री, मन्त्रिमण्डल का सबसे महत्वपूर्ण सदस्य था। वह सभी विभागों की देखभाल करता था।

(4) सचिव- वर्तमान के रक्षा मन्त्री की तरह ही इसका काम राज्य की सुरक्षा व्यवस्था सम्बन्धी कार्यों को देखना था।

(5) सुमन्त्र- राज्य के आय-व्यय का हिसाब रखना इसका कार्य था। चाणक्य ने इसको समर्हत्ता कहा।

(6) अमात्य- अमात्य का कार्य सम्पूर्ण राज्य के प्राकृतिक संसाधनों का नियमन करना था।

(7) दूत- वर्तमान काल की इंटेलीजेंसी की तरह दूत का कार्य गुप्तचर विभाग को संगठित करना था। यह राज्य का अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील विभाग माना जाता था।

इनके अलावा भी कई विभाग थे। इतना ही नहीं वर्तमान काल की तरह ही पंचायती व्यवस्था भी हमें अपने देश में देखने को मिलती है। शासन की मूल इकाई गांवों को ही माना गया था। प्रत्येक गाँव में एक ग्राम-सभा होती थी। जो गाँव की प्रशासन व्यवस्था, न्याय व्यवस्था से लेकर गाँव के प्रत्येक कल्याणकारी काम को अंजाम देती थी। इनका कार्य गाँव की प्रत्येक समस्या का निपटारा करना, आर्थिक उन्नति, रक्षा कार्य, समुन्नत शासन व्यवस्था की स्थापना कर एक आदर्श गाँव तैयार करना था। ग्रामसभा के प्रमुख को ग्रामणी कहा जाता था।

सारा राज्य छोटी-छोटी शासन इकाइयों में बँटा था और प्रत्येक इकाई अपने में एक छोटे राज्य सी थी और स्थानिक शासन के निमित्त अपने में पूर्ण थी। समस्त राज्य की शासन सत्ता एक सभा के अधीन थी, जिसके सदस्य उन शासन-इकाइयों के प्रधान होते थे।

एक निश्चित काल के लिए सबका एक मुख्य अथवा अध्यक्ष निर्वाचित होता था। यदि सभा बड़ी होती तो उसके सदस्यों में से कुछ लोगों को मिलाकर एक कार्यकारी समिति निर्वाचित होती थी। यह शासन व्यवस्था एथेन्स में क्लाइस्थेनीज के संविधान से मिलती-जुलती थी। सभा में युवा एवं वृद्ध हर उम्र के लोग होते थे। उनकी बैठक एक भवन में होती थी, जो सभागार कहलाता था।

एक प्राचीन उल्लेख के अनुसार अपराधी पहले विचारार्थ 'विनिच्चयमहामात्र' नामक अधिकारी के पास उपस्थित किया जाता था। निरपराध होने पर अभियुक्त को वह मुक्त कर सकता था पर दण्ड नहीं दे सकता था। उसे अपने से ऊँचे न्यायालय भेज देता था। इस तरह अभियुक्त को छः उच्च न्यायालयों के सम्मुख उपस्थित होना पड़ता था। केवल राजा को दण्ड देने का अधिकार था। धर्मशास्त्र और पूर्व की नजीरों के आधार पर ही दण्ड होता था।

देश में कई गणराज्य विद्यमान थे। मौर्य साम्राज्य का उदय इन गणराज्यों के लिए विनाशकारी सिद्ध हुआ। परन्तु मौर्य साम्राज्य के पतन के पश्चात कुछ नये लोकतान्त्रिक राज्यों ने जन्म लिया। यथा यौधेय, मानव और आर्जुनीयन इत्यादि।

प्राचीन भारत के कुछ प्रमुख गणराज्यों का ब्योरा इस प्रकार है:-

शाक्य- शाक्य गणराज्य वर्तमान बस्ती और गोरखपुर जिला (उत्तर प्रदेश) के क्षेत्र में स्थित था। इस गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु थी। यह सात दीवारों से घिरा हुआ सुन्दर और सुरक्षित नगर था। इस संघ में अस्सी हजार कुल और पाँच लाख जन थे। इनकी राजसभा, शाक्य परिषद के 500 सदस्य थे। ये सभा प्रशासन और न्याय दोनों कार्य करती थी। सभाभवन को सन्यागार कहते थे। यहाँ विशेषज्ञ एवं विशिष्ट जन विचार-विमर्श कर कोई निर्णय देते थे। शाक्य परिषद का अध्यक्ष राजा कहलाता था। भगवान बुद्ध के पिता शुद्धोदन शाक्य क्षत्रिय राजा थे। कौसल के राजा प्रसेनजित के पुत्र विडक्घभ ने इस गणराज्य पर आक्रमण कर इसे नष्ट कर दिया था।

लिच्छवि- लिच्छवि गणराज्य गंगा के उत्तर में (वर्तमान उत्तरी बिहार क्षेत्र) स्थित था। इसकी राजधानी का नाम वैशाली था। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के बसाढ़ ग्राम में इसके अवशेष प्राप्त होते हैं। लिच्छवि क्षत्रिय वर्ण के थे। वर्द्धमान महावीर का जन्म इसी गणराज्य में हुआ था। इस गणराज्य का वर्णन जैन एवं बौद्ध ग्रन्थों में प्रमुख रूप से मिलता है। वैशाली की राज्य परिषद में 7707 सदस्य होते थे। इसी से इसकी विशालता का अनुमान लगाया जा सकता है। शासन कार्य के लिए दो समितियां होती थीं। पहली नौ सदस्यों की समिति वैदेशिक सम्बन्धों की देखभाल करती थी। दूसरी आठ सदस्यों की समिति प्रशासन का संचालन करती थी। इसे इष्टकुल कहा जाता था। इस व्यवस्था में तीन प्रकार के विशेषज्ञ होते थे- विनिश्चय महामात्र, व्यावहारिक और सूत्राधार।

लिच्छवि गणराज्य तत्कालीन समय का बहुत शक्तिशाली राज्य था। बार-बार इस पर अनेक आक्रमण हुए। अन्तत: मगधराज अजातशत्रु ने इस पर आक्रमण करके इसे नष्ट कर दिया। परन्तु चतुर्थ शताब्दी ई॰ में यह पुनः एक शक्तिशाली गणराज्य बन गया।

वज्जि- लिच्छवि, विदेह, कुण्डग्राम के ज्ञातृक गण तथा अन्य पाँच छोटे गणराज्यों ने मिलकर जो संघ बनाया उसी को वज्जि संघ कहा जाता था। मगध के शासक निरन्तर इस पर आक्रमण करते रहे। अन्त में यह संघ मगध के अधीन हो गया।

अम्बष्ठ- पंजाब में स्थित इस गणराज्य ने सिकन्दर से युद्ध न करके सन्धि कर ली थी।

अग्रेय- वर्तमान अग्रवाल जाति का विकास इसी गणराज्य से हुआ है। इस गणराज्य में सिकन्दर की सेनाओं का डटकर मुकाबला किया। जब उन्हें लगा कि वे युद्ध में जीत हासिल नहीं कर पायेंगे तब उन्होंने स्वयं अपनी नगरी को जला लिया।

इनके अलावा अरिष्ट, औटुम्वर, कठ, कुणिन्द, क्षुद्रक, पातानप्रस्थ इत्यादि गणराज्यों का उल्लेख भी प्राचीन ग्रन्थों में मिलता है।

लोकतन्त्र की अवधारणा

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प्रत्येक राज्य चाहे वह उदारवादी हो या समाजवादी या साम्यवादी, यहाँ तक कि सेना के जनरल द्वारा शासित पाकिस्तान का अधिनायकवादी भी अपने को लोकतान्त्रिक कहता है। सच पूछा जाये तो आज के युग में लोकतान्त्रिक होने को दावा करना एक फैशन सा हो गया है।

लोकतन्त्र की पूर्णतः सही और सर्वमान्य परिभाषा देना कठिन है। क्रैन्स्टन ने ठीक ही कहा है कि लोकतन्त्र के सम्बन्ध में अलग-अलग धारणाएँ है। लिण्सेट की परिभाषा अधिक व्यापक प्रतीत होती हैं उसके अनुसार, “लोकतन्त्र एक ऐसी राजनीतिक प्रणाली है जो पदाधिकारियों को बदल देने के नियमित सांविधानिक अवसर प्रदान करती है और एक ऐसे रचनातंत्र का प्रावधान करती है जिसके तहत जनसंख्या का एक विशाल हिस्सा राजनीतिक प्रभार प्राप्त करने के इच्छुक प्रतियोगियों में से मनोनुकूल चयन कर महत्त्वपूर्ण निर्णयों को प्रभावित करती है।” मैक्फर्सन ने लोकतन्त्र को परिभाषित करते हुए इसे ‘एक मात्र ऐसा रचनातन्त्र माना है जिसमें सरकारों को चयनित और प्राधिकृत किया जाता है अथवा किसी अन्य रूप में कानून बनाये और निर्णय लिए जाते हैं।‘ शूप्टर के अनुसार, ‘लोकतान्त्रिक विधि राजनीतिक निर्णय लेने हेतु ऐसी संस्थागत व्यवस्था है जो जनता की सामान्य इच्छा को क्रियान्वित करने हेतु तत्पर लोगों को चयनित कर सामान्य हित को साधने का कार्य करती है। वास्तव में, लोकतन्त्र मूलतः नागरिक और राजनीतिक स्वतन्त्रता के लिए सहभागी राजनीति से संबद्ध प्रणाली है। लोकतन्त्र की अवधारणा के सम्बन्ध में प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित हैं:

1. लोकतन्त्र का पुरातन उदारवादी सिद्धान्त
2. लोकतन्त्र का अभिजनवादी सिद्धान्त
3. लोकतन्त्र का बहुलवादी सिद्धान्त
4. प्रतिभागी लोकतन्त्र का सिद्धान्त
5. लोकतन्त्र का मार्क्सवादी सिद्धान्त अथवा जनता का लोकतन्त्र

लोकतन्त्र का पुरातन उदारवादी सिद्धान्त

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लोकतन्त्र की उदारवादी परम्परा में स्वतन्त्रता, समानता, अधिकार, धर्म निरपेक्षता और न्याय जैसी अवधारणाओं का प्रमुख स्थान रहा है और उदारवादी चिन्तक आरम्भ से ही इन अवधारणाओं को मूर्त रूप देने वाली सर्वोत्तम प्रणाली के रूप में लोकतन्त्र की वकालत करते रहे हैं। नृपतियों और सामन्ती प्रभुओं से मुक्ति के बाद समाज के शासन-संचालन की दृष्टि से लोकतन्त्र को स्वाभाविक राजनीतिक प्रणाली के रूप में स्वीकार किया गया। मैक्फर्सन का कहना है कि पाश्चात्य जगत में लोकतन्त्र के आगमन के पहले ही चयन की राजनीति, प्रतियोगी राज्य व्यवस्था और मार्किट की राज्यव्यवस्था जैसी अवधारणाएं विकसित हो चुकी थीं। हकीकत में इस अर्थ में उदार राज्य का ही लोकतन्त्रीकरण हो गया, न कि लोकतन्त्र का उदारीकरण। लोकतान्त्रिक भावना के आरम्भिक चिह्न टॉमसमूर (यूटोपिया, 1616) और विंस्टैनले जैसे अंग्रेज विचारकों और अंग्रेज अतिविशुद्धतावाद (प्यूरिटैनिजन्म) के साहित्य में पाया जा सकता है, किन्तु लोकतान्त्रिक भावना की सही शुरुआत सामाजिक संविदा के सिद्धान्त के जन्म के साथ हुई, क्योंकि नागरिकों के सामाजिक अनुबन्ध की अन्तर्निहित भावना ही सभी व्यक्तियों की समानता है। थॉमस हॉब्स ने अपनी पुस्तक ‘लेवियाथन‘ (1651) में प्रमुख लोकतान्त्रिक सिद्धान्त की वकालत करते हुए लिखा कि सरकार का निर्माण जनता द्वारा एक सामाजिक संविदा के तहत होता है। जॉन लॉक का कहना था कि सरकार जनता के द्वारा और उसी के हित के लिए होनी चाहिए। एडम स्मिथ ने मुक्त बाजार का प्रतिमान इस लोकतान्त्रिक आधार पर ही प्रस्तुत किया कि प्रत्येक व्यक्ति को उत्पादन करने, खरीदने और बेचने की स्वतन्त्रता है। प्रसिद्ध उपयोगितावादी दार्शनिक मिल और बेंथम ने पूरी तरह लोकतन्त्र का समर्थन किया और उपयोगितावाद के माध्यम से इसे प्रभावी बौद्धिक आधार प्रदान किया। उनके अनुसार, लोकतन्त्र उपयोगितावाद अर्थात् अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख को अधिकतम संरक्षण प्रदान करता है, क्योंकि लोग अपने शासकों से तथा एक दूसरे से संरक्षण की अपेक्षा रखते हैं और इस संरक्षण को सुनिश्चित करने के सर्वोत्तम तरीके हैं, प्रतिनिधिमूलक लोकतन्त्र, संवैधानिक सरकार, नियमित चुनाव, गुप्त मतदान, प्रतियोगी दलीय राजनीति और बहुमत के द्वारा शासन। जे॰ एस॰ मिल ने बेंथम द्वारा लोकतन्त्र के पक्ष में प्रस्तुत तर्क में एक और बिन्दु जोड़ते हुए कहा कि लोकतन्त्र किसी भी अन्य शासन-प्रणाली की तुलना में मानवजाति के नैतिक विकास में सर्वाधिक योगदान करता है। उसकी दृष्टि में लोकतन्त्र नैतिक आत्मोत्थान और वैयक्तिक क्षमताओं के विकास एवं विस्तार का सर्वोच्च माध्यम है। इस सम्बन्ध में यह उल्लेख्य है कि बेंथम और मिल दोनों में कोई भी सार्वभौम वयस्क मताधिकार अथवा एक व्यक्ति एक मत के पक्षधर नहीं थे। 1802 तक बेंथम ने सीमित मताधिकार की वकालत की और 1809 में सिर्फ सम्पन्न वर्गों के गृहस्वामियों के लिए सीमित मताधिकार का नारा दिया और अन्ततोगत्वा 1817 में सार्वभौम मताधिकार का आह्वान किया, लेकिन इस अधिकार को मर्दों तक ही सीमित रखा। इसी प्रकार मिल भी सार्वभौम वयस्क मताधिकार के पक्ष में नही था, क्योंकि उसे आशंका थी कि एक वर्ग के लोग बहुसंख्यक होने की स्थिति अपना प्रभुत्व कायम कर सकते है और अन्य वर्गों के हित के विरुद्ध सिर्फ अपने हित के नियम-कानून बना सकते हैं। आगे चलकर उसने अपनी पुस्तक ‘रिप्रेजेंटेंटिव गवर्नमेंट‘ (प्रतिनिधिमूलक सरकार, 1816) में उसने कुछ लोगों के लिए एक से अधिक मतदान की वकालत की लेकिन खैरात पाने वाले अकिंचनों, निरक्षरों, दिवालियों, कर नहीं चुकाने वालों को, अर्थात् उन सभी लोगों को जो संयुक्त रूप से श्रमिक वर्ग का निर्माण करते हैं, इससे वंचित रखा। वह सिर्फ एक ऐसी प्रतिनिधिमूलक सरकार का हिमायती था जो आधारभूत समानताओं में दखलअंदाजी नही करती और मुक्त बाजार और हस्तक्षेप की नीति अपना कर चलती है। बाद के उदारवादी विचारक लोकतन्त्र का समर्थन करते रहे और पश्चिमी यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका ने इसकी स्वीकार्यता को और आगे बढ़ाने का काम किया।

लोकतंत्र के सम्बन्ध में पुरातन उदारवादी मत को समय-समय पर अनेक विचारकों द्वारा चुनौतियाँ मिलती रही हैं। प्रथमतः, लोकतन्त्र की इस मान्यता पर प्रश्न खड़े किए गए हैं कि प्रत्येक व्यक्ति यह जानता है कि उसके लिए सर्वोत्तम क्या है। लॉर्ड ब्राइस, ग्राहम वाल्स इत्यादि विचारक मानते हैं कि मनुष्य उतना विवेकशील, तटस्थ, जानकार अथवा सक्रिय नहीं है जितना कि प्रजातन्त्र के संचालन के लिए उसे मान लिया जाता है। द्वितीयतः, लोकतन्त्र जनता के शासन की आधारशिला पर टिका होता है, किन्तु यह स्पष्टतः बतलाना आसान नहीं है कि ‘शासन‘ और ‘जनता‘ के बिल्कुल सही अर्थ क्या है। इसलिए सरकार के आधार के रूप में लोकमत एक मिथक है। तृतीयतः लोकतन्त्र से अपेक्षा की जाती है कि वह सामान्य हित का काम करेगा, लेकिन सामान्य हित जैसी कोई चीज नहीं भी हो सकती है। किसी भी समाज में सामान्य हित विभिन्न लोगों के लिए विभिन्न अर्थ रख सकता है। चतुर्थतः, पुरातन उदारवादी सिद्धान्त समूह मनोविज्ञान, सामूहिक उत्पीड़न और प्रत्यायन तथा जनोत्तेजक नेतृत्व जैसे कारकों की उपेक्षा कर देता है। पंचमतः, लोकतन्त्र में दलीय प्रणाली प्रायः अभिजात्य वर्ग का खेल बन जाती है अथवा उनके द्वारा नियंत्रित होती है जो साधन सम्पन्न है और वे ही महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर निर्णय लेते हैं। फिर, नीति-निर्धारण की प्रक्रिया भी काफी जटिल है। उदारवादियों ने अनावश्यक रूप से इसे सरल, पारदर्शी और न्यायसंगत मान लिया है। और सबसे बड़ी त्रुटि इस सिद्धान्त में यह है कि यह राजनीतिक समानता किन्तु आर्थिक विषमता पर आधारित है।

लोकतन्त्र में अधिकारों की महत्वपूर्ण भूमिका

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बीसवीं सदी में राजनीतिक विचारकों ने प्रश्न उठाना शुरू किया कि क्या जनसाधारण प्रतिदिन के जीवन में राजनीति में कोई भूमिका निभा सकते हैं? क्या सामान्य नागारिक, जो अपने जीविकोपार्जन में लगे रहते हैं, राजनीतिक भूमिका निभाने के लिए समय और शक्ति लगा सकते हैं? क्या जनसमूह बिना किसी प्रतिबन्ध के चुनावी लोकतन्त्र के माध्यम से अपनी भावनाओं का खुला प्रदर्शन करता है तो स्वतन्त्रता नष्ट हो जाएगी? इन प्रश्नों के उत्तर में ही लोकतन्त्र के अभिजनवादी और बहुलवादी सिद्धान्त विकसित हुए हैं।

अभिजन (एलीट) पद का प्रयोग किसी समूह के ऐसे अल्पसंख्यक वर्ग के लिए होता है जो कुछ कारकों की वजह से समुदाय में विशिष्ट हैसियत रखते हैं। यह अल्पसंख्यक वर्ग समाज में सत्ता के वितरण में अग्रणी भूमिका में होता है। राजनीतिक श्रेष्ठीवर्ग, प्रेस्थस के अनुसार, सामुदायिक मामलों में अपने संख्या-बल के अनुपात में कहीं ज्यादा सत्ता का उपभोग करता है।

प्रजातन्त्र के सबन्ध में अभिजन सिद्धान्त का अभ्युदय द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद हुआ इस सिद्धान्त के प्रवर्त्तकों में विल्फ्रेडो पैरेटो, ग्रेटानोमोस्का, रॉबर्ट मिशेल्स और अमेरिकी लेखक जेम्स बर्नहाम तथा सी. राइट मिल्स प्रमुख हैं। इस सिद्धान्त का मुख्य आधार यह मान्यता है कि समाज में दो तरह के लोग होते हैं- गिने चुने विशिष्ट लोग और विशाल जनसमूह। विशिष्ट लोग हमेशा शिखर तक पहुँचते हैं क्योंकि वे सारी अर्हताओं से सम्पन्न सर्वोत्तम लोग होते हैं। अभिजन वर्ग विशेष रूप से राजनीतिक अभिजन वर्ग, सारे राजनीतिक कृत्यों का निष्पादन करता है, सत्ता पर एकाधिकार कर लेता है और सत्ता से जुड़े सारे लाभ उठाता है। बहुसंख्यक समूह अभिजन वर्ग द्वारा मनमाने ढंग से नियंत्रित और निर्देशित होता है। संगठित अल्पसंख्यक ही हमेशा असंगठित जनसमूह को शासित और निर्देशित करता है। रॉबर्ट मिशेल्स ने ‘अल्पतन्त्र के लौह कानून‘ जैसी उक्ति का प्रयोग करते हुए कहा है कि सामान्य वर्गों को अभिजन वर्ग की अधीनता स्वीकार करनी ही चाहिए क्योंकि जनसंख्या का एक विशाल भाग उदासीन कर्मण्य और स्व-शासन में अक्षम होता है। लोकतंत्र के अभिजन सिद्धान्त की मुख्य विशेषताए हैं :

  • (1) लोग समान रूप से योग्य नहीं होते, अतः अभिजन और गैर-अभिजन का निर्माण अपरिहार्य है,
  • (2) अपनी उच्चतर योग्यताओं के बल पर अभिजनवर्ग सत्ता-नियन्त्रक एवं प्रभविष्णु बन जाता है,
  • (3) अभिजनवर्ग अनवरत एक जैसा नहीं रहता। इस वर्ग में नए लोग शामिल होते हैं और पुराने लोग बाहर हो जाते है,
  • (4) बहुसंख्यक जनसमुदाय, जो गैर-अभिजनवर्ग का निर्मायक है, में अधिकांश भावशून्य, आलसी और उदासीन होते हैं, इसलिए एक ऐसा अल्पसंख्यक वर्ग का होना आवश्यक है जो नेतृत्व प्रदान करे और
  • (5) आज के युग में शासक अभिजनवर्ग में मुख्य रूप से बुद्धिजीवी, औद्योगिक प्रबन्धक और नौकरशाह होते हैं।

लोकतन्त्र के अभिजन सिद्धान्त का सुव्यवस्थित प्रतिपादन सर्वप्रथम जोसेफ शुम्प्टर ने अपनी पुस्तक ‘कैपिटलिज्म, सोशलिज्म एंड डेमोक्रेसी‘ (पूंजीवाद, समाजवाद और लोकतन्त्र, 1942) में किया। बाद में सार्टोरी, रॉबर्ट डाल, इक्सटाईन, रेमण्ड अरोन, कार्ल मैन हियुमण्ड, सिडनी वर्बा आदि ने अपनी रचनाओं में इस मत का समर्थन किया। लोकतन्त्र की यह अवधारणा इस मान्यता पर आधारित है कि जनसंख्या का विशाल भाग अक्षम और तटस्थ होता है और वह योग्यता और क्षमता के आधार पर कुछ लोगों का चुनाव करता है जो राजनीतिक दल का नियन्त्रित और संचालित करते हैं। बहुसंख्यक लोग जीविका कमाने में व्यस्त रहते हैं। उन्हें राजनीतिक मामलों में न तो अभिरूचि होती है, न समझ। इसलिए वे अभिजनवर्ग से कुछ लोगों का चयन कर लेते हैं और उनके अनुयायी बन जाते हैं। अभिजन सिद्धान्त के अनुसार आज के जटिल समाज में कार्यक्षमता के लिए विशेषज्ञता आवश्यक है और विशेषज्ञों की संख्या हमेशा कम ही होती है। अतः राजनैतिक नेतृत्व ऐसे चुनिन्दा सक्षम लोगों के हाथ में होना आवश्यक है। यह सिद्धान्त लोगो की अतिसहभागिता को भी खतरनाक मानता है, क्योंकि तानाशाही प्रवृत्ति का हिटलर जैसा कोई ताकतवर नेता सत्ता प्राप्त करने के लिए जनसमूह को लामबन्द कर लोकतन्त्र को ही खत्म कर दे सकता है जिसका सीधा अर्थ है मौलिक स्वतन्त्रताओं का अन्त। इसलिए उनका दावा है कि लोकतान्त्रिक और उदारवादी मूल्यों को बचाए रखने के लिए जनसमूह को राजनीति से अलग रखना जरूरी है। अभिजन सिद्धान्त के अनुसार आम जनता के द्वारा वास्तविक शासन हो ही नहीं सकता। शासन हमेशा जनता के लिए होता है, जनता के द्वारा कभी नही, क्योंकि जनता जिन्हें प्रतिनिधि चुनती है वे अभिजनवर्ग के ही होते हैं। दूसरे शब्दों में लोकतन्त्र का अर्थ है अभिजन वर्गां के बीच प्रतिद्वन्द्विता और जनता द्वारा यह निर्णय कि कौनसा अभिजन ऊपर शासन करेगा। इस प्रकार, लोकतंत्र मात्र एक ऐसी कार्यप्रणाली है जिसके द्वारा छोटे समूहों में से एक जनता के न्युनतकम अतिरिक्त समर्थन से शासन करता हैं अभिजनवादी सिद्धान्त यह भी मानता है कि अभिजन वर्गों- राजनीतिक दलों, नेताओं, बड़े व्यापारी घरानों के कार्यपालकों, स्वैच्छिक संगठनों के नेताओं और यहां तक कि श्रमिक संगठनों के बीच मतैक्य आवश्यक है ताकि लोकतन्त्र की आधारभूत कार्यप्रणाली को गैर जिम्मेदार नेताओं से बचाया जा सके। इससे यह स्पष्ट होता है कि बाह्य तौर पर तो अभिजन वर्ग सिद्धान्त लोकतन्त्र के विचार को अधिक व्यवहारवादी और आनुभविक बनाने का दावा करती है, लेकिन अन्ततः यह लोकतंत्र को एक ऐसे रूढ़िवादी राजनीतिक सिद्धान्त में बदल देता है जो उदारवादी अथवा नव-उदारवादी यथास्थितिवाद से सन्तुष्ट हो जाता है और इसके स्थायित्व को बनाए रखना चाहता है।

अभिजनवाद की कई विचारकों ने आलोचना की है जिनमें सी. बी. मैक्फर्सन, ग्रीम डंकन, बैरी होल्डन, रॉबर्ट डाल आदि प्रमुख हैं। इस सिद्धान्त के विरुद्ध मुख्य आपत्तियां निम्नलिखित हैं:

  • (1) अभिजनवाद लोकतन्त्र का अर्थ ही विकृत कर देता है और इसकी आधारभूत विशेषताओं की उपेक्षा कर इसे स्वेच्छाचारी बना देता है। यदि जनता का काम प्रतिनिधियों को चुनना भर ही है तो शासन संचालन में उनके पास बोलने-कहने को अधिकार नहीं रह जाता और ऐसी स्थिति में प्रणाली अलोकतांत्रिक बन जाती है।
  • (2) यह सिद्धान्त लोकतन्त्र की परम्परागत पुरातन अवधारणा के नैतिक उद्देश्य को समाप्त कर देता है पुरातन अवधारणा के अनुसार लोकतन्त्र का लक्ष्य मानवजाति का उन्नयन है, लेकिन अभिजन सिद्धान्त इस नैतिक पक्ष की अवहेलना कर देता है और पूरी स्थिति अल्पसंख्यक अभिजनवर्ग के शासन की निष्क्रिय स्वीकृति हो जाती है।
  • (3) अभिजन सिद्धान्त सहभागिता, जो लोकतान्त्रिक शासन का केन्द्रीय तत्त्व है, का महत्त्व घटा देता है और दावा करता है कि सहभागिता सम्भव है ही नहीं। इस तरह जनता द्वारा शासन असंभव हो जाता है।
  • (4) अभिजन सिद्धान्त एक सामान्य व्यक्ति को राजनीतिक दृष्टि से अक्षम और निष्क्रिय रूप में चित्रित करता है, एक ऐसा व्यक्ति जो अपना जीवन-निर्वाह करता है, शाम में अपने परिवार या मित्रों के बीच अथवा मीडिया के साधनों के उपयोग में अपना समय बिताता है और श्रेष्ठी समूहों में से किसी एक को समय-समय पर चुनने के अतिरिक्त कुछ नही करता।
  • (5) अभिजन सिद्धान्त लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के द्वारा मौलिक परिवर्तन लाने के बदले प्रणाली के स्थायित्व बनाए रखने पर ही विशेष बल देता है। उसका मुख्य उद्देश्य लोकतान्त्रिक प्रणाली को कायम रखना है। वह सामाजिक आन्दोलन को लोकतन्त्र के लिए खतरा और अभिजनवर्ग द्वारा व्यवस्थित कानूनी प्रक्रिया का विघटनकारी मानता है।

लोकतन्त्र का बहुलवादी सिद्धान्त

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लोकतन्त्र का बहुलवादी सिद्धान्त भी जन सामान्य के बदले समूहों की भूमिका पर बल देता है। कुछ विचारकों ने लोकतन्त्र सम्बन्धी ऐसे सिद्धान्तों का निरूपण किया है जो अभिजन सिद्धान्त और बहुलवादी सिद्धान्त का मिश्रण है। लेकिन यह भी सही है कि बहुलवादी सिद्धान्त की उत्पत्ति अभिजन सिद्धान्त की आंशिक प्रतिक्रिया के रूप में हुई है। अभिजन सिद्धान्त एक ऐसी स्थिति के निर्माण से सन्तुष्ट है जिसमें सत्ता ऐसे अभिजनवर्ग में निहित होती है जो महत्त्वपूर्ण निर्णय लेता है, लेकिन बहुलवादी एक ऐसी प्रणाली पर जोर देता है जो उदारवादी लोकतन्त्र में अभिजनवाद की प्रवृत्ति को निष्प्रभावी कर देगा और सही जनाकांक्षा को प्रकट करेगा।

बहुलवाद की अवधारणा वैसे तो पुरानी है, किन्तु बीसवीं सदी में आधुनिक उदारवादी चिन्तन का यह एक महत्त्वपूर्ण अंग बन गया। सामान्य अर्थ में बहुलवाद सत्ता को समाज में एक छोटे से समूह तक सीमित करने के बदले उसे प्रसारित और विकेन्द्रीकृत कर देता है। आधुनिक औद्योगिक और प्रौद्योगिक काल में, बहुलवादियों के अनुसार, सत्ता विखण्डित हो गई है और इसमें प्रतियोगी सार्वजनिक और निजी समूहों की साझेदारी बढ़ गई है। उच्च स्थानों पर आसीन लोगों के पास पूर्व की भांति सत्ता नहीं रह गई है, क्योंकि वे मुख्य रूप से परस्पर विरोधी स्वार्थों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने लगे। विभिन्न समूह अपने नेतृत्व के माध्यम से मध्यस्थता करते हैं और इसके जरिए व्यक्ति का भी प्रतिनिधित्व हो जाता है। यद्यपि औद्योगिक और प्रौद्योगिक एकीकरण और प्रौद्योगिक अभियाचनाओं के कारण सत्ता कुछ ही व्यक्तियों में केन्द्रित हो गई है लेकिन अल्पसंख्यक किन्तु वृहत्तर, हित-समूहों के बीच प्रतियोगिता सार्वजनिक हित के पक्ष में जाती है। बड़े व्यापारी घरानों, श्रम और सरकार के बीच प्रतियोगिता ने प्रत्येक समूह को अपनी सत्ता का दुरुपयोग करने पर लगाम कसी है। इस प्रकार, नागरिकों के बीच सम्पत्ति, शिक्षा और सत्ता में असमानता को निम्न प्रभावित कर दिया जाता है क्योंकि संगठन और समूह आशा से अधिक प्रतिनिधित्व प्रदान करते है और इससे लोकतन्त्र अधिक वास्तविक बनता है और इस अर्थ में अधिक व्यवहार्य भी सिद्ध होता है। भारत का ही उदाहरण लें। यहाँ महेन्द्र सिंह टिकैत का किसान संगठन और नर्मदा बचाओ आन्दोलन ऐसे जन आन्दोलन हैं जो लाखों गरीब और अशिक्षित लोगों की आवाज़ बन जाते हैं। और लोकतंत्र को निश्चय ही अधिक वास्तविक बनाते हैं। यह सही है कि अभिजनवर्ग और उनके समाचार मीडिया उनकी आलोचना करते हैं और उन्हें प्रगति का बाधक बताते हैं और यदा कदा सर्वोच्च न्यायालय भी उन्हें अपने आन्दोलनों को रोक देने के लिए बाध्य करता है, किन्तु इस सब के बावजूद ऐसे जनान्दोलन भारतीय लोकतन्त्र को अधिक सार्थक और प्रतिनिधिमूलक बनाते हैं। लोकतन्त्र की बहुवादी अवधारणा का विकास मुख्य रूप से अमेरिका में हुआ। इसके प्रणेताओं में एस. एम. लिण्सेट, रॉबर्ट डाल, वी. प्रेस्थस, एफ. हंटर आदि प्रमुख हैं। उनका तर्क है कि राजनीतिक सत्ता उतनी सरल नहीं है जितनी दिखाई पड़ती है, यह विभिन्न समूहों, संगठनों, वर्गों और संघों समेत अभिजन वर्ग जो आमतौर पर समाज को नेतृत्व प्रदान करता है के बीच बंटी हुई है। विभिन्न स्वार्थ समूह अपनी मांगों को सीधे तौर पर तो प्रस्तुत करते ही हैं, विभिन्न राजनीतिक दलों के माध्यम से भी पेश करते हैं। बहुलवादी लोकतंत्र की एक परिभाषा इस प्रकार दी गई है। यह एक ऐसी राजनीतिक प्रणाली है जिसमें नीतियां विभिन्न समूहों के बीच पारस्परिक परामर्श और विचारों के आदान प्रदान के द्वारा निर्धारित की जाती है क्योंकि कोई भी समूह या अभिजनवर्ग इतना सशक्त नही है कि वह अकेले सरकार पर इतना दबाब डाल सके कि वह उसकी सारी माँगों को पूरा कर सके।

बहुलवादी सत्ता की इस साझेदारी का अनुमोदन करते हैं कि इससे लाभ यह होता है कि कोई भी सामाजिक समूह सरकार की नीति- निर्धारण की प्रक्रिया पर इस कदर हावी नहीं हो पाता कि वह अन्य वर्गों के हितों की अनदेखी कर सके। लेकिन, बहुलवादी सिद्धान्तकारों की एक मान्यता यह भी थी कि सभी नागरिकों को राजनीतिक क्षेत्र में अपने हितों को संघटित करने और उन्हें साधने के लिए वैधानिक अवसर और आर्थिक संसाधन प्राप्त हैं। इस अवसर के बगैर नागारिक किसी प्रस्तावित कदम का समर्थन या विरोध नहीं कर सकते। बहुलवादी विचारक राजनीति को व्यक्तियों के बदले समूहों के बीच निश्चयों की प्रक्रिया मानते हैं और घोषणा करते हैं कि लोकतन्त्र सर्वोत्तम तरीके से तभी काम करता है जब नागरिक अपने विशेष हितों के समर्थक समूह से जुड़ जाते हैं। वे इस बात पर विशेष बल देते हैं कि किसी समाज में व्यक्तियों की सक्रिय सहभागिता होनी चाहिए और अपने संकल्प को क्रियान्वित करने के लिए विभिन्न समूहों से जुड़ जाना चाहिए। साथ ही, सारे समूहों और उनके सदस्यों को यह स्वीकार करना चाहिए कि चुनाव राजनीतिक निर्णयों में विशाल समुदाय की सहभागिता का एक कारगर हथियार है। इसी तरह, अभिजन वर्ग के सारे समूह और सदस्य पारस्परिक प्रतियोगिता के द्वारा लोकतन्त्र को सम्भव बनाते हैं। इससे स्पष्ट है कि बहुलवादी सिद्धान्त वास्तव में अभिजनवाद का पूर्णतः विरोध नहीं करता क्योंकि इसके प्रवर्तकों के अनुसार अभिजनवर्ग का अस्तित्व एक हकीकत है और वे उसकी अवस्थिति से सन्तुष्ट है। यही कारण है कि बहुलवादी सिद्धान्तों कभी-कभार अभिजनवर्ग सिद्धान्तों से आंशिक रूप में ही भिन्न समझा जाता है। महान अमेरिकी राजनीतिक विचारक रॉबर्ट डाल लोकतन्त्र की अभिजनवादी और बहुलवादी अभिधारणाओं को संयुक्त करते हुए अपनी लोकतान्त्रिक अभिधारणा को बहुतन्त्र की संज्ञा देता है। उसके अनुसार, जनता समूहों और अभिजनवर्ग के राजनीतिज्ञों दोनों के माध्यम से सक्रिय होती है। उसने अनेक ऐसे समुदायों का हवाला दिया है जो सरकार के नीति-निर्धारण को प्रभावित करते हैं- जैसे, व्यापारी घराने और उद्योगपति, सौदागर, श्रमिक संगठन, किसान संगठन, उपभोक्ता, मतदाता इत्यादि। ऐसा नहीं है कि उनकी पूरी कार्यसूची क्रियान्वित हो ही जाती है। सारे समूह समान रूप से सशक्त नहीं होते और अनेक समूह अपनी मनोनुकूलनीतियों को मनवाने की अपेक्षा प्रतिकूलनीतियों की रोकथाम में ज्यादा प्रभावी होते हैं।

बहुलवादी सिद्धान्त के विरुद्ध उठाई जाने वाली आपत्तियों में निम्नलिखित प्रमुख हैं:

  • (१) बहुलवादी सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि अलग-अलग समूहों के बीच हितों के टकराव के फलस्वरूप उन हितों अथवा उनके अंश को प्रोत्साहन मिलता है जो स्वीकार किए जाने के योग्य होते हैं। लेकिन कभी-कभी ऐसा देखा जाता है कि इस टकराव के कारण यथास्थिति अथवा गत्यावरोध के हालात बन जाते हैं। कभी-कभी तो और बदतर स्थिति हो जाती है जब एक समूह-विशेष अपनी सम्पूर्ण कार्य सूची को मनवा लेता है जिसके फलस्वरूप अन्य समूह आक्रोशित हो उठते हैं।
  • (२) बहुलवादी सिद्धान्त का सूत्र-वाक्य है कि लोग अपने हितों की सीधे तौर पर पूर्ति चाहते हैं। लेकिन यह सर्वथा और सर्वदा सत्य नहीं होता। लोग राष्ट्रवादी अथवा अन्य अभिप्रेरणाओं से भी संचालित हो सकते हैं।
  • (३) माइकल मावगोलिस के अनुसार बहुलवादी सिद्धान्त समाज के संसाधनों को संवर्द्धित या पुनर्वितरित करने के तरीके खोजने में अक्षम है। नतीजतन, निम्नजातियों, महिलाओं, आदिवासियों तथा परम्परागत रूप से समाज के अन्य वंचित तबकों को साधन सम्पन्न वर्गों की भान्ति राजनीति में सहभागिता के समान अवसर नहीं मिल पाते।
  • (४) मावगोलिस का यह भी कहना है कि बहुलवादियों के पास यथोचित आर्थिक और पर्यावरणीय मूल्य पर सामाजिक समानता और विकास की कोई योजना नहीं है।

लोकतन्त्र का सहभागिता सिद्धान्त

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राजनीति क्रियाकलाप में सहभागिता लोकतन्त्र का मूल तत्त्व है, लेकिन खासकर पूंजीवादी लोकतन्त्रों में यह प्रायः चुनावों में मतदान तक ही सीमित रहता है। लोकतन्त्र का सहभागिता सिद्धान्त संवर्द्धित भागीदारी को एक आदर्श भी मानता है और कृत्यात्मक आवश्यकता भी। इस सिद्धान्त के प्रमुख प्रस्तावकों में 1960 के दशक से कैरोल पेर्लमैन, सी. बी. मैक्फर्सन और एन. पॉलैन्ट जास जैसे वामपंथी विचारक प्रमुख रहे हैं। सहभागी लोकतंत्र की दो प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

(1) निर्णय लेने की प्रक्रिया का इस रूप में विकेन्द्रीकरण कि उन निर्णयों से प्रभावित होने वाले लोगों तक नीति निर्धारण किया जा सके।
(2) नीति-निर्धारण में सामान्यजन की प्रत्यक्ष हिस्सेदारी। सहभागिता सिद्धान्त के समर्थकों के अनुसार लोकतन्त्र वास्तविक अर्थ प्रत्येक व्यक्ति की समान सहभागिता है, न कि मात्र सरकार को स्थायी बनाए रखना जैसा कि अभिजनवादी अथवा बहुलवादी सिद्धान्तकार मान लेते हैं। सच्चे लोकतन्त्र का निर्माण तभी हो सकता है जब नागरिक राजनीतिक दृष्टि से सक्रिय हों और सामूहिक समस्याओं में निरन्तर अभिरूचि लेते रहें। सक्रिय सहभागिता इस लिए आवश्यक है ताकि समाज की प्रमुख संस्थाओं के पर्याप्त विनिमय हों और राजनीतिक दलों में अधिक खुलापन और उत्तरदायित्व के भाव हों।

सहभागी लोकतन्त्र के सिद्धान्तकारों के अनुसार यदि नीतिगत निर्णय लेने का जिम्मा केवल अभिजन वर्ग तक सीमित रहता है तो उसके लोकतन्त्र का वास्तविक स्वरूप बाधित होता है। इसलिए वे इसमें आम आदमी की सहभागिता की वकालत करते हैं। उनका मानना है कि यदि लोकतान्त्रिक अधिकार कागज के पन्नों अथवा संविधान के अनुच्छेदों तक ही सीमित रहे तो उन अधिकारों का कोई अर्थ नहीं रह जाता, अतः सामान्य लोगों द्वारा उन अधिकारों का वास्तविक उपभोग किया जाना आवश्यक है। लेकिन यह उपभोग भी तभी सम्भव है जबकि व्यक्ति स्वतन्त्र और समान हो। यदि लोगों का विश्वास हो कि नीतिगत निर्णयों में कारगर सहभागिता के अवसर वास्तव में विद्यमान न हैं तो वे निश्चय ही सहभागी बनेंगे। ऐसी स्थिति में वे प्रभावी ढंग से साझेदारी भी कर सकेंगे। जिस लोकतन्त्र में, चाहे वह राजनीतिक हो या प्राविधिक या शिल्पतान्त्रिक अभिजनवर्ग का वर्चस्व होता है वह नागरिकों के लिए सन्तोषप्रद नही होता और आमलोग सहभागिता के द्वारा ही उस वर्ग के वर्चस्व को समाप्त कर सकते हैं। सहभागिता सिद्धान्त के समर्थकों का यह भी कहना है कि आज के औद्योगिक और प्रौद्योगिक समाजों में शिक्षा का स्तर ऊँचा हो गया है और बौद्धिक तथा राजनैतिक चेतना से सम्पन्न समाज में अभिजन और गैर-अभिजन के बीच की खाई कम हुई है। इसलिए कार्यक्षमता और विकास की दृष्टि से अधिकांश मामलों में सामान्य लोगों की सहभागिता कोई बाधा नहीं रह गई है। सच पूछा जाए तो सत्ता का विकीर्णन ही अत्याचार के विरुद्ध सबसे मजबूत सुरक्षा-कवच है। सहभागिता पर आधारित लोकतंत्र ही नागरिकों को तटस्थता, अज्ञान और अलगाव से बचा सकता है और लोकतन्त्र की बुनियादी जरूरतों को पूरा कर सकता है।

प्रश्न है, आम नागरिक की राजनीतिक सहभागिता कैसे हो ? इसके सिद्धान्तकारों ने इसके निम्नलिखित तरीके बताए हैं:

  • 1. चुनावों में मतदान
  • 2. राजनीतिक दलों की सदस्यता
  • 3. चुनावों मे अभियान कार्य
  • 4. राजनीतिक दलों की गतिविधियों में शिरकत
  • 5. संघों, स्वैच्छिक संगठनों और गैर-सरकारी संगठनों जैसे दबाव तथा लॉबिंग समूहों की सदस्यता और सक्रिय साझेदारी
  • 6. प्रदर्शनों में उपस्थिति
  • 7. औद्योगिक हड़तालों में शिरकत (विशेषकर जिनके उद्देश्य राजनीतिक हों अथवा जो सार्वजनिक नीति को बदलने अथवा प्रभावित करने को अभिप्रेत हों)
  • 8. सविनय अवज्ञा आन्दोलन में भागीदारी, यथा- कर चुकाने से इन्कार इत्यादि
  • 9. उपभोक्ता परिषद् की सदस्यता
  • 10. सामाजिक नीतियों के क्रियान्वयन में सहभागिता
  • 11. महिलाओं और बच्चों के विकास, परिवार नियोजन, पर्यावरण संरक्षण, इत्यादि सामुदायिक विकास के कार्यों में भागीदारी, इत्यादि।

मैक्फर्सन की टिप्पणी है कि आज के राष्ट्र क्षेत्र और जनसंख्या की दृष्टि से विशालकाय हैं और यह सम्भव नहीं है कि सारे नागरिक रोजमर्रे के राजनीतिक विमर्श या नीति निर्धारण में शामिल हों, फिर भी यदि कुछ शर्तो को स्वीकार कर लिया जाए तो सहभागिता का अनुपात निश्चित रूप से बढ़ाया जा सकता ह। ये शर्ते हैं:

(1) यदि राजनीतिक दल “प्रत्यक्ष लोकतन्त्र” के सिद्धान्त के अनुसार लोकतान्त्रिक हो,
(2) यदि राजनीतिक दल सच्चे अर्थ में संसदीय ढाँचे के अन्तर्गत कार्य करते हों, और
(3) यदि राजनीतिक दल के क्रिया कलाप श्रमिक संगठनों, स्वैच्छिक संस्थाओं तथा ऐसे ही अन्य निकायों से सम्पूरित होते हों।

डेविड हेल्ड ने सहभागिता सिद्धान्त पर आपत्ति उठाते हुए कहा कि यह पुरातन/अभिजन बहुलवादी जैसे सिद्धान्तों से बेहतर तो है, लेकिन इससे यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि कैसे और क्यों सिर्फ सहभागिता मानवीय विकास, जो लोकतन्त्र का एक महत्त्वपूर्ण लक्ष्य है, के उच्चतर स्तर को प्राप्त कर सकेगी। इस बात का कोई साक्ष्य अथवा तर्क संगत आधार नहीं मिलता कि सहभागिता नागरिकों को सामान्य हित के प्रति अधिक सहयोगशील और प्रतिबद्ध बनाएगी। हेल्ड इस केन्द्रीय मान्यता को भी आवश्यक रूप से सत्य नहीं मानता कि आम लोग अपने जीवन को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर नीति निर्धारण करने और निर्णय लेने में अधिक उत्तरदायी बनना चाहते हैं। यदि वे सामाजिक-आर्थिक मामलों और नीतियों के निर्धारण में भाग लेना नहीं चाहें तो उन्हें इसके लिए बाध्य करना उचित नहीं माना जा सकता। फिर भी मान लिया जाए कि आम लोग अपने लोकतान्त्रिक रुझान को यदि एक सीमा से आगे ले जाना चाहें और बुनियादी स्वतन्त्रता और अधिकार के मामले में दखलअन्दाजी करने लगे तो लोकतन्त्र का क्या हश्र होगा, ऐसे प्रश्नों पर सहभागिता सिद्धान्त के समर्थकों ने पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है। कुक और मॉर्गन के अनुसार सहभागी लोकतन्त्र को असली जामा पहनाना उतना आसान नहीं है जितना ऊपरी तौर पर प्रतीत होता है। उदाहरणार्थ, सहभागी इकाई के सम्यक् आकार और कृत्य क्या हों फिर, नागरिकों की सक्रिय सहभागिता के बल पर स्थानीय स्तरों पर लिए गए निर्णयों को सम्पूर्ण राष्ट्र के हित के साथ किस प्रकार समन्वित एवं समेकित किया जाएगा? एक स्थानीय सहभागी इकाई के नीतिगत मामले दूसरी इकाई के विरोधी भी तो हो सकते हैं। फिर एक बात यह भी है कि अधिकतम सम्भव सहभागिता के बल पर लिए गए निर्णय आवश्यक नहीं कि सर्वाधिक कारगर निर्णय हों ही। सहभागिता सिद्धान्त के समर्थक कार्यक्षमता एवं प्रभाव के मुद्दों पर पर्याप्त ध्यान नहीं देते।

लोकतन्त्र का मार्क्सवादी सिद्धान्त

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आम धारणा के विपरीत लोकतन्त्र के विचार को मार्क्स और पश्चवर्ती मार्क्सवादी विचारकों ने भी स्वीकार कर लिया है। इतना अवश्य है कि उनकी लोकतन्त्र-सम्बन्धी अभिधारणा पाश्चात्य उदारवादी लोकतान्त्रिक अभिधारणाओं से पूर्णतः भिन्न है। चूंकि मार्क्सवादियों का मानना है कि पूंजीवादी व्यवस्था में लोकतान्त्रिक अधिकार सही अर्थ में आम जनता के पास न होकर सिर्फ साधन-सम्पन्न वर्ग के हाथ में होता है, इसलिए वे एक ऐसे लोकतन्त्र की स्थापना चाहते हैं जो ‘जनता का लोकतन्त्र‘ (पीपल्स डेमोक्रेसी) हो। मार्क्सवादी लोकतन्त्र में उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व को खत्म करने और सर्वहारावर्ग द्वारा अर्थव्यवस्था को नियन्त्रित करने के पश्चात् समाजवादी लोकतन्त्र की स्थापना होती है।

मार्क्स उदारवादी संवैधानिक लोकतन्त्र का आलोचक था क्योंकि उसके अनुसार पूंजीवादी लोकतन्त्र का आधार एक ऐसी आर्थिक प्रणाली होती है जिसमें उत्पादन के साधन हमेशा पूंजीपति वर्ग के नियन्त्रण में होते हैं। यही पूंजीपति वर्ग अपनी धन-शक्ति के बल पर राजनीतिक व्यवस्था की नियन्त्रण में रखकर सरकार और राज्य-तन्त्र को अपने अधीन रखता है। राज्य सत्ता, अधिकार और विशेषाधिकार पूर्णतः उसी वर्ग के पास होते हैं और श्रमिकवर्ग के पास सिर्फ नाम की स्वतन्त्रता और अधिकार होते हैं। राज्य का अधिकारी वर्ग, न्यायालय और पुलिस बल भी तटस्थ न होकर प्रभुतासम्पन्न वर्ग के ही हित साधक होते हैं। इसलिए, लोकतन्त्र एक ऐसी शासन-प्रणाली का रूप अख्तियार कर लेता है जो शासक वर्ग की सत्ता और विशेषाधिकार को बढ़ावा देने और उच्च वर्ग के हितों को साधने के काम आता है।

इसके बावजूद, मार्क्स और एंगेल्स ने यह स्वीकार किया है कि सम्पन्न पूंजीपति वर्ग द्वरा नियन्त्रित उदारवादी बुर्जुआ लोकतन्त्र भी किसी हद तक अपने नागरिकों को वास्तविक अधिकार देने के ऐतिहासिक दावे कर सकता है और श्रमिक वर्ग इसका इस्तेमाल अपने को संगठित कर सर्वहारा की क्रान्ति के लिए कर सकते हैं। उदारवादी लोकतन्त्रों में आम मताधिकार का उपयोग सर्वहारावर्ग की क्रांतिकारी आन्दोलन की पृष्ठभूमि तैयार करने में किया जा सकता है। मार्क्सवादी यह अवश्य मानते हैं कि कुछ स्थितियों में हिंसक क्रान्तिकारी आन्दोलन की आवश्यकता नहीं हो सकती है लेकिन ऐसी स्थितियों की सम्भावना अत्यल्प है। अगर समाजवादी क्रान्ति के लक्ष्य को पूरा करने के लिए संसदीय मार्ग अपनाया भी जाता है तो यह अन्य प्रकार के संघर्षों में एक अतिरिक्त सहायक उपकरण ही हो सकता है।

मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार वास्तविक लोकतन्त्र सर्वहारा के अधिनायकवाद को कायम करने के लिए सर्वहारावर्ग की क्रान्ति के पश्चात ही सम्भव है क्योंकि उदारवादी बुजुर्ग लोकतन्त्र का आदर्श प्रतिभागिता का हो सकता है, लेकिन यथार्थ में साधनहीन श्रमिक वर्ग की सहभागिता उसमें नहीं हो पाती। अपनी रचना ‘द क्रिटिक ऑफ द गोथा प्रोग्राम‘ (गोथा कार्यक्रम की समीक्षा- 1875) में मार्क्स और एंगेल्स ने अपनी अवधारणा को स्पष्ट करते हुए लिखा था ‘पूंजीवादी और साम्यवादी समाज के बीच में ही एक का दूसरे में रूपान्तरण की अवधि निहित होती है। इसी से मेल खाती एक राजनीतिक संक्रमण की अवधि भी होती है जिसमें राज्य सर्वहारा वर्ग के अधिनायकवाद और साम्यवाद में भेद किया है। वे इसे एक मध्यवर्ती काल मानते हैं। इसकी परिणति साम्यवादी समाज की स्थापना में होती है। यह समझना जरूरी है कि कार्ल मार्क्स और एंगेंल्स ने अधिनायकवाद पद का प्रयोग किस अर्थ में किया है। उनकी दृष्टि में प्रत्येक राज्य शासक सामाजिक वर्ग का अधिनायकवाद रहा है। पूंजीवादी व्यवस्था में यह वर्ग सम्पन्न औद्योगिक और व्यापारी बुर्जुआ का था जबकि उनकी अपनी अवधारणा वाला राज्य क्रान्ति के तुरन्त बाद सर्वहारा के नियंत्रण वाला राज्य होगा और तब समाजवादी पुननिर्माण की प्रक्रिया शुरू होगी जिसका अन्त एक वर्गहीन समाज की स्थापना में होगा। इसलिए, उनकी दृष्टि में लोकतन्त्र और सर्वहारा अधिनायकवाद एक ही साथ चलेंगे, ठीक वैसे ही जैसे कि पूंजीवादी व्यवस्था में उदारवादी लोकतंत्र व्यवहार्यतः लोकतन्त्र भी और उद्योगपतियों एवं व्यापारिक घरानों के बुर्जुआ वर्ग का अधिनायकवादी शासक भी। इसीलिए, मार्क्स और एंगेल्स का कहना था कि क्रान्ति और श्रमिक वर्ग के आधिपत्य के पश्चात् की प्रणाली ‘जनता के लोकतन्त्र‘ की प्रणाली होगी। जनता से उनका तात्पर्य मुठ्ठीभर सम्पन्न बुर्जुआ के स्थान पर जनसामान्य की विशाल आबादी से था। मार्क्स द्वारा प्रतिपादित ‘जनता का लोकतन्त्र‘ की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैंः

  • (1) जनता का लोकतन्त्र तत्त्वतः एक ऐसा लोकतन्त्र है जिसमें श्रमिक वर्ग का एक विशाल भाग राजनैतिक एवं नीतिगत निर्णय के अधिकार अल्पसंख्यक अभिजनवर्ग से अपने हाथ में ले लेता है। इस तरह, राजकीय एवं आर्थिक व्यवस्था के अधिकार अल्पसंख्यक उद्योगपतियों और व्यापारिक घरानों के पास नहीं रह जाते।
  • (2) जनता के लोकतन्त्र में उत्पादन के साधनों - भूमि, कल कारखानें इत्यादि पर जनता का स्वामित्व होता है, राज्य सारी उत्पादक पूंजीगत परिसम्पत्त्यिं को अपने नियन्त्रण में ले लेता है और उत्पादन-क्षमता में दु्रतगति से वृद्धि होती है। इसमें प्रत्येक नागरिक के लिए नियोजन के समान अवसर होते हैं।
  • (3) समाजवादी लोकतन्त्र में कार्यकारी और विधायी कृत्यों का समेकीकरण हो जाता है और क्रान्ति के पश्चात् सारे कार्मिक सीधे तौर पर चुने जाते हैं तथा पुलिस और सैन्य बल का स्थान नागरिक सेना ले लेती है। सारे सरकारी सेवक श्रमिक के रूप में समान वेतन पाते हैं।
  • (4) सामाजिक स्तर पर विरासत का चलन समाप्त हो जाता है, सभी बच्चे निःशुल्क शिक्षा प्राप्त करते हैं, गांवों और शहरों के बीच आबादी का न्यायसंगत वितरण होता है और सभी नागरिकों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए उत्पादक शक्तियों के संवर्धन के लिए पुरजोर कोशिश की जाती है।
  • (5) मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार जनता का लोकतन्त्र पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच की स्थिति है। व्यक्तिगत सम्पत्ति और वर्गों के उन्मूलन के पश्चात् जब समाजवादी समाज का निर्माण हो जाता है तो वह क्रमशः पूर्ण साम्यवाद की ओर अग्रसर होने लगता है। पूर्ण साम्यवाद की अवस्था में राज्य व्यवस्था का अन्त हो जाता है और उसके स्थान पर वास्तविक अर्थ में एक प्रकार का स्व-शासन कायम हो जाता है।

समाजवादी समाजों की रचना ने मार्क्सवादी विचारों को और आगे बढ़ाया, लेनिन जिसने रूस में 1917 में प्रथम समाजवादी राज्य की स्थापना की ने मार्क्सवादी चिन्तन की नई व्याख्याएं प्रस्तुत की। उसने सर्वहारा के अधिनायकवाद को स्वीकार किया और समाजवादी क्रान्ति के इसके महत्त्व पर बल दिया, लेकिन उसने इसके साथ यह भी जोड़ दिया कि सर्वहारा वर्ग का अधिनायकवाद विशाल सर्वहारा संगठन या साम्यवादी दल द्वारा ही प्रयोग में लाया जा सकता है। उसने लोकतन्त्र की तीन अवस्थाएं बताईः पूंजीवादी लोकतन्त्र, समाजवादी लोकतन्त्र और साम्यवादी लोकतन्त्र। उसके अनुसार लोकतन्त्र राज्य का एक स्वरूप है और वर्ग-विभाजित समाज में सरकार अधिनायकवादी और लोकतान्त्रिक दोनों होती है। यह एक वर्ग के लिए लोकतन्त्र है तो दूसरे के लिए अधिनायकवाद। बुर्जुआ वर्ग चुंकि अपने हित साधन में पूंजीवादी प्रणाली को नियन्त्रित और संचालित करता है, इसलिए उसे सत्ता से बेदखलकर समाजवादी लोकतन्त्र को स्थापित करना आवश्यक है। लेनिन स्वीकार करता है कि नव स्थापित समाजवादी राज्य उतना ही दमनात्मक होता है जितना कि पूंजीवादी राज्य। सर्वहारा वर्ग के शासन को लागु करने के लिए यह आवश्यक भी है। चूंकि बुर्जुआ काफी शक्तिशाली होता है, इसलिए समाजवादी लोकतन्त्र के आरम्भिक दौर में सर्वहारा वर्ग के लिए आवश्यक हो जाता है कि वह बलपूर्वक पूंजीवादी वर्ग का उन्मूलन कर दे। सर्वहारा के अधिनायकवाद के समक्ष दो लक्ष्य होते हैं:

  • (१) क्रान्ति को बचाना, और
  • (२) एक नई सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था को संघटित करना

लेनिन के अनुसार यह कार्य मुख्य रूप से साम्यवादी दल को करना पड़ता है।

इस तरह, लेनिन की दृष्टि में पूंजीवादी लोकतन्त्र में सच्चा लोकतन्त्र नहीं होता, जबकि सर्वहारा के अधिानायकवाद में पूर्वापेक्ष अधिक लोकतन्त्र होता है, क्योंकि यह बहुसंख्यक सर्वहारा वर्ग का शासन है। उसका यह भी दावा था कि अन्ततः सच्चे साम्यवाद की प्राप्ति के साथ लोकतन्त्र अनावश्यक हो जाएगा, क्योंकि उस समाज के सन्दर्भ में इसका कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।

मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन के बाद अनेक विचारकों ने मार्क्सवाद की अनेक व्याख्याएं प्रस्तुत की है। इनमें एडवर्ड बर्नस्टाइन, कार्ल कॉट्स्की, रोजा लुक्जमवर्ग आदि प्रमुख हैं। एडवर्ड बर्नस्टाइन का दावा है कि पूंजीवाद की मार्क्सवादी व्याख्या गलत है और सर्वहारा का अधिनायकवाद न तो आवश्यक है, न वांछनीय। उसके अनुसार, राजनीतिक लोकतन्त्र और उदारवादी स्वतन्त्रताएं अधिक महत्त्वपूर्ण है। लेनिन की यह मान्यता सही नहीं है कि सर्वहारा का अधिनायकवाद आवश्यक है। बर्नस्टाइन का तर्क है कि जब तक सर्वहारा वर्ग बहुमत हासिल नहीं कर लेता, समाजवादी क्रान्ति असम्भव है और यदि वह बहुमत हासिल कर लेता है तो अधिनायकवाद की जरूरत ही नहीं रहती। उसके अनुसार लोकतन्त्र आवश्यक है और मार्क्सवादी समाजवादी सिद्धान्त के साथ लोकतान्त्रिक परम्परा को जोड़कर ही समाजवाद की स्थापना हो सकती है। मार्क्सवादी क्रान्तिकारी रोजा लक्जमबर्ग ने लेनिन की लोकतन्त्र- विरोधी नीति के सम्बन्ध में आपत्ति उठाते हुए कहा है कि इससे विशाल जनसमुदाय का अधिनायकवाद नहीं, विशाल जनसमुदाय पर अधिनायकवाद स्थापित हो जाता है।

लोकतन्त्र की आवश्यकता

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• बहुसंख्यक जनसमुदाय, जो गैर-अभिजनवर्ग का निर्मायक है, में अधिकांश भावशून्य, आलसी और उदासीन होते हैं, इसलिए एक ऐसा अल्पसंख्यक वर्ग का होना आवश्यक है जो नेतृत्व प्रदान करे।

• अभिजन सिद्धान्त के अनुसार आज के जटिल समाज में कार्यक्षमता के लिए विशेषज्ञता आवश्यक है और विशेषज्ञों की संख्या हमेशा कम ही होती है। अतः राजनैतिक नेतृत्व ऐसे चुनिंदा सक्षम लोगों के हाथ में होना आवश्यक है।

• लोकतन्त्र मात्र एक ऐसी कार्यप्रणाली है जिसके द्वारा छोटे समूहों में से एक जनता के न्युनतकम अतिरिक्त समर्थन से शासन करता हैं अभिजनवादी सिद्धान्त यह भी मानता है कि अभिजन वर्गों- राजनीतिक दलों, नेताओं, बड़े व्यापारी घरानों के कार्यपालकों, स्वैच्छिक संगठनों के नेताओं और यहां तक कि श्रमिक संगठनों के बीच मतैक्य आवश्यक है ताकि लोकतंत्र की आधारभूत कार्यप्रणाली को गैर जिम्मदार नेताओं से बचाया जा सके।

• सहभागिता सिद्धान्त के समर्थकों के अनुसार लोकतंत्र वास्तविक अर्थ प्रत्येक व्यक्ति की समान सहभागिता है, न कि मात्र सरकार को स्थायी बनाए रखना जैसा कि अभिजनवादी अथवा बहुलवादी सिद्धान्तकार मान लेते हैं। सच्चे लोकतन्त्र का निर्माण तभी हो सकता है जब नागरिक राजनीतिक दृष्टि से सक्रिय हों और सामूहिक समस्याओं में निरन्तर अभिरूचि लेते रहें। सक्रिय सहभागिता इस लिए आवश्यक है ताकि समाज की प्रमुख संस्थाओं के पर्याप्त विनिमय हों और राजनीतिक दलों में अधिक खुलापन और उत्तरदायित्व के भाव हों।

• सहभागी लोकतन्त्र के सिद्धान्तकारों के अनुसार यदि नीतिगत निर्णय लेने का जिम्मा केवल अभिजन वर्ग तक सीमित रहता है तो उसके लोकतन्त्र का वास्तविक स्वरूप बाधित होता है। इसलिए वे इसमें आम आदमी की सहभागिता की वकालत करते हैं। उनका मानना है कि यदि लोकतान्त्रिक अधिकार कागज के पन्नों अथवा संविधान के अनुच्छेदों तक ही सीमित रहे तो उन अधिकारों का कोई अर्थ नहीं रह जाता, अतः सामान्य लोगों द्वारा उन अधिकारों का वास्तविक उपभोग किया जाना आवश्यक है।

• लोकतन्त्र राज्य का एक स्वरूप है और वर्ग-विभाजित समाज में सरकार अधिनायकवादी और लोकतांत्रिक दोनों होती है। यह एक वर्ग के लिए लोकतन्त्र है तो दूसरे के लिए अधिनायकवाद। बुर्जुआ वर्ग चुँकि अपने हित साधन में पूंजीवादी प्रणाली को नियन्त्रित और संचालित करता है, इसलिए उसे सत्ता से बेदखलकर समाजवादी लोकतंत्र को स्थापित करना आवश्यक है।

इन्हें भी देखें

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बाहरी कड़ियाँ

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  1. Boryczka, Jocelyn M. BoryczkaJocelyn M. (2008-01-01), "Democracy", The Oxford Encyclopedia Women in World History (अंग्रेज़ी में), Oxford University Press, आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-19-514890-9, डीओआइ:10.1093/acref/9780195148909.001.0001/acref-9780195148909-e-241;jsessionid=6567fff6f8242bf1c837ec85c33e002c, अभिगमन तिथि 2023-01-18
  2. "Definition of DEMOCRACY". www.merriam-webster.com (अंग्रेज़ी में). अभिगमन तिथि 2023-01-18.
  3. Locke, John (2013-08-15). Two Treatises on Government: A Translation Into Modern English (अंग्रेज़ी में). Industrial Systems Research. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-906321-69-0.