चंडीदास

राधकृष्ण लीला संबंधी साहित्य का आदिकवि

चण्डीदास (१३७०-१४३०), मध्ययुग के चौदहवीं शताब्दी के बांग्ला भाषा के कवि हैं। वे चैतन्य-पूर्व बांग्ला साहित्य में वैष्णव पदावली के रचयिता की दृष्टि से विशिष्ट स्थान रखते हैं। वे राधकृष्ण लीला सम्बन्धी साहित्य के आदिकवि माने जाते हैं। इनका बंगाली वैष्णव समाज में बड़ा मान है। चैतन्यदेव के जन्म से पहले इन्हीं चण्डीदास के नाम से प्रसिद्ध बहुत से गीतिपद लोगों के मुख में रहते थे।

बहुत दिनों तक इनके बारे में कुछ विशेष ज्ञात नहीं था। चंडीदास को द्विज चंडीदास, दीन चंडीदास, बडु चंडीदास, अनंतबडु चंडीदास इन कई नामों से युक्त पद प्राप्त थे। इनकी पदावली को प्रायः कीर्तनिया लोग गाया करते थे।

इसके पदों का सर्वप्रथम आधुनिक संग्रह जगद्बन्धु भद्र द्वारा "महाजन पदावली" नाम से किया गया। यह संग्रह सन् 1874 ई. में प्रकाशित हुआ था। इस संग्रह ग्रंथ के द्वितीय खण्ड में चंडीदास नामांकित दो सौ से अधिक पद संग्रहीत हैं। सन् 1916 ई. तक चंडीदास के परिचय, समय इत्यादि के संबंध में कोई निश्चित मत न होते हुए भी इस बात की कोई समस्या नहीं थी कि चंडीदास नाम के एक ही व्यक्ति थे या अनेक। इसी समय वसंतरंजन राय ने स्वयं प्राप्त की हुई "श्रीकृष्णकीर्तन" नाम की हस्तलिखित ग्रंथ की प्रति को सम्पादित कर प्रकाशित किया। यह ग्रंथ कृष्णलीला काव्य है। प्रचलित पदावली की भाषा और वर्ण्य विषय से "श्रीकृष्णकीर्तन" की भाषा एवं वर्ण्य विषय में अन्तर होने के कारण इस बात की सम्भावना जान पड़ी कि चंडीदास नाम के एकाधिक व्यक्ति अवश्य थे। बहुत छानबीन के उपरान्त प्राय: सभी विद्वान् इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि दो चंडीदास अवश्य थे।

चैतन्यदेव के पूर्ववर्ती एक चंडीदास थे, इस बात का निर्देश "चेतन्य-चरितामृत" एवं "चैतन्यमंगल" में मिलता है। चैतन्यचरितामृत में बताया गया है कि चैतन्य महाप्रभु चंडीदास एवं विद्यापति की रचनाएँ सुनकर प्रसन्न होते थे। जीव गोस्वामी ने भागवत की अपनी टीका "वैष्णव तोषिनी" में जयदेव के साथ चंडीदास का उल्लेख किया है। नरहरिदास और वैष्णवदास के पदों में भी इनका नामोल्लेख है। इन चंडीदास का जो कुछ परिचय प्राप्त है वह प्रायः जनश्रुतियों पर ही आधारित है। ये ब्राह्मण थे और वीरभूम जिले के नामूर ग्राम के निवासी थे। "तारा", "रामतारा" अथवा "रामी" नाम की धोबिन इनकी प्रेमिका थी, यह एक जनश्रुति है। दूसरी जनश्रुति के अनुसार ये बाँकुड़ा जिले के छातना ग्राम के निवासी थे। ये "वाशुली" देवी के भक्त थे। इनके नाम से प्रकाशित ग्रंथ "श्रीकृष्णकीर्तन" में प्रबन्धात्मकता है। यह प्राचीन यात्रानाट्य और पांचाली काव्य का मिलाजुला रूप है।

'दीन चंडीदास' नामक एक व्यक्ति चैतन्यदेव के परवर्ती थे, इस बात का भी पता चलता है। दीन चंडीदास के नाम से नरोत्तमदास का वन्दना सम्बंधी एक पद प्राप्त है। इससे वे नरोत्तमदास के शिष्य ज्ञात होते हैं। दीन चंडीदास नांमाकित बहुत से पद प्राप्त हैं। इनका संपादित संग्रह मणीन्द्रमोहन वसु ने प्रकाशित किया है।

पदावलीसंपादित करें

सहजिया भाबधारा के पदावली कवि चण्डीदास द्वारा रचित मानवीय प्रेम के कुछ पद -

ब्रह्माण्ड ब्यापिया आछये ये जन, केह ना जानये तारे।
प्रेमेर आरति ये जन जानये सेइ से चिनिते पारे।।

मरम ना जाने, मरम बाथाने, एमन आछये यारा।
काज नाइ सखि, तादेर कथाय, बाहिरे रहुन तारा।
आमार बाहिर दुयारे कपाट लेगेछे – भितर दुयार खोला।

कहे चण्डीदास, कानुर पीरिति – जातिकुलशील छाड़ा।

प्रणय करिया भाङ्गये ये। साधन-अङ्ग पाय ना से।

कि लागिया डाकरे बाँशी आर किबा चाओ।
बाकि आछे प्राण आमार ताहा लैया याओ।

सहजिया गुरुवाद के प्रति श्रद्धा निवेदन करने वाले उनके कुछ पद-

शुनह मानुष भाइ, सबार उपरे मानुष बड़, ताहार उपरे नाइ।

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इन्हें भी देखेंसंपादित करें

सन्दर्भसंपादित करें

  1. Dinesh Chandra Sen, Brihat Banga, 2nd volume, Dey's publishing: Jan 1993, Kolkata: 700073, ISBN 81-7079-186-3