दयानन्द सरस्वती

महर्षि दयानंद सरस्वती आर्य समाज के संस्थापक व समाज-सुधारक (1824-1883) थे। इनके अभूतपूर्व योगदान को भुला
(दयानंद सरस्वती से अनुप्रेषित)

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती (१८२४-१८८३) आधुनिक भारत के चिन्तक तथा आर्य समाज के संस्थापक थे। उनके बचपन का नाम 'मूलशंकर' था। उन्होंने वेदों के प्रचार के लिए मुम्बई में आर्यसमाज की स्थापना की। 'वेदों की ओर लौटो' यह उनका ही प्रमुख नारा था। स्वामी दयानन्द ने वेदों का भाष्य (अनुवाद) किया इसलिए उन्हें 'ऋषि' कहा जाता है । उन्होने कर्म सिद्धान्त, पुनर्जन्म तथा सन्यास को अपने दर्शन के स्तम्भ बनाया। उन्होने ही सबसे पहले १८७६ में 'स्वराज्य' का नारा दिया जिसे बाद में लोकमान्य तिलक ने आगे बढ़ाया। प्रथम जनगणना के समय स्वामी जी ने आगरा से देश के सभी आर्यसमाजो को यह निर्देश भिजवाया कि 'सब सदस्य अपना धर्म ' सनातन धर्म' लिखवाएं। उनका विवादों से भी नाता रहा है।

महर्षि दयानन्द सरस्वती
महर्षि दयानन्द सरस्वती
जन्म मूलशंकर
१२ फ़रवरी १८२४
टंकारा, गुजरात
मृत्यु अजमेर, राजस्थान
गुरु/शिक्षक विरजानन्द दण्डीश
दर्शन वेदों की ओर चलो, आधुनिक भारतीय दर्शन
धर्म हिन्दू
दर्शन वेदों की ओर चलो, आधुनिक भारतीय दर्शन
राष्ट्रीयता भारतीय

प्रारम्भिक जीवनसंपादित करें

दयानन्द सरस्वती का जन्म १२ फ़रवरी टंकारा में सन् १८२४ में मोरबी (मुम्बई की मोरवी रियासत) के पास काठियावाड़ क्षेत्र (जिला राजकोट), गुजरात में हुआ था। उनके पिता का नाम करशनजी लालजी तिवारी और माँ का नाम यशोदाबाई था। उनके पिता एक कर-कलेक्टर होने के साथ ब्राह्मण परिवार के समृद्ध और प्रभावशाली व्यक्ति थे। क्योंकि इनका जन्म धनु राशि और मूल नक्षत्र मे हुआ था इसीलिए स्वामी दयानन्द सरस्वती का असली नाम मूलशंकर था और उनका प्रारम्भिक जीवन बहुत आराम से बीता।[1] आगे चलकर एक पण्डित बनने के लिए वे संस्कृत, वेद, शास्त्रों व अन्य धार्मिक पुस्तकों के अध्ययन में लग गए। अपनी छोटी बहन और चाचा की हैजे के कारण हुई मृत्यु से वे जीवन-मरण के अर्थ पर गहराई से सोचने लगे और ऐसे प्रश्न करने लगे जिससे उनके माता पिता चिन्तित रहने लगे। तब उनके माता-पिता ने उनका विवाह किशोरावस्था के प्रारम्भ में ही करने का निर्णय किया (१९वीं सदी के आर्यावर्त (भारत) में यह आम प्रथा थी)। लेकिन बालक मूलशंकर ने निश्चय किया कि विवाह उनके लिए नहीं बना है और वे 1846 में सत्य की खोज में निकल पड़े।[2]

ज्ञान की खोजसंपादित करें

फाल्गुन कृष्ण संवत् १८९५ में शिवरात्रि के दिन उनके जीवन में नया मोड़ आया। वे घर से निकल पड़े और यात्रा करते हुए वह गुरु विरजानन्द के पास पहुंचे। गुरुवर ने उन्हें पाणिनी व्याकरण, पातंजल-योगसूत्र तथा वेद-वेदांग का अध्ययन कराया। गुरु दक्षिणा में उन्होंने मांगा- विद्या को सफल कर दिखाओ, परोपकार करो, मत मतांतरों की अविद्या को मिटाओ, वेद के प्रकाश से इस अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करो, वैदिक धर्म का आलोक सर्वत्र विकीर्ण करो। यही तुम्हारी गुरुदक्षिणा है। उन्होंने अंतिम शिक्षा दी—मनुष्यकृत ग्रंथों में ईश्वर और ऋषियों की निंदा है, ऋषिकृत ग्रंथों में नहीं। हालांकि, गुरु विरजानन्द जी के पास जो ज्ञान था वह पूर्ण नहीं था। क्योंकि पूर्ण ज्ञान तो सिर्फ तत्वदर्शी संत ही बता सकते हैं।

