सरना धर्म झारखण्ड के आदिवासियों का आदि धर्म है। परन्तु प्रत्येक राज्य आदिवासी ये धर्म को अलग-अलग नाम से जानते है और मानते है अर्थात जब आदिवासी आदिकाल में जंगलों में होते थे। उस समय से आदिवासी प्रकृति के सारे गुण और सारे नियम को समझते थे और सब प्रकृति के नियम पर चलते थे। उस समय से आदिवासी में जो पूजा पद्धति व परम्परा विद्यमान थी वही आज भी क़ायम रखे है। सरना धर्म दुनिया का सबसे पुराना धर्म है। सरना धर्म में पेड़, पौधे, पहाड़ इत्यादि प्राकृतिक सम्पदा की पूजा की जाती है। [1]

सरना धरम का प्रतीक-चिह्न
चित्र:Sarna worshippers following their religious rites.jpg
पूजा करते हुए सरना धरम के अनुयायी

चुंकि आदिवासी प्रकृति पूजक है, प्रकृति पूजक सरना धर्म को 'आदि धर्म' भी कहा जाता रहा है। सरना धर्म आदिवासियों में "हो", "संथाल", "मुण्डा", "उराँव" , "बेदिया" , "कुड़मी महतो" इत्यादि खास तौर पर इसको मानते हैं। जानकारी के अभाव में सरना धर्म को छोड़ कर बहुत से आदिवासी लोग ईसाई धर्म , हिन्दू धर्म और इस्लाम धर्म अपना रहे हैं। जिससे [2] जो कि आदिकाल से जिस परम्परा को मानते आ रहा है, उसे छोड़ने पर विवश हैं। सरना धर्म के अंदर अधिकतर परंपराएं प्रकृति पूजक मानी जाती है जिस प्रकार से सनातन धर्म में भी प्रकृति को पूजा जाता है, उसी प्रकार से सरना के अंदर भी आदिवासी लोग प्रकृति को पूजते हैं!

सरना धर्मसंपादित करें

सरना धर्म क्‍या है ? यह दूसरे धर्मों से किन मायनों में जुदा है ? इसका आदर्श और दर्शन क्‍या है ? अक्‍सर इस तरह के सवाल पूछे जाते हैं। कई सवाल सचमुच जिज्ञाशा का पुट लिए होते हैं और कई बार इसे शरारती अंदाज में भी पूछा जाता है, कि गोया तुम्‍हारा तो कोई धर्मग्रंथ ही नहीं है, इसे कैसे धर्म का नाम देते हो ? लब्‍बोलुआब यह होता है कि इसकी तुलना और कसौटी किन्‍हीं पोथी पर आधारित धर्मों के सदृष्‍य बिन्‍दुवार की जाए।

सच कहा जाए तो सरना एक धर्म से अधिक आदिवासियों के जीने की पद्धति है जिसमें लोक व्‍यवहार के साथ पारलौकिक आध्‍यमिकता या आध्‍यत्‍म भी जुडा हुआ है। आत्‍म और पर-आत्‍मा या परम-आत्‍म का आराधना लोक जीवन से इतर न होकर लोक और सामाजिक जीवन का ही एक भाग है। धर्म यहॉं अलग से विशेष आयोजित कर्मकांडीय गतिविधियों के उलट जीवन के हर क्षेत्र में सामान्‍य गतिविधियों में गुंफित रहता है।

सरना अनुगामी प्राकृतिक का पूजन करता है। वह घर के चुल्‍हा, बैल, मुर्गी, पेड, खेत खलिहान, चॉंद और सूरज सहित सम्‍पूर्ण प्राकृतिक प्रतीकों का पूजन करता है। वह पेड काटने के पूर्व पेड से क्षमा याचना करता है। गाय बैल बकरियों को जीवन सहचार्य होने के लिए धन्‍यवाद देता है। पूरखों को निरंतर मार्ग दर्शन और आशीर्बाद देने के लिए भोजन करने, पानी पीने के पूर्व उनका हिस्‍सा भूमि पर गिरा कर देते हैं। धरती माता को प्रणाम करने के बाद ही खेतीबारी के कार्य शुरू करते हैं।

लेकिन यह पूजन कहीं भी रूढ नहीं है। कोई भी सरना लोक और परलोक के प्रतीकों में से किसी का भी पूजन कर सकता है और किसी का भी न करे तो भी वह सरना ही होता है। कोई किसी एक पेड की पूजा करता है तो जरूरी नहीं कि दूसरा भी उसी पेड की पूजा करे। दिलचस्‍प और ध्‍यान देने वाली बात तो यह है कि जो आज एक विशेष पेड की पूजा कर रहा है जरूरी नहीं कि वह कल भी उसी पेड की पूजा करे। यहॉं पेड किसी मंदिर, मस्जिद या चर्च की तरह रूढ नहीं है। वह तो विराट प्रकृति का सिर्फ एक प्रतीक है और हर पेड प्रकृति का जीवंत प्रतीक है, इसलिए किसी एक पेड को रूढ होकर पूजन करने का कोई मतलब नहीं। अमूर्त शक्ति की उपासना के लिए एक मूर्त प्रतीक की सिर्फ आवश्‍यकता-वस वह उस या इस पेड का पूजन करता है।

सरना धर्म किसी धार्मिक ग्रंथ और पोथी का मोहताज नहीं है। पोथी आधारित धर्म में अनुगामी नियमों के खूँटी से बॉधा गया होता है। जहॉं अनुगामी एक सीमित दायरे में आपने धर्म की प्रैक्टिस करता है। जहॉं वर्जनाऍं हैं, सीमा है, खास क्रिया क्रमों को करने के खास नियम और विधियॉं हैं, जिसका प्रशिक्षण खास तरीके से दिया जाता।

पोथीबद्ध धर्म के इत्‍तर सरना धार्मिकता के उच्‍च व्‍यक्तिगत स्‍वतंत्रता की गारंटी देयता का धर्म है। जहॉं सब कुछ प्राकृतिक से प्रभावित है और सब कुछ प्रकृतिमय है। कोई नियम, वर्जनाऍं नहीं है। आप जैसे हैं वैसे ही बिना किसी कृत्रिमता के सरना हो सकते हैं और प्राकृतिक ढंग से इसे अपने जीवन में अभ्‍यास कर सकते हैं। जीवंत और प्राणमय प्रकृति, जो जीवन का अनिवार्य अंग है, आप उसके एक अंग है। आप चाहें तो इसे मान्‍यता दें या न दें। आप पर किसी तरह की बंदिश नहीं है।

आप प्रकृति के प्रति अपनी श्रद्धा की अभिव्‍यक्ति कहीं भी कर सकते हैं या कहीं भी न करें तो भी आपको कोई मजबूर नहीं करेगा, क्‍योंकि हर व्‍यक्ति की भक्ति की शक्ति या शक्ति की भक्ति के अपनी अवधारणाऍं हैं। एक समूह का अंग होकर भी आपके ”वैचारिक और मानसिक व्‍यक्तित्‍व” समूह से इतर हो सकता है। अपने वैयक्तिक आवधारणा बनाए रखने और उसे लोक व्‍यवहार में प्रयोग करने के लिए आप स्‍वतंत्र है। यही सरना धर्म की अपनी विशेषता और अनोखापन है।

यह किसी रूढ बनाए या ठहराए गए धार्मिक, सामाजिक या नैतिक नियमों से संचालित नहीं होता है। आप या तो सरना स्‍थल में पूजा कर सकते हैं या जिंदगी भर न करें। यह आपके व्‍यक्तिगत स्‍वतंत्रता का भरपूर सम्‍मान करता है। आप चाहें तो अपने बच्‍चों को सरना स्‍थल में ले जाकर वहॉं प्रार्थना करना सिखाऍं या न सिखाऍं । कोई आप पर किसी तरह की मर्जी को लाद नहीं सकता है।

आप धार्मिक, सामाजिक और ऐच्छिक रूप से स्‍वतंत्र हैं। आपको पकड कर न कोई प्रार्थना रटने के लिए कहा जाता है न ही आपको किसी प्रकार से मजबूर किया जाता है कि आप धार्मिक स्‍थल जाऍं और वहॉं अपनी हाजिरी लगाऍं और कहे गए निर्देशों का पालन करें । सरना धर्म के कर्मकांड करने के लिए कहीं किसी को न प्रोत्‍साहन किया जाता है न ही इससे दूर रहने के लिए किसी का धार्मिक और सामाजिक रूप से तिरस्‍कार और बहिष्‍कार किया जाता है। सरना धर्म किसी को धार्मिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक रूप से नियंत्रित नहीं करता है और न ही उन्‍हें अपने अधीन रखने के लिए किसी भी तरह के बंधन बना कर उन पर थोपता है।

सरना बनने या बने रहने के लिए कोई नियम या सीमा रेखा नहीं बनाया गया है। इसमें घुसने के लिए या बाहर निकले के लिए आपको किसी अंतरण अर्थात (धर्मांतरण) करने की जरूरत नहीं है । कोई किसी धार्मिक क्रिया कलाप न में शामिल न होते हुए भी सरना बन के रह सकता है उसके धार्मिक झुकाव या कर्मकांड में शामिल नहीं होने या दूर रहने के लिए कोई सवाल जवाब नहीं किया जाता है। सरना धर्म का कोई पंजी या रजिस्‍टर नहीं होता है। इसके अनुगामियों के बारे कहीं कोई लेखा जोखा नहीं रखा जाता है, न ही किसी धार्मिक नियमों से संबंधित जवाब के न देने पर नाम ही काटा जाता है।

सरना अनुगामी जन्‍म से मरण तक किसी तरह के किसी निर्देशन, संरक्षण, प्रवचन, मार्गदर्शन या नियंत्रण के अधीन नहीं होते हैं। उसे धार्मिक रूप से आग्रही या पक्का बनाने की कोई कोशिश नहीं की जाती है। वह धार्मिक रूप से न तो कट्टर होता है और न ही धार्मिक रूप से कट्टर बनाने के लिए उसका ब्रेनवाश किया जाता है। क्‍योंकि ब्रेनवाश करने, उसे धार्मिकता के अंध-कुँए में धकेलने के लिए कोई तामझाम या संगठन होता ही नहीं है। इसीलिए इसे प्राकृतिक धर्म भी कहा गया है। प्राकृतिक अर्थात् जो जैसा है वैसा ही स्‍वीकार्य है। इसे नियमों ओर कर्मकांडों के अधीन परिभाषित भी नहीं किया गया है। क्‍योंकि इसे परिभाषा से बांधा नहीं जा सकता है।

जन्‍म, विवाह मृत्‍यु सभी संस्‍कारों में उनकी निष्‍ठा का कोई परिचय न तो लिया जाता है न ही दिया जाता है। हर मामले में वे किसी आधुनिक देश में लागू किए सबसे आधुनिक संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार ही (समता-स्‍वतंत्रतापूर्ण जीवन जीने जैसे मूल अधिकार की तरह) सदियों से व्‍यक्तिगत और सामाजिक स्‍वतंत्रता का उपभोग करते आ रहा है। उसके लिए कोई पर्सनल कानून नहीं है। वह शादी भी अपनी मर्जी जिसमें सामाजिक मर्जी स्‍वयं सिद्ध रहता है, से करता है और तलाक भी अपनी मर्जी से करता है। लडकियॉं सामाजिक रूप से लडकों की तरह की स्‍वतंत्र होती है। धर्म उनके किसी सामाजिक कार्यों में कोई बंधन नहीं लगाता है।

सरना बनने के लिए किसी जाति में जन्‍म लेने की जरूरत नहीं है। वह उरॉंव, मुण्‍डा, हो, संताल, खडिया, महली या चिक-बडाइक कहीं के भी आदिवासी, मसलन, उडिसा, छत्‍तीसगढ, महाराष्‍ट्र, गुजरात या केरल के हो, जो किसी अन्‍य किताबों, ग्रंथों, पोथियों आधारित धर्म नहीं मानता है और जिसमें सदियों पुरानी जीवन यापन के अनुसार जिंदगी और सामाज चलाने की आदत रही है सरना या प्राकृतिक धर्म का अनुगामी कहा जा सकता है। क्‍योंकि उन्‍हें नियंत्रित करने वाले न तो कोई संगठन है, न समुदाय है न ही उन्‍हें मानसिक और मनोवैज्ञानिक रूप से नियंत्रण में रखने वाला बहुत चालाकी से लिखी गई किताबें हैं। कोई भी आदमी सरना बन कर जीवन यापन कर सकता है क्‍योंकि उसे किसी धर्मांतरण के क्रिया कलापों से होकर गुजरने की जरूरत नहीं है।

सरना धर्म में सरना अनुगामी खुद ही अपने घर का पूजा पाठ या धार्मिक कर्मकांड करता है। लेकिन सार्वजनिक पूजापाठ जैसे सरना स्‍थल में पूजा करना, करम और सरहूल में पूजा करना, गॉंव देव का पूजा या बीमारी दूर करने के लिए गॉंव की सीमा पर किए जाने वाले डंगरी पूजा वगैरह पहान करता है। पहान का चुनाव विशेष प्रक्रिया जिसे थाली और लोटा चलाना कहा जाता के द्वारा किया जाता है। जिसमें चुने गए व्‍यक्ति को पहान की जिम्‍मेदारी दी जाती है। लेकिन अलग अलग जगहों में पृथक ढंग से भी पहान का चुनाव किया जाता है। चुने गए पहान पहनाई जमीन पर खेती बारी कर सकता है या उसे चारागाह बनाने के लिए छोड सकता है। उल्‍लेखनीय है कि सरना पहान सिर्फ पूजा पाठ करने के लिए पहान होता है। वह समाज को धर्म का सहारा लेकर नियंत्रित नहीं करता है। वह हमेशा पहान की भूमिका में नहीं रहता है। वह सिर्फ पूजा करते वक्‍त ही पहान होता है। पूजा की समाप्ति पर अन्‍य सामाजिक सदस्‍यों की तरह ही रहता है और सबसे व्‍यवहार करता है। वह पहान होने पर कोई विशिष्‍टता प्राप्‍त नागरिक नहीं होता है। अन्‍य धर्मो में पूजा करने वाला व्‍यक्ति न सिर्फ विशिष्‍ट होता है बल्कि वह हमेशा उसी भूमिका में समाज के सामने आता है और आम जनता को उसे विशिष्‍ट सम्‍मान अदा करना पडता है। सम्‍मान नहीं अदा नहीं करने पर धार्मिक रूप से ”उदण्‍ड” व्‍यक्ति को सजा दी जा सकती है, उसकी निंदा की जा सकती है। पहान धार्मिक कार्य के लिए कोई आर्थिक लाभ नहीं लेता है। वह किसी तरह का चंदा भी नहीं लेता है। वह अपनी जीविकोपार्जन स्‍वयं करता है और समाज पर आश्रित नहीं रहता है।

कई लोग अन्‍जाने में या शरातर-वश सरना धर्म को हिन्‍दू धर्म का एक भाग कहते हैं और सरना आदिवासियों को हिन्‍दू कहते हैं। लेकिन दोनों धर्मो में कई विश्‍वास या कर्मकांड एक सदृष्‍य होते हुए भी दोनों बिल्‍कुल ही जुदा हैं। यह ठीक है कि सदियों से सरना और हिन्‍दू धर्म सह-अस्तित्‍व में रहते आए हैं। इसलिए कई बातें एक सी दिखती है। लेकिन आदिवासी सरना और हिन्‍दू धर्म के बीच 36 का आंकडा है। आदिवासी मूल्‍य, विश्‍वास, आध्‍याम हिन्‍दू धर्म से बिल्‍कुल जुदा है इसलिए किसी आदिवासी का हिन्‍दू होना मुमकिन नहीं है। हिन्‍दू धर्म कई किताबों पर आधारित है और उन किताबों के आधार पर चलाए गए विचारों से यह संचालित होता है। याद कीजिए इन किताबों का आदिवासी समाज के लिए कोई महत्‍व नहीं न ही प्रभाव है। इन किताबों के लिए आदिवासियों के मन में सम्‍मान भी नहीं है न ही हिकारत। इन किताबों में आत्‍म, पुर्नजन्‍म, सृष्टि और उसका अंत, चौरासी कोटी देवी देवता, ब्राह्मणवाद की जमींदारी और मालिकाना विचार आदि केन्‍द्र बिन्‍दु है। यह जातिवाद का जन्‍मदाता और पोषक है और सामांतवाद को यहॉं धार्मिक मान्‍यता प्राप्‍त है। यहीं हिन्‍दू धर्म सरना धर्म के उलट रूप में प्रकट होता है। ब्राहणवाद और जातिवाद से पीडित यह जबरदस्‍ती बहुसंख्‍यक, कर्मवीर और श्रमशील लोगों को नीच घोषित करता है और लौकिक और परलौकिक विषयों की ठेकेदारी ब्राह्मण और उनके मनोवैज्ञानिक उच्‍चता का बोध कराने के लिए बनाए गए नियमों को सर्वोच्‍चता प्रदान करता है। यह वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक रूप ये अत्‍यंत अन्‍यायकारी और घ़ृष्‍टतापूर्ण है। इंसानों को अन्‍यायपूर्ण रूप से धार्मिक भावनाओं के बल पर जानवरों की तरह गुलाम बनाने के हर औजार इन किताबों में मौजूद है।

ऐसा धार्मिक नियम, परंपरा और लोक व्‍यवहार सरना समाज में मौजूद नहीं है। सरना समाज में जातिवाद और सामांतवाद दोनों ही नहीं है। यहॉं सिर्फ समुदाय है, जो न तो किसी दूसरे समुदाय से उॅच्‍च है न नीच है। सरना धर्म के समता के मूल्‍य और सोच के बलवती होने के कारण किसी समुदाय का शोषण का कोई सोच और मॉडल न तो विकसित हुई है और न ही ऐसे किसी प्रयास के मान्‍यता मिली है। कई लोग आदिवासियों के हनुमान और महादेव के पूजन को हिन्‍दू धर्म से जोडकर इसे हिन्‍दू सिद्ध करना चाहते हैं। लेकिन सरना वालों ने कहीं इसका मंदिर न तो खुद बनाए हैं न ही सामाजिक धर्म और पर्वों में इनके घरों में पूजा की जाती है। ऐतिहासिक रूप से अभी तक कुछ स्‍पष्‍ट नहीं हो पाया है लेकिन अनेक विद्वान हनुमान और महादेव को प्रागआदिवासी मानते हैं। हजारों सालों से एक ही धरती पर निरंतर साथ रहने के कारण दोनों के बीच कहीं अंतरण हुआ होगा। लेकिन आदिवासी हिन्‍दू नहीं है यह स्‍पष्‍ट है।

हाल ही में हिन्‍दुत्‍व, क्रिश्चिनि‍टी, इस्‍लाम से प्रभावित कुछ उत्‍साही जो अपने को सरना के रूप में परिचय देते हैं, लोगों ने सरना को परिभाषित करने, उसका कोई प्रतीक चिन्‍ह, तस्वीर, मूर्ति, मठ, पोथी आदि बनाने की कोशिश की है जिसे निहायत ही आईडेंटिटी क्राइसेस से जुझ रहें लोगों का प्रयास माना जा सकता है। इन चीजों के बनने का सरना धर्म के मूल्‍यों में हृास होगा और इसके अनुठापन खत्‍म होगा । सरना धर्म में विचार, चिंतन की स्‍वतंत्रता उपलब्‍ध है । वे भी स्‍वतंत्र हैं अपने धार्मिक चिंतन को एक रूप देने के लिए । लेकिन ऐसे परिवर्तन को सरना कहना, एक मजाक के सिवा कुछ नहीं है। सरना किसी मूर्ति, चिन्‍ह, तस्‍वीर या मठ का मोहताज नहीं है। फिर यह भी दूसरे धर्म की धार्मिक बुराईयों का शि‍कार हो जाएगा।

यदि सरना के दर्शन के शब्‍दों में कहा जाए तो यह सब चिन्‍ह आपनी आईडेंटिटी गढने, रचने और उसके द्वारा व्‍यैयक्तिक पहचान बनाने के कार्य हैं । जिसका इस्‍तेमाल, सामाजिक कम राजनैतिक, सांस्‍कृतिक और वैचारिक साम्राज्‍य गढने और वर्चस्‍व स्‍थापित करने के लिए एक हथियार के रूप में किया जाता रहा है। ऐसे चीजों का अपना एक बाजार होता है और उसके सैकडों लाभ मिलते हैं। लेकिन सरना दर्शन, सोच, विचार, विश्‍वास, मान्‍यता से बाजार का कोई संबंध नहीं है। मिट्टी के छोटे दीया, भांड, घडा आदि हजारों साल से स्‍थानीय लोगों के द्वारा ही निर्मित होता रहा है और इसका कोई स्‍थायी बाजार नहीं होता है।

कु्ल मिला कर यही कहा जा सकता है कि सरना एक अमूर्त शक्ति को मानता है और सीमित रूप से उसका आराधना करता है। लेकिन इस आराधना को वह सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक रूप में नहीं बदलता है। वह आराधना करता है लेकिन उसके लिए किसी तरह के शोशेबाजी नहीं करता है। यदि वह करता है तो फिर वह कैसे सरना ???? लेकिन किसी मत को कोई मान सकता है और नहीं भी, क्‍योंकि व्‍यक्ति के पास अपना विवेक होता है और यह विवेक ही उसे अन्‍य प्राणी से अलग करता है, विवेकवान होने के कारण अपनी अच्‍छाईयों को पहचान सकता है। सब अच्‍छाईयॉं, कल्‍याणकारी पथ खोजने के लिए स्‍वतंत्र है। इंसान की इसी स्‍वतंत्रता की जय जयकार हर युग में हर तरफ हुई है

सरना धर्म कोड की मांगसंपादित करें

दस करोड़ आदिवासियों की आबादी का क्या कोई अपना धर्म नहीं है? भारत सरकार की मानें तो नहीं? क्योंकि जनगणना प्रपत्र में इनके लिए कोई कॉलम नहीं हैं। इन्हें या तो हिंदू धर्म में विलोपित कर दिया जाता है या ईसाई में। पर, इसकी मांग लंबे समय से की जाती रही है और सरकार इसे नकारती रही है? जोहार सहिया के संपादक अश्विनी कुमार पंकज कहते हैं कि अलग धरम कोड की मांग उतनी ही पुरानी है, जितनी झारखंड आंदोलन की मांग। अलग राज्य की मांग में अलग धरम कोड की मांग भी थी। पर, कालांतर में राजनीतिक-आर्थिक कारणों की प्रबलता से यह मांग पीछे छूट गई। अब राज्य अलग हो गया तो भाषा का सवाल, धरम कोड का सवाल प्रमुखता से उठ रहा है। यह जायज भी है। यह उनके अस्तित्व से जुड़ा है। धरम कोड को लेकर एक लंबी बहस भी चली। आदिवासियों के धर्म को आदि धरम कहा जाए या सरना। आदिवासियों के पूजा स्थल को सरना स्थल कहा जाता है। इसे लेकर कहा गया कि पूजा स्थल धर्म नहीं हो सकता। दूसरे आदिवासी समुदायों ने आदि धरम नाम प्रस्तावित किया। इसमें डा. रामदयाल मुंडा का नाम प्रमुख है। उन्होंने अपने अंतिम समय में आदि धरम नामक किताब भी लिखी। वे शुरू से ही इसके पक्ष में थे कि आदिवासियों को आदि धरम से चिह्नित किया जाए। भारत सरकार ने तो संयुक्त राष्ट्र संघ में एक बार आदिवासी आबादी को ही नकार दिया था। जब काफी हो-हल्ला हुआ तो उसने स्वीकार किया। हालांकि संविधान ने आदिवासियों की एक अलग पहचान स्वीकारी है और उनकी सांस्कृतिक विशिष्टता के संरक्षण-संवर्धन के लिए अनेक प्रावधान किए गए हैं। यहां तक कि 1960 में ढेबर कमीशन ने आदिवासी/अनुसूचित जनजातियों को इंडीजिनस के समकक्ष माना है। देश की सत्ता सदैव से ही आदिवासी आबादी को नकारती रही है। इसलिए जनगणना प्रपत्र में आज तक इनके लिए अलग से कोई कॉलम नहीं दिया गया है। अब यह मामला जोर पकड़ रहा है। जब जैन, बौद्ध, पारसी या अन्य जो जनसंख्या की दृष्टि से कम हैं, उनके लिए अलग से कॉलम है तो आदिवासियों के लिए क्यों नहीं? यही मांग लंबे समय से की जा रही है। जिनकी आबादी देश में दस करोड़ हो, उनके अस्तित्व को क्या नकारा जा सकता है? आदिवासी जनपरिषद इन्हीं सवालों को लेकर बिरसा मुंडा के जन्म स्थान से पदयात्रा कर रहा है।

मुड़मा जतरा

मुड़मा नामक एक गाँव में प्रत्येक वर्ष आयोजित किया जाता है। मुड़मा गाँव झारखंड की राजधानी राँची से लगभग 28 किलोमीटर दूर राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-75 पर जिसे राँची-डलटेनगंज मार्ग के नाम से भी जाना जाता है, स्थित है। यहाँ दशहरा के दसवें दिन ‘मुड़मा जतरा’ का आयोजन झारखंड के आदिवासी समुदायों के द्वारा मेला किया जाता है। यह मेला कब और कैसे प्रारम्भ हुआ इसकी कोई लिखित प्रामाणिक जानकारी उपल्ब्द्ध नहीं है लेकिन लोकगितों एवं किवदंतियों के अनुसार जनजातीय समुदाय के उराँव आदिवासी जनजाति जो की रोहतसगढ, बिहार के थे, के पलायन से जोड़कर देखा जाता है। छोटनागपुर के इतिहास के अनुसार जब मुग़लों ने रोहतसगढ़ पर आक्रमण कर अधिकार कर लिया तो वहाँ रह रहे उराँव समुदाय के लोगों को गढ़ छोड़कर भागना पड़ा था और इसी क्रम में वे सोन नदी पार कर वर्तमान पलामू होते हुए वे राँची ज़िला में प्रवेश किए जहाँ मुड़मा में इनका सामना मुंडा जनजाति के मुँड़ाओं से हुआ और जब उराँव लोगों ने अपनी व्यथा कथा मुँड़ाओं को सुनाई तब मुँड़ाओं ने इनको पश्चिम वन क्षेत्र की सफ़ाई करके वहाँ रहने की अनुमति प्रदान की थी और यह समझौता मुड़मा गाँव में हुआ था। इसलिए उराँव समुदाय के 40 पाड़हा के लोग उस ऐतिहासिक समझौते के स्मृति में ‘मुड़मा जतरा’ को आयोजित करते हैं। इस दिन सरना धर्मगुरु के अगुवाई में अधिष्ठात्री शक्ति के प्रतीक जतरा खूंटे की परिक्रमा व जतरा खूंटा की पूजा-अर्चना भी की जाती है। पाड़हा झंडे के साथ मेला स्थल पहुंचे पाहन (पुजारी) ढोल, नगाड़ा, माँदर के थाप अन्य ग्रामीणों के साथ नाचते-गाते आते हैं और मेला स्थल पर पाहन पारम्परिक रूप से सरगुजा के फूल सहित अन्य पूजन सामग्रियों के साथ देवताओं का आहवाहन करते हुए ‘जतरा खूँटा’ का पूजन करता है एवं प्रतीक स्वरूप दीप भी जलाया जाता है और इस प्रकार मेला का आरम्भ किया जाता है। इस पूजन में सफ़ेद एवं काला मुर्ग़ा की बलि भी चढ़ाई जाती है। सरना धर्मगुरु के अनुसार यह आदिवासियों का शक्ति पीठ है। आदिवासी व मुंडा समाज का मिलन स्थल भी है। यहां सभी समाज के लोग आते हैं। सुख-समृद्धि व शांति के लिए प्रार्थना करते हैं।.

सरहुल

सरहुल आदिवासियों का एक प्रमुख पर्व है जो झारखंड, उड़ीसा, बंगाल और मध्य भारत के आदिवासी क्षेत्रों में मनाया जाता है। यह उनके भव्य उत्सवों में से एक है। यह उत्सव चैत्र महीने के तीसरे दिन चैत्र शुक्ल तृतीया पर मनाया जाता है। आदिवासी लोग 'सरहुल' का जश्न मनाते हैं, जिसमें वृक्षों की पूजा की जाती है। यह पर्व नये साल की शुरुआत का प्रतीक है। यह वार्षिक महोत्सव वसंत ऋतु के दौरान मनाया जाता है एवम् पेड़ और प्रकृति के अन्य तत्वों की पूजा होती है। सरहुल का शाब्दिक अर्थ है 'साल की पूजा', सरहुल त्योहार धरती माता को समर्पित है - इस त्योहार के दौरान प्रकृति की पूजा की जाती है। सरहुल कई दिनों तक मनाया जाता है, जिसमें मुख्य पारंपरिक नृत्य सरहुल नृत्य किया जाता है। सरहुल वसंत ऋतु के दौरान मनाया जाता है और साल (शोरिया रोबस्टा) पेड़ों को अपनी शाखाओं पर नए फूल मिलते हैं। आदिवासियों का मानना ​​है कि वे इस त्योहार को मनाए जाने के बाद ही नई फसल का उपयोग मुख्य रूप से धान, पेड़ों के पत्ते, फूलों और फलों के फल का उपयोग कर सकते हैं। सरहुल महोत्सव कई किंवदंतियों के अनुसार महाभारत से जुडा हुआ है। जब महाभारत युद्ध चल रहा था तो मुंडा जनजातीय लोगों ने कौरव सेना की मदद की और उन्होंने इसके लिए भी अपना जीवन बलिदान किया। लड़ाई में कई मुंडा सेनानियों पांडवों से लड़ते हुए मर गए थे इसलिए, उनकी शवों को पहचानने के लिए, उनके शरीर को साल वृक्षों के पत्तों और शाखाओं से ढका गया था। निकायों जो पत्तियों और शाखाओं के पेड़ों से ढंके हुए थे, सुरक्षित नहीं थे, जबकि अन्य शव, जो कि साल के पेड़ से नहीं आते थे, विकृत हो गए थे और कम समय के भीतर सड़ गया थे। इससे साल के पेड़ पर उनका विश्वास दर्शाया गया है जो सरहुल त्योहार से काफी मजबूत है। त्योहार के दौरान फूलों के फूल सरना (पवित्र कब्र) पर लाए जाते हैं और पुजारी जनजातियों के सभी देवताओं का प्रायश्चित करता है। एक सरना वृक्ष का एक समूह है जहां आदिवासियों को विभिन्न अवसरों में पूजा होती है। कई अन्य लोगों के बीच इस तरह के एक ग्रोथ को कम से कम पांच सा वृक्षों को भी शोरज के रूप में जाना जाना चाहिए, जिन्हें आदिवासियों द्वारा बहुत ही पवित्र माना जाता है। यह गांव के देवता की पूजा है जिसे जनजाति के संरक्षक माना जाता है। नए फूल तब दिखाई देते हैं जब लोग गाते और नृत्य करते हैं। देवताओं की साला फूलों के साथ पूजा की जाती है पेड़ों की पूजा करने के बाद, गांव के पुजारी को स्थानीय रूप से जाने-पहल के रूप में जाना जाता है एक मुर्गी के सिर पर कुछ चावल अनाज डालता है स्थानीय लोगों का मानना ​​है कि यदि मृगी भूमि पर गिरने के बाद चावल के अनाज खाते हैं, तो लोगों के लिए समृद्धि की भविष्यवाणी की जाती है, लेकिन अगर मुर्गी नहीं खाती, तो आपदा समुदाय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इसके अलावा, आने वाले मौसम में पानी में टहनियाँ की एक जोड़ी देखते हुए वर्षा की भविष्यवाणी की जाती है। ये उम्र पुरानी परंपराएं हैं, जो पीढ़ियों से अनमोल समय से नीचे आ रही हैं। सभी झारखंड में जनजाति इस उत्सव को महान उत्साह और आनन्द के साथ मनाते हैं। जनजातीय पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को रंगीन और जातीय परिधानों में तैयार करना और पारंपरिक नृत्य करना। वे स्थानीय रूप से बनाये गये चावल-बीयर, हांडिया नाम से पीते हैं, चावल, पानी और कुछ पेड़ के पत्तों के कन्सेक्शन से पीसते हैं और फिर पेड़ के चारों ओर नृत्य करते हैं। हालांकि एक आदिवासी त्योहार होने के बावजूद, सरहुल भारतीय समाज के किसी विशेष भाग के लिए प्रतिबंधित नहीं है। अन्य विश्वास और समुदाय जैसे हिंदू, मुस्लिम, ईसाई लोग नृत्य करने वाले भीड़ को बधाई देने में भाग लेते हैं। सरहुल सामूहिक उत्सव का एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करता है, जहां हर कोई प्रतिभागी है। इस दिन झारखंड में राजकीय अवकाश रहता है।

इतिहास

देश का प्रथम जनगणना 1872 में हिन्दू, मुसलमान, इसाई, जैन, बौद्द, पारसी, यहूदी की गणना हुई, सरना की नहीं. 1891 में आदिवासियों को प्रकृतिवादी के रूप में जनगणना में जगह दिया गया. 1901, 1911, 1921, 1931 और 1941 में जनजातीय समुदाय का नाम लिखा गया. 1951 में अन्य धर्म की श्रेणी में जनजातीय धर्म का अलग से पहचान को अंकित किया गया. 1961 में अधिसूचित धर्मों(हिन्दू, मुसलमान, सिख, इसाई, जैन, बौद्द) के संक्षिप्त नाम को कोड के रूप में लिखा गया लेकिन जनजातीय समुदाय को अन्य धर्म अंतर्गत विलोपित कर दिया गया. 1971 में सिर्फ अधिसूचित धर्मों का ही रिपोर्ट प्रकाशित किया गया. 1981 में धर्म के पहले अक्षर को कोड के रूप में अंकित किया गया, सरना विलोपित रहा. 2001 और 2011 में अधिसूचित धर्मों को 1 से 6 का कोड दिया गया, जनजातियों को अन्य धर्म की श्रेणी में रखा गया लेकिन कोड प्रकाशित नहीं किया गया.

  अब यदि हम सरना की मान्यता और शुरुआत कैसे हुई? इस पर बात करेंगे तो पाएंगे कि मुन्डा और हो जनजाति में इसके सम्बन्ध में एक पौराणिक कथा चलती है. कहते हैं की आदि काल में जब हमारे पूर्वज अपने दस्तूर के नियमों को बाँध रहे थे, तो उन लोगों के विचारों में काफी भिन्नता थी. कहा जाता है की विचारों में भिन्नता के कारण वे साथ रह कर भी दूर थे. अलग अलग पेड़ों के नीचे बैठ कर निर्णय का प्रयास हुआ पर वे असफल रहे. लेकिन, कोई भी शुभ काम करने से पहले धनुष से तीर छोड़ने का रिवाज था. उसी अनुसार काम के शुभ-अशुभ की जानकारी लेते थे. अपने सांस्कृतिक अनुष्ठानों को पूरा करने हेतु किस पेड़ के पत्ते आदि का इस्तेमाल करना है, जानने के लिए उन्होंने तीर छोड़ा. घने जंगलों को चीरते हुए तीर काफी दूर गया. उसे खोजने पर लोगों को तीर नहीं मिला. वे वापस गाँव को वापस लौटे. आदिवासी बालाएं पत्ते, दतुवन, लकड़ी आदि तोड़ने के लिए 4-6 महीने के अन्तराल में जब जंगल गई तो एक लड़की ने कुछ देख कर अनायास ही बोल उठी कि “(मुंडारी/हो भाषा में) सर-ना बई सर नेन दरू दो सरे: जोमा कडा”. ‘सर’ को मुंडारी/हो में तीर बोलते हैं और ‘ना’ आश्चर्य सूचक शब्द है, अर्थात इस पेड़ ने तीर को निगल लिया है. इस जानकारी को लड़कियों ने गाँव वालों को दिया तो वे तुरंत समझ गए की यह तीर किस मकसद से छोड़ा गया था. चूंकि उसे देख कर लड़की ने जिस शब्द को पहले उच्चारित किया वही शब्द ‘सर-ना=सरना’ हुआ. यहीं से सरना शब्द की शुरुआत हुई.

आज भी हो समाज के बहा पर्व में जयरा में पूजा पाठ कर वापस गाँव आने की प्रक्रिया में साल पेड़ की टहनी जमीन पर गाड़ कर निशाना लगाने का दस्तूर है. जो व्यक्ति इसमें सफल होता है उसे वीर की श्रेणी में रखा जाता है और उसी दिन से जंगल में शिकार की शुरुआत होती है, जो बमुश्किल एक महीने तक चलती है. इससे पता चलता है की सरना वास्तव में एक सांस्कृतिक गतिविधि है जो प्राकृतिक अनुष्ठानों के क्रम में आदिवासियों ने अपनाया. सांस्कृतिक पहचान एक बहुत ही अमूल्य धरोहर है आदिवासियों के लिए, लेकिन आज हम धर्म और राजनीती के चक्कर में अपने मूल स्वरुप को खो सा दिए हैं, इसीलिए अपनी पहचान की स्पष्ट परिभाषा खोज पाने में असमर्थ होने की स्थिति में हम दूसरों की संस्कृति को अपना समझ और मान कर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं, आत्महत्या कर रहे हैं

सरना धर्म या संस्कृति

 मैं सरना को धर्म नहीं वरन आदिवासी जीवन जीने की पद्दति मानता हूँ. और जिस कोड की बात जनगणना में हो रही है वह वास्तव में पहचान कोड की है. जैसे हिन्दू धर्म नहीं है, सनातन है. कोड हिन्दू का है, सनातन का नहीं. जनगणना के C1 Annexure में भारत देश के अन्दर जिसने भी नाम दर्ज कराया है, उन सबका एक तकनिकी धर्म कोड अंकित होता है.

2011 जनगणना के C1 Annexure में हिन्दू का धर्म कोड 100000 है और सेक्ट कोड 000000 है. सनातन धर्म का 100000(हिन्दू का ही) और सेक्ट कोड 121000 है, जबकि सरना का धर्म कोड 701146 दर्ज होकर है. आदिवासी का धर्म कोड 701002 है. आप जो भी लिखेंगे इस टेबल में लिखा जाएगा. अब कोड की बात तो जनगणना नियमावली में जनगणना आयुक्त के पद में यह शक्ति दी गई है कि प्रकाशन की सुविधा के लिए वह आवश्यक कदम उठाएंगे. इसी शक्ति का इस्तेमाल कर अब तक सरकारों ने हिन्दू, मुसलमान, सिख, इसाई, जैन, बौद्द के लिए कोड 1, 2 आदि आवंटित कर दिया जाता रहा है, जबकि सनातन धर्म को कोई प्रकाशन कोड आवंटित नहीं हुआ है. यह लड़ाई वास्तव में इसी प्रकाशन कोड की लड़ाई है, जो सुविधा के लिए जनगणना कार्यालय आवंटित कर रही है.

अंतराष्ट्रीय आदिवासी दिवस क्या है और हमें क्यों मनाना चाहिए

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद संसार में बहुत बड़े स्तर पर अशांति का माहौल था। दुनिया में पुन: शांति स्थापित करने एवं मुकम्मल व्यवस्था कायम करने के इरादे से 1945 में 189 स्वतंत्र राष्ट्रों ने मिलकर एक अंतराष्ट्रिय संगठन, संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की थी। इस संस्था का महत्वपूर्ण उद्देश्य यह था कि संसार में सामाजिक और आर्थिक विकास को बढ़ावा दिया जाए और यह सुनिश्चित किया जाए की दुनिया भर में मानवाधिकारों का सम्मान हो। विभिन्न राष्ट्रों के बीच संघ की परिकल्पना को जीवित रखने वाली एक विशिष्ट एजेन्सी है, अंतराष्ट्रिय श्रम संगठन (आई.एल.ओ.) जिसकी स्थापना 1919 में हुई थी, इसी संगठन ने हमेशा आदिवासियों के विषयों को अपने अजेंडा में शामिल किया। और सबसे पहला मामला 1920 का है जब अंतराष्ट्रिय श्रम संगठन ने आदिवासी श्रामिकों की श्रम स्थितियों की जाँच के लिए अध्ययन शुरू किया था। पुन: 1957 में समझौता 107 और 1989 में संशोधित समझौता 169 पारित किया। इन अनुबंधों में आदिवासिओं के निम्लिखित दो स्तरीय दृष्टिकोण दिए गए – आदिवासी उन्हें माना गया 1- जिनकी हैसियत पूरी तरह या आंशिक तौर पर अपने रीति -रिवाजों, परम्पराओं या विशेष नियमों द्वारा नियंत्रित एवं संचालित होती है। 2- जिन्हें ऐसी जनसंख्याओं का वंशज होने के कारण आदिवासी माना जाता है, जो देश पर विजय, उपनिवेशीकरण या मौजूदा सीमाओं के स्थापित होने के पहले कुछ देश या उसके भौगोलिक क्षेत्र में रह रहे थे और जिन्होंने अपनी कानूनी हैसियत की परवाह किए बिना अपनी सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक संस्थाएं पूरी तरह से या कुछ हद तक बचाए रखी है। और इस तरह से आदिवासियों की परिभाषा के चार मुख्य पहचान तय किए गए : 1. राज्य की संस्थाओं और व्यापक समाज में वे एक निचले दर्जे का स्थान रखते हैं और कभी-कभी वे जातीय भेदभाव के शिकार होते रहे हैं। 2. ये सामूहिक रूप से अपने पुराने रीति -रिवाजों को बरक़रार रखते हुए जीवनयापन कर रहे हैं। और अपनी पुरानी मान्यताओं के कारण ही वे अन्य समूहों से अलग पहचान बनाते हैं। 3. परंपरागत प्राकृतिक संसाधनों पर सदियों से उनका मालिकाना हक़ रहा है, लेकिन उस संसाधनों के आजादी पूर्वक उपभोग से उन्हें वंचित किया जाता रहा है। 4. आदिवासी लोग किसी सीमा में रहनेवाले मूल लोगों के वंशज हैं, और विदेशी उपनिवेशवादी ताकतों द्वारा इतिहासिक रूप से शोषित है।

आर्श्चय है कि भारत ने पहले तो इस पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया था। लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ के आर्थिक और सामाजिक परिषद् ने अल्पसंखयकों और आदिवासियों के प्रति भेदभाव रोकने और उनकी रक्षा करने के मुद्दे पर गठित उप-आयोग को आदिवासियों के खिलाफ भेदभाव पर जाँच पड़ताल करने के लिए 1972 में अधिकृत किया। Equador के जोस मार्टिनेज कोबे को यह जाँच पड़ताल करने के लिए नियुक्त किया गया। और कोबे ने 1986 में अपनी जाँच पूरी की।

1982 में आदिवासी आबादियों पर संयुक्त राष्ट्र के कार्यदल (UNWGEP) का गठन किया गया। वर्ष 2006 तक प्रत्येक वर्ष इस कार्यदल की बैठक होती रही। इस कार्यदल के क्रियाकलापों में संसार के प्रतिनिधियों और आदिवासियों ने भाग लिया। विश्व भर के आदिवासियों की अपनी सांस्कृतिक, सामाजिक, एवं आर्थिक धरोहरों की रक्षा के लिए निरंतर संघर्षों की भावना को देखते हुए सर्वप्रथम 1992 में संयुक्त राष्ट्र संघ की आमसभा में यह तय किया गया की ऐसी कोई मुकम्मल नीति बनाई जाए जो आदिवासी समुदायों को विश्व स्तर पर एकसूत्र में बाँध सके। चूँकि कई देशों ने आदिवासियों को जातिय अल्पसंख्यक की तरह मान्यता नही दी थी, अत: 1992 के अंतराष्ट्रिय मानवाधिकार दिवस में इस विषय पर चर्चा की गई कि आदिवासियों के अधिकारों पर विश्वव्यापी घोषणा के प्रस्ताव को राष्ट्र संघ की साधारण सभा द्वारा अग्रसारित किया जाए। संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 1993 को आदिवासी वर्ष घोषित किया और इसी वर्ष 1993 में संयुक्त राष्ट्र कार्यदल के 11 वें सत्र में आदिवासी अधिकार घोषणा प्रारूप को मान्यता दी गई। 23 दिसम्बर 1994 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने निर्णय लिया कि पहला आदिवासी दशक 1995-2004 के दौरान प्रति वर्ष 9 अगस्त को अंतराष्ट्रिय आदिवासी दिवस मनाया जाएगा। यह दिन वास्तव में 1982 में आदिवासी आबादियों पर संयुक्त राष्ट्र के कार्यदल की पहली बैठक का दिन था। आदिवासी दशक को पुन: 2005-2014 तक बढ़ाया गया। इस तरह विश्व आदिवासी दिवस मनाने की शुरुआत हुई।

वर्ष 1995 में मानवाधिकार आयोग की स्थापना की गई, और उपरोक्त प्रारूप पर आगे काम बढ़ाने के लिए अन्तर-सत्र-कार्यदल का गठन किया गया। क्योंकि उक्त प्रारूप को संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा के समक्ष प्रस्तुत करना था। विभिन्न देशों के सरकारी प्रतिनिधिओं के साथ आदिवासियों को भी इस सभा में भाग लेने का अवसर दिया गया। मानवाधिकार परिषद् ने 29 जून 2006 को घोषणा के संशोधित प्रारूप को स्वीकार किया और उसे महासभा को पेश किया गया। संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने नवम्बर 2006 में अन्तिम निर्णय को किसी कारण वश टाल दिया था। लेकिन अंतत: 13 सितम्बर 2007 को संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने कुछ परिवर्तनों के साथ घोषणा को स्वीकार किया और आदिवासी घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किया । इसीलिए 13 सितम्बर को आदिवासी अधिकार घोषणा दिवस भी कहा जाता है। इस घोषणा पत्र में कुल 46 अनुच्छेदों का जिक्र है, जिसमें आदिवासी लोगों के आत्मनिर्णय के साथ-साथ उनकी संस्कृति, धर्म, शिक्षा, सूचना, संचार, स्वस्थ्य, आवास, रोजगार, सामाजिक कल्याण, आर्थिक गतिविधियाँ, भूमि एवं प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंध, प्रयावरण और गैर आदिवासियों के आदिवासी क्षेत्रों में प्रवेश आदि विषयों को रखा गया और इन विषयों में से एक स्वायत कार्यों यानी स्वशासन व्यवस्था की वित्तीय उपलब्धता भी शामिल था। इस बार भारत को भी आदिवासियों के लगातार संघर्षों एवं अंतराष्ट्रिय दबाव के कारण ही सही, घोषणा पत्र में हस्ताक्षर करना पड़ा। भारत के संविधान के अनुच्छेद 253 के तहत इस अंतरष्ट्रीय समझौता में हस्ताक्षर के साथ ही भारत अब सिद्दांतत: आदिवासियों के हक़ और अधिकारों से मुँह नहीं मोड़ सकता वरण बाध्य है। संयुक्त राष्ट्र संघ की नीति के अनुरूप आदिवासियों को इंडिजिनस पीपुल के तमाम आधिकार देते हुए उन्हें अपनी संस्कृति, परम्परा और जीवन शैली के अनुरूप अपना विकास का मौका देने के लिए सरकारें अब बाध्य हैं। लेकिन वास्तव में हो कुछ नहीं रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपने उद्देश्य में स्पष्ट कर दिया है कि 9 अगस्त को दुनिया के तमाम देशों की सरकारों से ये अपेक्षा की गई है, कि सरकारें आदिवासियों के पिछड़ेपन, शोषण, उत्पीड़न एवं समग्र विकास में पीछे छूट जाने के कारणों को जानने तथा उसे दूर करने के उपाय ढ़ुडें, इसकी समीक्षा करें। आदिवासियों को उनके प्राकृतिक एवं संवैधानिक अधिकार प्राप्त हो रहे हैं या नहीं? यदि नहीं मिले हैं तो उनको सरकारें अधिकार दिलाएँ। ध्यान रहे आदिवासी समाज के मानवीय अधिकारों का संरक्षण हो, उनके जल जंगल और जमीन के अधिकार सुरक्षित रहें, अस्मिता, आत्मसम्मान, कला संस्कृति, अस्तित्व क़ायम रहे एवं शिक्षा का व्यापक प्रचार प्रसार हो ऐसी मंशा संयुक्त राष्ट्र संघ ने आदिवासियों के लिए की है। इन्हीं उद्देश्यों तथा जनजागृति हेतु यह दिवस आज मनाया जाता है। हमारी एकता ही हमारा भविष्य है, आइए हम सब एकजुट होने के हर प्रयास को साथ दें, सभी आदिवासी साथी एक दिन का अवकाश लेकर अपने-अपने क्षेत्रों में होने वाले विश्व आदिवासी दिवस समारोह में तन मन धन से सहयोग करें और अपने परिवार संग पारम्परिक वेशभूषा, आभूषण, वाद्दयंत्र एवं पारम्परिक तीर धनुष के साथ उपस्थित होकर आदिवासी सांस्कृतिक को सम्मानित एवं समृद्द बनाएँ।


आदिवासियों अधिकारों के बारे में संयुक्त राष्ट्र का घोषणा


संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों द्वारा निर्देशित और राज्यों द्वारा चार्टर के अनुसार आने वाले दायित्वों की पूर्ति में पूरी निष्ठा रखकर यह पुष्टि करते हुए कि आदिवासी भी अन्य सभी लोगों के समकक्ष हैं, हालांकि यह भी स्वीकार किया जाता है कि सभी लोगों के अधिकार भिन्न होते हैं, उन्हें अलग ही माना जाए और उसी भाव से उनको उचित सम्मान प्रदान किया जाए। यह भी पुष्टि करते हुए कि सभी लोग सभ्यताओं और संस्कृतियों की विविधता तथा समृद्दता में योगदान करते हैं, ये ही मानवता की सभी धरोहर बनाने में सहयोग करते हैं। यह भी पुष्टि करते हुए कि देश, नस्ल, धर्म, जाति या संस्कृति के आधार पर लोगों या किन्ही व्यक्तियों के प्रति भेदभाव के सभी सिद्दाँत, नीतियां और नस्लवादी रीतियां, विज्ञान की दृष्टि से झूठी, कानूनी दृष्टि से अवैध, नैतिक रूप से निंदनीय और सामाजिक दृष्टि से अन्यायपूर्ण है। पुनः पुष्टि करते हुए कि आदिवासी अपने अधिकारों का प्रयोग करने में किसी भी प्रकार के भेदभाव से मुक्त रहने चाहिए। यह चिंताजनक है कि आदिवासी लोग उपनिवेशवाद की स्थापना तथा अपने जमीनी क्षेत्र एवं संसाधनों से वंचित कर दिए जाने के कारण एक लंबे अरसे से अन्याय झेलते आ रहे हैं, इसी के परिणाम स्वरूप वे अपनी जरूरतों और रूचि के अनुरूप विकास करने के अपने अधिकार से भी वंचित रह जाते हैं। आदिवासियों के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक स्वरूप तथा उनकी संस्कृतियाँ, इतिहास, अध्यात्मिक परंपराओं और सिद्धांतों से विशेषकर देशों, क्षेत्रों और संसाधनों पर उनके अधिकारों से आदिवासियों को प्राप्त होने वाले वंशानुगत अधिकारों को मान्यता एवं प्रोत्साहन देने की तुरंत आवश्यकता को स्वीकार किया गया।

यह भी स्वीकार करते हुए कि देशों के साथ हुई संधियों, समझौतों और अन्य रचनात्मक व्यवस्थाओं में स्वीकृत, आदिवासियों के अधिकारों को सम्मान एवं प्रोत्साहन देने की तुरंत आवश्यकता है।

इस तथ्य का स्वागत करते हुए कि आदिवासियाँ राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक उन्नति के लिए तथा कहीं भी किसी भी तरह से भेदभाव और दमन को समाप्त करने के हेतु स्वयं ही एकजुट होते और प्रयास करते हैं। मान लिया है कि आदिवासियों को और उनके देशों, क्षेत्रों तथा संसाधनों को प्रभावित करने वाली घटनाओं पर इन आदिवासियों का ही नियंत्रण होने से वे लोग अपनी संस्थाओं, संस्कृतियों और परंपराओं को बरकरार रखने और उन्हें सशक्त बनाने तथा उनकी आकांक्षाओं एवं आवश्यकताओं के अनुरूप ही अपने विकास को बढ़ावा दे सकेंगे। स्वीकार करते हुए कि आदिवासियों की जानकारी, संस्कृतियों और परंपरागत नीतियों को मान्यता देने से स्थाई एवं समानता आधारित विकास हो सकेगा और परिवेश का समुचित प्रबंधन भी होगा। आदिवासियों के देशों और क्षेत्रों को सैनिकीकरण से मुक्त रखने से विश्व के देशों और लोगों के बीच शांति, आर्थिक एवं सामाजिक प्रगति, आपसी समझ और मैत्री संबंधों के विकास में योगदान मिलेगा। आदिवासी परिवारों और समुदायों पर अपने बच्चों का पालन पोषण, प्रशिक्षण, शिक्षा और कल्याण बच्चों के अधिकारों के अनुरूप करने का संयुक्त दायित्व स्वीकार किया गया। यह ध्यान में रखते हुए कि राज्यों और आदिवासियों के बीच संधियों, समझौते और अन्य रचनात्मक व्यवस्थाएं कुछ हालात में अंतर्राष्ट्रीय सोच, रुचि, दायित्व एवं चरित्र हो सकती है। यह भी ध्यान में रखते हुए कि संधियों, समझौते और अन्य रचनात्मक व्यवस्थाएं और वे संबंध जिनका यह प्रतिनिधित्व करती है, आदिवासियों और राज्यों के बीच सशक्त भागीदारी का आधार है। यह स्वीकार करते हुए कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के बारे में अंतरराष्ट्रीय प्रतिज्ञापत्र और नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों के बारे में अंतरराष्ट्रीय तथा वियाना घोषणा और कार्यवाही कार्यक्रम, सभी लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकारों के मूल महत्व की पुष्टि करते हैं, जिसके अंतर्गत वे स्वतंत्र रूप से अपनी राजनीतिक स्थिति तय करते हैं और अपने आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास को आगे बढ़ाते हैं। इस घोषणा के किसी भी अंश को आधार बनाकर किन्ही भी लोगों को आत्म निर्णय के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता बशर्ते कि उस अधिकार से अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन ना होता हो। इस बात से सहमत हैं कि घोषणा में दिए गए आदिवासी लोगों के अधिकारों को मान्यता देने से राज्य और आदिवासी लोगों के बीच सद्भावपूर्ण एवं सहयोग के संबंध मजबूत होंगे जो न्याय, लोकतंत्र, मानवाधिकारों के प्रति सम्मान भेदभाव रहित और परस्पर विश्वास पर आधारित होंगे। राज्यों को अंतरराष्ट्रीय समझौतों के अनुरूप आदिवासियों के प्रति वे अपने सभी दायित्वों का विशेषकर मानव अधिकारों से संबद्ध दायित्वों का, संबद्ध लोगों के परामर्श एवं सहयोग से पालन करेंगे और उन्हें लागू करेंगे। इस बात पर जोर देते हुए कि आदिवासियों के अधिकारों को बढ़ावा देने और उनके संरक्षण में संयुक्त राष्ट्र ने महत्वपूर्ण एवं निरंतर भूमिका निभाई है। यह विश्वास करते हुए कि यह घोषणा आदिवासी के अधिकारों को मान्यता, बढ़ावा और संरक्षण देने की दिशा में तथा क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र के संबद्ध गतिविधियों के विकास में एक और महत्वपूर्ण कदम है। इस बात को मानते और इसकी पुष्टि करते हुए कि आदिवासियों को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत सभी मानव अधिकारों का बिना किसी भेदभाव के पूरा अधिकार है। और आदिवासियों को ऐसे सामूहिक अधिकार भी प्राप्त हैं, जो उनके अस्तित्व, कल्याण, एवं समन्वित विकास के लिए अपरिहार्य हैं। यह मानते हुए कि विभिन्न क्षेत्रों और विभिन्न देशों में आदिवासियों की स्थिति भिन्न है, और यह कि राष्ट्रीय और क्षेत्रीय विशेषताओं तथा विभिन्न ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। विधिवत घोषणा की जाती है कि आदिवासियों के अधिकारों के बारे में नीचे दी जा रही संयुक्त राष्ट्र घोषणा एक मानक उपलब्धि के रूप में सहयोग या भागीदारी और परस्पर सम्मान की भावना से लागू की जाएगी।


अनुच्छेद 1 आदिवासियों को सामूहिक रूप से अथवा व्यक्तिगत तौर पर उन सभी मानवाधिकारों और मूल स्वतंत्रताओं का पूरी तरह उपभोग करने का अधिकार है, जो संयुक्त राष्ट्र चार्टर मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा और अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार अधिकार कानून से स्वीकार किए गए हैं। अनुच्छेद 2 आदिवासी भी अन्य सभी लोगों एवं व्यक्तियों की भांति ही स्वतंत्र और बराबर है, तथा उन्हें अपने अधिकारों विशेषकर उनके आदिवासी होने के कारण मिले अधिकारों को इस्तेमाल करने में किसी भी तरह से भेदभाव से मुक्त रहने का अधिकार है। अनुच्छेद 3

     आदिवासियों को आत्मनिर्भर का अधिकार है, इस अधिकार से ही वे अपने राजनीतिक स्थिति स्वतंत्र रूप से तय कर सकते हैं और अपने आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास के प्रयास कर सकते हैं।

अनुच्छेद 4 अपने आत्मनिर्णय के अधिकार का इस्तेमाल करने में आदिवासियों को अपने आंतरिक और स्थानीय मामलों में स्वायत्ता अथवा स्वायत्त सरकार स्थापित करने का तथा उनके स्वायत्त क्रियाकलाप के लिए वित्तीय साधन जुटाने का अधिकार भी है। अनुच्छेद 5 आदिवासियों को अपनी विशिष्ट राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थानों को बनाए रखने और उन्हें सशक्त बनाने का अधिकार होगा, और साथ ही यदि वे चाहें तो अपने राज्य के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन में पूरी तरह भाग लेने का अधिकार भी बरकरार रहेगा। अनुच्छेद 6 प्रत्येक आदिवासी व्यक्ति को राष्ट्रीयता का अधिकार प्राप्त होगा । अनुच्छेद 7 1- आदिवासियों को व्यक्ति के जीवन, शारीरिक व मानसिक निष्ठा, स्वतंत्रता और सुरक्षा का अधिकार होगा। 2- आदिवासियों को विशिष्ट लोगों की भांति स्वतंत्रता, शांति और सुरक्षा के साथ जीने का सामूहिक अधिकार होगा और उनके प्रति किसी भी तरह के नरसंहार या किसी अन्य प्रकार की हिंसक कार्रवाई नहीं की जा सकेगी, जिनमें किसी समूह के बच्चों को जबरन किसी अन्य समूह में शामिल करना भी शामिल है। अनुच्छेद 8 1- आदिवासियों और व्यक्तियों को अधिकार होगा कि उनकी संस्कृति का ज़बरन विलय अथवा नष्ट ना किया जाए 2 राज्य ऐसा प्रभावी तंत्र उपलब्ध कराएंगे जो निम्नलिखित की रोकथाम और निराकरण करेगा : (क) ऐसा कोई कार्य जिसका उद्देश्य अथवा परिणाम उन्हें उनकी विशिष्ट पहचान या उनके सांस्कृतिक मूल्यों या जातीय पहचान से वंचित करना हो ; ख) ऐसा कोई कार्य जिसका उद्देश्य अथवा परिणाम उन्हें उनके देश, क्षेत्रों या संसाधनों से वंचित (बेदखल) करना हो ; ग) किसी भी प्रकार का जबरन आबादी स्थानांतरण जिसका उद्देश्य अथवा प्रभाव उनके किसी भी अधिकार का अतिक्रमण या उल्लंघन करना हो घ) किसी भी प्रकार का जबरन विलय या समन्वय ; ङ्) उनके विरुद्ध नस्ल आधारित अथवा जातिगत भेदभाव को बढ़ावा देने के इरादे या उकसाने के इरादे से किसी भी तरह का दुष्प्रचार ; अनुच्छेद 9 आदिवासियों का अधिकार होगा देश कि सम्बद्द परम्पराओं और रीतियों के अनुसार किसी भी आदिवासी समुदाय या देश को अपना लें, इस अधिकार के प्रयोग से किसी भी प्रकार का भेदभाव उत्पन्न नहीं होना चाहिए। अनुच्छेद 10 आदिवासियों को उनके देश या क्षेत्र से जबरन हटाया नहीं जाएगा। सम्बद्द आदिवासियों की स्वतंत्रता एवं लिखित पूर्व सहमति के बिना कोई पुन: आवंटन नहीं होगा और उसके बाद भी न्यायसंगत एवं उचित मुआवजा देने का और हो सके उनके वापस लौट सकने के विकल्प का अनुबंद भी होना चाहिए। अनुच्छेद 11 1- आदिवासियों को अपनी सांस्कृतिक परंपराएं और रीति-रिवाज अपनाने और उन्हें अधिक सशक्त बनाने का अधिकार है। इसमें उनका यह अधिकार भी शामिल होगा कि वह पुरातत्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक स्थल, कला वस्तुओं, डिज़ाइनों, समारोहों, आयोजनों, प्रौद्योगिकियों और दृश्य का मंचन कला तथा साहित्य सहित अपनी संस्कृति की सभी प्राचीन, वर्तमान और भावी अभिव्यक्तियों की देखभाल, संरक्षण और विकास कर सकें; 2- राज्य आदिवासियों के कानूनों, परंपराओं और रीति-रिवाजों का उल्लंघन करके अथवा उनकी स्वतंत्र लिखित एवं पूर्व सहमति के बिना उनकी सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक संपदा के संबंध में उनकी शिकायत को, उनके ही सहयोग से पुन: प्रतिष्ठित और विकसित करके दूर करके, दूर करने के उद्देश्य से शिकायत निवारण तंत्र उपलब्ध कराएगा; अनुच्छेद 12 1- आदिवासी लोगों को अपनी आध्यात्मिक और धार्मिक परंपराओं, रीतिरिवाजों और समारोहों को मनाने, विकसित करने और पढ़ाने-लिखाने का अधिकार होगा। अपने धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थलों के रखरखाव, संरक्षण एवं पूरी गोपनीयता से वहां पहुंचाने, अपनी पूजा की चीजों को प्रयोग एवं नियंत्रित करने तथा अपने नश्वर अवशेषों को अपने यहां प्रत्यवर्तित कराने का अधिकार होगा। 2- राज्य पूजा-अर्चना से जुड़ी वस्तुओं और मानव अवशेषों तक पहुंच उपलब्ध कराने और/या उन्हें प्रत्यवर्तित कराने का निष्पक्ष, पारदर्शी एवं प्रभावी तंत्र सम्बद्द आदिवासियों के सहयोग से विकसित करेंगे। अनुच्छेद 13 1- आदिवासियों को अधिकार होगा कि वह अपने इतिहास, भाषाएं, मौखिक(अलिखित) सिद्दाँत, लेखन प्रणालियां और साहित्य को फिर से सशक्त बना सकें, प्रयोग कर सकें और अपनी भावी पीढ़ियों को सौंप सकें तथा समुदायों, स्थानों और व्यक्तियों के परंपरागत नाम रखे रहें। 2- राज्य प्रभावी उपाय करके सुनिश्चित करेंगे कि उनका यह अधिकार सुरक्षित रहे और यह भी सुनिश्चित करेंगे कि राजनीतिक, कानूनी और प्रशासनिक गतिविधियों को आदिवासी लोग समझ सके और उन्हें भी इन गतिविधियों से समझा जाए तथा जहां जरूरी हो वहां दुभाषियों की अथवा कोई अन्य उपयुक्त व्यवस्था की जाए। अनुच्छेद 14 1- आदिवासियों को अधिकार है कि वे अपनी ही भाषा में तथा पढ़ने-पढ़ाने की अपनी संस्कृतिक पद्धतियों के अनुरूप उपयुक्त तरीके से शिक्षा उपलब्ध कराने वाली शिक्षा प्रणालियों और संस्थान स्थापित करके उनका नियंत्रण भी अपने पास ही रखें। 2- आदिवासियों विशेषकर बच्चों को बिना किसी भेदभाव के राज्य के सभी स्तरों की और सभी प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है। 3- राज्य आदिवासियों के सहयोग से सभी आदिवासियों, खासकर बच्चों के लिए जिनमें अपने समुदायों से बाहर रहने वाले बच्चे भी शामिल है, यथासंभव प्रयास करेगा कि वह अपनी संस्कृति के अनुरूप और अपनी भाषा में दी जाने वाली शिक्षा का पहुंच प्राप्त कर सकें। अनुच्छेद 15 १- आदिवासियों को अपनी संस्कृति, परंपरा, इतिहास और आकांक्षाओं की गरिमा और विविधता बनाए रखने का अधिकार होगा जो उपयुक्त रूप से शिक्षा और सार्वजनिक जानकारी को प्रतिबिंबित करेगा। २- राज्य सम्बद्द आदिवासियों के सहयोग एवं परामर्श से ऐसे प्रभावी उपाय करेंगे कि पूर्वाग्रह का सामना किया जा सके और भेदभाव समाप्त हो सके तथा आदिवासी लोगों और समाज के अन्य वर्गों के बीच संयम, आपसी समझ और सद्भावनापूर्ण संबंध विकसित हो। अनुच्छेद 16 1- आदिवासियों को अधिकार है कि वह अपनी भाषा में अपने मीडिया(प्रचार माध्यम) स्थापित कर सकें और बिना किसी भेदभाव के हर किस्म के गैर आदिवासी मीडिया में भी पहुंच प्राप्त कर सकें; 2- राज्य ऐसे प्रभावी उपाय करेंगे जिससे सुनिश्चित हो सके कि सरकारी स्वामित्व वाले मीडिया में आदिवासी सांस्कृतिक विविधता को समुचित रूप से प्रतिबिंबित किया जा सके, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के प्रति बिना किसी पूर्वाग्रह के राज्यों को निजी स्वामित्व वाले मीडिया को प्रोत्साहित करना चाहिए कि वह आदिवासी संस्कृतिक विविधता को समुचित रूप से प्रचारित करें अनुच्छेद 17 1- आदिवासियों और व्यक्तियों को लागू अंतरराष्ट्रीय और घरेलू श्रम कानूनों के अंतर्गत पदत्त सभी अधिकारों का पूरी तरह उपभोग करने का अधिकार होगा; 2- आदिवासियों के परामर्श और सहयोग से राज्य ऐसे विशिष्ट उपाय करेंगे कि आदिवासी बच्चों को आर्थिक शोषण तथा ऐसा कोई भी काम करने से बचाया जा सके जो उनके स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता हो या जिससे उनकी शिक्षा में बाधा पड़ती हो या उनके शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक, नैतिक अथवा सामाजिक विकास हो, तथा यह भी ध्यान रखा जाए की वे किन पहलुओं से प्रभावित हो सकते हैं और उनके सशक्तिकरण के लिए शिक्षा कितनी आवश्यक है। 3- आदिवासियों को अधिकार होगा कि वे श्रम संबंधी किसी भेदभाव के शिकार ना बनाए जा सकें, जिसमें रोजगार या वेतन आदि का भेदभाव शामिल है। अनुच्छेद 18 आदिवासियों को अधिकार होगा कि उन मामलों में निर्णय प्रक्रिया में उनकी हिस्सेदारी हो जिनसे उनके अधिकारों पर असर पड़ सकता है, इसके लिए उनके अपने तौर तरीके से उनके ही द्वारा चुने गए प्रतिनिधि निर्णय प्रक्रिया में शामिल किए जा सकते हैं, और साथ ही वे अपनी स्वंय की आदिवासी निर्णय प्रक्रिया भी स्थापित कर सकते हैं। अनुच्छेद 19 राज्य सम्बद्द आदिवासियों से उनके ही प्रतिनिधि संस्थानों के जरिए पूरी ईमानदारी से परामर्श और सहयोग करेंगे ताकि उनको प्रभावित करने वाले विधाई अथवा प्रशासनिक उपाय लागू करने से पहले उनकी स्वतंत्र और लिखित पूर्व सहमति ली जा सके। अनुच्छेद 20 1- आदिवासियों को अधिकार होगा कि वे अपने राजनीतिक अपने राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक प्रणालियां स्थापित एवं विकसित कर सकें ताकि वे अपने जीवन निर्वाह और विकास का अपने साधनों(तौर-तरीकों) से आनंद उठाने में सुरक्षित रहें तथा अपनी सभी परंपराओं और अन्य आर्थिक गतिविधियों में स्वतंत्र रूप से शामिल हो सके। 2- जो आदिवासी जीवन निर्वाह और विकास के साधन से वंचित है, उन्हें न्याय संगत एवं निष्पक्ष समाधान/मुआवजा पाने का अधिकार होगा; अनुच्छेद 21 1- आदिवासियों को बिना किसी भेदभाव के अधिकार होगा कि अपनी आर्थिक एवं सामाजिक हालात सुधार सकें जिसमें शिक्षा का क्षेत्र, रोजगार, व्यवसायिक प्रशिक्षण, और पुनर्प्रशिक्षण, आवास, साफ-सफाई, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा शामिल है; 2- राज्य उनकी आर्थिक सामाजिक हालात में निरंतर सुधार सुनिश्चित करने के वास्ते प्रभावी उपाय करेंगे और जहां जरूरी लगेगा, विशेष उपाय करेंगे, आदिवासी बृदजनों, महिलाओं, युवाओं, बच्चों और विकलांगों के अधिकारों और खास जरूरतों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। अनुच्छेद 22 1- इस घोषणा को कार्यान्वित करते समय आदिवासी बृदजनों, महिलाओं, युवाओं, बच्चों और विकलांगों के अधिकारों और खास जरूरतों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। 2- आदिवासियों के सहयोग से राज्य यह सुनिश्चित करने के उपाय करेंगे कि आदिवासी महिलाएं और बच्चे किसी भी प्रकार की हिंसा और भेदभाव से पूरी तरह सुरक्षित एवं आश्वस्त रहें; अनुच्छेद 23 आदिवासियों को अधिकार है कि वे विकास के अधिकार को इस्तेमाल करने की प्राथमिकताएं और नीतियां तय कर सकें, विशेषकर आदिवासियों को स्वयं को प्रभावित करने वाले स्वास्थ्य, आवास और अन्य आर्थिक, सामाजिक कार्यक्रम निर्धारित करने का अधिकार होगा, और जहां तक संभव हो वे ऐसे कार्यक्रमों को अपने ही संस्थाओं के माध्यम से लागू करेंगे। अनुच्छेद 24 1- आदिवासियों को अपनी परंपरागत औषधियां तथा स्वास्थ्य पद्धतियां बनाए रखने का अधिकार होगा, जिनमें उनके महत्वपूर्ण औषधीय पौधों, पशुओं और खनिजों का संरक्षण शामिल है। आदिवासी व्यक्तियों को बिना किसी भेदभाव के सभी सामाजिक एवं स्वास्थ्य सेवा प्राप्त करने का भी अधिकार है । 2- आदिवासी व्यक्तियों को शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के सर्वोच्च प्राप्य स्तर का सुख लेने का अधिकार है। राज्य इस अधिकार का पूर्ण क्रियान्वयन बनाए रखने की दृष्टि से आवश्यक उपाय करेंगे। अनुच्छेद 25 आदिवासियों को परंपरागत रूप से अधिकृत और प्रयोग की जा रही जमीनों, भूखंडों, जल क्षेत्रों और तटीय सागरों तथा अन्य संसाधनों पर अपना विशिष्ट आध्यात्मिक संबंध बनाए रखने और उसे मजबूत करने का अधिकार है, और साथ ही इस बारे में अपनी भावी पीढ़ियों के प्रति दायित्व निभाने का भी अधिकार है। अनुच्छेद 26 1- आदिवासियों को उन जमीनों, राज्य क्षेत्रों और संसाधनों पर अधिकार होगा जो परंपरा से उनके स्वामित्व, कब्जे या अन्य प्रकार के इस्तेमाल अथवा नियंत्रण में रही है। 2- आदिवासियों को वे जमीने, राज्यक्षेत्र और संसाधन स्वामित्व में लेने, इस्तेमाल करने, उन्हें विकसित करने अथवा नियंत्रण में रखने का अधिकार है, जिन पर उनका परंपरागत स्वामित्व है या किसी परंपरागत कब्जे या इस्तेमाल से उनके पास है, या किसी भी अन्य प्रकार से उनके नियंत्रण में है। 3- राज्य इन जमीनों, क्षेत्रों और संसाधनों के लिए कानूनी मान्यता एवं संरक्षण प्रदान करेंगे। इस प्रकार की मान्यता देते समय संबद्ध आदिवासी लोगों के रीति-रिवाजों, परंपराओं और जमीन की पट्टेदारी व्यवस्था का पूरा सम्मान किया जाएगा। अनुच्छेद 27 राज्य सम्बद्द आदिवासी लोगों की सहमति एवं सहयोग से एक निष्पक्ष, स्वतंत्र, न्याय संगत, खुली और पारदर्शी प्रक्रिया स्थापित करेंगे जिसमें आदिवासियों के कानूनों, परंपराओं, रीति-रिवाजों और भू-पट्टे दारी व्यवस्थाओं को समुचित मान्यता दी जाएगी तथा आदिवासियों की जमीनों, क्षेत्रों और संसाधनों पर उनके अधिकारों को मान्यता देकर स्वीकार किया जाएगा, जिनमें वे जमीने, क्षेत्र और संसाधन भी शामिल हैं, जिन पर परंपरा से ही आदिवासियों का अधिकार, कब्जा, इस्तेमाल या नियंत्रण रहा है। आदिवासियों को इस प्रक्रिया में शामिल होने का भी अधिकार है। अनुच्छेद 28 1- आदिवासियों का अधिकार होगा कि अपनी शिकायत का समाधान कराने के लिए प्रत्यर्पण सहित विभिन्न उपाय अपनाएं और ऐसा संभव ना हो तो जिन जमीनों, क्षेत्रों और संसाधनों पर उनका परंपरागत स्वामित्व या अन्य प्रकार का कब्जा अथवा इस्तेमाल/नियंत्रण हो और जिन्हें उनकी स्वतंत्र, लिखित और पूर्व सहमति के बिना जब्त कर लिया गया हो या कब्जे में ले लिया गया हो या नुकसान पहुंचाया गया हो, उनका समुचित न्याय संगत मुआवजा दिया जाए; 2- संबद्ध लोगों के साथ स्वतंत्र रूप से समझौता किए बिना मुआवजा, जमीनों, क्षेत्रों और संसाधनों के रूप में ही समानता, आकार एवं गुणवत्ता पर आधारित होगा या धन के रूप में मुआवजा दिया जाएगा या फिर कोई अन्य उपयुक्त समाधान उपलब्ध कराया जाएगा। अनुच्छेद 29 1- आदिवासियों को अधिकार होगा कि अपनी जमीनों एवं संसाधनों के पर्यावरण एवं उत्पादक क्षमता का संरक्षण कर सकें। राज्य इस प्रकार के संरक्षण और बचाव के लिए बिना किसी भेदभाव के, आदिवासियों के लिए सहायता कार्यक्रम बनाकर उन्हें लागू करेंगे 2- राज्य यह सुनिश्चित करने के उपाय करेंगे कि आदिवासियों की जमीनों और क्षेत्रों में उन लोगों की स्वतंत्र, लिखित एवं पूर्व सहमति के बिना खतरनाक सामग्रियों का किसी भी प्रकार का भंडारण अथवा निपटान नहीं किया जाएगा; 3- राज्य आवश्यक होने पर, यह सुनिश्चित करने के भी प्रभावी उपाय करेंगे कि ऐसे सामग्री से प्रभावित आदिवासियों द्वारा स्वास्थ्य की निगरानी, देखभाल और बहाली के कार्यक्रम उपयुक्त रूप में क्रियान्वित किए जाएं। अनुच्छेद 30 1- आदिवासियों के देशों या क्षेत्रों में सैनिक गतिविधियां नहीं होंगी जब तक कि व्यापक जनहित के कारण अथवा स्वतंत्र सहमति के आदिवासी स्वयं इस आशय का अनुरोध ना करें; 2- आदिवासियों की जमीनों या क्षेत्रों का सैनिक गतिविधियों के वास्ते इस्तेमाल करने से पहले राज्य सम्बद्द आदिवासियों के साथ मिलकर उपयुक्त प्रक्रिया के जरिए व्यापक एवं प्रभावी विचार विमर्श करेंगे। अनुच्छेद 31 1- आदिवासियों को अधिकार होगा कि वे अपनी सांस्कृतिक धरोहर, परंपरागत ज्ञान और पारंपरिक सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों तथा अपने विज्ञान, प्रद्द्योगिकियों तथा संस्कृतियों की अभिव्यक्ति को बरकरार, सुरक्षित एवं नियंत्रित रख सकें, जिसमें मानवीय एवं वंशानुगत संसाधन, बीज, औषधीयां, वनस्पतियां एवं जड़ी बूटियों के गुण दोषों के प्रयोग, मौखिक परंपरा, साहित्य, शैलियां, खेल-कूद और परंपरागत खेल कौशल (शिकार) तथा दृश्य एवं मंचन कलाएं शामिल है। उन्हें या भी अधिकार होगा कि ऐसे सांस्कृतिक धरोहर, पारंपरिक ज्ञान और परंपरागत संस्कृतिक अभिव्यक्तियों पर अपनी बौद्धिक संपदा को बरकरार, नियंत्रण में सुरक्षित रख सकें और इनका विकास कर सकें; 2- आदिवासियों की सहमति से राज्य इन अधिकारों को मान्यता देने और उनका सुरक्षित प्रयोग सुनिश्चित करने के प्रभावी उपाय करेंगे। अनुच्छेद 32 1- आदिवासियों को अधिकार होगा कि वे अपनी जमीन, क्षेत्रों तथा संसाधनों के विकास की प्राथमिकताएं एवं नीतियां तय कर सकें; 2- राज्य आदिवासियों के देशों, क्षेत्रों या अन्य संसाधनों को प्रभावित करने वाली किसी भी परियोजना को स्वीकृत करने से पहले उनकी स्वतंत्र एवं सूचित सहमति प्राप्त करने के उद्देश्य से उनके ही प्रतिनिधि संस्थाओं के माध्यम से आदिवासी लोगों के साथ परामर्श एवं सहयोग करेंगे; 3- राज्य की ऐसी किसी भी गतिविधि के लिए न्याय संगत और निष्पक्ष क्षतिपूर्ति का प्रभावी तंत्र उपलब्ध कराएंगे, साथ ही पर्यावरणीय, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक आध्यात्मिक दृष्टि से हो सकने वाले प्रतिकूल प्रभाव को रोकने के भी प्रयास करेंगे। अनुच्छेद 33 1- आदिवासियों का अधिकार होगा कि वे अपने रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुरूप अपनी पहचान या सदस्यता निर्धारित कर सकें, इससे आदिवासियों के इन राज्यों की नागरिकता पाने के अधिकार पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा जहां यह रहते हैं; 2- आदिवासियों को अपने तौर-तरीकों के हिसाब से अपनी संस्थाओं की संरचना तय करने और उनकी सदस्यता सदस्यता चुनने का अधिकार होगा। अनुच्छेद 34 आदिवासी लोगों को अधिकार है कि वे अपने संस्थागत ढांचे और उनके विशिष्ट तौर-तरीकों, आध्यात्मिक परम्पराओं, क्रियाकलाप, धार्मिक कृत्यों और यदि हो तो न्यायिक व्यवस्था या रितियों को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप प्रेरित, विकसित और सुरक्षित रखने के उपाय कर सकें। अनुच्छेद 35 आदिवासियों का अधिकार है कि वे अपने समुदायों के प्रति सभी व्यक्तियों के दायित्व तय कर सकें। अनुच्छेद 36 आदिवासियों और खासकर अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से विभाजित हुए आदिवासी लोगों को अपने यहां रहने वालों और सीमाओं के पार रहने वालों के साथ आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक उद्देश्यों से संपर्क, संबंध और सहयोग बनाए रखने और आगे बढ़ाने का अधिकार है। अनुच्छेद 37 1- आदिवासियों को राज्यों या उनके उत्तराधिकारियों के साथ की गई संधियों, समझौतों और अन्य रचनात्मक व्यवस्थाओं को मान्यता दिलाने, उनका परिपालन कराने और उन्हें लागू कराने का अधिकार है। 2- घोषणा में शामिल किसी भी अंश को आदिवासियों के इन संधियों, समझौतों और अन्य रचनात्मक व्यवस्थाओं में निहित अधिकारों को हल्का करने या उनका महत्व कम करने वाला नहीं माना जाना चाहिए। अनुच्छेद 38

           आदिवासियों के साथ परामर्श और सहयोग से इस घोषणा की उद्देश्य की पूर्ति के लिए विधाई उपायों सहित राज्य सभी उपयुक्त प्रयास करेंगे।

अनुच्छेद 39 आदिवासियों को अधिकार होगा कि वे इस घोषणा में उल्लेखित अधिकारों का इस्तेमाल कर सकने के उद्देश्य से राज्यों से आर्थिक एवं तकनीकी सहायता प्राप्त कर सकें और उसके लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी ले सकें। अनुच्छेद 40 आदिवासियों को अधिकार है कि राज्यों एवं अन्य पक्षों के साथ चल रहे टकराव और विवादों का समाधान न्याय संगत और निष्पक्ष तरीकों से करने के वास्ते तुरंत निर्णय ले सकें और साथ ही अपने व्यक्तिगत एवं सामूहिक अधिकारों के किसी भी प्रकार के उल्लंघन का प्रभावी उपचार कर सकें। इस प्रकार के निर्णय में सम्बद्द आदिवासी लोगों के रीति-रिवाजों, परंपराओं, नियमों एवं कानूनी प्रणालियों तथा अंतरराष्ट्रीय मनवाधिकारों पर समुचित ध्यान दिया जाएगा। अनुच्छेद 41 संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के अंग और उसकी विशेष एजेंसियां तथा अन्य अंतर-सरकारी संगठन वित्तीय सहयोग और तकनीकी सहायता के द्वारा इस घोषणा के प्रावधानों को पूर्णतया क्रियान्वित कराने में योगदान देंगे। आदिवासी लोगों को प्रभावित करने वाले मामलों में उनका सहयोग सुनिश्चित करने के तौर-तरीके भी तय किए जाएंगे। अनुच्छेद 42 संयुक्त राष्ट्र आदिवासियों के मुद्दों के बारे में स्थाई मंच सहित उसकी संस्थाएं और राष्ट्र स्तर की एजेंसियां समेत विशेष एजेंसियां और राज्य इस घोषणा के प्रावधानों को पूरा सम्मान देते हुए इनके पूर्ण क्रियान्वयन के लिए प्रयास करेंगे तथा इस घोषणा की प्रभाविकता आँकने के उपाय भी अपनाएंगे। अनुच्छेद 43 इसमें शामिल अधिकार दुनियाभर के आदिवासियों के अस्तित्व, मान-सम्मान और कल्याण का न्यूनतम स्तर है। अनुच्छेद 44 इसमें शामिल सभी अधिकारों और स्वतंत्रताओं की सभी पुरुष और महिला आदिवासियों के लिए पक्की गारंटी होगी। अनुच्छेद 45 इस घोषणा के किसी भी अंश या प्रावधान को आदिवासियों के मौजूदा या भावी अधिकारों को कम या समाप्त करने का आधार न माना जाए जाए। अनुच्छेद 46 1- इस घोषणा में शामिल किसी अंश या प्रावधान का अर्थ यह कदापि न लगाया जाए कि किसी भी राज्य, लोगों, समूह या व्यक्ति को ऐसा कोई अधिकार मिल जाएगा कि वह संयुक्त राष्ट्र चार्टर के विरुद्ध कोई कार्य कर सकें अथवा ऐसे किसी भी कार्य को मान्यता या प्रोत्साहन मिल जाएगा, जिससे सार्वभौम एवं स्वतंत्र राज्यों की राज्यक्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक एकता पर पूरी तरह अथवा आंशिक रूप से प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। 2- प्रस्तुत घोषणा में दिए गए अधिकारों को इस्तेमाल करते वक्त सभी के मानवाधिकारों और मूल अधिकारों का सम्मान किया जाएगा। इस घोषणा में निहित अधिकारों का इस्तेमाल करते समय केवल कानून द्वारा निर्धारित और अंतरराष्ट्रीय मनवाधिकारों के अनुरूप सीमाएं ही लागू होगी। इस तरह की सीमा लगाने में कोई भेदभाव नहीं बरता जाएगा और इसका एक मात्र उद्देश्य अन्य सभी के अधिकारों और स्वतंत्रता की मान्यता और प्रतिष्ठा सुनिश्चित करना तथा लोकतांत्रिक समाज की न्यायसंगत एवं अनिवार्य मांगों को पूरा करना है।

3-    इस घोषणा में शामिल प्रावधानों का अर्थ लगाते समय न्याय, लोकतंत्र, मानवाधिकारों के सम्मान, समानता, भेदभाव रहित व्यवस्था, कुशल प्रशासन एवं पूर्ण निष्ठा के सिद्धांतों को ही आधार माना जाएगा

संस्थानसंपादित करें

  • अखिल भारतीय सरना धरम
  • अखिल भारतीय सरना धरम मण्डोवा
  • केंद्रीय सरना समिति
  • भारतीय आदिवासी सेना

सरना धरम की जनसांख्यिकीसंपादित करें

 
जाहेर थान या जाहेर घर

आदिवासी भाषाएँसंपादित करें

भारत में सभी आदिवासी समुदायों की अपनी विशिष्ट भाषाएं है। भाषाविज्ञानियों ने भारत के सभी आदिवासी भाषाओं को मुख्यतः तीन भाषा परिवारों में रखा है- द्रविड़, आस्ट्रिक और चीनी-तिब्बती। लेकिन कुछ आदिवासी भाषाएं भारोपीय भाषा परिवार के अंतर्गत भी आती हैं। आदिवासी भाषाओं में ‘भीली’ बोलने वालों की संख्या सबसे ज्यादा है जबकि दूसरे स्थान पर ‘गोंडी’ भाषा और तीसरे स्थान पर ‘संताली’ भाषा है। भारतीय राज्यों में एकमात्र झारखण्ड में ही 5 आदिवासी भाषाओं - संताली, मुण्डारी, हो, कुड़ुख और खड़िया - को 2011 में द्वितीय राज्यभाषा का दर्जा प्रदान किया गया।

भारत की 114 मुख्य भाषाओं में से 22 को ही संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया है। इनमें हाल में शामिल की गयी संताली और बोड़ो ही मात्र आदिवासी भाषाएं हैं। अनुसूची में शामिल संताली (0.62), सिंधी, नेपाली, बोड़ो (सभी 0.25), मिताइ (0.15), डोगरी और संस्कृत भाषाएं एक प्रतिशत से भी कम लोगों द्वारा बोली जाती हैं। जबकि भीली (0.67), गोंडी (0.25), टुलु (0.19) और कुड़ुख 0.17 प्रतिशत लोगों द्वारा व्यवहार में लाए जाने के बाद भी आठवीं अनुसूची में दर्ज नहीं की गयी हैं। (जनगणना 2001)

आदिवासियों के धार्मिक विश्वाससंपादित करें

आदिवासियों का अपना धर्म भी है। ये प्रकृति-पूजक हैं और वन, पर्वत, नदियों एवं सूर्य की आराधना करते हैं। आधुनिक काल में जबरन बाह्य संपर्क में आने के फलस्वरूप इन्होंने हिन्दू, ईसाई एवं इस्लाम धर्म को भी अपनाया है। अंग्रेजी राज के दौरान बड़ी संख्या में ये ईसाई बने तो आजादी के बाद इनके हिूंदकरण का प्रयास तेजी से हुआ है। परन्तु आज ये स्वयं की धार्मिक पहचान के लिए संगठित हो रहे हैं और भारत सरकार से जनगणना में अपने लिए अलग से धार्मिक कोड (कोया पुनेम) की मांग कर रहे हैं।

भारत में 1871 से लेकर 1941 तक हुई जनगणनाओं में आदिवासियों को अन्‍य धमों से अलग धर्म में गिना गया है, जिसे एबओरिजिन्स, एबोरिजिनल, एनिमिस्ट, ट्राइबल रिलिजन या ट्राइब्स इत्यादि नामों से वर्णित किया गया है। हालांकि 1951 की जनगणना के बाद से आदिवासियों को अलग से गिनना बन्‍द कर दिया गया है।

भारत में आदिवासियों को दो वर्गों में अधिसूचित किया गया है- अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित आदिम जनजाति।

भारत की प्रमुख जनजातियाँसंपादित करें

चंदा समिति ने सन् 1960 में अनुसूचति जातियों के अंर्तगत किसी भी जाति को शामिल करने के लिये 5 मानक निर्धारित किया:

1. भौगोलिक एकाकीपन 2. विशिष्ट संस्कृति 3. पिछड़ापन 4. संकुचित स्वभाव 5. आदिम जाति के लक्षण भारत में 461 जनजातियां हैं, जिसमें से 424 जनजातियों भारत के सात क्षेत्रों में बंटी हुई हैं:

""" उत्तरी क्षेत्र """ (जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड , हिमाचल प्रदेश)

जातियाँ: लेपचा, भूटिया, थारू, बुक्सा, जॉन सारी, खाम्पटी, कनोटा।

इन सब में मंगोल जाति के लक्षण मिलते हैं। जैसे:- तिरछी छोटी आंखे (चाइनीज, तिब्बती), पीला रंग, सीधे बाल, चेहरा चौड़ा, चपटा नाक।

उत्तर प्रदेश:- थारु,बोक्सा,भूटिया,राजी,जौनसारी,

"""केवल पूर्वी उप्र में"""

गोंड़,धुरिया,नायक,ओझा,पठारी,राजगोड़,तथा देवरिया बलिया,वाराणसी,सोनभद्र में खरवार,व तलितपुर में सहरिया,केवल सोनभद्र में बैगा,पनिका,पहडिया,पंखा,अगरिया,पतरी,चेरो भूइया।

बिहार :- असुर,अगरिया,बैगा,बनजारा,बैठुडी,बेदिया,खरवार,आदि।


"""पूर्वी क्षेत्र""" उड़ीसा में:- जुआंग, खोड़, भूमिज, खरिया। झारखण्ड में:- उराँव, मुंडा, संथाल, बिरहोर हो। संथाल:- भारत की सबसे बड़ी जनजाति। संथालिय भाषा को संविधान में मान्यता प्राप्त हैं। पश्चिम बंगाल में:- उंराँव, संथाल, मुंडा, कोड़ा पहचान : रंग काला, चॉकलेटी कलर, लंबा सिर, चौड़ी छोटी व चपटी नाक, हल्के घुंघराले बाल। यह सभी प्रोटो ऑस्टेलाइड प्रजाति से संबधित हैं।

"""मध्य क्षेत्र""" गोंड, परधान, बैगा, मारिया, अबूझमाडिया, धनवार/धनुहार, पहाड़ी कोरवा, बिरहोर, हल्बा।

ये सभी प्रजातियां छत्तीसगढ, मध्यप्रदेश, पूर्वी आंध्र-प्रदेश में निवास करते हैं। ये सभी प्रोटो ऑस्टेलाइड प्रजाति से संबधित हैं।

"""पश्चिमी भारत में"""

गुजरात, राजस्थान, पश्चिमी मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र : मीणा (सर्वाधिक शिक्षित जनजाति),भील,गोंड़,सहरिया,गरासिया

"""दक्षिण भारत में""" केरल:- कोटा, बगादा, टोडा। (टोडा में बहुपति प्रथा प्रचलित है।) कुरूंबा, कादर, चेंचु, पूलियान, नायक, चेट्टी ये सभी जनजातियां नीग्रिये से संबधित हैं। विशेषताएं:- काला/गोरा रंग, बड़े होठ,बड़े नाक द्विपीय क्षेत्र संपादित करें अंडमान-निकोबार- जाखा, आन्गे, सेन्टलिस, सेम्पियन (शोम्पेन) यह जातियां नीग्रो प्रजाति से संबधित हैं। ये लुप्त होने के कगार पर हैं।

भारत की प्रसिद्ध जनजातिसंपादित करें

यह भी देखेसंपादित करें

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें

सन्दर्भसंपादित करें

  1. National Council of Educational Research and Training. "Social and Political Life - III". Publication Department, NCERT, 2009, p.83.
  2. "The Green Revolution in India" Archived 3 नवम्बर 2016 at the वेबैक मशीन.. U.S. Library of Congress (released in public domain). Library of Congress Country Studies. Retrieved 2007-10-06.