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उदयसिंह प्रथम
मेवाड़ के राणा
मेवाड़ के राणा
शासनावधि१४६८ से १४७३
पूर्ववर्तीमहाराणा कुम्भा
उत्तरवर्तीराणा रायमल
निधन१४७३
पितामहाराणा कुम्भा
मेवाड़ के राजपूत राजवंश
(1326–1884)
राणा हम्मीर सिंह (1326–1364)
राणा क्षेत्र सिंह (1364–1382)
राणा लखा (1382–1421)
राणा मोकल (1421–1433)
राणा कुम्भ (1433–1468)
उदयसिंह प्रथम (1468–1473)
राणा रायमल (1473–1508)
राणा सांगा (1508–1527)
रतन सिंह द्वितीय (1528–1531)
राणा विक्रमादित्य सिंह (1531–1536)
बनवीर सिंह (1536–1540)
उदयसिंह द्वितीय (1540–1572)
महाराणा प्रताप (1572–1597)
अमर सिंह प्रथम (1597–1620)
करण सिंह द्वितीय (1620–1628)
जगत सिंह प्रथम (1628–1652)
राज सिंह प्रथम (1652–1680)
जय सिंह (1680–1698)
अमर सिंह द्वितीय (1698–1710)
संग्राम सिंह द्वितीय (1710–1734)
जगत सिंह द्वितीय (1734–1751)
प्रताप सिंह द्वितीय (1751–1754)
राज सिंह द्वितीय (1754–1762)
अरी सिंह द्वितीय (1762–1772)
हम्मीर सिंह द्वितीय (1772–1778)
भीम सिंह (1778–1828)
जवान सिंह (1828–1838)
सरदार सिंह (1838–1842)
स्वरूप सिंह (1842–1861)
शम्भू सिंह (1861–1874)
उदयपुर के सज्जन सिंह (1874–1884)
फतेह सिंह (1884–1930)
भूपाल सिंह (1930–1947)

उदयसिंह प्रथम (? -१४७३) इन्हें कभी-कभी उदयकरण या उदाह या ऊदा के नाम से भी जाने जाते थे और ये एक मेवाड़ साम्राज्य के महाराणा (१४६८ से १४७३) थे । ये महाराणा कुम्भा के पुत्र थे। जब राणा कुंभा एकलिंगजी (भगवान शिव) की प्रार्थना कर रहे थे, उदय सिंह प्रथम ने उनकी हत्या कर दी और खुद को शासक घोषित कर दिया था। वह एक क्रूर शासक थे,1473 में उनकी मौत बिजली गिरने से हुई

जीवनीसंपादित करें

मेवाड़ के महाराणा कुम्भा के बड़े पुत्र उदयकर्ण ने कुम्भलगढ़ में महाराणा को मारकर बदनोर के ठाकुर जेतसिंहजी के साथ मेरवाड़ा में ठाकुर श्री खंगारसिंहजी चौहान के यहां आकर शरण ली। यहां के ठाकुर ने उन्हें तीन माह तक बरार (राणारेल) में रखा और १० दिन तक बरसावाड़ा में रखा। जब महाराणा का सोलह राव और बत्तीस उमरावों के साथ सन्धि हो गई तो श्री खंगारसिंह चौहान अपने साथ उदयकर्ण को लेकर उदयपुर दरबार में हाजिर हुए, तो उदयपुर के राजकवि ने श्री खंगारजी की प्रशंसा में निम्न उक्तियाँ कहकर सम्मानित किया –

"सोलह सामन्त, सौ शूरमा, हुणि बरसावाड़े वाग।

राण पहुँचाया चहुवान रजपुतां उदको वदियो आग।।

रण छेला रण बावला, कुले सुधारण काज।

राणी जाया चहुवान रजपुतां लाख-लाख समराज।।"

राजपूताना भूमि को उसके योद्धा पुत्रों की साहस और बहादुरी के रूप में जाना जाता है; उनके खून से रंगी हुई रेगिस्तान की मिट्टी जो इन महान योद्धाओं के लिए जानी जाती है और उनकी महिमा का प्रतीक है। मेवाड़ की धरती पर कई महान योद्धाओं ने जन्म लिया है और शिष्टता, वीरता और स्वतंत्रता के लिए जाने जाते थे लेकिन हर सिक्के का एक और पहलु होता है और हर युग में कुछ अजीब जरूर देखने को मिला है।[कृपया उद्धरण जोड़ें]