कर्तासंपादित करें

यज्ञफलम् के कर्ता सामन्यतः महाकवि भास को माना जाता हैं किंतु यह विवादास्पद हैं जिस पर विद्वानों की भिन्न भिन्न अवधारणा हैं।

पाण्डुलिपिसंपादित करें

यज्ञफल नाटक की मुख्य दो पाण्डुलिपियाँ हैं। प्रथम प्रति के अंत मे लिखा है कि 'इति यज्ञनाटकं समाप्तं' जबकि दूसरी प्रति मे अंत मे 'इति यज्ञफलं संपूर्ण' लिखा है।


पात्रसंपादित करें

  • सूत्रधार - नाटक का स्थापक
  • नटी - सूत्रधार की पत्नी
  • सुमन्त्र - दशरथ के अमात्य
  • ब्राभव्य - अंतःपुर का कंचुकीय
  • सुन्दरक - नाटक का विदूषक
  • दशरथ - अयोध्या का राजा
  • विजया - कौशल्या की प्रतिहारी
  • विनयवति - सुमित्रा की चेटी
  • मंथरा - कैकेयी की दासी
  • कौशल्या - राजमहिषी
  • कैकेयी - दशरथ की पत्नी
  • सुमित्रा - दशरथ की पत्नी
  • चित्रकेतु - एक गंधर्व
  • चित्रपद - एक गंधर्व
  • रावण - लंका का राजा
  • विश्वामित्र - ब्रह्मर्षि
  • वसिष्ठ - दशरथ पुत्र के गुरु
  • राम
  • भरत
  • लक्ष्मण
  • शत्रुघ्न
  • मधुरिका - अयोध्या कि चेटी
  • चतुरिका - अयोध्या कि चेटी
  • पुष्प्रलतिका- अयोध्या कि चेटी
  • मालवक - एक वैतालिक
  • भषक - एक वैतालिक
  • दन्तिल - एक वैतालिक
  • गोपिल - एक वैतालिक
  • शालंकायन - विश्वामित्र का शिष्य
  • गालव - विश्वामित्र का शिष्य
  • ताम्यायन - विश्वामित्र का शिष्य
  • वृद्धगोपिका - एक वृद्ध ग्रामस्त्री
  • मुष्टिक - जनक का भट
  • दंडबाहु - जनक का भट
  • स्थूलांस - जनक का भट
  • सीता - जनक की दुहिता
  • चन्द्रकला - सीता की सखी
  • मधुरिका - सीता की सखी
  • जनक - मिथिला के राजा
  • जया - जनक की प्रतिहारी
  • शतानन्द - जनक के पुरोहित
  • परशुराम - क्रोधित ऋषि
  • पुष्पवर्षा करते देवी-देवता
  • सुबुद्धि - दशरथ का प्रघानचर (नेपथ्य)


कथासारसंपादित करें

  • स्थापना - नांदी के बाद नाटक का प्रारंभ मुद्रालंकार का द्वारा प्रारंभ किया गया हैं। सूत्रधार और नटी आते हैं और नटी वसंतगीत गाती हैं तभी नेपथ्य से सुमंत्र बोलता हैं। सूत्रधार कहता है कि सम्राट ने पुत्रजन्म पर दान-उत्सव का आयोजन किया है।
  • प्रथम अंक - सुमंत्र कंचुकीय बाभ्रव्य से दान-उत्सव कि बात कर रहे थे तभी वहाँ सुंदरक विदूषक आता हैं। वह सुमंत्र से कहता है कि महाराज का यज्ञ सफल रहा पर उसे मोदक नहीं मिले इस पर सुमंत्र बोला कि तुम्हें सुवर्ण तो मिला हैं पर विदूषक कहता हैं कि सुवर्ण थोड़ा खाया जा सकता है। विदूषक यह कहता हैं कि शत्रु को मारकर जैसे महारथी महाराज बनते हैं मैं भी दशसहस्त्र मोदकमारक बनना चाहता हूं। सुंमत्र ब्राभव्य से कहता है कि वह राजा को अभिनंदन देने जा रहा हैं इसलिए ब्राभव्य वहाँ से चला जाता हैं विदूषक भी वशिष्ठ के मोदक कि रक्षा करने चला जाता हैं। सुमंत्र दशरथ से मिलता हैं। प्रसन्न दशरथ कहता हैं कि गाय और सुवर्ण को श्रोत्रिय को दे तथा बंदी को मुक्त कर दे। दशरथ कहते है कि वह पितृऋण से मुक्त हो गए तभी प्रतिहारी विजया आकर कौशल्या का संदेश देती हैं कि रानी का निवृत्तोत्सव हो गया है और इसलिए ज्येष्टा कौशल्या ने आपको याद दिलवाया हैं। सुमित्रा की चेटी विनयवति दशरथ को कहती हैं की रानी को दो पुत्र हुए तभी विदूषक के साथ मंथरा का प्रवेश होता हैं। मंथरा कैकेयी के पुत्र जन्म की सूचना दशरथ को देती हैं। दशरथ कहते है कि सभी रानीयां मुझे मघ्यम मंदिर मिले और दासीयां वहाँ से चली जाती हैं। सुमंत्र भी रानीयो को अभिनंदन देने जाते हैं। संघ्या होने पर दशरथ और विदूषक प्रस्थान करते हैं।
  • द्वितीय अंक - कंचुकिय ब्राभव्य और चेटी बात करते हैं कि दशरथ और उनकी रानी ग्रीष्मोघान मे आने वाले हैं और वहाँ से निकल जाते है। तभी दशरथ का प्रवेश होता हैं वो प्रजा का सुख देखकर प्रसन्न है पर उनकी ईच्छा हैं कि राजगुण संपन्न राम का अभिषेक हो परंतु उन्होंने कैकेयी-पुत्र को राजा बनाने का वचन दिया था इस के समाधान हेतु दशरथ सुमंत्र को बुलाते हैं। सुमंत्र उन्हें सलाह देते है कि तभी रानीयां वहाँ आती हैं और सुमंत्र वहा से प्रस्थान करता है। दशरथ राज्याभिषेक कि बात करते हैं इस पर सुमित्रा कहती हैं कि बडे का राज्याभिषेक होना चाहिए पर कैकेयी कहती यह निर्णय गुण पर होना चाहिए। दशरथ पुछते है कि किस मे गुण अघिक हैं। कौशल्या मन में राम का नाम लेती हैं तभी कैकेयी इस का उत्तर देती हैं की समय बतायेगा। सुमित्रा कहेती हैं कि दायवस्तु जयेष्ठ को मिले यह मनु का नियम हैं लेकिन दशरथ कहते है कि राजधर्म मे वशिष्ट को प्रमाण माना गया हैं और दशरथ चारों पुत्र के लिए राज्य के चार टुकड़े करने की बात करते हैं पर कौशल्या सारा राज्य राम को मिले यह चाहती हैं। कैकेयी योग्य पुत्र को राज्य देना चाहती हैं। दशरथ उन्हें विवाह के समय की प्रतिज्ञा याद करवाते है किंतु कैकेयी कहती हैं कि स्त्री अपने पुत्र को राज्यलाभ नही दे सकती। यह सुनकर कौशल्या मूर्छित हो जाती हैं। कैकेयी उन पर जल छिडकती है और सुमित्रा उनके हाथ मलती हैं। कौशल्या जागृत होती हैं और मघ्याह्न के ताप का बहाना बनाती हैं किंतु सब जानते थे कि कौशल्या कैकेयी के कारण व्यथित हैं। सुमित्रा कहती हैं राज्य के दो भाग कर राम और भरत को बाँट दे इस पर दशरथ पूछते हैं की अपने पुत्रों को क्या दोगी? सुमित्रा कहती कुछ नहीं उनके पुत्र राम और भरत कि सेवा करेंगे। सभी सुमित्रा की प्रसंशा करते हैं। कैकेयी और सुमित्रा कहती हैं कि राम को राजा बनाया जाए। दशरथ अपनी प्रतिज्ञा के बारे मे पूछते हैं पर कैकेयी कहती हैं अपने सुख हेतु प्रतिज्ञा त्याग भी देनी चाहिए। तभी कौशल्या कहती हैं की सभी पुत्र सायंकाल वंदना करने आने है इसलिए रानीयां वहाँ से जाती हैं। दशरथ सुमंत्र को बुलाकर कैकेयी की महानता और सुमित्रा का निर्लोभत्व बताते हैं। सुमंत्र दशरथ को वसिष्ठ से भी बात करने को कहते हैं कि तभी प्रसन्न विदूषक दशरथ से कहता है अभिषेक होने पर उसे मोदक मिलेंगे। सुमंत्र भी वसिष्ठ से मिलने जाते हैं तभी सुबुद्धि नामक चर नेपथ्य से कहता हैं कि राम का पराक्रम सुन रावण चोरीछिपे आ सकता हैं। दशरथ इसकी पुष्टि हेतु विदूषक को कहते हैं पर वह कहता है की मार्ग मे रावण मुझे राम समझकर खा गया तो इसलिए मैं नहीं जाऊंगा सो दशरथ भी उसके साथ जाते हैं।
  • तृतीय अंक - चित्रकेतु और चित्रपद रावण पर बात करते हैं कि वह राम के अनिष्ट हेतु अयोध्या मे भ्रमण कर रहा हैं और वे दोनों वहाँ से प्रस्थान करते हैं। आकाश मार्ग से रावण का प्रवेश होता है वो मंत्रप्रभाव के कारण कोइ उसको देख नहीं सकता तभी विश्वामित्र का भी प्रवेश होता हैं वह राम के गुण सुनकर उसे अपना शिष्य बनाना चाहते हैं इसलिए वे राम का पराक्रम देखने आते हैं लेकिन विश्वामित्र वहाँ रावण को और रावण विश्वामित्र को देख लेते हैं तभी रंगमंच पर वसिष्ठ और चारों कुमारो का प्रवेश होता हैं। कुमार वसिष्ठ से कहते हैं कि हम नगर के बाहर धनुर्वेद का अभ्यास करना चाहते है। वसिष्ठ उन्हें अनुमति देकर चले जाते है। शत्रुघ्न , भरत और लक्ष्मण क्रमशः बाण छोडते है और अंत मे राम को बाणप्रयोग करने की प्रार्थना करते हैं। विश्वामित्र तथा रावण राम को देखकर वहाँ से निकल जाते हैं। राम पिप्पल के सभी पत्तों के छेदन हेतु बाण छोडते हैं किंतु चक्रानिल के कारण उसके दो टुकड़े हो जाते हैं। राम वायव्यास्त्र छोडते हैं किंतु पिप्पल को कुछ नहीं हुआ इसलिए क्रोधित राम अब आग्नेयास्त्र को छोडने कि तैयारी करते हैं तभी रावण दूर से उन्हें देखता हैं और भय के कारण वहाँ से चला जाता हैं। विश्वामित्र यह देखकर प्रसन्न होते है कि राम को देख रावण भाग गया और विश्वामित्र भी चले जाते है। क्रोधित राम आग्नेयास्त्र का ध्यान करते है किंतु भरत उन्हें पिप्पल के पक्षियों का स्मरण करा कर रोक देते हैं। राम अब वायव्यास्त्र के प्रयोग द्वारा शिला पर शरसंधान करते हैं की वहाँ चेटीया और मंथरा आती हैं। मंथरा उन चेटीे पूछती हैं यहाँ क्या खेल रही हो जाकर रानी की सेवा करो। चतुरिका कहती हैं तुम भी तो दासी हो तुम रानी की सेवा करो इस पर मंथरा कहती है की मैं तो कैकेयी मां और सखी हूं और तुम सब गर्भदासी हो। चतुरिका और मधुरिका उससे मजाक करती हैं और मंथरा वहाँ से चली जाती हैं। चतुरिका कहती हैं कुरुपा मंथरा अगर सुरुपा होती तो न जाने क्या करती और सभी चेटी गौरीमण्डप हेतु पिप्पल के पत्ते लेने जाती है किंतु पत्तों को छिद्रित देख निराश होती हैं तभी वे रावण के रथचिह्नो को राजकुमार के रथचिह्न समझ चली जाती हैं। राम बाणसंघान करते है कि तभी वसिष्ठ वहाँ आते है और सभी कुमार उन्हें वंदन करते हैं और अस्त्र परिक्षण के लिए क्षमा भी मागते हैं। भरत उनके वापस आने का कारण पुछते हैं तब वसिष्ठ कहते हैं कि वन मे मैेने विश्वामित्र का कमण्डल देखा संभवतः वह रावण के पीछे अयोध्या आकर दशरथ से मिलने आये हो। राम पूछते हैं की विश्वामित्र को देखकर धन्य होंगे किंतु रावण क्यूँ अयोध्या आया था। वसिष्ठ कहते की वह राम की जिज्ञासा हेतु छूपकर आया था। वसिष्ठ उन्हें विश्वामित्र के ब्राह्मणत्व कि बात करते और सभी वहाँ से प्रस्थान करते हैं। अब मंथरा का प्रवेश होता हैं वो वसिष्ठ को कपटपण्डित कहती है क्योंकि वसिष्ठ राम पर अधिक घ्यान देते हैं। वह सोचती है यदि रावण का राम से विरोध हो जाये तो भरत राजा बन जायेगा। मंथरा प्रतिज्ञा करती है यदि भरत को राजा ना बनाया तो मेरा नाम मंथरा नहीं और वहाँ से चली जाती हैं। अब सुमंत्र आकर कहता है कि कल विश्वामित्र महाराज से मिलने आने वाले हैं और सुना है कि रावण भी आया था और चला जाता हैं। अंत मे गंधर्व राम के गुण गाकर तृतीय अंक समाप्त करते है।
  • चतृर्थ अंक - वैतालिक आपस मे गीत कि बात कर रहे थे कि विदूषक सुन्दरक वहाँ आता है और बतातख हैं की वह विश्वामित्र से मिलने जा रहा हैं। वैतालिक गोपिल विदूषक से कहता है की मैंने कल महाराज के महल मे ऋषि को देखा था पर तुम्हारे गुरु प्रति पक्षपात कर उन्हें यहाँ क्या काम ? विदूषक बताता हैं की विश्वामित्र के दो मुख और चार हाथ हैं और वे ब्राह्मण तथा क्षत्रिय हैं, वे राजा और ऋषि हैं और वे अक्षमालाघारी और घनुर्घर भी हैं। गोपिल कहता मैंने तो सुना है चार हाथ केवल विष्णु के हैं पर विदूषक कहता हैं की उनके दो मुख के दो-दो हाथ हैं। गोपिल और विदूषक का विवाद होता हैं कि नेपथ्य से राजा और ऋषि के आने कि घोषणा होती हैं। विदूषक और वैतालिक वहाँ से प्रस्थान करते हैं और विश्वामित्र आते हैं। सुमंत्र आकर उनका आर्शीवाद लेते हैं और तभी वसिष्ठ , दशरथ , विदूषक और चारों कुमार का प्रवेश होता हैं। राजा और कुमार उनका आर्शीवाद लेते हैं। विश्वामित्र वसिष्ठ से पुछते हैं कि आपने कभी बताया नहीं कि आप दशरथपुत्रों के गुरु है क्या आपने कुमारों शास्त्र-शस्त्र का ज्ञान दिया है? वसिष्ठ कहते हैं कि मैंने शास्त्र का ज्ञान दिया हैं। विश्वामित्र कुमार से पुछते हैं वसिष्ठ ने आपको क्या ज्ञान दिया हैं इस उत्तर राम देते हैं कि गुरू ने हमें चार वेद, सूत्र सहित व्याकरण, पतंजलि का योगशास्त्र, मानव का आचारशास्त्र, चौदह व्यवहारनिर्णय, वाशिष्ट राजधर्मशास्त्र, मेघातिथि का न्यायशास्त्र, कासकृत्स्न का मीमांसाशास्त्र , रत्न-गज-अश्व परिक्षा, शकुनशास्त्र और काव्यकला सिखायी हैं। अब विश्वामित्र शस्त्र के बारे मे पुछते है तो लक्ष्मण कहता है कि शस्त्र चलाने में राम 'बलाधिकारी विजय' समान हैं। विश्वामित्र यह सब जानकर खुश होते हैं और विश्वामित्र दश दिन चलनेवाले यज्ञ हेतु राम को मांगते है क्योंकि उन्हें भय है कि सुबाहु और मारिच यज्ञ का मे विघ्न डालेंगे। दशरथ कहता हैं कि मैं स्वयं सेना लेकर चलुंगा पर विश्वामित्र कहते है कि यदि राम आये तो यज्ञ का फल उसे भी मिलेगा। वसिष्ठ के कहने पर दशरथ राम को अनुमति देते हैं लक्ष्मण के आज्ञा माँगने पर दशरथ उन्हें भी जाने कि आज्ञा देते हैं। राजा यह खबर अंतःपुर मे देने जाते हैं और सभी प्रस्थान करते हैं।
  • पंचम अंक - ऋषिशिष्यों का प्रवेश होता है। शालंकायन और गालव बात करते है कि विश्वामित्र के यज्ञ का फल हैं कि हम निर्भय होकर वन मे जा सकते है इसी तपोवन मे मारिच विश्वामित्र को पीडा देता था। ताम्यायन नामक शिष्य पूछता है कि राक्षस विश्वामित्र को क्यूँ पीडा पहुंचाते थे? इस पर गालव कहता है कि विश्वामित्र पूर्व क्षत्रिय थे पर तप से ब्रह्मर्षित्व पाया पर रावण को यह पसंद नहीं था वो विश्वामित्र को कुपित करना चाहता था जिससे वह ब्रह्मर्षित्व का उपहास कर सके। ताम्यायन कहता है कि विश्वामित्र शाप क्यों नहीं देते। गालव उत्तर देता है कि क्रोध के बिना ऋषि कैसे शाप दे सकते हैं। गालव ताडका वघ के बारे मे भी कहते हैं और तभी वहाँ विश्वामित्र सह राम और लक्ष्मण का प्रवेश होता हैं। विश्वामित्र राम की प्रसन्नता करते हैं क्योंकि उन्होंने सुबाहु को मार डाला और मारिच भी उनके भय के कारण भाग गया। विश्वामित्र कहते है कि रावण के साथ युद्ध मे तुम्हारी विजय होगी क्योंकि इक्ष्वाकु वंश वर्णाश्रम का रक्षक है पर उस युद्ध को अभी देर हैं अभी तो सारा तपोवन प्रसन्न हैं। विश्वामित्र, लक्ष्मण और राम तपोवन की शोभा देखते हैं। विश्वामित्र कहते है कि तपोवन अतिरम्य होते है यहाँ अपकार और कलह नहीं आतिथ्य होता हैं। विश्वामित्र कृषक का श्रम भी दिखाते हैं। तभी एक वृद्धगोपिका का प्रवेश करती हैं वह अपने गृह में कुमार और ऋषि को आने का निवेदन करती है विश्वामित्र उन्हें राम-लक्ष्मण का परिचय करवाती हैं। वृद्धा उनके धनुष देखकर कहती हैं कि वन और ग्राम मे मृगों को नही मारना क्योंकि वह दोडते हुए ज्यादा शोभा देते हैं। राम उनकी दया से प्रसन्न होते है और विश्वामित्र वृद्धा कि अनुमति लेकर निकल हैं। विश्वामित्र चिंता करते हैं कि सीता राम के योग्य है पर उनका विवाह कैसे कराये। राम उनसे चिंता का कारण पूछते है तब विश्वामित्र कहते हैं कि वैदेह जनक का सांवत्सरिक सत्र हैं उस पर मुझे सत्रांत अभिनंदन हेतु जाना है और तुम दोनों भी चलो। लक्ष्मण कहता की क्या हम अयोध्या नहीं जा रहे। विश्वामित्र कहते है कि संभवतः तुम दोनों भी जनक के यज्ञ का फल मिले। राम और लक्ष्मण सहमत होते हैं।
  • षष्ठ अंक - तीन भट बात कर रहे हैं की राम सीता से प्रेम करते हैं और शीघ्र उनका विवाह होगा। तभी उघान में राम का प्रवेश होता हैं जो सीता का स्मरण कर रहे थे। तभी सीता सखियों के साथ वहा आती हैं पर सीता वहाँ संताप का अनुभव करती है और मणिशिला पर आराम करती हैं। मधुरिका कहती हैं राम भी यहाँ हैं पर सीता धनुभंग की प्रतीज्ञा को लेकर चिंतित होती हैं। मधुरिका कहती है संभवतः राम धनुभंग नहीं कर पायेंगे यह सुनकर सीता मुर्छित हो जाती हैं और राम उन्हें बचाने जाते है। मधुरिका राम से कहती है कि धनुभंग कठिन कार्य है तभी सीता जागृत होती हैं किंतु जनक के आने कि घोषणा सुन राम चले जाते हैं। जनक सीता से कहते हैं कि तुम्हारे लिए अच्छा वर ढूंढा हैं पर सीता कहती है आप मुझे देशांतर कर रहे है। जनक कहते है कि धीरज रखो और आनंद करो यह सुनकर सभी प्रस्थान करते हैं। जनक निर्णय लेते हैं कि मेरे सत्रांतस्नान के समय मैं राम-सीता का विवाह करवाउंगा।
  • सप्तम अंक - दशरथ , उनके पुत्र , रानीयां , विश्वामित्र , वसिष्ठ , शतानन्द , विदूषक और परिजनों का प्रवेश होता हैं। आनन्दित जनक कहते है कि यज्ञ के अंत मे देवता फल देते है मुझे भी यज्ञफल मिल गया क्योंकि मेरे यज्ञान्तस्नान मे राम-सीता, लक्ष्मण-ऊर्मिला, भरत-मांडवी तथा शत्रुघ्न-श्रृतर्किती का विवाह हो गया। सभी नये विवाह संबंध से प्रसन्न थे के तभी क्रोधित परशुराम का प्रवेश होता हैं। सभी उनसे आर्शीवाद लेते हैं। परशुराम जनक से पुछते है कि किसने धनुभंग कीया? जनक कहते हैं की राम ने। राम कहते हैं की यह धनुभंग मैंने जानबूझकर नहीं किया। परशुराम उनका धनुष तोडऩे को देते हैं कि तभी वे राम का वैष्णव रूप देखते हैं और दशरथ से उनके गुणगान करते हैं। विदूषक सोचता है कि यह वृद्ध ऋक्ष (रीछ) यहाँ से जाता क्यों नहीं और परशुराम प्रस्थान करते हैं। राम, जनक और दशरथ परशुराम के गुणगान करते हैं इस पर विदूषक मन में सोचता हैं कि वृद्ध ऋक्ष चला गया फिर भी उसके गुणगान करते हैं। विश्वामित्र कहते है कि परशुराम के कारण अनेक क्षत्रिय मारे गये। विश्वामित्र आकाश मे ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, नारद और तुम्बुर पुष्पवर्षा करते है और वे सभी देवता अपनी पत्नियों सह वहां आकर सवस्ति-सवस्ति कहते हैं। दशरथ कहते हैं कि अपुत्र का दुःख समाप्त हुआ , जनक जैसे संबंधी मिले और पुत्र वीर हुए। विश्वामित्र भरतवाक्य कहते हैं कि राजसिंह पृथ्वी और सागर पर्यन्त अपनी प्रजा के वर्णधर्म की रक्षा करें।

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