विश्वकर्मा

हिंदुओ के त्रिमूर्ति के पहले ईश्वर

हिन्दू धर्म में विश्वकर्मा को निर्माण एवं सृजन का देवता माना जाता है। मान्यता है कि सोने की लंका का निर्माण उन्होंने ही किया था।🙏ॐ नमो विश्वकर्मणे🙏

भगवान् विश्वकर्मा
बलुआ पत्थर से निर्मित एक आर्किटेक्चरल पैनेल में भगवान विश्वकर्मा (१०वीं शताब्दी) ; बीच में गरुड़ पर विराजमान विष्णु हैं, बाएँ ब्रह्मा हैं, तथा दायें तरफ भगवान विश्वकर्मा हैं। इस संग्रहालय में उनका नाम 'विश्नकुम' लिखा है।

5.ग -            जमाता ( दामाद ) के भ्राता गण

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(1) प्रजापती विश्वकर्मा पुत्री वर्हिष्मती के पति सम्राट प्रीयब्रत के भ्राता उत्तानपाद

      थे जिनके पुत्र भक्त ध्रुव हुये ।

                      ( भागवत महापुराण ४/१/१)

(2) विश्वरुप विश्वकर्मा पुत्री सिद्धि-ऋद्धि के पति गणेश जी है ।

गणेश के भ्राता देवसेनापती

       स्वामी कार्तिकेय या स्कन्द या कुमार है ।

             १. शिव म.पु.रुद्र संहिता कुमार खण्ड अ.२०

             २. मत्स्य म.पु. अ.१०

(3) प्रजापती विश्वकर्मा पुत्री संज्ञा ( जिसे सुरेणु द्याे प्रभा , त्वष्टी भि कहते है ) के पति भगवान सुर्य ( विवस्वान) के भ्राता 1.अर्यमा, 2.पुषा, 3. त्वष्टा, 4.सविता, 5. भग, 6. धाता, 7. विधाता, 8. वरुण, 9. मित्र, 10. इन्द्र, 11. त्रीविक्रम( विष्णु) । भगवान वावन है जो कस्यप मुनि तथा माता अदिती कि सन्तान होनेसे आदित्य कहलाते है । से सभी विश्वकर्मा जामाता विवस्वान ( सुर्य ) के भ्राता है ।

                   १. भागवत म.पु. ६/६/३९

                   २. विष्णु म.पु. १/१५/१२९-१३१

(4) महावली गरुड और अरुण भि कस्यप मुनि कि सन्तान है । गरुड जि भगवान विष्णु के वाहनकर्ता तथा अरुण सुर्य भगवान के सारथि है । ये दोनो विश्वकर्मा दामाद के भ्राता है ।

        १. महाभारत १/२३/१३   २. महाभारत १/२४/३,१६ से २०

         ३. महाभारत १/३३/१६

(5) त्वष्टा पुत्री कशेरु पति श्री कृष्ण के भ्राता बलराम भि जामाता तुल्य है ।

               १. भागवत म.पु. १०/१/८,२४

               २. महाभारत सभा पर्व अ.३८

5 घ-         दौहित्र- दौहित्री कि सन्तान

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(1) प्रजापती विश्वकर्मा के दौहित्र ( नाति ) तथा भगवान सुर्य के पुत्र यमराज से गज, गवाक्ष, गवय,शरभ और गन्दमादन नामक  ५ काल समान पुत्र हुए जो राम रावण युद्ध मे श्री राम पक्ष के भयंकर योद्धा थे ।

                  ( वाल्मीकि रामायण युद्ध काण्ड सर्ग ३० स्लोक २६)

(2) पराक्रमी मैन्द और द्विविद विश्वकर्मा के नाति व सुर्य पुत्र अश्विनी कुमार के अंश से त्रेतायुग मे उत्पन्न हुए और श्रीराम कि ओर से भयंकर युद्ध किया ।

                ( वाल्मीकि रामायण  युद्ध काण्ड सर्ग ३० स्लोक २५)

(3) महाभारत काल मे महाराजा पाण्डु पुत्र नकुल और सहदेव विश्वकर्मा के दौहित्र अश्विनी कुमार के अंश से उत्पन्न हुए है ।

                 ( महाभारत आदि पर्व अ.६३ स्लोक ११७)

(4) प्रजापती विश्वकर्मा के दौहित्र ( नाति ) अर्थात भगवान सुर्य ( विवस्वान )के पुत्र वैवस्वत् मनु ( वर्तमान ७वें मन्वन्तर ) के ईक्ष्वाकु वंश मे हि भगवान श्रीराम का जन्म हुवा है ।

                  ( भागवत म. पु. ८/१३/२-३ )

                  ( नर्सिंह पुराण  )

(5) विस्वकर्मा नाति वैवस्वत मनु के सर्व प्रथम "ईला" नामक पुत्री हुई जो वाद मे सुधुम्न नाम से पुरुष राजा हुई ।ईला के गर्भ से राजा पुरुरवा का जन्म हुआ और सुधुम्न से ३ पुत्र उत्कल, गय, और विनताश्व हुए । उत्कल ने उत्कला, गय ने गया नामक नगरी बसायी ।

        १.( ब्रह्म म.पु. ७/१ से ४४)    २.( ब्रह्म म.पु.८/८७ )

(6) वैवस्वत मनु के ईक्ष्वाकु , नाभाग, धृष्ठ, शर्याती, नरिष्यन्त, प्रांशु, रिष्ट, करुष और पृषधन नामक ९ श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न हुए । वैवस्वत मनु के पुत्र नरिष्यन्त से शक - जाती वाले पुत्र हुए ।

                        ( ब्रह्म म.पु. ७/१-४४)

               

                                    सुर्य वंश एवं चन्द्र वंश

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चन्द्र वंश :-   विश्वकर्मा दौहित्र ( नाति ) वैवस्वत मनु के पुत्र ईल पुनश्च ईला एवं चन्द्रमा- पुत्र बुध और बुध के पुत्र पुरुर्वा से चन्द्र वंश का प्रारम्भ हुआ जिनमे भगवान श्री कृष्ण उत्पन्न हुए ।

सुर्य वंश:-     वैवस्वत मनु ( उपरोक्त ) के पुत्र ईक्ष्वाकु से सुर्य वंश का विस्तार हुआ जिसमे भगवान श्री राम चन्द्र उत्पन्न हुए ।

                     (१) मत्स्य म.पु. ११/४०-४२

                     (२) मत्स्य म.पु. १२/१४-१९

6-क        चाचा गण , चाचाजात भ्राता गण

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तैतिस कोटि ( प्रकार ) देवता मे ११ रुद्र १२ आदित्य ८ वसु वषठ्कार एवं दक्ष होते है ।ईसमे ८ प्रतापी वसु देवता निम्नवत् है :-

जिनमे आठ वसु ( धर्म ऋषि तथा वसु नामक पत्नी से ) निम्नावत उत्पन्न हुए ।

6 क -   चाचा गण              6 ख - चाचाजात भ्राता गण

१- धर ( आँप) के पुत्र         १. वैतन्ड्य २. श्रम ३. शान्त ४ ध्वनी

२- ध्रुव के पुत्र                    १. लोक संसारक काल

३- सोम                            १. वर्चा २. बुध

४- अह ( धर्म ) के पुत्र        १. ज्योती २. शम ३. शान्त ४. मुनि

तथा ( विष्णु म.पु. १/१५/११३ ) के अनुसार- द्रविता , हुत, हव्यवह, शिशिर प्राण और वरुण भि धर्म ( अह) के पुत्र है ।

५- अनल ( अग्नि) के पुत्र    १. स्कन्द (कुमार या कार्तिकेय ) २. शाख ३.

                                             विशाख ४. नैगमेय ५. निल

६- अनिल ( वायु ) के पुत्र     १. मनोजव २. अविज्ञात गति ३. हनुमान

७- प्रत्युष के पुत्र                  १. देवल ऋषि २. बिन्दु

८- प्रभास के पुत्र                  १. भगवान विश्वकर्मा प्रजापती

                 (विष्णु म.पु.१/१५/११८-१२३)

                            संदर्भ प्रमाण

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         (१) विष्णु म.पु. अंश १ अ. १५ स्लोक १०९ से ११७

         (२) महाभारत आदि( प्रथम) पर्व अ. ६६ स्लोक १७-३१

         (३) वायु म.पु. अ. ६६ स्लोक २० से २८

         (४) ब्रह्म म.पु. अ. ३२ स्लोक २७,३५ से ४६

         (५) वाल्मीकि रामा. युद्ध काण्ड सर्ग ३० स्लोक २९-३०

         (६) महाभारत १/६६/३१-३३

         ईन्ही मे सम्पुर्ण लोक प्रतिष्ठित है

९- शम कि पत्नी प्राप्ती

१०- काम कि पत्नी रति

११- हर्ष कि पत्नी नन्दा

(क) पितामह त्वष्टा ब्रह्मा ( विश्वकर्मा) के दाहिने स्तन ( अमैथुनी सृष्टि ) से उत्पन्न भगवान धर्म उनके पुत्र माने गए है । प्रजापती दक्ष कि कन्याओ से धर्म के ८ पुत्र उत्पन्न हुए जिन्हे " वसुगण " कहते है ।ईनमे आठवें वसु प्रवास है जिनसे शिल्प कर्म के ब्रह्म महाभाग विश्वकर्मा जि उत्पन्न हुए है । अन्य वसु पुत्र उपरोक्त है ।

(ख) महापराक्रमी ८ वसुओ के अतिरिक्त भगवान धर्म देव के शम कामदेव तथा हर्ष नामक ३ श्रेष्ठ पुत्र और हुए ।

(ग) महाविर हनुमान केशरी के क्षेत्रज तथा वायुदेव ( अनिल) के औरस पुत्र है ।

                  ( महाभारत आदि पर्व अ.६६ स्लोक १७-३३)

                  ( वाल्मीकि रामा. ४/६६/२९-३० )

7 क- मातुल ( मामा )         7 ख- मातुल जात भ्राता

      ( अंगिरा पुत्र )                ( महर्षि अंगिरा पौत्र )

१- देवगुरु बृहस्पति            १. शन्यु या भारद्वाज २. कुशध्वज

        के पुत्र                      ३. केशरी                 ४. कछ

२- वामदेव के पुत्र              १. उशिज या बृहदक्ष्य

३- उतथ्य के पुत्र               १. शरद्वान

४. सुधन्वा के पुत्र               १. ऋभु २.विम्ब ३.वाज ( रथकार ब्राह्मण )

५- गौतम के पुत्र                 १. शतानन्द ( अहिल्या के गर्भ)से

                                 सन्यघंति तथा उनसे कृपाचार्य एवं कृपी उत्पन्न हुए ।

६- सम्वर्त के पुत्र

७- दिर्धतमा के पुत्र             १. कक्षिवान ईन्ही कि पुत्री घोषा ऋषिका हुई ।

                              प्रमाण संदर्भ

                              ========

(१) वायु म.पु. ४/९७-१०३    (२)वाल्मीकि रामा.७/१७/६ से १०,३१-४४

(३) वाल्मीकि रामा.६/३०/२१(४) वाल्मिकी रामा. ७/३५/१९-२०

(५) विष्णु म.पु. ४/१९/६०-६८(६) वायु म.पु. ६५/९७ से १०५

(७) महाभारत अनुशासन पर्व अ. ८५/१३०/१३


वेदों में उल्लेखसंपादित करें

ऋग्वेद मे विश्वकर्मा सुक्त के नाम से 11 ऋचाऐ लिखी हुई है। जिनके प्रत्येक मन्त्र पर लिखा है ऋषि विश्वकर्मा भौवन देवता आदि। यही सुक्त यजुर्वेद अध्याय 17, सुक्त मन्त्र 16 से 31 तक 16 मन्त्रो मे आया है ऋग्वेद मे विश्वकर्मा शब्द का एक बार इन्द्र व सुर्य का विशेषण बनकर भी प्रयुक्त हुआ है। परवर्ती वेदों मे भी विशेषण रूप मे इसके प्रयोग अज्ञत नही है यह प्रजापति का भी विशेषण बन कर आया है।

प्रजापति विश्वकर्मा विसुचित।

परन्तु महाभारत के खिल भाग सहित सभी पुराणकार प्रभात पुत्र विश्वकर्मा को आदि विश्वकर्मा मानतें हैं। स्कंद पुराण प्रभात खण्ड के निम्न श्लोक की भांति किंचित पाठ भेद से सभी पुराणों में यह श्लोक मिलता हैः-

बृहस्पते भगिनी भुवना ब्रह्मवादिनी।
प्रभासस्य तस्य भार्या बसूनामष्टमस्य च।
विश्वकर्मा सुतस्तस्यशिल्पकर्ता प्रजापतिः॥16॥

महर्षि अंगिरा के ज्येष्ठ पुत्र बृहस्पति की बहन भुवना जो ब्रह्मविद्या जानने वाली थी वह अष्टम् वसु महर्षि प्रभास की पत्नी बनी और उससे सम्पुर्ण शिल्प विद्या के ज्ञाता प्रजापति विश्वकर्मा का जन्म हुआ। पुराणों में कहीं योगसिद्धा, वरस्त्री नाम भी बृहस्पति की बहन का लिखा है।

