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पाबूजी राजस्थान के लोक-देवता हैं। वे १४वीं शताब्दी में राजस्थान में जन्मे थे। पाबु जी को प्लेग रक्षक देवता के रूप में पूजा जाता है। राजस्थान में ऊँटो के बीमार होने तथा ऊँटो के देवता के रूप में पाबूजी की पूजा होती है।पाबूजी राठौड़ कोल्हुगढ़ के रहने वाले थे. चांदा और डामा दो वीर इनके प्रिय सहयोगी थे. जब पाबूजी युवा हुए तो अमरकोट के सोढा राणा के यहाँ से सगाई का नारियल आया. सगाई तय हो गई. पाबूजी ने देवल नामक चारण देवी को बहन बना रखा था. देवल के पास एक बहुत सुन्दर और सर्वगुण सम्पन्न घोड़ी थी. जिसका नाम था केसर कालवी .

पाबूजी
कोलू के शासक
Pabuji-temple-kolu.jpg
उत्तरवर्तीधाँधल जी राठौड़
जन्मवि.स. 1313
कोलू
निधनकोलू
घरानाराठौड़ वंशीय राजपूत
पिताधाँधल जी राठौड़
धर्महिन्दू

देवल अपनी गायों की रखवाली इस घोड़ी से करती थी इस घोड़ी पर जायल के जिंदराव खिचीं की आँख थी. वह इसे प्राप्त करना चाहता था. जींदराव और पाबूजी में किसी बात को लेकर मनमुटाव भी था. विवाह के अवसर पर पाबूजी ने देवल देवी से यह घोड़ी मांगी. देवल ने जिंदराव की बात बताई. तब पाबू ने कहा कि आवश्यकता पड़ी तो वह अपना कार्य छोड़कर बिच में ही आ जायेगे. देवल ने घोड़ी दे दी.

बारात अमरकोट पहुची. जिंदराव ने मौका देखा और देवल देवी की गायें चुराकर ले भागा. पाबूजी जब शादी के फेरे ले रहे थे. तब देवल के समाचार पाबू को मिले कि जिंदराव उनकी गायें लेकर भाग गया है. समाचार मिलते ही अपने वचन के अनुसार शादी के फेरों को बिच में ही छोड़ कर केसर कालवी घोड़ी पर बैठकर जिंदराव का पीछा किया.

गायों को तो छुड़ा लिया लेकिन पाबूजी खेत में ही रहे. अर्धविवाहित सोढ़ी पाबूजी के साथ सती हो गई. इनकी यह यशगाथा पाबूजी की फड़ में संकलित है, जिसका वाचन बड़ा लोकप्रिय है. तथा पाबूजी की लोकदेवता के रूप में पूजा की जाती है.

ऊमर काव्य के कवि ऊमरदान के अनुसार पाबूजी का जन्म वि.सं. 1342 के आसपास तथा मृत्यु संवत् 1383 में होनी लिखी है । श्री विश्वेशर रेऊजी के अनुसार पाबूजी का जन्म वि.सं. 1323 में हुआ ।...दयालदसा की ख्यात में यद्यपि पाबूजी का कोई निश्चित समय नहीं बतलाया है फिर भी उन्होंने ‘बिरवड़ी’ देवी का वित्त फलौदी की तरफ देवलदे जी के धन के साथ चरने का स्पष्ट उल्लेख किया है -‘पीछै चारणी बिरवड़ी वित्त लेय नै देवळ मिसण कनै आई थी, कुसमय सूं सौ उण रौ वित्त फलौदी रै गांवां रहतौ सूं उठै जींदराव खींची धाड़ौ दौडि़यौ । तिण में विरवड़ी रौ वित्त मांय आयौ ।’ .....सिंध के इतिहास के अनुसार दौदा ने जिनकी मृत्यु ई.स. 1356 है, 25 वर्ष राज्य किया, अतः ई.स. 1326 में सिंध में दौदा सूमरा राज्य करता था । पाबूजी राठौड़ उसी के यहां से सांड़ों का काफिला लाये थे । अतः पाबूजी का समय भी ई.स. 1325 के लगभग होना चाहिए । उस समय दिल्ली के राज सिंहासन पर (ई.स. 1320 में) गयासुद्दीन राज्य करता था ।’ वीर पाबूजी राठौड़ की मृत्यु का समय -‘तेरा सम्वत् तेइस, मास मिगसर तिथि नौमी, वद परव रिव सुमवार, भूजंग रचियो भोमी ।’ अर्थात् वि.सं. 1323 में, माह मार्गशीर्ष, बदी नवमी, वार रविवार तदनुसार नवम्बर 18 रविवार सन् 1326 को पाबू युद्ध स्थल में काम आये । इसके अतिरिक्त कळुमढ़ में पाबूजी का मेला भी रविवार के दिन ही लगता है । समुसपुर में रविवार को ही पाबूजी की धोक ‘पूजा’ की जाती है। इस तरह पाबूजी के आयु के संबंध में दो अभिमत हैं - 1. वे 24 वर्ष जिये, 2. वे 21 वर्ष जिये । पाबूजी को लक्ष्मणजी का अवतार माना जाता है। इनकी प्रतिमा में इन्हें भाला लिए हुए एक अश्वरोही के रूप में अंकित किया जाता है। प्रतिवर्ष चैत्र अमावस्या को पाबूजी के मुख्य 'थान' (मंदिर गाँव कोलूमण्ड) में विशाल मेला लगता है, जहाँ भक्तगण हज़ारों की संख्या में आकर उन्हें श्रृद्धांजलि अर्पित करते हैं।

पीर

राजस्थान के लोक जीवन में कई महान् व्यक्तित्व देवता के रूप में सदा के लिए अमर हो गए। इन लोक देवताओं में कुछ को 'पीर' की संज्ञा दी गई है। एक जनश्रुति के अनुसार राजस्थान में पाँच पीर हुए हैं। इन्हें 'पंच पीर' भी कहा जाता है, जिनके नाम इस प्रकार हैं-

   पाबूजी
   हड़बूजी
   रामदेवजी
   मंगलियाजी
   मेहाजी

उपरोक्त जनश्रुति का दोहा इस प्रकार है-

  पाबू, हड़बू, रामदे, मांगलिया, मेहा। पांचो पीर पधारज्यों, गोगाजी जेहा॥

|पाबूजी की फड़:- पाबूजी के यशगान में 'पावड़े' (गीत) गाये जाते हैं व मनौती पूर्ण होने पर फड़ भी बाँची जाती है। 'पाबूजी की फड़' पूरे राजस्थान में विख्यात है, जिसे भोपे बाँचते हैं। ये भोपे विशेषकर थोरी जाति के होते हैं। फड़ कपड़े पर पाबूजी के जीवन प्रसंगों के चित्रों से युक्त एक पेंटिंग होती है। भोपे पाबूजी के जीवन कथा को इन चित्रों के माध्यम से कहते हैं और गीत भी गाते हैं। इन भोपों के साथ एक स्त्री भी होती है, जो भोपे के गीतोच्चारण के बाद सुर में सुर मिलाकर पाबूजी की जीवन लीलाओं के गीत गाती है। फड़ के सामने ये नृत्य भी करते हैं। ये गीत रावण हत्था पर गाये जाते हैं, जो सारंगी के जैसा वाद्य यन्त्र होता है। 'पाबूजी की फड़' लगभग 30 फीट लम्बी तथा 5 फीट चौड़ी होती है। इस फड़ को एक बाँस में लपेट कर रखा जाता है। पाबूजी के अलावा अन्य लोकप्रिय फड़ 'देवनारायण जी की फड़' होती है। |पाबूजी का विवाह एवं गायों की रक्षा करना

पाबूजी राठौड़ का विवाह अमरकोट के निवासी सोढ़ा राणा सूरजमल की बेटी के साथ हुआ था। विवाह करने के लिये पाबूजी ने देवलजी चारणी से उनकी कालवी नामक घोड़ी ले गये थे। पाबूजी राठौड़ ने फेरे लेते हुए सुना कि जिंदराव खिंची नामक व्यक्ति देवलजी चारणी की गायों को अपहरण कर ले जा रहे हैं। पाबूजी ने देवलजी को उनकी गायों की रक्षा का वचन दिया था कि वो उनकी गायों की रक्षा करेंगे। पाबूजी गायों की रक्षा करते-करते वीरगति को प्राप्त हो गये।

जीवनसंपादित करें

राजस्थान के लोक देवता पाबूजी राठौड़ का जन्म वि.संवत 1239 ई॰ में जोधपुर के पास कोलू नामक गाँव में हुआ था। पाबूजी के पिता का नाम धाँधल राठौड़ था। धाँधल एक दुर्गपति थे। अमरकोट के राजा सुरजमल सोढ़ा की पुत्री सुप्यारदे/ फुल्लनदे से विवाह के समय जीन्दराव खींची से देवल चारणी की गाये छुड़ाते हुए वीर गति को प्राप्त हुए यह राठौड़ों के मूल पुरुष राव सीहा के वंशज थे । इनकी घोड़ी का नाम केसर कालमी घोड़ी एवं बायीं ओर झुकी पाग के लिए प्रसिद्ध हैं। हाल ही में राजस्थान सरकार ने कोलूमण्ड फलौदी में पाबूजी के पैनोरमा की स्थापना की है।

सन्दर्भसंपादित करें

कोलुमण्ड

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें