हिन्दू शास्त्र में कुल मिलाकर अट्ठारह पुराण है जिसमे से नारद पुराण का क्रम छठवां है। इस पुराण में पहले 25000 श्लोक थे लेकिन बाद में अभी इसमे मात्र 18,110 श्लोक ही उपलब्ध हैं और अन्य श्लोक लुप्त हो चुके है| इस पुराण में व्रत का महत्व, तीर्थ गमन का महत्व जैसे संदर्भ में चर्चा की गयी है। नारदीय पुराण का समय तक़रीबन 12वीं सदी के आसपास का होगा|

'नारदीय पुराण' को दो भागों में विभक्त किया गया है-

  1. पूर्व भाग
  2. उत्तर भाग

इस पुराण के पहले यानी पूर्व भाग में एक सौ पच्चीस अध्याय है जब की और दूसरे यानी उत्तर भाग में बयासी अध्याय मिलते हैं। नारदीय पूरण में शुरुआत में सभी अट्ठारह पुराणों की अनुक्रमणिका दी गई है इसलिए इसका महत्व अधिक है।

'नारद पुराण' एक वैष्णव पुराण है। इस पुराण के सन्दर्भ में यह कहा जाता है कि इसका मात्र श्रवण करने से पाप मुक्त हो जाते हैं। जिस भी व्यक्ति को ब्रह्महत्या का दोष है, अगर वह मदिरा अथवा मांस भक्षण करता है, पर स्त्री में लिप्त रहता हो,चोरी करता है ये सब पाप से मुक्त करता है। यह पुराण मुख्यत्व विषय 'विष्णु भक्ति' पर आधारित है। नारद जी विष्णु के परम भक्त हैं।

'नारद पुराण' के प्रारम्भ भाग में ऋषि का गण सूत जी से कुछ प्रश्न पूछते हैं जैसे की-

  • भगवान विष्णु को प्रसन्न करने का उपाय क्या है?
  • जीवो को मुक्ति कैसे मिल सकती है?
  • भगवान की भक्ति के प्रकार कैसे है और इनसे क्या लाभ होता है?
  • अतिथियों का स्वागत कैसे करें?
  • आश्रमों और वर्णों का स्वरूप क्या है?

सूत जी के द्वारा उपर्युक्त प्रश्न के सन्दर्भ में उत्तर दिया की विष्णु जी को प्रसन्न करने का सर्वोत्तम साधन श्रद्धा, भक्ति और सदाचरण का पालन करना है। जो भी जिव निष्काम भाव से भक्ति करता है और अपनी सभी इन्द्रियों को संयमित रखता वही परमपिता इश्वर का सानिध्य प्राप्त करता है| भारत में अतिथि को देवता के समान माना गया है। अतिथि को देवता समज कर ही उनका आदर सत्कार करना चाहिए| चार वर्णों के सन्दर्भ में नारदीय पुराण में ब्राह्मण को ही सर्वश्रेष्ठ माना गया है| ब्राह्मण को जब भी भेंट करे तब उनसे नमन करना चाहिए| क्षत्रिय के द्वारा ब्राह्मणों की रक्षा और वैश्य के द्वारा भरण-पोषण और उनकी इच्छाओं की पूर्ति करनी चाहिए। कुछ कार्यो में ब्राह्मणों को छूट और शूद्रों को दण्ड देने की बात है। इस सन्दर्भ से यह कहा जा सकता है की नारदीय पुराण में ब्राह्मण का पक्ष अधिक लिया जाता है, क्षत्रिय और वैश्य के प्रति का दृष्टिकोण कुछ हद तक स्वार्थी है और शुद्र के प्रति व्यवहार कठोर दिखने को मिलता है|

सागर के वंश में भगीरथ हुए और उन्ही के द्वारा गंगा का पृथ्वी पर जो भी अवतरण हुआ इन सारी बातोँ का वर्णन भी मिलाता है|

पूर्व भागसंपादित करें

नारदीय पुराण में ब्रह्मचर्य में किन किन बातो का ध्यान रखना चाहिए और किन बातो का पालन करना चाहिए तथा गृहस्थाश्रम वालो को किन बातो का ध्यान रखना चाहिए उसका निर्देश भी दिया गया है|

पूर्व भाग में ज्ञान प्राप्ति के संदर्भ में विविध पद्धतियों तथा उनके अंग का वर्णन है। ऐतिहासिक कथाओं, धार्मिक अनुष्ठान, एकादशी व्रत माहात्म्य, धर्म का स्वरूप, बारह महीनों की व्रत-तिथियों के साथ जुड़ी कथाएं, मन्त्र विज्ञान,भक्ति का महत्त्व दर्शाने वाली कथाएं, गंगा माहात्म्य तथा ब्रह्मा के मानस पुत्रों का नारद से संवाद का विस्तृत, अलौकिक आख्यान इसमें प्राप्त होता है।

उत्तर भागसंपादित करें

उत्तर भाग में महर्षि वसिष्ठ और ऋषि मान्धाता के बारे में विस्तृत माहिती प्राप्त होती है| इस भाग में वेदों के छह अंगों का विश्लेषण है। ये अंग हैं- शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरूक्त, छंद और ज्योतिष।

'नारद पुराण' में भगवान् विष्णु की पूजा के साथ-साथ भगवान् राम की पूजा का भी विधान प्राप्त होता है। साथ ही हनुमान, कृष्ण, काली और महेश की पूजा के मन्त्र भी दिए गए हैं। किन्तु प्रमुख तौर पर विष्णु का महत्व अधिक बताया है। अन्त में गोहत्या और देव निन्दा को पाप माना गया है|