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पचमढ़ी की पांडव गुफाएँ

मध्यप्रदेश के एकमात्र पर्वतीय स्थल होशंगाबाद जिले में स्थित पचमढ़ी समुद्र तल से १,०६७ मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। सतपुड़ा श्रेणियों के बीच स्थित होने और अपने सुंदर स्थलों के कारण इसे सतपुड़ा की रानी भी कहा जाता है। यहाँ घने जंगल, कलकल करते जलप्रपात और तालाब हैं। सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान का भाग होने के कारण यहाँ आसपास बहुत घने जंगल हैं। यहाँ के जंगलों में शेर, तेंदुआ, सांभर, चीतल, गौर, चिंकारा, भालू, भैंसा तथा कई अन्य जंगली जानवर मिलते हैं। यहाँ की गुफाएँ पुरातात्विक महत्व की हैं, क्योंकि यहाँ गुफाओं में शैलचित्र भी मिले हैं।

         "नागव्दार यात्रा "
    पचमढ़ी  (होशंगाबाद, मध्यप्रदेश )
          केदारनाथ यात्रा के समान मध्यप्रदेश मे प्रतिवर्ष  की जाने वाली नागव्दार यात्रा भक्ति भावना  (ईश्वर के प्रति समर्पिण)की प्राकाष्टा को प्रदर्शित करती है  

प्रारंभ - पचमढ़ी शहर (होशंगाबाद ) से

समापन - नागव्दार गुफा, महादेव पहाड़ी (सतपुड़ा के पर्वतो मे )

समर्पित - भगवान् शिव

यात्रीगण- 5 वर्ष से 60 वर्षीय बच्चे,युवा एवं बुर्जुग वर्ग, जो उतरी महाराष्ट्र (ज्यादातर यात्री), म.प्र . एवं थोड़े-बहुत अन्य राज्यो से ।

यात्रा - पचमढ़ी से प्रारंभ होकर 20 km. तक का सफर पैदल चलकर तय करना होता है।

पर्यटन स्थल -

        -धुपगढ , (1350 m. ऊंचाई पर           स्थित म. प्र . का सबसे ऊंचा स्थान  )
         - पांडव की गुफाए,
         - अप्सरा जलप्रपात, 
         - नागव्दार गुफा 

विशेष -

        - इस यात्रा की अनुमति म.प्र. सरकार व्दारा प्रतिवर्ष सिर्फ छः दिनों के लिए दी जाती है ।
       - पैदल की जाने वाली इस यात्रा से सतपुड़ा के पर्वतो को घुमने का सुअवसर प्राप्त होता है ।
         इस तरह नागव्दार यात्रा अपने लौकिक एवं प्राकृतिक सौंदर्यो के कारण विशिष्ट पहचान को बनाए हुए है ।
           Written by bablu dayma

पहुंचने का मार्गसंपादित करें

पचमढ़ी पिपरिया तहसील में पिपरिया-पचमढ़ी मार्ग पर तहसील मुख्यालय से ५४ किमी की दूरी पर स्थित है। भोपाल से पचमढ़ी की दूरी लगभग २०४ किमी है जहां से नियमित बसें चलती हैं। मध्य रेलवे की इटारसी-जबलपुर शाखा पर स्थित पिपरिया रेलवे स्टेशन । पचमढ़ी सड़क मार्ग पर यह लगभग ५२ किमी दूर है।

पचमढ़ी एक लोकप्रिय पर्यटक स्थल होने के कारण यह सड़क, रेल और वायुमार्ग से अच्छे से जुड़ा हुआ है। किसी भी माध्यम से यहां सरलता से पहुंचा जा सकता है। इसके अतिरिक्त यहां ठहरने के लिए भी कई विकल्प उपलब्ध हैं
रेल: मुंबई-हावड़ा रेलमार्ग पर इटारसीजबलपुर के बीच पिपरिया स्टेशन सबसे पास है।
सड़क: पचमढ़ी भोपाल, इंदौर, नागपुर, होशंगाबाद, छिंदवाड़ा तथा पिपरिया से सीधा जुड़ा है। पिपरिया से टैक्सी भी उपलब्ध रहती हैं।
हवाई मार्ग:भोपाल हवाई अड्डे के द्वारा दिल्ली, ग्वालियर, इंदौर, मुंबई, रायपुर और जबलपुर से जुड़ा है।

सामान्य जानकारीसंपादित करें

पचमढ़ी सदाबहार सतपुड़ा पर्वत श्रेणी पर सुंदर पहाड़ियों से घिरा पठार है, जिसे पर्यटक प्यार से सतपुड़ा की रानी कहते हैं। इस पठार का वनक्षेत्र सहित कुल क्षेत्र लगभग ६० वर्ग किमी है। सामान्य मान्यता के अनुसार पचमढ़ी नाम, पंचमढ़ी या पांडवों की पांच गुफा से व्युत्पन्न है, जिनके संबंध में माना जाता है कि, उन्होंने इस क्षेत्र में अपने अज्ञातवास का अधिकांश समय बिताया था। अंग्रेजों के शासन काल में पचमढ़ी मध्य प्रांत की राजधानी थी। अभी भी मध्यप्रदेश के मंत्रियों तथा उच्च शासकीय अधिकारियों के कार्यालय, कुछ दिनों के लिए पचमढ़ी में लगते हैं। ग्रीष्म काल में यहां अधिकारियों की अनेक बैठकें भी होती हैं। यह आरोग्य निवास के रूप में उपयोगी है।

इस स्थान की खोज केप्टन जे.फॉरसोथ ने की थी। उन्हें यहां सन् १८६२ में, सतपुड़ा के इस भाग के अन्वेषण के लिए भेजा गया था। उन्होंने यहां एक फॉरेस्ट लॉज का निर्माण किया और द हाइलेंडस ऑफ सेंट्रल इंडिया नामक एक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी, जिसमें सतपुड़ा पर्वत श्रेणी की उत्कृष्ट सुंदरता का चित्रण है। जब वे पचमढ़ी आए तो इस क्षेत्र पर पंचमढ़ी के कोरकू जागीरदार का अधिकार था, किंतु हांडी खो के समीप मग्न झोपड़ियों के स्थलों के रूप में अति प्राचीन सभ्यता के चिन्ह विद्यमान थे।findore to hoshanga badbetween distance deepak barde

जलवायुसंपादित करें

पंचमढ़ी का ठंडा सुहावना मौसम इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। सर्दियों के मौसम में यहां तापमान लगभग ४-५ डिग्री सेग्रे रहता है लेकिन मई-जून के महीनों में जब मप्र के अन्‍य भागों में तापमान ४५ डिसे तक पहुंच जाता है, पंचमढ़ी में ३५ डिसे से अधिक नहीं होता। इस कारण यहां गर्मियों में पर्यटकों की बहुत भीड़ होती है। सतपुड़ा के घने जंगलों से घिरा यह रमणीय स्थल इसके मौसम के कारण ही अपने आप में विशिष्ट बन गया है।

यहां की सदाबहार हरियाली घास और हर्रा, जामुन, साज, साल, चीड़, देवदारू, सफेद ओक, यूकेलिप्टस, गुलमोहर, जेकेरेंडा और अन्य छोटे-बडे सघन वृक्षों से आच्छादित वन गलियारों तथा घाटियों के कारण दृश्यावली मनमोहक है। तल भूमि भी घास तथा जहां-तहां फर्न और पत्तों से हरी-भरी है। भांति-भांति के खिले फूल और उन पर मंडराती तितलियां नयनाभिराम दृश्‍य प्रस्‍तुत करते हैं। प्रहारियों के समान खड़ी पहाड़ियां मुलायम बलुआ पत्थर की बनी है। पानी से वे विरूपित हो गई है किंतु भव्य दिखाई देती हैं। बहुत बढ़िया

दर्शनीय स्‍थलसंपादित करें

यहाँ महादेव, चौरागढ़ का मंदिर, रीछागढ़, डोरोथी डीप रॉक शेल्टर, जलावतरण, सुंदर कुंड, इरन ताल, धूपगढ़, सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान है। सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान 1981 में बनाया गया जिसका क्षेत्रफल 524 वर्ग किलोमीटर है। यह प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है। यहाँ रुकने के लिए उद्यान के निर्देशक से अनुमति लेना जरूरी है। इसके अलावा यहाँ कैथोलिक चर्च और क्राइस्ट चर्च भी हैं।

 
चर्च

प्रियदर्शिनी प्‍वाइंट : यहां से सूर्यास्त का दृश्य बहुत ही लुभावना लगता है। तीन पहाड़ी शिखर बायीं तरफ चौरादेव, बीच में महादेव तथा दायीं ओर धूपगढ़ दिखाई देते हैं। इनमें धूपगढ़ सबसे ऊँची चोटी है।

रजत प्रपात: यह अप्सरा विहार से आधा किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। 350 फुट की ऊँचाई से गिरता इसका जल इसका जल एकदम दूधिया चाँदी की तरह दिखाई पड़ता है।

बी फॉल: यह जमुना प्रपात के नाम से भी जाना जाता है। यह नगर से 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। पिकनिक मनाने के लिए यह एक आदर्श जगह है।

राजेंद्र गिरि : इस पहाड़ी का नाम राष्ट्रपति डॉ॰ राजेंद्र प्रसाद के नाम पर रखा गया है। सन 1953 में डॉ॰प्रसाद स्‍वास्‍थ्‍य लाभ के लिए यहाँ आकर रुके थे और उनके लिए यहाँ रविशंकर भवन बनवाया गया था। इस भवन के चारों ओर प्रकृति की असीम सुंदरता बिखरी पड़ी है।

हांडी खोह : यह खाई पचमढ़ी की सबसे गहरी खाई है जो 300 फीट गहरी है। यह घने जंगलों से ढँकी है और यहाँ कल-कल बहते पानी की आवाज सुनना बहुत ही सुकूनदायक लगता है। वनों के घनेपन के कारण जल दिखाई नहीं देता; पौराणिक संदर्भ कहते हैं कि भगवान शिव ने यहाँ एक बड़े राक्षस रूपी सर्प को चट्टान के नीचे दबाकर रखा था। स्थानीय लोग इसे अंधी खोह भी कहते हैं जो अपने नाम को सार्थक करती है; यहाँ बने रेलिंग प्लेटफार्म से घाटी का नजारा बहुत सुंदर दिखता है।

जटाशंकर गुफा: यह एक पवित्र गुफा है जो पचमढ़ी कस्बे से 1.5 किलोमीटर दूरी पर है। यहाँ तक पहुँचने के लिए कुछ दूर तक पैदल चलना पड़ता है। मंदिर में शिवलिंग प्राकृतिक रूप से बना हुआ है। यहाँ एक ही चट्टान पर बनी हनुमानजी की मूर्ति भी एक मंदिर में स्थित है। पास ही में हार्पर की गुफा भी है।

पांडव गुफा: महाभारत काल की मानी जाने वाली पाँच गुफाएँ यहाँ हैं जिनमें द्रौपदी कोठरी और भीम कोठरी प्रमुख हैं। पुरातत्वविद मानते हैं कि ये गुफाएँ गुप्तकाल की हैं, जिन्हें बौद्ध भिक्षुओं ने बनवाया था।

अप्सरा विहार: पांडव गुफाओं से आगे चलने पर 30 फीट गहरा एक ताल है जिसमें नहाने और तैरने का आनंद लिया जा सकता है। इसमें एक झरना आकर गिरता है।

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें