मुख्य मेनू खोलें

पुष्यमित्र शुंग

पुष्य मित्र हि राम है जो सारे सनातन धर्म ( हिन्दु धर्म ) अपना बताकर मान रहे है
पुष्यमित्र की मूर्ति

शुंगवंशिय लोग अवंतिका(उज्जैन) के थे। ये मौर्य राजाओं की सेना में अनेक पदों पर थे।पुष्यमित्र प्रखर योद्धा थे और वह मौर्य साम्राज्य का प्रधान सेनापतिथे । यह पद उसे विरासत में सैनिक पुत्र होने से ही मिला था और वह अपनी योग्यता से सेनापति बने थे । प्रारम्भिक स्थिति में राज्य प्राप्त करने की उसकी कोई लिप्सा नहीं थी।वह मौर्य वंश का विश्वासपात्र था।किंतु मौर्य सम्राट वृहद्रथ की नीतियां और अकुशलता तथा ब्राह्मण धर्म के प्रति अतिरिक्त उदासीनता और उसके बौद्ध चाटुकारों के कारण साम्राज्य के लिए परिस्थितियां घातक हो गई थी। उसी समय यवनों ने मेवाड़ में चितौड़ के निकट और और अवध में साकेत के निकट अपने शिविर बनाये थे। इनके अनेक लोग बौद्ध मठों में वेश बदल कर रह रहे थे।इस स्थिति में राज्य का शक्तिशाली होना आवश्यक था।तब पुष्यमित्र ने अवसर व आवश्यकता देखते हुए वृहद्रथ की हत्या कर सत्ता अपने हाथ मे ली। पुष्यमित्र ने 187 ईसा पूर्व से 32 वर्ष शासन किया और 112 वर्ष भारत पर शुंग साम्राज्य रहा।

पुष्यमित्र हिन्दू धर्म का अनुयायी था किंतु बौद्धों से उसे घृणा नहीं थी।उसके काल मे विदिशा की उदयगिरि में विष्णु मूर्तियां बनाई गई तो सांची में बौद्ध वेदिकाएँ भी बनवाई गई।उसके समकालीन पतंजलि के भास में भी पुष्यमित्र के लिए कराए यज्ञों का उल्लेख है।

यह बात भी सच है कि जिन प्रभावशाली बौद्धों ने उसका विरोध किया व यवनों को गुप्त संरक्षण किया उनको उसने प्राणदण्ड दिए। तथा ऐसे बौद्धमठ जहां राष्ट्र विरोधी तत्व थे और अपनी गतिविधियां संचालित करते थे उन्हें नष्ट किया।यह काम राजनैतिक था न कि धार्मिक था।इसलिए बुद्ध साहित्य में बढ़ा चढ़ा कर उसे बौद्धों का शत्रु प्रचारित किया गया है। वहीं हिंदू अनुयाईयों द्वारा उसे अतिरंजित योद्धा बताया जाने के लिए कई कहानियां बनाई गई। लेकिन यह निर्विवाद सत्य है कि वह महाबली था और हिन्दू धर्म का अनुयायी था। यदि देखा जाए तो पूजा हेतु पहली हिन्दू मूर्ति पुष्यमित्र ने बनवाई है। इसके पहले बुद्ध और महावीर जी की ग्रीक शैली की मूर्तियां ही मिलती हैं। यहीं से वैदिक हिन्दू धर्म मे मूर्तिपूजा प्रारम्भ होती है। इसके पूर्व मूर्तियों का उपयोग सजावट और चित्रकथायो हेतु ही होता था।


अनुक्रम

उद्भव से सम्बंधित सिद्धान्तसंपादित करें

पुष्यमित्र का शासन प्रबन्धसंपादित करें

साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र थी। पुष्यमित्र प्राचीन मौर्य साम्राज्य के मध्यवर्ती भाग को सुरक्षित रख सकने में सफल रहा। पुष्यमित्र का साम्राज्य उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में बरार तक तथा पश्‍चिम में पंजाब से लेकर पूर्व में मगध तक फ़ैला हुआ था। दिव्यावदान और तारानाथ के अनुसार जालन्धर और स्यालकोट पर भी उसका अधिकार था। साम्राज्य के विभिन्न भागों में राजकुमार या राजकुल के लोगो को राज्यपाल नियुक्‍त करने की परम्परा चलती रही। पुष्यमित्र ने अपने पुत्रों को साम्राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में सह-शासक नियुक्‍त कर रखा था। और उसका पुत्र अग्निमित्र विदिशा का उपराजा था। धनदेव कौशल का राज्यपाल था। राजकुमार जी सेना के संचालक भी थे। इस समय भी ग्राम शासन की सबसे छोटी इकाई होती थी।

इस काल तक आते-आते मौर्यकालीन केन्द्रीय नियन्त्रण में शिथिलता आ गयी थी तथा सामंतीकरण की प्रवृत्ति सक्रिय होने लगी थीं।

सन्दर्भसंपादित करें

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें