ग्वालवंशी या गवालवंशी अहीर एक ऐसा शब्द है जो उन लोगों के लिए प्रयुक्त किया जाता है जो अपने आप को ग्वाला वंश का मानते हैं अथवा श्री कृष्ण के वंसज हैं, ये क्षत्रिय यदुवंश का ही पवित्र शाखा है, ये शब्द अपने आप में पवित्र गायों से सम्बंध को बताता है। गर्ग संहिता और हरिवंश पुराण में इन्हें परमपवित्र व ब्रह्मांड का सबसे श्रेष्ठ जाती कहा गया है इस बात का दम्भ भी इनमें देखने को ख़ूब मिलता है । ये लोग पूरे बिहार में पाए जाते है । सबसे अधिक जनसंख्या में ये लोग बिहार के मधेपुरा में है , कहा जाता है पूरा मधेपुरा गोप का है ।

व्युत्पतिसंपादित करें

शब्द ग्वाला की व्युत्पति गोपाल से हुई जिसका अर्थ "गायों के संरक्षक" होता है।[1]

सन्दर्भसंपादित करें

  1. डैन लेंडिस, रोसिता डी॰ अल्बर्ट (2012). Handbook of Ethnic Conflict: International Perspectives Volume 0 of International and Cultural Psychology (अंग्रेज़ी में). स्प्रिंगर साइंस & बिजनस मीडिया. पृ॰ 162. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9781461404484. मूल से 14 जून 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 24 नवंबर 2018.