ज्ञान प्राप्ति के पश्चातसंपादित करें

 
स्वामी दयानन्द सरस्वती।

महर्षि दयानन्द ने अनेक स्थानों की यात्रा की। उन्होंने हरिद्वार में कुंभ के अवसर पर 'पाखण्ड खण्डिनी पताका' फहराई। उन्होंने अनेक शास्त्रार्थ किए। वे कलकत्ता में बाबू केशवचन्द्र सेन तथा देवेन्द्र नाथ ठाकुर के संपर्क में आए। यहीं से उन्होंने पूरे वस्त्र पहनना तथा हिन्दी में बोलना व लिखना प्रारंभ किया। यहीं उन्होंने तत्कालीन वाइसराय को कहा था, मैं चाहता हूं विदेशियों का राज्य भी पूर्ण सुखदायक नहीं है। परंतु भिन्न-भिन्न भाषा, पृथक-पृथक शिक्षा, अलग-अलग व्यवहार का छूटना अति दुष्कर है। बिना इसके छूटे परस्पर का व्यवहार पूरा उपकार और अभिप्राय सिद्ध होना कठिन है।

आर्य समाज की स्थापनासंपादित करें

 
ओ३म को आर्य समाज में ईश्वर का सर्वोत्तम और उपयुक्त नाम माना जाता है

महर्षि दयानन्द ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा संवत् १९३२(सन् १८७५) को गिरगांव मुम्बई में आर्यसमाज की स्थापना की। आर्यसमाज के नियम और सिद्धांत प्राणिमात्र के कल्याण के लिए है। संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना।

सत्यार्थ प्रकाशसंपादित करें

सत्यार्थ प्रकाश आर्य समाज की एक प्रमुख पुस्तक है जिसकी रचना महर्षि दयानन्द सरस्वती ने थी. इस पुस्तक की रचना अजमेर में की गई थी। परंतु इस पुस्तक में बहुत सी आपत्ति जनक बातें लिखी हुई है, जो एक सभ्य समाज में मान्य नहीं है। जैसे:[3]

  • समुल्लास 4 पृष्ठ 71 पर स्वामी दयानन्द जी कहते है: अपनी 24 वर्ष की लड़की का विवाह 48 वर्ष के व्यक्ति से करें यह उत्तम विवाह समय है।
  • समुल्लास 4 पृष्ठ 96 व 97 पर कहा है कि विधवा स्त्राी विवाह न करें। वह नियोग करे। नियोग की परिभाषा बताई है कि वह विधवा स्त्राी किसी अन्य पुरूष के पास जाकर पशु की तरह गर्भ धारण कर ले। वह उत्पन्न हुई संतान मृत पति की ही मानी जाएगी उसी का गौत्र होगा।
  • जीवित पति वाली स्त्राी अर्थात् सुहागिन भी नियोग (पशु तुल्य कर्म) करे। (समु. 4 पृष्ठ 102)
  • समुल्लास 4 पृष्ठ 103 पर लिखा है:- स्त्राी के गर्भ रहने के पश्चात् एक वर्ष तक स्त्राी पुरूष मिलन नहीं करें। यदि पुरूष से न रहा जाए तो किसी विधवा स्त्राी से नियोग (पशु तुल्य कर्म) करके सन्तान उत्पत्ति कर दे।
  • समुल्लास 4 पृष्ठ 101 पर लिखा है कि विधवा स्त्राी ग्यारह पुरूषों तक नियोग (पशु तुल्य कर्म) कर सकती है।
  • समु. 4 पष्ठ 71 पर लिखा है कि कैरी आँखों वाली लड़की से विवाह मत करो, दांत युक्त लड़की से विवाह करो, किसी का नाम पार्वती, गोदावरी, गोमति आदि नदियों और पर्वतों पर हो उस लड़की से विवाह मत करो।
  • समु. 4 के पष्ठ 96.97 पर महर्षि दयानन्द ने लिखा है कि विधवा स्त्राी का पुनः विवाह इसलिए नहीं करना चाहिए क्योंकि पुनःविवाह से उसका पति व्रत धर्म नष्ट हो जाएगा। इसलिए वे नियोग करें।
  • समु. 4 पष्ठ 96.97 पर लिखा है कि ‘यदि विधवा का पुनः विवाह कर दिया तो उसका पतिव्रत धर्मनष्ट हो जाएगा’ फिर पष्ठ 101 पर लिखा है कि एक स्त्राी ग्यारह पुरूषों तक नियोग अर्थात् पशु तुल्य कर्म कर सकती हैं। विचार करें बुद्धिमान समाज क्या ऐसी बातें महर्षि या विद्धान या समाज सुधारक कह सकता हैं ऐसा विधान तथा नियम या तो महामुर्ख या भांग पीकर ही कह सकता है।
  • फिर महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 8 पष्ठ 197.198 पर लिखा है कि सूर्य पर पथ्वी की तर सब प्रजा बसती हैं। इसी प्रकार सर्व पदार्थ हैं। इन्हीं वेदों को सूर्य (आग के गोले) पर रहने वाले मनुष्य पढ़ते हैं।
  • सत्यार्थ प्रकाश के चौथे सत्यार्थ प्रकाश से विवाह और नियोग का प्रकरण 168 धरती पर अवतार (सम्पूर्ण)
  • समुल्लास के पष्ठ 101 पर अज्ञानी महर्षि ने लिखा है कि एक स्त्राी नियोग (पशु तुल्य कर्म) ग्यारह व्यक्तियों तक कर सकती है।
  • सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 11 पष्ठ 263.264 में महर्षि दयानन्द ने कहा है कि नाम जाप करने से कुछ नहीं होता। इससे सिद्ध है कि उन्होंने परमात्मा के नाम का जाप भी त्याग दिया था।

महर्षि दयानन्द को वेद ज्ञान नहींसंपादित करें

महर्षि दयानन्द जी कहते हैं कि परमात्मा एक देशीय नहीं है। निराकार है। जबकि वेद बताते हैं कि परमात्मा साकार है। नराकार (मानव सदृश शरीर युक्त है) उसका शरीर तेजोमय है। जैसे सूर्य स्वयं प्रकाशमान तथा साकार है। परमात्मा एक देशीय है। वह तीसरे मुक्ति धाम में साकार विराजमान है।[4]

प्रमाण:- यजुर्वेद अध्याय 5 मंत्रा 1 व अध्याय 1 मंत्रा 15 में ऋग्वेद मण्डल 1 सुक्त 31 मंत्रा 17 का अनुवाद स्वामी दयानन्द जी द्वारा किया गया है। जिसमें लिखा है ‘‘मनुष्वदग्ने’’ (मनुष्यवत्) अर्थात् मनुष्य जैसे (अग्ने) परमेश्वर आप जैसे  पहले समय में अपने सत्यधाम (ऋतधाम) से चलकर अपने अच्छे सेवकों को यहाँ आकर मिलते हो वैसे ही हमें प्राप्त हुजिए। यही प्रमाण ऋग्वेद मण्डल 9 सुक्त 86 मंत्रा 26.27 तथा ऋग्वेद मण्डल 9 सुक्त 82 मंत्रा 1 से 3 ऋग्वेद मण्डल 9 सुक्त 96 मण्डल 18.19.20 में स्पष्ट है कि परमात्मा मनुष्य की तरह एक राजा की तरह देखने योग्य है। जो ऊपर अन्तरिक्ष में एक स्थान तीसरे मुक्ति धाम में विराजमान है साकार है। वह अपने उस लोक (स्थान) से चलकर गर्जता हुआ इस लोक में आता है तथा एक भक्त समुदाय का सेनापति की तरह अर्थात् गुरु रूप में नेतृत्व करता है।

स्वामी दयानन्द नशा करते थेसंपादित करें

पुस्तक: ‘‘महर्षि दयानन्द समग्र क्रान्ति के अग्रदूत’’ पृष्ठ 8 तथा 21 पर लिखा है कि स्वामी दयानन्द जी ने अपने जीवन चरित्रा में स्वयं ही स्वीकारा है कि वे माता पिता की सेवा करने के विरोधी थे तथा स्वामी दयानन्द जी भांग पीते थे तथा भांग की मादकता से बेसुध हो जाते थे। “स्वामी दयानन्द तम्बाकू सूंघते थे” (पुस्तक:- ‘‘श्रीमद् दयानन्द प्रकाश’’ पृष्ठ 138 पर लिखा हैं)[3][5]

वैचारिक आन्दोलन, शास्त्रार्थ एवं व्याख्यानसंपादित करें

वेदों को छोड़ कर कोई अन्य धर्मग्रन्थ प्रमाण नहीं है - इस सत्य का प्रचार करने के लिए स्वामी जी ने सारे देश का दौरा करना प्रारम्भ किया और जहां-जहां वे गये प्राचीन परम्परा के पण्डित और विद्वान उनसे हार मानते गये। संस्कृत भाषा का उन्हें अगाध ज्ञान था। संस्कृत में वे धाराप्रवाह बोलते थे। साथ ही वे प्रचण्ड तार्किक थे।

उन्होंने ईसाई और मुस्लिम धर्मग्रन्थों का भली-भांति अध्ययन-मन्थन किया था। अतएव अपनें चेलों के संग मिल कर उन्होंने तीन-तीन मोर्चों पर संघर्ष आरंभ कर दिया। दो मोर्चे तो ईसाइयत और इस्लाम के थे किन्तु तीसरा मोर्चा सनातनधर्मी हिन्दुओं का था। दयानन्द ने बुद्धिवाद की जो मशाल जलायी थी, उसका कोई जवाब नहीं था।। मगर सत्य यह था कि पौराणिक ग्रंथ भी वेद आदि शास्त्र में आते हैं।

महर्षि दयानन्द का ज्ञान वेद विरुद्धसंपादित करें

स्वामी दयानन्द जी ने सत्यार्थ प्रकाश के समुल्लास 7 पृष्ठ 155 व 163 पर लिखा है कि परमात्मा की साधना उपासना अर्थात भक्ति से परमात्मा भक्त के पाप नाश (क्षमा) नहीं करता। जबकि यजुर्वेद अध्याय 8 मंत्रा 13 में छः बार लिखा है कि परमात्मा साधक के सर्व पाप नाश कर देता है। अधर्म के अधर्म अर्थात् घोर पाप को भी नाश कर देता है।

समाज सुधार के कार्यसंपादित करें

महर्षि दयानन्द का समाज सुधार में कोई खास योगदान नहीं था।  महर्षि दयानन्द ने तत्कालीन समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों तथा अन्धविश्वासों और रूढियों-बुराइयों व पाखण्डों का खण्डन व विरोध किया। उनके ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश, में समाज नासक विचार बहुत समल्लित हैं। वे योगी थे तथा प्राणायाम पर उनका विशेष बल था। वे सामाजिक पुनर्गठन में सभी वर्णों तथा स्त्रियों की भागीदारी के पक्षधर थे। उनकी देशभक्ति दूर दूर तक नहीं दिखाई देती बल्कि वह तो 1857 के स्वतंत्रा संग्राम से भाग कर चले गए थे।

हत्या का षड्यन्त्रसंपादित करें

स्वामी जी की मृत्यु जिन परिस्थितियों में हुई, उससे भी यही आभास मिलता है कि उसमें निश्चित ही अंग्रेजी सरकार का कोई षड्यन्त्र था। स्वामी जी की मृत्यु ३० अक्टूबर १८८३ को दीपावली के दिन सन्ध्या के समय हुई थी। उन दिनों वे जोधपुर नरेश महाराज जसवन्त सिंह के निमन्त्रण पर जोधपुर गये हुए थे। वहां उनके नित्य ही प्रवचन होते थे। यदा कदा महाराज जसवन्त सिंह भी उनके चरणों में बैठ कर वहां उनके प्रवचन सुनते। दो-चार बार स्वामी जी भी राज्य महलों में गए। वहां पर उन्होंने नन्हीं नामक वेश्या का अनावश्यक हस्तक्षेप और महाराज जसवन्त सिंह पर उसका अत्यधिक प्रभाव देखा। स्वामी जी को यह बहुत बुरा लगा। उन्होंने महाराज को इस बारे में समझाया तो उन्होंने विनम्रता से उनकी बात स्वीकार कर ली और नन्हीं से सम्बन्ध तोड़ लिए। इस से नन्हीं स्वामी जी के बहुत अधिक विरुद्ध हो गई। उसने स्वामी जी के रसोइए कलिया उर्फ जगन्नाथ को अपनी तरफ मिला कर उनके दूध में पिसा हुआ कांच डलवा दिया। थोड़ी ही देर बाद स्वामी जी के पास आकर अपना अपराध स्वीकार कर लिया और उसके लिए क्षमा मांगी। उदार-हृदय स्वामी जी ने उसे राह-खर्च और जीवन-यापन के लिए पांच सौ रुपए देकर वहां से विदा कर दिया ताकि पुलिस उसे परेशान न करे। बाद में जब स्वामी जी को जोधपुर के अस्पताल में भर्ती करवाया गया तो वहां सम्बन्धित चिकित्सक भी शक के दायरे में रहा। उस पर आरोप था कि वह औषधि के नाम पर स्वामी जी को हल्का विष पिलाता रहा। बाद में जब स्वामी जी की तबियत बहुत खराब होने लगी तो उन्हें अजमेर के अस्पताल में लाया गया। मगर तब तक काफी विलम्ब हो चुका था। स्वामी जी को बचाया नहीं जा सका।

इस सम्पूर्ण घटनाक्रम में आशंका यही है कि वेश्या को उभारने तथा चिकित्सक को बरगलाने का कार्य अंग्रेजी सरकार के इशारे पर किसी अंग्रेज अधिकारी ने ही किया। अन्यथा एक साधारण वेश्या के लिए यह सम्भव नहीं था कि केवल अपने बलबूते पर स्वामी दयानन्द सरस्वती जैसे सुप्रसिद्ध और लोकप्रिय व्यक्ति के विरुद्ध ऐसा षड्यन्त्र कर सके। बिना किसी प्रोत्साहन और संरक्षण के चिकित्सक भी ऐसा दुस्साहस नहीं कर सकता था।

मृत्युसंपादित करें

इनकी मृत्यु 30 अक्टूबर 1883 में अजमेर में हुई थी। इनकी पुस्तक श्रीमद्दयानन्द प्रकाश के पष्ठ 443 में लिखा है कि दयानंद को 15 दिन तक अतिसार (दस्त) लगे रहे। हिचकियाँ लगी रही। पेट को हाथ लगाने से भी दर्द होता था। श्रीमद्दयानन्द प्रकाश’’ के पष्ठ 444 के आंशिक विवरण है कि अंत समय में उनके कण्ठ में छाले, जीभ पर छाले, मुख में छाले, माथे पर सिर पर छाले पड़ गए थे। पानी की एक घूंट भी बड़ी कठिनाई से गले से नीचे जाती थी। इस प्रकार महापीड़ा को भोगकर मत्यु को प्राप्त हुए महर्षि दयानन्द।

अंतिम शब्दसंपादित करें

स्वधर्म, स्वभाषा, स्वराष्ट्र, स्वसंस्कृति और स्वदेशोन्नति के अग्रदूत स्वामी दयानन्द जी का शरीर सन् १८८३ में दीपावली के दिन पंचतत्व में विलीन हो गया और वे अपने पीछे छोड़ गए एक सिद्धान्त, कृण्वन्तो विश्वमार्यम् - अर्थात सारे संसार को श्रेष्ठ मानव बनाओ। उनके अन्तिम शब्द थे - "प्रभु! तूने अच्छी लीला की। आपकी इच्छा पूर्ण हो।"

जीवनचरित का लेखनसंपादित करें

महर्षि के साहित्य के साथ-साथ उनका जीवन चरित भी अत्यन्त परेरणास्पद है। महर्षि पर अनेकों व्यक्तियों ने जीवन चरित्र लिखा, जिनमें पण्डित लेखराम, सत्यानन्द आदि प्रमुख हैं। किन्तु बंगाली सज्जन बाबू श्री देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय के द्वारा लिखे गए ऋषि दयानन्द का जीवनचरित की यह विशेषता है कि देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय जी स्वयं आर्यसमाजी नहीं थे फिर भी अत्यन्त श्रद्धावान होकर उन्होनें 15-16 वर्ष लगातार और सहस्रों रुपया व्यय करके ऋषि जीवन की सामग्री को एकत्र करके उन्होने महर्षि की प्रामाणिक और क्रमबद्ध जीवनी को लिखा। इस जीवनी के लेखन का कार्य दैवयोग से पूर्ण नहीं हो पाया तथा देवेन्द्रनाथ जी की असामायिक मृत्यु हो गई। तत्पश्चात् पं. लेखराम और सत्यानन्द द्वारा संग्रहित सामग्री की सहायता से पं. घासीराम ने इसे पूर्ण किया। यह महर्षि की अत्यन्त प्रमाणिक जीवनी है।

पण्डित लेखराम का अनुसंधान विशेषकर पंजाब, यू.पी. और राजस्थान तक ही सीमित रहा। मुम्बई और बंगाल प्रान्त में न उन्होने अधिक भ्रमण किया और न अधिक अनुसन्धान किया, अत: इन दोनो प्रान्तों की घटनाओं का उनके ग्रन्थ में उतना विशद वर्णन नहीं है जितना पंजाब और यूपी तथा राजस्थान की घटनाओं का है। देवेन्द्रनाथ जी के ग्रन्थ में मुम्बई और बंगाल का भी विस्तृत वर्णन है।

स्वामी दयानन्द के योगदान के बारे में महापुरुषों के विचारसंपादित करें

  • डॉ॰ भगवान दास ने कहा था कि स्वामी दयानन्द हिन्दू पुनर्जागरण के मुख्य निर्माता थे।
  • श्रीमती एनी बेसेन्ट का कहना था कि स्वामी दयानन्द पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने 'आर्यावर्त (भारत) आर्यावर्तियों (भारतीयों) के लिए' की घोषणा की।
  • सरदार पटेल के अनुसार भारत की स्वतन्त्रता की नींव वास्तव में स्वामी दयानन्द ने डाली थी।
  • फ्रेंच लेखक रोमां रोलां के अनुसार स्वामी दयानन्द राष्ट्रीय भावना और जन-जागृति को क्रियात्मक रूप देने में प्रयत्नशील थे।
  • अन्य फ्रेंच लेखक रिचर्ड का कहना था कि ऋषि दयानन्द का प्रादुर्भाव लोगों को कारागार से मुक्त कराने और जाति बन्धन तोड़ने के लिए हुआ था। उनका आदर्श है- आर्यावर्त ! उठ, जाग, आगे बढ़। समय आ गया है, नये युग में प्रवेश कर।
  • स्वामी जी को लोकमान्य तिलक ने "स्वराज्य और स्वदेशी का सर्वप्रथम मन्त्र प्रदान करने वाले जाज्व्लयमान नक्षत्र थे दयानन्द "
  • सैयद अहमद खां के शब्दों में "स्वामी जी ऐसे विद्वान और श्रेष्ठ व्यक्ति थे, जिनका अन्य मतावलम्बी भी सम्मान करते थे।"
  • वीर सावरकर  ने कहा महर्षि दयानन्द संग्राम के सर्वप्रथम योद्धा थे।
  • लाला लाजपत राय ने कहा - स्वामी दयानन्द ने हमे स्वतंत्र विचारना, बोलना और कर्त्तव्यपालन करना सिखाया।


लेखन व साहित्यसंपादित करें

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने कई धार्मिक व सामाजिक पुस्तकें अपनी जीवन काल में लिखीं। प्रारम्भिक पुस्तकें संस्कृत में थीं, किन्तु समय के साथ उन्होंने कई पुस्तकों को आर्यभाषा (हिन्दी) में भी लिखा, क्योंकि आर्यभाषा की पहुँच संस्कृत से अधिक थी। हिन्दी को उन्होंने 'आर्यभाषा' का नाम दिया था।[6] उत्तम लेखन के लिए आर्यभाषा का प्रयोग करने वाले स्वामी दयानन्द अग्रणी व प्रारम्भिक व्यक्ति थे। यदि ऋषि दयानन्द सरस्वती के ग्रंथों व विचारों ( यद्यपि ये विचार ऋषि के स्वयं द्वारा निर्मित थे अपितु वेद द्वारा प्रदत्त थे ) पर चला जाये तो राष्ट्र पुनः विश्वगुरु गौरवशाली, वैभवशाली, शक्तिशाली, स्मम्पन्नशाली, सदाचारी और महान बन जाये।

स्वामी दयानन्द सरस्वती की मुख्य कृतियाँ निम्नलिखित हैं-

  • संस्कारविधि
  • पंचमहायज्ञविधि
  • आर्याभिविनय
  • गोकरुणानिधि
  • आर्योद्देश्यरत्नमाला
  • भ्रान्तिनिवारण
  • अष्टाध्यायीभाष्य
  • वेदांगप्रकाश
  • संस्कृतवाक्यप्रबोध
  • व्यवहारभानु

आर्योद्देश्यरत्नमालासंपादित करें

१८७३ में आर्योद्देश्यरत्नमाला नामक पुस्तक प्रकाशित हुई जिसमें स्वामी जी ने एक सौ शब्दों की परिभाषा वर्णित की है। इनमें से कई शब्द आम बोलचाल में आते हैं पर उनके अर्थ रूढ हो गए हैं, उदाहरण के लिए ईश्वर धर्म-कर्म आदि। इनको परिभाषित करके इनकी व्याख्या इस पुस्तक में है। इस लघु पुस्तिका में ८ पृष्ठ हैं।

गोकरुणानिधिसंपादित करें

१८८१ में स्वामी दयानन्द ने गोकरुणानिधि नामक पुस्तक प्रकाशित की जो कि गोरक्षा आन्दोलन को स्थापित करने में प्रमुख भूमिका निभाने का श्रेय भी लेती है। इस पुस्तक में उन्होंने सभी समुदाय के लोगों को अपने प्रतिनिधि सहित गोकृष्यादि रक्षा समिति की सदस्यता लेने को कहा है जिसका उद्देश्य पशु व कृषि की रक्षा है। आधुनिक पर्यावरणवादियों के समान यहाँ विचार व्यक्ति किए गए हैं। इस पुस्तक में समीक्षा, नियम व उपनियम हैं, तथा प्रमुखतः पशुओं को न मार कर उनका पालन करने में होने वाले लाभ वर्णित किए गए हैं।

व्यवहारभानुसंपादित करें

वैदिक यन्त्रालय, बनारस द्वारा १८८० में व्यवहारभानु पुस्तक प्रकाशित की गई थी। इसमें धर्मोक्त और उचित व्यवहार के बारे में वर्णन है।

स्वीकारपत्रसंपादित करें

२७ फ़रवरी १८८३ को उदयपुर में स्वामी दयानन्द सरस्वती ने एक स्वीकारपत्र प्रकाशित किया था जिसमें उन्होंने अपनी मृत्योपरान्त २३ व्यक्तियों को परोपकारिणी सभा की जिम्मेदारी सौंपी थी जो कि उनके बाद उनका काम आगे बढ़ा सकें। इनमें महादेव गोविन्द रानडे का भी नाम है[7]। इस स्वीकारपत्र पर १३ गणमान्य व्यक्तियों के साक्षी के रूप में हस्ताक्षर हैं। इसके प्रकाशन के कुछ छः माह पश्चात ही उनका देहान्त हो गया था।

संस्कृतवाक्यप्रबोधःसंपादित करें

यह संस्कृत सिखाने वाली लघु वार्तालाप पुस्तिका है। विभिन्न विषयों पर लघु वाक्य संस्कृत में दिये गये हैं। उनके अर्थ भी हिन्दी में दिए हैं।

सन्दर्भसंपादित करें

  1. "Dates, on-the-move, work meetings or parties: The Freesoul collection on Myntra has got you covered! - Times of India". The Times of India. अभिगमन तिथि 2022-05-20.
  2. Webdunia. "Swami Dayanand Saraswati Biography : एक महान देशभक्त थे महर्षि दयानंद सरस्वती". hindi.webdunia.com. अभिगमन तिथि 2022-05-20.
  3. "Dayanand Saraswati Jayanti in Hindi: दयानंद की वह अनसुनी सच्चाई जिससे आप आज तक अनजान है". SA News Channel (अंग्रेज़ी में). 2022-02-23. अभिगमन तिथि 2022-05-20.
  4. books. "दयानन्द सरस्वती जी की जन्म पत्री". Sant Rampal Ji Books (अंग्रेज़ी में). अभिगमन तिथि 2022-06-05.
  5. "राष्ट्र की अमूल्य निधि थे महर्षि दयानंद सरस्वती : भजनानंद". Dainik Jagran. अभिगमन तिथि 2022-06-08.
  6. आर्य भाषा के उन्नायक महर्षि दयानन्द Archived 2016-12-26 at the Wayback Machine – डॉ॰ मधु संधु
  7. स्वीकारपत्र Archived 2012-06-28 at the Wayback Machine पृष्ठ २

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें

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