शिल्प शास्त्र का कर्ता वह ईश विश्वकर्मा देवताओं का आचार्य है, सम्पूर्ण सिद्धियों का जनक है, वह प्रभास ऋषि का पुत्र है और महर्षि अंगिरा के ज्येष्ठ पुत्र का भानजा है। अर्थात अंगिरा का दौहितृ (दोहिता) है। अंगिरा कुल से विश्वकर्मा का सम्बन्ध तो सभी विद्वान स्वीकार करते हैं। जिस तरह भारत मे विश्वकर्मा को शिल्पशस्त्र का अविष्कार करने वाला देवता माना जाता हे और सभी कारीगर उनकी पुजा करते हे। उसी तरह चीन मे लु पान को बदइयों का देवता माना जाता है।

प्राचीन ग्रन्थों के मनन-अनुशीलन से यह विदित होता है कि जहाँ ब्रहा, विष्णु ओर महेश की वन्दना-अर्चना हुई है, वही भनवान विश्वकर्मा को भी स्मरण-परिष्टवन किया गया है। " विश्वकर्मा" शब्द से ही यह अर्थ-व्यंजित होता है

"विशवं कृत्स्नं कर्म व्यापारो वा यस्य सः

अर्थातः जिसकी सम्यक् सृष्टि और कर्म व्यपार है वह विशवकर्मा है। यही विश्वकर्मा प्रभु है, प्रभूत पराक्रम-प्रतिपत्र, विशवरुप विशवात्मा है। वेदों में

विशवतः चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वस्पात

कहकर इनकी सर्वव्यापकता, सर्वज्ञता, शक्ति-सम्पन्ता और अनन्तता दर्शायी गयी है। हमारा उद्देश्य तो यहाँ विश्वकर्मा जी का परिचय कराना है। माना कई विश्वकर्मा हुए हैं और आगे चलकर विश्वकर्मा के गुणों को धारण करने वाले श्रेष्ठ पुरुष को विश्वकर्मा की उपाधि से अलंकृत किया जाने लगा हो तो यह बात भी मानी जानी चाहिए।

भारतीय संस्कृति के अंतर्गत भी शिल्प संकायो, कारखानो, उद्योगों में भगवान विशवकर्मा की महता को प्रगत करते हुए प्रत्येक वर्ष १७ सितम्बर को श्वम दिवस के रूप मे मनाता हे। यह उत्पादन-वृदि ओर राष्टीय समृद्धि के लिए एक संकलप दिवस है। यह जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान नारे को भी श्वम दिवस का संकल्प समाहित किये हुऐ है।

यह पर्व सोरवर्ष के कन्या संर्काति मे प्रतिवर्ष 17 सितम्बर विशवकर्मा-पुजा के रूप मे सरकारी व गैर सरकारी ईजीनियरिग संस्थानो मे बडे ही हषौलास से सम्पन्न होता हे। लोग भ्रम वश इस पर्व को विश्वकर्मा जयंति मानते हे। जो सर्वदा अनुचित हे। भाद्रपद शुक्ला प्रतिपदा कन्या की संक्राति (17 सितम्बर), कार्तिक शुक्ला प्रतिपदा (गोवर्धन पूजा), भाद्रपद पंचमी (अंगिरा जयन्ति) मई दिवस आदि विश्वकर्मा-पुजा महोत्सव पर्व है। इन पर्वो पर भगवान विश्वकर्मा जी की पुजा-अर्चना की जाती है।

 
आन्ध्रप्रदेश के मछलीपट्टनम का विश्वकर्मा मन्दिर

भगवान विशवकर्मा जी की वर्ष मे कई बार पुजा व महोत्सव मनाया जाता है। जैसे भाद्रपद शुक्ला प्रतिपदा इस तिंथि की महिमा का पुर्व विवरण महाभारत मे विशेष रूप से मिलता है। इस दिन भगवान विश्वकर्मा जी की पूजा अर्चना की जाती है। यह शिलांग और पूर्वी बंगला मे मुख्य तौर पर मनाया जाता है। अन्नकुट (गोवर्धन पूजा) दिपावली से अगले दिन भगवान विश्वकर्मा जी की पुजा अर्चना (औजार पूजा) की जाती है। मई दिवस, विदेशी त्योहार का प्रतीक है। रुसी क्रांति श्रमिक वर्ग कि जीत का नाम ही मई मास के रुसी श्रम दिवस के रूप मे मनाया जाता है। 5 मई को ऋषि अंगिरा जयन्ति होने से विश्वकर्मा-पुजा महोत्सव मनाया जाता है भगवान विश्वकर्मा जी की जन्म तिथि माघ मास त्रयोदशी शुक्ल पक्ष दिन रविवार का ही साक्षत रूप से सुर्य की ज्योति है। ब्राहाण हेली को यजो से प्रसन हो कर माघ मास मे साक्षात रूप मे भगवान विश्वकर्मा ने दर्शन दिये। श्री विश्वकर्मा जी का वर्णन मदरहने वृध्द वशीष्ट पुराण मे भी है।

माघे शुकले त्रयोदश्यां दिवापुष्पे पुनर्वसौ।
अष्टा र्विशति में जातो विशवकमॉ भवनि च॥

धर्मशास्त्र भी माघ शुक्ल त्रयोदशी को ही विश्वकर्मा जयंति बता रहे है। अतः अन्य दिवस भगवान विश्वकर्मा जी की पुजा-अर्चना व महोत्सव दिवस के रूप मे मनाऐ जाते है। ईसी तरह भगवान विश्वकर्मा जी की जयन्ती पर भी विद्वानों में मतभेद है। भगवान विश्वकर्मा जी की वर्ष मे कई बार पुजा व महोत्सव मनाया जाता है।

निःदेह यह विषय निर्भ्रम नहीं है। हम स्वीकार करते है प्रभास पुत्र विश्वकर्मा, भुवन पुत्र विश्वकर्मा तथा त्वष्ठापुत्र विश्वकर्मा आदि अनेकों विश्वकर्मा हुए हैं। यह अनुसंधान का विषय है। अतः सभी विशवकर्मा मन्दिर व धर्मशालाऔं, विशवकर्मा जी से सम्भधींत संस्थाऔं, संघ व समितिऔं को प्रस्ताव पारित करके भारत सरकार से मांग जानी चाहीए की सम्पुर्ण संस्कृत साहित्य का अवलोकन किया जाय, भारत की विभिन्न युनीर्वशटीजो मे इस विष्य पर शौध की जानी चाहीए, विदेशों में भी खोज की जाय, तथा भारत सरकार विश्वकर्मा वशिंयो का सर्वेक्षण किसी प्रमुख मीडिया एजेन्सी से करवाऐ। श्रुति का वचन है कि विवाह, यज्ञ, गृह प्रवेश आदि कर्यो मे अनिवार्य रूप से विशवकर्मा-पुजा करनी चाहिए

विवाहदिषु यज्ञषु गृहारामविधायके।
सर्वकर्मसु संपूज्यो विशवकर्मा इति श्रुतम॥

स्पष्ट है कि विशवकर्मा पूजा जन कल्याणकारी है। अतएव प्रत्येक प्राणी सृष्टिकर्ता, शिल्प कलाधिपति, तकनीकी ओर विज्ञान के जनक भगवान विशवकर्मा जी की पुजा-अर्चना अपनी व राष्टीय उन्नति के लिए अवश्य करनी चाहिए।

जगदचक विश्वकर्मन्नीश्वराय नम:॥

आश्चर्यजनक वास्तुकारसंपादित करें

चार युगों में विश्वकर्मा ने कई नगर और भवनों का निर्माण किया। कालक्रम में देखें तो सबसे पहले सत्ययुग में उन्होंने स्वर्गलोक का निर्माण किया, त्रेता युग में लंका का, द्वापर में द्वारका का और कलियुग के आरम्भ के ५० वर्ष पूर्व हस्तिनापुर और इन्द्रप्रस्थ का निर्माण किया। विश्वकर्मा ने ही जगन्नाथ पुरी के जगन्नाथ मन्दिर में स्थित विशाल मूर्तियों (कृष्ण, सुभद्रा और बलराम) का निर्माण किया।

विश्वकर्मा जयंतीसंपादित करें

विश्वकर्मा जयंती हिंदू धर्म में ब्रह्मांड के दिव्य वास्तुकार भगवान विश्वकर्मा को समर्पित है। विश्वकर्मा भाद्र केबंगाली महीने के अंतिम दिन, विशेष रूप से भद्रा संक्रांति पर निर्धारित की जाती है। यही कारण है कि जब सूर्य सिंह सेकन्या पर हस्ताक्षर करता है इसे कन्या सक्रांति के रूप में भी जाना जाता है।

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें