विठ्ठल, विठोबा अर्थात पाण्डुरंग एक हिन्दू देवता हैं जिनकी पूजा मुख्यतः महाराष्ट्र, कर्नाटक, गोवा, तेलंगाना, तथा आन्ध्र प्रदेश में होती हैं। उन्हें आम तौर पर भगवान विष्णु अथवा उनके अवतार, कृष्ण की अभिव्यक्ति माना जाता हैं। विठ्ठल अक्सर एक सावले युवा लड़के के रूप में चित्रित किए जाते है, एक ईंट पर खडे और दोनो हाथ कमर पर रखे; कभी-कभी उनकी पत्नी रखुमाई (ऋक्षमणी) भी साथ होती हैं।

विठोबा
विठ्ठल
A black-and-white image of an idol of an arms-akimbo bare-chested man, wearing a conical head-gear, a dhoti and ornaments. The idol is placed on a brick, and backed by a decorated halo.
पंढरपुर के विठ्ठल मन्दिर की मुख्य मूर्ति
संबंध कृष्ण के रूप
निवासस्थान पंढरपुर
जीवनसाथी रुक्मिणी, सत्यभामा, राही
सवारी गरुड़

पूजासंपादित करें

श्री हरि विठ्ठल पूजा मुख्यतः महाराष्ट्र, कर्नाटक, गोवा, तेलंगाना, तथा आन्ध्र प्रदेश में होती है और साथही तमिल नाडु, केरल और गुजरात मे भी होती हैं।[1] श्री हरि विट्ठल की पूजा अधिकतर मराठी लोग करते है, किन्तु वह कुलदेवता के रूप में लोकप्रिय नहीं हैं।[2] पंढरपुर में श्री हरि विट्ठल भगवान का मुख्य मंदिर हैं, जिसमें उनकी पत्नी रखुमाई (ऋक्षमणी) के लिए एक अलग, अतिरिक्त मंदिर भी उपस्थित हैं। इस संदर्भ में, पंढरपुर को प्रेम से भक्तों द्वारा "भु-वैकुंठ" (भु-वैकुंठ अर्थात पृथ्वी पर श्री हरि विष्णु भगवान के निवास का स्थान) कहा जाता हैं।[3] महाराष्ट्र, कर्नाटक और तेलंगाना के भक्त, पंढरपुर में श्री विट्ठल मन्दिर मे ज्ञानेश्वरजी (१३वीं शताब्दी) के समय से आते हैं।[4]

पंढरपुर के मुख्य मंदिर में बड़वा परिवार के ब्राह्मण पुजारी पूजा-विधी करते हैं। इस पूजा में पांच दैनिक संस्कार होते हैं। प्रथम संस्कार : सुबह लगभग ३ बजे, भगवान को जागृत करने के लिए एक अरती है, जिसे काकडआरती कहा जाता है। द्वितीय संस्कार :पंचामृतपुजा होती हैं, जिसमें पंचामृत के साथ स्नान भी कराया जाता हैं और मुर्ती का सुबह के भक्तों के दर्शन लिए शृंगार किया जाता हैं। तृतीय संस्कार : एक और पूजा है जिसमें दोपहर का भोजन और मूर्ति का शृंगार किया हैं। इसे माध्यान्यपूजा के रूप में जाना जाता हैं।

चतुर्थ संस्कार : दोपहर की भक्ती के पश्चात सूर्यास्त पर रात का भोजन होते है जिसे अपराह्णपूजा कहते हैं। पंचम संस्कार :सेजार्ती होती है जो रात १० के पश्चात भगवान को सुलाने के लिये की जाती हैं।[5]

वारकरी सम्प्रदायसंपादित करें

वारकरी सम्प्रदाय अथवा वारकरी पंथ भारत में एक महत्वपूर्ण वैष्णव सम्प्रदाय है जो एकेश्वरवाद मे मानते और विठ्ठल की पूजा पर ध्यान केंद्रित करते है।[6][7] वारकरीयों के अनुसार इस सम्प्रदाय का आरंभ पुंडलिक ने किया जो कि उनके मराठी घोष "पुंडलिकवरदे हरि विठ्ठल" (अर्थ: हरि विठ्ठल, जिसने पुंडलिक को वरदान दिया है) को पुरावा मानत है।[8] कुछ मानते हैं कि पंथ ज्ञानेश्वर जी द्वारा बनाया गया है जो उन्हे श्रेय देते मराठी में कहते है "ज्ञानदेवे राचीला पाया" (अर्थ: ज्ञानेश्वर ने नींव रखी)।[9][10]

नामदेव, एकनाथ, तुकाराम, जनाबाई, विसोबा खेचर, सेना न्हावी, नरहरी सोनार, सावता माळी, गोरा कुंभार, कान्होपात्रा, चोखामेला, शेख मोहम्मद जैसे कई सन्तोंने वारकरी सम्प्रदाय अपनाया और उसे बढावा दिया।[11] लिंग, जाति, आर्थिक पृष्ठभूमि, शूद्र के सभी पूर्वाग्रहों के बिना, जो सभी विट्ठल को माता-पिता और पंढरपुर को माइके के रूप में मानते है, उन सभी का संप्रदाय में स्वीकार होता हैं। वारकरी अक्सर विठ्ठल का जाप करते हैं और हर महीने की एकादशी पर उपवास करते हैं। [8][12]

सन्दर्भसंपादित करें

  1. Kelkar (2001) p. 4179
  2. Karve (1968) p. 183
  3. Tagare in Mahipati: Abbott, Godbole (1987) p. xxxv
  4. Pande (2008) p. 508
  5. Shima (1988) p. 188
  6. Flood (1996) p. 135
  7. Raeside, I. M. P. (1965) p. 82. Cited in Sand (1990) p. 33
  8. anon. (1987) pp. 966–68
  9. Zelliot, Eleanor (1990) p. 38
  10. Pawar p. 350
  11. Shima (1988) pp. 184–86
  12. Tagare in Mahipati: Abbott, Godbole (1988) p. xxxvii

ग्रन्थसूचीसंपादित करें

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें