चन्द्र देव (संस्कृत: चन्द्र), जिसे सोम के रूप में भी जाना जाता है, एक हिन्दू देवता है जो चन्द्रमा का देवता माना जाता है। यह रात्रि के समय रोशन करने के लिए रात्रि, पौधों और वनस्पति से सम्बंधित माना जाता है। ब्रह्मा का चन्द्र रूप लेने का मूल उद्देश्य था कि रात्रि काल में पाप न हो। इन्हें नवग्रह (हिन्दू धर्म में नौ ग्रह) और दिक्पाल (दिशाओं के पालक) में से एक माना जाता है।[1] पुराणों के अनुसार इनके पिता का नाम महर्षि अत्रि और माता का नाम देवी अनुसूया था। चंद्रदेव का विवाह दक्ष प्रजापति और वीरणी की साठ में से सत्ताईस कन्याओं के साथ हुआ था और इन्हीं कन्याओं को सत्ताईस नक्षत्र भी कहा गया है। इन कन्याओं में चंद्र रोहिणी से सर्वाधिक प्रेम करते थे।

चंद्र देव

जल तत्व के अधिष्ठाता देवता

रात, पौधे, अवैध संभोग, चंद्रमा और वनस्पति के देवता
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अन्य नाम सोम , रोहिणीनाथ , अत्रिपुत्र ,अनुसूयानंदन , शशि , महेश्वरप्रिय आदि
संस्कृत लिप्यंतरण चंद्र
संबंध ग्रह एवं देव और ब्रह्मा का अवतार
निवासस्थान चंद्र लोक
ग्रह चंद्र
मंत्र ॐ सोम सोमय नमः
अस्त्र रस्सी और अमृत पात्र
जीवनसाथी रोहिणी(मुख्य पत्नी),रेवती , कृतिका , मृगशिरा , आद्रा, पुनर्वसु , सुन्निता , पुष्य अश्व्लेशा , मेघा , स्वाति ,चित्रा , फाल्गुनी , हस्ता , राधा , विशाखा ,अनुराधा , ज्येष्ठा , मुला , अषाढ़ , अभिजीत ,श्रावण , सर्विष्ठ , सताभिषक , प्रोष्ठपदस ,अश्वयुज और भरणी
माता-पिता
भाई-बहन दत्तात्रेय, दुर्वासा
संतान वर्चस , बुध और अभिमन्यु (सुभद्रा और चंद्र के पुत्र)
सवारी मृग का रथ

चंद्रमा का जन्मसंपादित करें

एक बार त्रिदेवियों को अपने सतीत्व पर अहम् हो गया। उन्हें लगा कि उनके समान पतिव्रता स्त्री इस विश्व में कोई नहीं हैे। एक बार भगवान विष्णु के भक्त देवऋषि नारद वहां आ पहुंचे और उन्होंने त्रिदेवियों को महर्षि अत्रि की पत्नी अनुसूया के सतीत्व के बारे में बताया जिससे उनके अहम को बहुत ठेस पहुंची। उन्होंने त्रिदेवों को अनुसूया के सतीत्व की परीक्षा लेने को कहा। तब त्रिदेव एक ही समय में महर्षि अत्रि के आश्रम में आए। तीनों देवों का एक ही उद्देश्य था अनुसूया का सतीत्व नष्ट करना। तीनों देवों ने साधु का वेश लिया और अनुसूया से भोजन करवाने की मांग की और ये शर्त रखी कि उन्हें नग्न अवस्था में भोजन करवाया जाए। अनुसूया ने महर्षि अत्रि का चरणोदक तीनों देवों पर छिड़क दिया जिससे त्रिदेव छोटे छोटे बालकों के रूप में परिवर्तित हो गए और अनुसूया की गोद में खेलने लगे। जब काफी देर तक त्रिदेव अपने धाम नहीं लौटे तब त्रिदेवियाँ उन्हें खोजती हुई महर्षि अत्रि के आश्रम में आ गयीं और देवी अनुसुया के पास आईं। सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती ने उनसे आग्रह किया कि वे उन्हें उनके पति सौंप दें। अनुसुया और उनके पति ने तीनों देवियों की बात मान ली किन्तु अनुसूया ने कहा "कि त्रिदेवों ने मेरा स्तनपान किया है इसलिए किसी ना किसी रूप में इन्हें मेरे पास रहना होगा अनुसुया की बात मानकर त्रिदेवों ने उनके गर्भ में दत्तात्रेय , दुर्वासा और चंद्रमा रूपी अपने अवतारों को स्थापित कर दिया। समय आने पर अनुसूया के गर्भ से भगवान विष्णु ने दत्तात्रेय , भग्वान ब्रह्मा ने चंद्र और भगवान शंकर ने दुर्वासा के रूप में जन्म

लिया

चंद्रदेव को श्रापसंपादित करें

दक्ष प्रजापति द्वारा चंद्र को श्रापसंपादित करें

चंद्रदेव का विवाह ब्रह्मा के पुत्र प्रजापति दक्ष और उनकी पत्नी वीरणी की सत्ताईस पुत्रियों से हुआ था। चंद्र इनमें से रोहिणी से अधिक प्रेम करते थे। कहते हैं चंद्रमा अपनी पत्नी रोहिणी से इतना प्रेम करने लगे कि अन्य 26 पत्नियां चंद्रमा के बर्ताव से दुखी हो गईं. जिसके बाद सभी 26 पत्नियों ने अपने पिता दक्ष प्रजापति से चंद्र की शिकायत की. बेटियों के दुख से क्रोधित दक्ष ने चंद्रमा को श्राप दे डाला दक्ष के श्राप के बाद चंद्रमा क्षयरोग के शिकार हो गए। श्राप से ग्रसित होकर चंद्रमा का तेज क्षीण पड़ने लगा। इससे पृथ्वी की वनस्पतियों पर भी बुरा असर पड़ने लगा।

गणेश जी द्वारा चंद्र को श्रापसंपादित करें

गणेशपुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव और माता पार्वती ने सभी देवताओं को भोजन पर आमंत्रित किया था।भोजन करने के पश्चात् चंद्रदेव आकाश में स्थित हो गए और गणेशजी मूषक पर बैठकर टहलने निकल पड़े। गणेश जी की शारीरिक रचना देखकर चंद्रदेव मन ही मन में हंसने लगे। जब मूषक का संतुलन बिगड़ गया तो उन्होंने गणेश जी से कहा कि "गणेश जी आपकी आकृति बड़ी विचित्र है आपके भार से मूषक भी चलने में असमर्थ हो रहे हैं। आपके हाथ पांव तो खम्भ जैसे हैं विशालकाय हाथी का सिर है और आपका पेट तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे अन्न का पूरा भण्डार हो।" आपको देखकर तो मेरी हंसी रूक ही नहीं रही।" चंद्र की ऐसी बातें सुनकर गणेश जी ने उन्हें अपनी चमक खोने का श्राप दिया।

श्राप से मुक्तिसंपादित करें

दक्ष प्रजापति के श्राप से मुक्तिसंपादित करें

चंद्रदेव ने भगवान विष्णु के कहने पर प्रभास तीर्थ में जाकर १०८ बार महामृत्युंजय मन्त्र का जप किया तथा भगवान शिव की कृपा से उस श्राप से मुक्ति पाई। आज ये स्थान भगवान शंकर का सोमनाथ ज्योत्रिलिंग कहलाता है।

गणेश जी द्वारा चंद्र को श्राप से मुक्तिसंपादित करें

गणेश जी से श्राप मिलने के बाद चंद्रदेव एक सरोवर में जा छुपे थे। गणेश जी को कुछ समय बाद अपनी भूल का अहसास हुआ और वे चंद्रदेव को श्राप मुक्त करने के लिए खोजने लगे। बाद में चंद्रदेव से वे बोले "चंद्रदेव आपको मैंने एक छोटी सी भूल का बड़ा श्राप देकर बहुत बड़ा अपराध किया है। इसलिए मैं आपको श्राप मुक्त करता हूं। लेकिन भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को आपके दर्शन करने वाले व्यक्ति को कलंक लगेगा। इसलिए मेरे जन्मदिवस को कलंक चतुर्थी के नाम से भी जानेंगे।" इसी कारण चंद्रदेव के दर्शन गणेश चतुर्थी को नहीं करने चाहिए।

सन्दर्भसंपादित करें

  1. Dalal 2010a, पृ॰ 394.

स्रोतसंपादित करें

  • Dalal, Roshen (2010a). Hinduism: An Alphabetical Guide (अंग्रेज़ी में). पेंगुइन बुक्स इंडिया. पृ॰ 394. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-14-341421-6.

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें