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बुद्ध का पहला उपदेश, भारत, 11 वीं शताब्दी

बुद्धचरितम्, संस्कृत का महाकाव्य है। इसके रचयिता अश्वघोष हैं। इसकी रचनाकाल दूसरी शताब्दी है। इसमें गौतम बुद्ध का जीवनचरित वर्णित है। इस महाकाव्य का आरम्भ बुद्ध के गर्भाधान से तथा इसकी परिणति बुद्धत्व-प्राप्ति में होती है। यह महाकव्य भगवान बुद्ध के संघर्षमय सफल जीवन का ज्वलन्त, उज्ज्वल तथा मूर्त चित्रपट है। इसकी कथा का रूप-विन्यास वाल्मीकिकृत रामायण से मिलता-जुलता है।

सन् 420 में धर्मरक्षा ने इसका चीनी भाषा में अनुवाद किया तथा ७वीं एवं ८वीं शती में इसका अत्यन्त शुद्ध तिब्बती अनुवाद किया गया। दुर्भाग्यवश यह महाकाव्य मूल रूप में अपूर्ण ही उपलब्ध है। 28 सर्गों में विरचित इस महाकाव्य के द्वितीय से लेकर त्रयोदश सर्ग तक तथा प्रथम एवं चतुर्दश सर्ग के कुछ अंश ही मिलते हैं। इस महाकाव्य के शेष सर्ग संस्कृत में उपलब्ध नहीं है। इस महाकाव्य के पूरे 28 सर्गों का चीनी तथा तिब्बती अनुवाद अवश्य उपलब्ध है। इसका चीनी भाषा में अनुवाद पांचवीं शताब्दी के प्रारम्भ में 'धर्मरक्ष', 'धर्मक्षेत्र' अथवा 'धर्माक्षर' नामक किसी भारतीय विद्वान ने ही किया था तथा तिब्बती अनुवाद ९वीं शताब्दी से पूर्ववर्ती नहीं है।

कथास्रोतसंपादित करें

बुद्धचरित का कथानक, प्रख्यात कोटि का कथानक है। बुद्ध के जीवन से सम्बन्ध रखने वाली अनेक घटनाओं का श्रवण एवं पठन यत्र-तत्र आज भी पाया जाता है। बुद्धचरित महाकाव्य का कथानक किस निश्चित स्रोत से लिया गया है, इस प्रश्न का उत्तर पूर्णतः निश्चित नहीं है। बील के अनुसार अश्वघोष के इस काव्य का आधार महापरिनिर्वाणसूत्र था।[1] मैक्समूलर के अनुसर भी बुद्धचरित के कथानक का स्रोत महापरिनिर्वाणसूत्र ही है।[2] किन्तु कीथ के अनुसार बुद्धचरित का आधार ग्रन्थ बुद्ध के प्रति भक्तिभावना से युक्त हीनयान सम्प्रदाय से सम्बन्धित "ललितविस्तर" नामक ग्रन्थ है।[3]

वस्तुतः बुद्धचरित की कथावस्तु महावस्तु, ललितविस्तर, निदानकथा तथा जातक कथाओं से अत्यधिक साम्य प्राप्त करती है, किसी एक ग्रन्थ से नहीं।

बुद्धचरित के सर्गसंपादित करें

बुद्धचरित 28 सर्गों में था जिसमें 14 सर्गों तक बुद्ध के जन्म से बुद्धत्व-प्राप्ति तक का वर्णन है। किन्तु बुद्धचरितम् मूल रूप में अपूर्ण ही उपलब्ध है। 28 सर्गों में विरचित इस महाकाव्य के दूसरे सर्ग से लेकर तेरहवें सर्ग तक पूर्ण रूप से तथा पहला एवं चौदहवाँ सर्ग के कुछ अंश ही मिलते हैं। प्रथम सर्ग के प्रारम्भ के सात श्लोक और चतुर्दश सर्ग के बत्तीस से एक सौ बारह तक (81 श्लोक) मूल में नहीं मिलते हैं। चौखम्बा संस्कृत सीरीज तथा चौखम्बा विद्याभवन की प्रेरणा से उन श्लोकों की रचना श्री रामचन्द्रदास ने की है। उन्हीं की प्रेरणा से इस अंश का अनुवाद भी किया गया है। इस महाकाव्य के शेष सर्ग संस्कृत में उपलब्ध नहीं है।

15 से 28 सर्गों की मूल संस्कृत प्रति भारत में बहुत दिनों से अनुपलब्ध है। उसका अनुवाद तिब्बती भाषा में मिला था। उसके आधार पर किसी चीनी विद्वान ने चीनी भाषा में अनुवाद किया तथा आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से संस्कृत अध्यापक डाक्टर जॉन्सटन ने उसे अंग्रेजी में लिखा। इसका अनुवाद श्रीसूर्यनारायण चौधरी ने हिन्दी में किया है, जिसको श्री रामचन्द्रदास ने संस्कृतपद्यमय काव्य में परिणत किया है।

बुद्धचरित के 28 सर्गो में भगवत्प्रसूति, संवेगोत्पत्ति, अभिनिष्क्रमण, तपोवन प्रवेश, अंतःपुर विलाप, कुमारान्वेषणम्, श्रेणभिगमनम्, बुद्धत्वप्राप्ति, महाशिष्याणा प्रव्रज्या प्रमुख हैं। प्रथम तेरह सर्गों के नाम इस प्रकार हैं-[4]

  1. भगवत्प्रसूति,
  2. अन्तःपुरविहार
  3. संवेगोत्पत्तिः
  4. स्त्रीविघातन
  5. अभिनिष्क्रमण
  6. छन्दकनिवर्तनम्
  7. तपोवनप्रवेशम्
  8. अन्तःपुरविलाप
  9. कुमारान्वेषणम्
  10. श्रेणभिगमनम्
  11. कामविगर्हणम्
  12. आराडदर्शन
  13. मारविजय

बुद्धचरित की कथावस्तुसंपादित करें

प्रथम सर्गसंपादित करें

"भगवत्प्रसूतिः" नामक इस सर्ग की महत्वपूर्ण कथा बुद्ध के जन्म की है जिसमें बताया गया है कि इक्ष्वाकुवंश रूपी समुद्र में शुद्धोदन नाम का शाक्यों में एक राजा हुआ उसकी पत्नी का नाम माया था। रानी ने लोककल्याण के लिए गर्भधारण किया। गर्भधारण के बाद रानी ने स्वप्न में अपने अन्दर एक सफेद हाथी प्रवेश करते देखा। एक दिन रानी ने नन्दन वन सदृश लुम्बिनी वन में जाने की इच्छा की। राजा रानी को लुम्बिनी वन में ले गया, वहां पुष्य नक्षत्र के आने पर एक बालक का जन्म हुआ। जन्म होते ही वह बालक सप्तर्षि तारा की तरह सात पग चला तथा गम्भीर स्वर में बोला- विश्वकल्याण के लिए एवं ज्ञान प्राप्ति के लिए मैंने यह जन्म ग्रहण किया है, संसार में यह मेरा अन्तिम जन्म है। (बोधाय जातोऽस्मि जगद्वितार्थमन्त्या भवोत्पत्तिरियं मामेति। -- बुद्धचरित 1/15)। ब्राह्मणों ने उस बालक के सम्बन्ध में विचार किया तथा राजा से कहा, "हे राजन ! यह आपका पुत्र शुभ लक्षणों से युक्त है, यह समय आने पर गुणों का निधान होगा और बुद्धों में ऋषि होगा अथवा अत्यन्त राज्य श्री प्राप्त करेगा (दीपप्रभोऽयं कनकोज्जवलाङ्ग, सुलक्षणैर्यस्तु समन्वितोऽस्ति। निधिर्गुणानां समये स मन्ता बुद्धर्षिभावं परमां प्रियं वा॥-- बु०च० 1/34)। जिस प्रकार धातुओं में शुद्ध स्वर्ण, पर्वत में सुमेरु, जलाशयों में समुद्र, ताराओं में चन्द्रमा तथा अग्नियों में सूर्य श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार मनुष्यों में आपका पुत्र श्रेष्ठ है।

यथा हिरण्यं शुचि धातुमध्ये मेरुगिरीणां सरस समुद्रः।
तारासु चन्द्रस्तपतां च सूर्यः पुत्रस्तथा ते द्विपदेषु वर्थः ॥ (बुद्धचरित 1/37)

तब राजा को आश्चर्य हुआ कि ब्राह्मणों द्वारा कथित ये गुण इसमें कैसे आयेंगे, जो पूर्वजों में नहीं थे। तब ब्राह्मणों ने बहुत दृष्टान्त देकर बताया कि ऐसे बहुत व्यक्ति हैं, जो अपने से पूर्व किसी ने नहीं किया वो उन लोगों ने कर दिया। उन्होने वाल्मीकि, जनकादि का उदाहरण दिया और कहा कि न तो अवस्था ही प्रमाण होती है और न वंश ही। संसार में कोई भी कहीं भी श्रेष्ठता प्राप्त कर सकता है क्योंकि राजाओं एवं ऋषियों के पुत्रों ने वे कर्म किये जो उनके पूर्वजों ने नहीं किया।

तस्मात् प्रमाणं न वयो न वंशः न कश्चित् क्वचिन्ह श्रेष्ठ्यमुपैतिलोके।
राज्ञामृषीणां च हि तानि तानि कृतानि पुत्रैरकृतानि पूर्वैः ॥ (बुद्धचरित 1/46)

इसके बाद राजा ने ब्राह्मणों को प्रसन्नतापूर्वक, सत्कारपूर्वक धन दिया, इस उद्देश्य से कि वह (बालक) राजा होवे और वृद्धावस्था को ही बन को जाय। तदन्तर महर्षि असित, तपोबल से जन्मान्तकर का जन्म हुआ, ऐसा जानकर सद्धर्म की जिज्ञासा से शाक्यराज के घर आये। राजा ने आसन पर बैठाकर पाद्यार्ध्य से उनकी पूजा की। महर्षि असित अपने आने का प्रयोजन बताया, "मैं आपके पूत्र का दर्शन करने आया हूँ, मार्ग में ही मैने सुना कि बुद्धत्व प्राप्ति के लिए आपका पुत्र उत्पन्न हुआ है।" राजा ने धाई की गोद से बालक को महर्षि की गोद में दे दिया। महर्षि ने आश्चर्य से देखा कि उसके पैरों में चक्र के चिन्ह थे, अंगुलियों, हाथों एवं पैरों में रेखाओं का जाल विछा हुआ था, भौहें बालों से युक्त थीं एवं अण्डकोश हाथी के समान सूक्ष्म थे।

चक्राङ्कपादं स ततो महर्षिर्जालावनद्धानुलिपाणिपादम्।
सोर्णभ्रुवं वारणवस्तिकोशं सविस्मयं राजसुतं ददर्श ॥ (बुद्धचरित 1/60)

इसके बाद महर्षि असित ने राजा से उनके पुत्र के विषय में बहुत सारी बातें बताया कि आपका पुत्र अत्यन्त विलक्षण गुण वाला है और यह धर्म का राजा होगा, एवं बुद्धत्व प्राप्त करके मोहपाश से बँधे हुए दुःख से पीड़ित जगत् का बन्धन खोलेगा। इस प्रकार महर्षि असित पुत्रसम्बन्धी नियत बात बताकर आकाश मार्ग से जैसे आये थे, वैसे ही चले गये।

राजा ने अपने राज्य के सभी कैदियों को छोड़ दिया। पुत्र का जातक आदि संस्कार करवाया। पुत्र के मंगल के लिए जप, होम, दान आदि मांगलिक कृत्य किया और उसके बाद मंगल शुभ मुहूर्त आने पर वहां से राज्य में प्रवेश किया।

द्वितीय सर्गसंपादित करें

"अन्तःपुरविहार" नामक इस सर्ग में बताया गया है कि उस पुत्र के जन्म से उस शाक्यराज के राज्य में सारी सम्पत्तियाँ अनायास प्राप्त होने लगीं। वह राजा प्रतिदिन धन-धान्य, हॉथी-घोड़ों से इस प्रकार बढ़ने लगा जिस प्रकार जल के प्रवाह से नदी बढ़ती है।

उसके राज्य में केवल सन्यासियों ने ही भिक्षावृत्ति की, अन्य किसी ने नहीं किया। उसका राज्य चोर और शत्रुओं से रहित था। सूर्यपुत्र मनु के राज्य की तरह उसके राज्य में उस बालक के जन्म से हर्ष का सञ्चार हुआ, पाप का नाश हुआ, धर्म प्रज्वलित हुआ, कलुषता मिट गयी।

बालक के जन्म के कारण राजकुल की ऐसी सर्वार्थसिद्धि हुई कि राजा ने उसका नाम 'सर्वाथसिद्ध' रखा। उस बालक की माता माया देवी अपने पुत्र का देवर्षि सदृश विशाल प्रभाव देखकर उत्पन्न हर्ष को न सम्भाल सकी, अतः निवास के लिए स्वर्ग चली गयीं। तब माता के सदृश मौसी ने विशेष प्यार एवं भाव से सगे की भाँति उस देवतुल्य बालक का पालन-पोषण किया।

वह बालक शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की तरह क्रमशः बढ़ने लगा। उस बालक ने बाल्यावस्था को बिताकर उचित समय में उपनयनादि संस्कार से विधिवत सुसंस्कृत होकर बहुत वर्षों में सीखी जाने वाली अपने कुल के अनुसार विद्या थोड़े ही दिनों में सीख ली।

वयश्च कौमारमतीत्य सम्यक् सम्प्राप्य काले प्रतिपत्तिकर्म।
अल्पैरहोभिर्बहुवर्षगम्या जग्राह विद्याः स्वकुलानुरूपाः ॥ (बुद्धचरितम् 2/24)

इसके बाद राजा ने विषयों में उसकी आसक्ति उत्पन्न करने की इच्छा से उसका विवाह यशोधरा नाम की कन्या से सम्पन्न करा दिया ताकि बालक वन को न जावे। मन को क्षुभित करने वाला कोई प्रतिकूल दृश्य यह बालक किसी तरह न देख सके, ऐसा विचार कर वह राजा उस कुमार के लिए महल के अन्दर रहने की ही आज्ञा देता था, बाहर घुमने की नहीं। इस प्रकार वह कुमार महलों में ही स्त्रियों के मनोरम तूर्य, वीणा आदि नाद के बीच विहार करने लगा। अनेक सुन्दर युवतियों ने अपने कटाक्ष एवं भूविलास से उसको रमाने का प्रयास किया। राजा ने उस कुमार की दीर्घायु के लिए अग्नि में आहुति एवं ब्राह्मणों को गाय, स्वर्ण इत्यादि दान दिया।

उत्तम गुण वाली यशोधरा ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम राहु के समान मुख होने के कारण राहुल रखा गया। अब राजा को अपने वंश के विस्तार का पूर्ण विश्वास हुआ तथा जिस प्रकार पुत्र जन्म से प्रसन्ता हुयी थी, उसी प्रकार पौत्र जन्म से भी हुयी।

'मेरे ही समान मेरे पुत्र को भी अपने पुत्र में प्रेम होवें', इस प्रसन्नता से उस राजा ने यथासमय तत् तत् धर्म का आचरण किया। सत्पुरुषों द्वारा सेवित एवं वेदप्रतिपादित विविध धर्मो का सेवन किया, एवं पुत्र का मुख देखकर यह प्रार्थना की कि मेरा पुत्र किसी भी प्रकार वन न जावे।

तृतीय सर्गसंपादित करें

"संवेगउत्पत्ति:" नामक इस सर्ग में महात्मा बुद्ध के मन में विभिन्न कारणों से वैराग्य उत्पन्न होने की चर्चा की गयी है। बताया गया है कि किसी समय सिद्धार्थ ने वन के विषय में सुना कि कोमल तृणों से सम्पन्न है और वहाँ के वृक्ष कोयलों के विवाद से विवादित हैं तथा कमलों के तालाबों से सुशोभित गीत से निबद्ध हैं। इस प्रकार जब सिद्धार्थ ने स्त्रियों के प्रिय नगर के उद्यानों की सुन्दरता सुनी तब राजकुमार ने बाहर जाने की इच्छा की। राजकुमार के मनोगत भाव को जानकर राजा ने वनविहारयात्रा की आज्ञा दे दी। राजकुमार के मन में रोगादि से पीड़ित व्यक्तियों को देखकर संवेग न उत्पन्न हो जाय, अतः ऐसे लोगों का मार्गों में आवागमन रोक दिया गया। कर्मचारियों ने राजपथ से अङ्गहीनों, इन्द्रियहीनों, वृद्धों, रोगियों एवं गरीब जनों को परम शान्ति से हटाकर मार्ग को बहुत सजाया।

प्रत्यङ्गहीनान्विकलेन्द्रियांश्च जीर्णातुरादीन् कृपणांश्च दिक्षु।
ततः समुत्सार्य परेण सान्न! शोभां परां राजपथस्य चक्रुः॥ (बुद्धचरित 3/5)

राजपथ के सज जाने पर राजा से आज्ञा लेकर राजकुमार स्वर्ण के आभूषणों से अलङ्कृत, चार अश्वों से संयुक्त, कुशल सारथी वाले सुवर्णमय रथ पर सवार हुए। नगर के लोगों ने उसका अभिनन्दन किया। स्त्रियाँ उसको देखने की इच्छा से अटारियों पर चढ़ गयीं।

राजमार्ग पर जाते समय राजकुमार को वन में जाने के लिए प्रेरित करने हेतु शुद्धाधिवास देवयोनि विशेषों ने एक वृद्ध पुरूष का निर्माण किया। तब राजकुमार ने जर्जर से उस व्यक्ति को देखकर स्तब्ध होते हुए सारथी से कहा-

हे सूत! यह कौन मनुष्य आया है। सफेद केशों से युक्त, हाँथों में लाठी पकड़े हुए, भौहों से आँखे ढंकी हैं, शिथिलता के कारण शरीर झुका है। क्या यह विकार है अथवा स्वभाव या अनायास ऐसा हो गया है?
क ऐष भो सूत नरोऽभ्युपेतः केशैः सितैर्यष्टिविषक्तहस्तः ।
भूसंवृताक्षः शिथिलानताङ्गः किं विक्रियैषा प्रकृतिर्यदृच्छा॥ (बुद्धचरित ३/२८)

इस प्रकार बुद्ध के द्वारा पूछे जाने पर देवताओं के प्रभाव से बुद्धिमोह को प्राप्त उस सारथी ने बिना कुछ छिपाये उस अवस्था के विषय में सब कुछ बता दिया। सारथी ने कहा, "रूप को नष्ट करने वाली, बल के लिए विपत्ति स्वरूप, शोक की जननी, आनन्द का निधन, स्मृति का नाश एवं इन्द्रियों का शत्रु यह जरावस्था है जिसने इसे तोड़ डाला है।

ऐसा कहे जानेपर राजकुमार ने सारथी से पूछा क्या यह मुझे भी दोष होगा? तब सारथी ने कहा, "आयुष्मन! यह किसी को नहीं छोड़ती, अतः आपको भी अवश्यम्भावी है"। इस प्रकार सुनकर वह कुमार उद्विनग्मन हो सारथी से रथ लौटाने को कहा। सारथी ने रथ लौटाया और महल में प्रवेश किया। 'जरा-जरा' का चिन्तन करते हुए जब राजकुमार को शान्ति नहीं आयी तब राजा की आज्ञा से दूसरी बार भी पुनः उसी क्रम से बाहर गया। अनन्तर व्याधिग्रस्त दूसरे मनुष्य का भी मार्ग में उसी देवों ने निर्माण किया। तब राजकुमार ने फिर सारथी से पूछा कि दूसरे का आश्रय लेकर दुःखित स्वर में जो माँ-माँ चिल्ला रहा है यह कौन है? तब सारथी ने बताया कि हे सौम्य! रसादि धातु के प्रकोप से बढ़ा हुआ रोग नामक यह महान अनर्थ है, जिसने इस समर्थ को भी पराधीन कर दिया है।

ततोऽब्रवीत्सारथिरस्य सौम्य धातुप्रकोपप्रभवः प्रवृद्धः।
रोगाभिधानः येमहाननर्थः शक्तोऽपि पेनैष कृतोऽस्वतन्त्रः ॥ (बुद्धचरित 3/421)

तदनन्तर राजकुमार के द्वारा पूछे जाने पर कि यह रोग इसी को हुआ है या सबको होता है, सारथी ने कहा कि यह रोग सबको होता है। इस प्रकार के सारथी के वचन को सुनकर उद्विग्नमन राजकुमार ने फिर रथ लौटाने को कहा और रथ लौटकर महल में प्रवेश किया। राजकुमार के लौटने पर राजा का मन बहुत दुःखित हुआ कि कहीं यह पुत्र मुझे छोड़ न दे।

राजा ने पुनः सारथी एवं रथ का परिवर्तन कर राजमार्ग को सजवा कर सुदृढ व्यवस्था कराकर भली प्रकार से मार्ग का परीक्षण कर बाहर भेजा। फिर उन्हीं शुद्धाधिवास देवों ने एक मृतक का निर्माण किया। उस मृतक को मार्ग में जाते हुए केवल राजकुमार एवं सारथी ने देखा, अन्य कोई नहीं। तब राजकुमार ने सारथि से पूछा कि चार पुरुषों से ढोया जा रहा यह कौन है? राजकुमार के पूछने पर देवों के द्वारा अभिभूत चित्त वाले सारथी ने न कहने योग्य यह बात भी राजकुमार से कह दी कि बुद्धि, इन्द्रिय, प्राण और गुणों से वियुक्त यह चेतन रहित तृण या लकड़ी के समान कोई सदा के लिए सो गया हैं, अभी तक प्रेमी स्वजनों ने इसे पाला-पोसा, अब छोड़ रहे हैं। राजकुमार ने रथवाहक का यह वचन सुनकर फिर पूछा कि यह सबको होता है या इसी का 'धर्म' है, तब सारथी ने बताया कि सब प्राणियों का यही अन्तिम कर्म है। उत्तम, मध्यम, नीच कोई भी हो, विनाश सबका निश्चित है।

ततः प्रणेतावदति स्म तस्मै सर्वप्रजानामिदमन्तकर्म।
हीनस्य मध्यस्य महात्मनो वा सर्वस्य लोके नियतो विनाशः॥ (बुद्धचरित 3/59)

इस प्रकार सारथी के कहने पर राजकुमार ने गम्भीर स्वर से बोला, "प्राणियों की यह मृत्यु निश्चित है, किन्तु भय को छोड़कर लोग भूल कर रहे हैं। मै समझता हूँ कि मनुष्यों का मन कठिन है, जो इस प्रकार मृत्युपथ पर चलते हुए भी सुखी हैं। अतः हे सुत! यह विहार करने का समय उपयुक्त नहीं, रथ लौटाओ। विनाश को जानता हुआ भी बुद्धिमान विपत्ति काल में विभोर कैसे रह सकता है? इस प्रकार राजकुमार के कहने पर भी सूत ने रथ नहीं लौटाया और राजा की आज्ञा से विशेष सुन्दरता से युक्त नन्दनवन के सामन राजकुमार को पभषण्ड नामक बन को ले गया।

चतुर्थ सर्गसंपादित करें

नगर की स्त्रियाँ नगर उद्यान से बाहर निकलकर उस राजपुत्र के पास आयीं और कमल सदृश करों से स्वागत कीं। यद्यपि वे स्त्रियां उस राजकुमार को रागाभिमुख करने के उद्देश्य से वहाँ आयीं थीं, किन्तु उसके प्रभाव से निरूद्ध होकर कुछ बोल न सकीं, मात्र देखती ही रहीं। तब ऐसा देखकर पुरोहित पुत्र उदायी ने कहा कि आप लोग सब कला को जानने वाली हो, भावग्रहण में पण्डिता हो, चातुर्य से सम्पन्न हो, अपने गुणों से प्रधानता को प्राप्त हुयी हो, स्त्रियों का तेज महान होता है। इस प्रकार कहते हुए उदायी ने अनेक दृष्टान्त दिया। कहा कि स्त्रियों ने स्त्रियों के विषय में अनभिज्ञ ऋष्यश्रृङ्ग का भी अपहरण किया। विश्वामित्र ने जो महान तपस्वी थे, घृताची अप्सरा से अपहृत होकर दस वर्ष को एक दिन समझा। इस प्रकार जब स्त्रियों ने ऐसे लोगों को विकार उत्पन्न करवाया तो यह सुन्दर एवं युवा राजपुत्र क्या चीज है। तुम लोग निश्चित रूप से ऐसा प्रयत्न करो जिससे राजा के वंश की शोभा यहाँ से विरक्त होकर न जावे। उदायी की ऐसी बात सुनकर स्त्रियों ने उस राजकुमार को लुभाने के लिए अनेक विशिष्ट प्रयत्न प्रारम्भ किया। किसी ने लोकलज्जा छोड़ वस्त्रावरण शरीर से हटा दिया, तो किसी ने उसका चुम्बन किया। इस प्रकार नाना प्रकार के हाव-भावों से प्रभावति करने का प्रयास किया। लेकिन वह राजकुमार इस प्रकार आकृष्ट किये जाने पर भी विचलित नहीं हुआ और धीरचित्त से सोचनें लगा- क्या ये स्त्रियाँ यौवन को क्षणिक नही समझतीं, जिसको वृद्धावस्था नष्ट कर देगी। क्या ये किसी को रोगग्रस्त नहीं देखतीं, जिससे भय त्यागकर प्रसन्न हैं। सब कुछ हर लेने वाली मृत्यु से ये अनभिज्ञ हैं तभी तो स्वस्थ एवं उद्वेगरहित होकर खेलती और हँसती हैं। कौन वृद्ध रोगी एवं मृतक को देखकर ऐसे प्रसन्न रहेगा। जो ऐसे प्रसन्न रहेगा वह निश्चित ही अचेतन सदृश है। इस प्रकार ध्यानमग्न होकर वह सोच रहा था कि उदायी ने, जो नीतिशास्त्र का ज्ञाता था, उसको ध्यानमग्न एवं विषयों से निस्पृह देख मित्रता पूर्वक बोला- मैं तुम्हारा मित्र हूँ, मित्रता के नाते कुछ कहना चाहता हूँ। अहित में निषेध करना, हित में नियुक्त्त करना, विपत्ति में भी न छोड़ना ये ही मित्र के तीन लक्षण हैं।

अहितात् प्रतिषेधश्च हिते चानुप्रवर्तनम्।
व्यसने चापरित्यागस्त्रिविधं मित्रं लक्षणम्॥ (बुद्धचरित 4/64)

अतः मित्र होने के नाते मैं कहता हूँ कि स्त्रियों के प्रति इस प्रकार की उदासीनता तुम जैसे सुन्दर पुरुष के अनुरूप नहीं है। दुर्लभ विषय को पाकर तुम्हे उसकी अवहेलना नहीं करनी चाहिए। इन्द्र ने भी गौतम पत्नी अहल्या के साथ काम का सेवन किया। इसी प्रकार वृहस्पति-ममता, पराशर-काली जैसे अनेक प्रमाण प्रस्तुत कर उदायी समझा रहा था कि उदायी की बात सुनकर राजकुमार ने उत्तर दिया- मैं विषयों की उपेक्षा नहीं करता, संसार को तदात्मक जानता हूँ, किन्तु जगत् को अनित्य मानकर मेरा मन इसमें नहीं रम रहा है।

नावजानामि विषयान् जाने लोकं तदात्मकम्।
अनित्यं तु जगन्मत्वा नात्र मेरमते मनः ॥

यदि जरा, व्याधि एवं मृत्यु नहीं होते तो इस मनोहर विषयों में मेरा भी मन रमता। मै तो जन्म, मृत्यु और व्याधि से होने वाले भय को देखकर अत्यन्त भयातुर एवं विकल हूँ। अग्नि से जलते हुए के समान जगत को देखते हुए मुझे न शान्ति है न धैर्य ही। मृत्यु, व्याधि एवं जरा स्वरूप मनुष्य यदि मृत्यु व्याधि और रूप आदि विषयों में रमता है तो वह मृग पक्षियों के समान है।

इस प्रकार जब कुमार ने काम-मूल को नष्ट करने वाली निश्चयात्मक बातें कहीं, तब स्त्रियाँ सूर्य को अस्तचल को जाते देख अपने गुणों तथा प्रेमलीलाओं के निष्फल हो जाने पर काम भाव को अपने में निरुद्ध कर विवश होकर नगर को लौट गयीं। और राजकुमार भी प्रासाद में प्रवेश किया। लेकिन राजा ने जब सुना कि कुमार का मन विषयों में नहीं रमा, तो उसे ऐसे दुख हुआ मानो उसके हृदय में बाण चुभ गया हो। रात्रि में उसे नींद भी नहीं आयी।

पञ्चम सर्गसंपादित करें

जब राजकुमार को धैर्य नहीं हुआ तो राजा की आज्ञा पाकर एक बार फिर वन प्रान्त में घूमने के उद्देश्य से बाहर निकला। वन-दर्शन के लोभ से और पृथ्वी के गुण विशेष से आकृष्ट होकर सुदूर वन के अन्त की भूमि की ओर गया तथा जलतरङ्ग की भाँति विकृत हल से जुतते हुए उसने पृथ्वी को देखा। हल जुतने से तृण, कुशायें छिन्न-भिन्न हो गयी थीं। छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़े मर कर बिछ गये थे। वैसे उस बसुधा को देखकर अत्यन्त शोक किया, मानो स्वजन का बध हुआ हो। वहाँ वह हरित तृण युक्त सुन्दर पवित्र भूमि पर बैठा और विश्व के जन्म-मृत्यु की गवेषणा करते हुए मन की एकाग्रता के मार्ग का सहारा लिया।

इसी समय दूसरे के द्वारा न देखा जाता हुआ एक पुरूष भिक्षु वेष में उसके पास आया। राजपुत्र ने उससे पूछा, कहो कौन हो? तब उसने उससे कहा, "नरश्रेष्ठ! जन्म-मृत्यु से डरा हुआ मैं सन्यासी हूँ तथा मोक्ष के लिए सन्यास लिया हूँ। नश्वर जगत में मोक्ष की इच्छा वाला मैं, प्रसिद्ध कल्याणमय अविनाशी पद खोज रहा हूँ। निज और पराये में समान बुद्धि होकर, विषयों के राग-द्वेष से रहित हो गया हूँ। जहाँ कहीं, जो कुछ मिल जाता है, वही लेकर खा लेता हूँ और आशारहित हो घूम रहा हूँ। ऐसा कहकर वह आकाश में उड़ गया। वह उसकी स्मृति जगाने वाला देव विशेष था। इस प्रकार आकाश में उड़ते उसे देख वह कुमार अत्यन्त प्रसन्न और आश्चर्यचकित हो घर को पुनः प्रस्थान किया।

घर जाकर उसने राजा के पास जाकर करबद्ध प्रणाम कर बोला- "हे नरदेव! मुझे शुभ आज्ञा देवें, मैं मोक्ष के लिए सन्यास लेना चाहता हूं क्योंकि एक दिन इस व्यक्ति विशेष से अवश्य वियोग होगा।" इस प्रकार की उसकी वाणी सुनकर राजा कम्पित हो गया और अश्रुपूर्ण सजल नेत्र वाला होकर बोला- हे तात! इस बुद्धि को लौटाओ, धर्मसेवन का तुम्हारा समय नहीं हैं। प्रथम अवस्था में मन चञ्चल होने के कारण बुद्धजन धर्माचरण में बहुत दोष बताते हैं। अतः तुम इस वैभवशाली लक्ष्मी का सेवन कर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करो। राजा की यह बात सुनकर कुमार ने उत्तर दिया- हे राजन! यदि चार बातों में रक्षक बनें तो मै वन का आश्रय न लूँ। मेरा जीवन मरण के लिए न हो, रोग मेरे इस आरोग्य को न हरे, बुढ़ापा यौवन को विक्षिप्त न करे और विपत्ति मेरी इस सम्पत्ति को न हरे।

न भवेन्मरणाय जीवितं न विहरत्स्वास्थ्यमिदं च मे न रोगः ।
न च यौवनमाक्षिपेज्जरा मे न च सम्पत्तिमिमा हरेद्विपतिः ॥ (बुद्धचरित 5/35)

ऐसी असम्भव बात सुनकर राजा ने कहा, पुत्र! अप्राप्य की कामना करने वाले का उपहास होता है। राजकुमार ने कहा- हे पिताजी! घर से मोक्ष की कामना वाले को भागने से रोकना उचित नहीं है।

पुत्र का ऐसा निश्चय सुनकर राजा ने रक्षा की विशेष व्यवस्था की, और विषय भोगों का उसके लिए विशिष्ट विधान किया। राजकुमार ने अपने महल में प्रवेश किया। रात्रि में युवतियाँ बाजे-गाजे के साथ उसके पास उपस्थित हुईं। प्रतीत होता था मानो किसी देव श्रेष्ठ के पास अप्सराओं का झुण्ड आया हो। उन युवतियों के द्वारा लुभाने एवं बाजे बजाने पर भी वह नरश्रेष्ठ न तो सुखी हुआ और न प्रसन्न ही। तब श्रेष्ठ देवों ने उसके अभिप्राय को जानकर वहां सब प्रमादाओं को एक साथ निद्रित तथा उनकी मात्र चेष्टाओं को विकृत कर दिया। यद्यपि उनके शरीर सुन्दर थे एवं वाणी मधुर थी, फिर भी अभद्र तरीके से सोने के कारण उनकी आकृतियाँ विकृत एवं चेष्टायें चञ्चल थीं, जिसे देखकर राजपुत्र ने निन्दा की। इस संसार में वनिताओं का ऐसा विकराल तथा अपवित्र स्वभाव है, तथापि वस्त्राभूषणों से वञ्चित पुरुष स्त्रियों के विषय में राग करता है।

इस प्रकार सो रही उन स्त्रियों की निन्दा करते हुए वे राजकुमार महल के ऊपरी भाग से निचले भाग प्रथम कक्ष में आये। शीघ्रगामी अश्वरक्षक को जगाकर कन्धक नामक या जाति विशेष अश्व को शीघ्र लाने के लिए कहा और कहा कि मोक्ष पाने के लिए यहाँ से जाने की मेरी इच्छा है। अश्वरक्षक छन्दक ने अन्यमनस्क मन से ही राजकुमार की आज्ञा को स्वीकार करते हुए अश्व को लाया। तब राजकुमार उस अश्व की पीठ पर चढ़कर सिंहनाद करते हुए कहा, "जन्म एवं मृत्यु का अन्त देखे बिना इस कपिलवस्तु नगर में प्रवेश नहीं करूँगा। इस प्रकार उसकी बात सुनकर देवताओं ने प्रसन्नतापूर्वक प्रफुल्लित चित्त से उसका मनोरथ सिद्ध करने का संकल्प किया। कुछ अन्य देवताओं ने अग्निरूप धारण करके उसे वर्फीले मार्ग में प्रकाश किया और वह घोड़ा सूर्य की किरणों से आकाश के तारे मलिन नहीं हो पाये (अर्थात रात में ही) इतने ही समय में अनेकों योजन दूर निकल गया।

षष्ठ सर्गसंपादित करें

कुछ मुहूर्त में भगवान भास्कर के उदित हो जाने पर उस नरश्रेष्ठ ने भार्गव का आश्रम देखा। अश्वपीठ से उतरकर उसको सहलाया और कहा 'तुमने मुझको पार कर दिया। इसके बाद स्निग्ध दृष्टि से छन्दक से कहा, हे सौम्य! तुमने अपनी अतुलनीय भक्ति मुझमें दिखाई, तुम्हारे इस फलकामना रहित कर्म से मैं सन्तुष्ट हूँ। अब तुम अश्व लेकर लौट जाओ। इतना कहकर उसने अपना सब आभूषण उतार कर उसको दे दिया तथा दीपक का काम करने वाली एक तेजस्वी मणि मुकुट से लेकर कहा कि हे छन्दक इस मणि से राजा को बारम्बार प्रणाम करते हुए कहना कि यथार्थ में स्वर्ग की तृष्णा से नहीं और न वैराग्य तथा क्रोध से अपितु जरामरण नाश के लिए मैं तपोवन में आया हूँ, अतः इस प्रकार निकलने वाले मेरे लिए शोक नहीं करना चाहिए। ऐसी बात सुनकर छन्दक ने अश्रुग्रसित वाणी से उत्तर दिया, हे स्वामिन्! बन्धुओं को कष्ट देने वाले आपके इस भाव से मेरा मन व्यथित हो रहा है। अतः हे महाबाहो! पुत्र में उत्कठित प्रेम एवं वृद्ध राजा को आप इस प्रकार न छोड़ें जिस प्रकार नास्तिक सद्धर्म को छोड़ता है। पालन-पोषण वाली उस अपनी दूसरी माता को भी उसी प्रकार न छोड़ें जैसे कृतघ्न सत्कार को भुला देता है। हे श्रेष्ठ! पतिव्रता यशोधरा और पुत्र राहुल भी आपके द्वारा नहीं छोड़ा जाना चाहिए। और यदि आपने सबको त्यागने का निश्चय भी किया है तो मुझे न छोड़ें। मैं सुमन्त्र की तरह राम (आप)को छोड़कर घर नहीं जाना चाहता।

तब कुमार ने शोकसंतप्त छन्दक की बात सुनकर इस प्रकार कहा, हे छन्दक! मेरे वियोग सम्बन्धी इस संताप को छोड़ो। पृथक-पृथक जाति (योनि) वाले देहधारियों में वियोग होना एवं नानाभाव होना नियत है। मेरे विचार में जैसे बादल मिलकर फिर विलग हो जाते हैं, उसी प्रकार प्राणियों का भी वियोग होता है।

इसके बाद उसने कन्धक को भी "हे कन्थक! अश्रुपात न करो" ऐसा कहते हुए सान्त्वना दिया और कृपाण निकालकर अपने मुकुट को काटा और आकाश में फेंक दिया। देवताओं ने उस छिन्न-भिन्न मुकुट को आदर से लेकर स्वर्गीय सामग्री से उसकी पूजा की। तदन्तर पवित्र अन्तःकरण वाला एक देवता उसका अभिप्राय जानकर शिकारी के वेष में काषाय वस्त्र धारण कर उसके पास गया। राजकुमार ने कहा कि हे सौम्य, यदि तुम्हें इस वस्त्र में ममता न हो तो यह मेरा वस्त्र लेकर तुम हमें यह वस्त्र दे दो। तब उस व्याध (शिकारी) ने परम हर्ष से अपना वस्त्र दे दिया। कुमार ने काषाय वस्त्र धारण किया और व्याध भी शुक्ल वस्त्र लेकर दिव्य शरीर धारण कर स्वर्ग चला गया। इसके बाद कुमार और छन्दक दोनों आश्चर्यचकित हुए। काषाय वस्त्रधारी कुमार ने छन्दक को लौटाकर आश्रम की ओर जाने वाले एक मार्ग से चल दिया। छन्दक स्वामी के इस वेष को देखकर बहुत विलाप किया और घोड़े को लेकर केवल शरीर मात्र से लौटा लेकिन चित्त से नहीं।

सप्तम सर्गसंपादित करें

छन्दक को विसर्जित कर, वन में स्वच्छन्दता की इच्छा से, सर्वार्थसिद्ध सिंह के समान शरीर की शोभा वाला, आश्रम को आक्रान्त करके वह वहाँ पहुँचा। आश्रम में पहुंचते ही सभी आश्रमवासियों का चित्त उसकी ओर आकृष्ट हुआ। सब लोगों ने निरनिमेष दृष्टि से उसको देखा। निश्चल बुद्धि तपस्वीयों ने भी उसको उसी प्रकार देखा, अपने मठो में वे उस समय नहीं गये। मोक्षाभिलाषी धीर उस कुमार ने स्वर्गाभिलाषी पुण्यकर्मी जनों से परिपूर्ण उस आश्रम को तथा वहाँ की विविध तपस्याओं को देखते हुए विचरण किया।

उस शान्त कुमार ने उस तपोवन में तपोधनों की तपस्या के प्रकार को देखकर तत्व ज्ञान की इच्छा से कहा- मेरा यह प्रथम आश्रम दर्शन है। मैं इस धर्म विधि को नहीं जानता हूँ अतः आपकी जिसके प्रति यह प्रवृत्ति है, और जो आपका निश्चय है, मुझे बतावें। तब तपोविहारी द्विजाति ने उससे तपस्याओं की विशेषताएँ एवं तपस्या का फल बताया। उन्होंने कहा कि- जल में जायमान फल, कन्द, मूलादि ही मुनियों की आजीविका है। कुछ लोग पक्षी की तरह चुन कर धान्य का सेवन करते हैं। कुछ मृगों की तरह तृण चरते हैं, कुछ लोग अग्नि में दो बार हवन करते हैं। इस प्रकार बहुत काल में सञ्चित श्रेष्ठ तपों से स्वर्ग में जाते हैं। इस प्रकार इन वचनों से नरश्रेष्ठ को सन्तोष नहीं हुआ, वह मन्दस्वर से स्वगत ही कहा कि विविध प्रकार की तपस्याएँ दुःख रूप हैं, और तपस्या का प्रमुख फल स्वर्ग है, तथा समस्त लोक बदलते रहने वाले हैं, अतः आश्रमवासियों का यह परिश्रम सचमुच में लघुफल के लिए है। तपस्याओं की परीक्षा करता हुआ उसने कुछ रात्रि वहाँ निवास किया और संक्षेप में सभी तपों को समझकर वहाँ से चल दिया। आश्रमवासी उसके पीछे-पीछे जाने लगे। उसमें से एक वृद्ध ने अत्यन्त आदर से कहा कि, हे सौम्य! आपके आने से यह आश्रम भर गया, आप यहाँ से जाइए मत। ये तपोधन आपको अपनी तपस्या का सहायक बनाना चाहते हैं। इस प्रकार तपस्वीयों के कहने पर उसने कहा कि आप सबका धर्म स्वर्ग के लिए है, किन्तु मेरी अभिलाषा मोक्ष की है। इसी कारण से इस वन में रहने की मेरी इच्छा नहीं है क्योंकि प्रवृति से निवृति धर्म भिन्न है।

तदनन्तर एक द्विज ने उसकी ऐसी विचारधारा को जानकर कहा कि हे प्रज्ञ! आपका निश्चय सचमुच उदार है जो कि आपने युवावस्था में ही जन्मगत दोषों को देखा। अतः आपकी बुद्धि निश्चित (दृढ़) है, तो आप शीघ्र विन्ध्य कोष्ठ को जाँय। वहाँ पर अराड मुनि निवास करते हैं। आप उनसे तत्वमार्ग सुनेंगे एवं रूचि होने पर स्वीकार भी करेंगे। लेकिन मै समझता हूँ कि आपकी बुद्धि उनकी बुद्धि का भी तिरस्कार कर चली जाएगी। तब नृपात्मज "अति उत्तम" ऐसा कहकर उन ऋषियों का अभिनन्दन कर वहाँ से निकल गया, वे ऋषिगण भी तपोवन में प्रवेश किए।

अष्टम सर्गसंपादित करें

नरश्रेष्ठ के वन में चले जाने पर छन्दक एवं कन्धक अश्वों ने शोक रोकने का प्रयत्न किया लेकिन नहीं रोक पाये। जिस मार्ग में वो एक रात्रि में गये थे उसी मार्ग से विरहकातर यो आठ दिन में लौटे। नगर में आते ही लोगों ने कुमार को न देखकर आश्चर्य किया। कुछ लोगों ने क्रोधपूर्वक छन्दक को खरी-खोटी सुनाई। छन्दक ने लोगों से कहा कि इसमें हमारा कोई दोष नही है, हम लोगों ने उनको नहीं छोड़ा, वे ही हम लोगों को छोड़ दिये। कुमार आये है, ऐसा जानकर नगर की स्त्रियाँ अट्टारियों पर चढ़ गयीं, किन्तु उनको न देख अत्यन्त दुःखित हुईं। नगर में दुःखपूर्ण वातावरण हो गया। पालन-पोषण करने वाली माता सदृश गौतमी कन्धक को खाली देख हतप्रभ हो पृथ्वी पर गीर पड़ीं। अन्य स्त्रियाँ भी वैसे ही विलाप करने लगीं। यशोधरा जिसके अंगप्रत्यङ्ग काँप रहे थे, क्रोध से आँखे लाल हो गयीं थीं, बोली- हे छन्दक! एक साथ गये तुम तीन में से दो को देखकर मेरा मन काँप रहा है, हे निर्दय! ऐसा अशोभन बैरी कर्म करके, और रो रहे हो, आँसू रोको, प्रसन्नचित हो जाओ, ठीक ही कहा जाता है- मनुष्य का पण्डित शत्रु अच्छा होता है किन्तु मूर्ख मित्र अच्छा नहीं होता। अपने के मित्र कहने वाले तुझ मूर्ख ने इस कुल का नाश कर दिया।

निश्चय ही यह कन्धक तुरङ्ग भी अनर्थकारी है। जिस प्रकार रात में सोने पर चोर, चोरी कर लेता है, वैसे ही इसने भी मेरा सर्वस्व हर लिया। इस प्रकार की विलाप एवं दुःख भरी वाणी सुनकर छन्दक ने कहा, "हे देवि! इसमें हम लोगों को दोष नही देना चाहिए, हम दोनों निर्दोष हैं। इसमें दैवी प्रेरणा ही प्रतीत होती है। जिस समय राजकुमार बाहर निकलने लगे तब द्वार स्वयं ही खुल गए, रात्रि का अन्धकार नष्ट हो गया सभी दरवान सो गये, कोई भी जागा नहीं। मैने चाह कर भी विपरीत आचरण नहीं कर पाया। अतः हे नरदेवि! इसके जाने के प्रति हम दोनों का दोष नहीं हैं, न मेरी इच्छा से यह कार्य हुआ, न इस कन्धक की। वह तो देवताओं की प्रेरणा से हो गया।

इस प्रकार इधर नगर में माता, पत्नी, सभी नगरवासी नर-नारी विलाप कर रहे थे, तब तक राजा पुत्र के मंगलपूर्वक प्राप्ति के लिए हवन पूजादि कर्म करके मन्दिर से बाहर आये। राजा भी कन्धक और छन्दक को देख मूर्छित हो पृथ्वी पर गिर पड़े। तब मन्त्री और बृद्ध पुरोहित ने राजा को समझाया और राजा से आदेश ले उस नरश्रेष्ठ से मिलने के लिए तथा समझाकर वापस लाने के लिए उस वन की ओर चल दिया।

नवम सर्गसंपादित करें

मन्त्री और पुरोहित दोनों उस वन में भार्गव के आश्रम पहुंचकर भार्गव मुनि से प्रश्न किये कि हमलोग उसको खोज रहे हैं जो जरामृत्यु के भय से आपके पास आया था। वह राजपुत्र कहाँ गया? तब भार्गव ने बताया कि इस धर्म को पुनर्जन्मप्रद जानकर वह दीर्घबाहु कुमार अराड की ओर तत्वज्ञान की जिज्ञासा से चला गया। ऐसा जानकर वे दोनों मन्त्री और पुरोहित उसी आश्रम की ओर कुछ दूर चलने पर उस कुमार को देख वे दोनों उसके पास गये और आदरपूर्वक उसके पास बैठे। बैठने के बाद पुरोहित ने उस राजकुमार से कहा, हे कुमार! राजा ने तुम्हारे शोक के हृदय में चुभने पर क्षण भर के लिए पृथ्वी पर बेहोश होते हुए आँसू पोंछकर जो कहा वह सुनो- "धर्म के प्रति तुम्हारा विश्वास है, यह जानता हूँ। यह तुम्हारा अवश्यम्भावी होनहार था, यह भी जानता हूँ। किन्तु असमय में तुमने वन का आश्रय लिया है, अतः अग्नि तुल्य शोकाग्नि से जल रहा हूँ। हे धर्मप्रिय! मेरा प्रिय करने के लिए इस बुद्धि को त्यागो। चौथेपन में वन को जाना। इस सम्बन्ध में चौथेपन में बन जाने वाले अनेक राजाओं का नाम गिनाया गया है तथा गृहस्थ होने पर भी मोक्ष प्राप्त करने वाले जनकादि का नाम गिनाया गया है।" इस प्रकार पुरोहित ने माता गौतमी, यशोधरा, पुत्र रोहित सबके शोक जन्य दुःख का वर्णन राजा के शब्दों में किया किन्तु राजकुमार ने उनके वचनों का उत्तर दिया और वन से घर लौटने को तैयार नहीं हुआ। उन्होंने कहा, "धर्म के लिए समय नहीं होता" और कहा कि विषय भोग के लिए अकाल होता है, उसी प्रकार धनोपार्जन में काल का विधान है। काल सदैव जगत को खींचता है। मोक्ष के सम्बन्ध में कोई निश्चित काल नहीं है।

पुरोहित के बाद मन्त्री ने भी बहुत दर्शनयुक्त वाक्यों के द्वारा और मोक्ष तथा स्वर्ग का वर्णन, पुनर्जन्म का वर्णन, करते हुए उसको समझाने का प्रयत्न किया। लेकिन वह नरश्रेष्ठ लौटने को तैयार नहीं हुआ और कहा कि मैं प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश कर लूँगा किन्तु असफल होकर घर में प्रवेश नहीं करूँगा। और ऐसी प्रतिज्ञाकर उठकर वहाँ से एक ओर चल दिया। तब मन्त्री और पुरोहित दोनों उसके दृढ़ विचार सुनकर दुःखी हुए एवं म्लानमुख रोते हुए कुछ दूर उसके पीछे-पीछे गये। फिर हताश होकर शनैःशनैः नगर की ही ओर चलने लगे।

दशम सर्गसंपादित करें

वह राजकुमार मन्त्री और पुरोहित को छोड़कर चलायमान तरंगों वाली गंगा को पार कर लक्ष्मी-सम्पन्न भवनों से युक्त राजगृह को गया। उसे देखकर, जो दूसरी ओर जा रहा था रूक गया; जो रूका हुआ था, पीछे-पीछे गया; जो तेजी से जा रहा था, वह धीरे-धीरे चला; एवं जो बैठा था, वह उठकर खड़ा हो गया। किसी ने हाथों से उसकी पूजा की, किसी ने सत्कार करके सिर से प्रणाम किया, किसी ने प्रिय वचन से अभिनन्दन किया, उसकी पूजा किये बिना कोई नहीं रहा। तब मगध राज के राजा श्रेष्ठ (बिम्बसार) ने महल से देखा कि बाहर विशाल जनसमुदाय है, उसका कारण पूछा। तब एक राजपुरुष ने उसको बताया कि यही विप्रों के द्वारा कथित मोक्ष धर्माभिलाषी शाक्यराज का पुत्र परिव्राजक हो गया है। लोग उसे देख रहे है। तब राजा ने कहा, पता लगाओ कहाँ जा रहा है। वह पुरूष "अच्छा" कह कर उसके पीछे-पीछे गया। वह भिक्षुश्रेष्ठ भिक्षा माँग रहा था। भिक्षा में जो कुछ मिल गया उसे लेकर पर्वत के पास एकान्त में खाया और खाकर पाण्डव पर्वत पर चढ़ गया। उस राजपुरूष ने वहाँ से आकर राजा को बताया। राजा यह सुनकर अनुचरों के साथ वहाँ प्रस्थान किया। न्यायवेत्ताओं में वरिष्ठ उस कुमार के पास जाकर राजा ने उससे आरोग्य पूछा। उसने भी राजा को आरोग्य बताया। इसके बाद राजा ने उससे कहा कि आपके कुल से परम्परागत एवं परीक्षित मेरी बड़ी प्रीति है। आपका कुल महान है। सूर्य से प्रारम्भ हुआ है। आपकी अवस्था नयी है। यह शरीर भी देदीप्यमान है। किस कारण आपकी गति भिक्षा में रमी, राज्य में न रमी, आपका शरीर रक्त चन्दन लेप के समान है, काषाय के योग्य नहीं, यह हाथ प्रजापालन के योग्य है, भिक्षा के योगय नहीं। अतः हे सौम्य! यदि पिता से स्नेहवश पैतृक राज्य पराक्रम से नहीं लेना चाहते तो मेरा ही आधा राज्य भोगिये। मैं यह बात स्नेह से कह रहा हूँ, ऐश्वर्य के राग से नहीं। जबतक वृद्धावस्था नहीं आ जाती, तब तक विषयोपभोग करिये, फिर समय से धर्म कीजिए। बूढ़ा आदमी धर्म प्राप्त कर सकता है। कामोपभोग में बुढ़ापे की गति नही होती। अतः युवा के लिए काम, मध्य के लिए धन, एवं वृद्ध के लिए धर्म कहते है।

यदि आपको धर्म ही करना है, तो यज्ञ कीजिए। यज्ञ करना आपका कुलधर्म है। राजार्षि लोग यज्ञ के द्वारा उसी गति को प्राप्त हुए, जिस गति को कठिन तपस्या के द्वारा महर्षिगण।

एकादश सर्गसंपादित करें

इस प्रकार जब मगधराज बिम्बसार ने ऐसी बात कही तब क्षुब्ध शाक्यश्रेष्ठ ने इस प्रकार कहा- "विशाल चन्द्रवंश में उत्पन्न आपके लिए ऐसा कहना आश्चर्यजनक नहीं, क्योंकि हे मित्रकामी! विशुद्ध व्यवहार वाले आपकी मित्र के पक्ष में ऐसी भावना है। संसार में जो मनुष्य धन क्षीण होने पर मित्रों के समान सहायक होते हैं, उन्हीं को मैं अपनी बुद्धि के अनुसार मित्र समझता हूँ। सम्पन्न व्यक्ति की बढ़ती में कौन मित्र नहीं होता? हे राजन! मित्रता एवं सज्जनता के कारण मेरे प्रति आपका जो यह निश्चय हुआ है, इस विषय में मित्रता से ही मैं अनुनय करूँगा। मैं जरा एवं मृत्यु का भय जानकर मोक्ष की इच्छा से इस धर्म की शरण में आया हूँ। पहले अशुभ के हेतु भूत कामों को, फिर बाद में रोते हुए बन्धुओं को छोड़कर आया हूँ। मैं विषधरों से उतना नहीं डरता, और न आकाश से गिरे हुए वज्रों से, और न वायु मिश्रति अग्नि से, जितना की विषयों से डरता हूँ। काम अनित्य हैं, ज्ञानरूप धन के चोर है, माया सदृश हैं, एवं संसार में उसकी आशा करने पर भी मनुष्यों के मन को मोह में डाल देते हैं। फिर यदि अन्दर स्थिर हो तो क्या कहना।

कामा ह्यनित्याः कुशलार्थ चौरा रिक्ताश्च माया सदृशाश्च लोके।
आशास्यमाना अपि मोहयन्ति चित्तं नृणां किं पुनरात्मसंस्थाः ॥ (बुद्धचरितम् ११/९)

इस संसार में प्राणी को काम से तृप्ति नहीं होती। इस सम्बन्ध में मान्धाता, नहुष इत्यादि राजाओं का उदाहरण दिया और कहा कि इनको भी तृप्ति नहीं हुयी। काम मनुष्य को नाश को प्राप्त कराता है। इस सम्बन्ध में कहा कि कौरव, वृष्णि, अन्धक, सुन्द-उपसुन्द जिस काम के चलते नष्ट हो गये, उस काम में किस आत्मवान को सुख होगा। गीतों से हिरण बध के लिए फुसलाये जाते हैं, रूप के निमित्त पतंगे अग्नि में गिरते है। मांस के लिए मछली लोहे का कांटा लील जाती है। अतः विषयों का फल विपत्ति है। अतः कल्याण एवं मंगलमय कार्य में प्रयुक्त हुआ मै बहकाया नहीं जा सकता हूँ। मित्रत्व का स्मरण करके आप मुझसे बारम्बार यह कहें कि आप अपनी प्रतिज्ञा पालन करें। जिस पद में न जरा, न भय, न रोग, न जन्म, न मृत्यु और न व्याधि है- उसको ही मैं परम पुरुषार्थ मानता हूँ। जिसमें बार-बार कर्म नहीं करना पड़ता। आपने जो कहा कि "वृद्धावस्था की प्रतीक्षा करो", नई अवस्था में विकार होता है- यह भी निश्चित नहीं, क्योंकि बहुधा देखा गया है वृद्धावस्था में अधीरता एवं युवावस्था में धैर्य रहता है। जब विनाश का समय अनिश्चित है तब ऐसा जानकर कल्याण चाहने वाला व्यक्ति वृद्धावस्था की प्रतीक्षा क्यों करे? आपने जो कहा "कुलोचित यज्ञ करो"। उन यज्ञों के लिए नमस्कार है। मैं ऐसा सुख नहीं चाहता जो दुसरों को दुःख देकर किए जाते है। मनुष्य को दूसरों को दुःख देकर सुख प्राप्ति की कामना नहीं करनी चाहिए।

हे राजन! यहाँ से मैं शीघ्र ही मोक्ष वादी अराड मुनि के दर्शन की इच्छा से जा रहा हूँ। आपका कल्याण हो। मेरे इस सत्य निष्ठुर वचन को क्षमा करें। तब राजा बड़े अनुराग से हाथ जोड़कर कहा, आप अपना अभिष्ट निर्विघ्न प्राप्त करें और मेरे ऊपर भी अनुकम्पा करें। तब "वैसा ही हो" इस प्रकार कह कर वहां से वह वैश्वन्तर आश्रम को गया और राजा भी गिरिव्रज को प्रस्थान किया।

द्वादश सर्गसंपादित करें

वह इक्ष्वाकु वंश का चन्द्रमा अराड मुनि के आश्रम में गया। मुनि ने उसको आदरपूर्वक बैठाया तथा कहा कि शिष्य को अच्छी तरह जान लेने के बाद शास्त्र का वर्णन किया जाता है लेकिन मैं तुम्हारे उद्योग से प्रसन्न हूँ और तुम्हारी परीक्षा नहीं करूँगा। तब कुमार के प्रेमपूर्वक आग्रह करने पर मुनि ने प्रकृति, विकृति, अहंकार, बुद्धि, पञ्च महाभूत, क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ, मोह, माया, सन्देह, अभिसम्पलव, ज्ञान, अज्ञान, विषाद इत्यादि का शास्त्र रीति से उपदेश किया। मुनि ने बताया कि "द्रष्टा, श्रोता, ज्ञाता, कार्य एवं कारण मै ही हूँ" - ऐसा मानता हुआ व्यक्ति संसार में भटकता है। ये ही पुनर्जन्म के हेतु हैं। हेतु के अभाव में फल का अभाव होता है। बुद्धिमान को चार बातें अच्छी तरह जाननी चाहिए- प्रतिबुद्ध, अप्रयुद्ध, व्यक्त एवं अव्यक्त। क्षेत्रज्ञ इनको अच्छी तरह जानता है। अतः वह अक्षर पद पाता है। इसीलिए ब्रह्मवादी बह्ममचर्य का आचरण करते हैं। इस प्रकार अराड ने ब्रह्म और मोक्ष की भी व्याख्या की और कहा कि मैंने आपको मोक्ष और उपाय भी बताया, यदि आपकी रूचि हो तो ग्रहण करें। किन्तु यह व्यक्ति अराड का धर्म जानकर सन्तुष्ट नहीं हुआ। "यह धर्म अपूर्ण है" - ऐसा जानकर वहाँ से चला गया। वह विशेष जानने की इच्छा से उद्रक के आश्रम में गया किन्तु आत्मा को स्वीकार करने के कारण उसका भी दार्शनिक विचार उसने ग्रहण नहीं किया। इसके बाद कल्याण की इच्छा से निश्चय करके वह राज ऋषि गय के पास नगरी नामक आश्रम गया तथा आनन्द पाने वाला मुनि ने नैरञ्जना नदी के तट पर निवास किया। वहाँ उसने पाँच भुक्षुओं को देखा। तदनन्तर वह निराहार रह कर छः वर्ष तक दुष्कर तप करते हुए अपने को कृश किया। संसार से डरने वाला वह मुनि "कठिन तपस्या से सत्य ही शरीर को व्यर्थ कष्ट होता है" - ऐसा सोचते हुए विचार किया, यह धर्म न वैराग्य दे सकता है, न बोध, न मुक्ति। इस प्रकार चिन्तन कर वह कुछ खाने की इच्छा किया और नैरञ्जना नदी के तट से धीरे-धीरे ऊपर चढ़ा।

उसी समय देवताओं से प्रेरित गोपराज की कन्या नन्दबाला वहाँ आयी और प्रसन्नता पूर्वक उनको पायस दिलवाया। पाँच भिक्षुओं ने उसे 'ब्रत भङ्ग' समझकर छोड़ दिया। तब बोध पाने के लिए निश्चय करके वह एक अश्वत्थ मूल में निश्चय के साथ गया। उसी समय गजराज के समान पराक्रमी 'काल' नामक महासर्प ने "बोधि प्राप्ति के लिए आया है" ऐसा जानकर उसकी स्तुति की। तब भुजङ्ग श्रेष्ठ के द्वारा स्तुति किये जाने पर "जब तक कृतार्थ नहीं हो जाऊँगा तब तक पृथ्वी पर इस आसन को नहीं तोड़ूँगा" ऐसा निश्चय करके उत्तम अचल एवं सोये हुए सर्प के फण के समान पिण्डाकार पर्यङ्क आसन उस महावृक्ष के मूल में बाँधा।

त्रयोदश सर्गसंपादित करें

राजर्षि वंश में उत्पन्न होने वाले उस महर्षि के मोक्ष के लिए वहाँ प्रतिज्ञा पूर्वक बैठ जाने पर संसार तो प्रसन्न हुआ किन्तु सद्धर्म का शत्रु मार भयभीत हुआ। कामदेव के विभ्रम, हर्ष एवं दर्प तीन पुत्र तथा अरति, प्रीति एवं तृषा तीन कन्यायें हैं। अपने पुत्रों और कन्याओं के द्वारा खिन्न मन का कारण पूर्छ जाने पर वह कहा कि यह मुनि निश्चय का कवच एवं सत्य रूप धनुष धारण कर बुद्धिरूप बाण तान कर हमारे विषयों को जीतना चाहता है। अतः मुझे यही दुःख है।

इस प्रकार अपने दुख का कारण बताकर वह कामदेव, पुष्प, धनुष एवं संसार को मोहित करने वाले पाँच वाणों का प्रहार किया किन्तु उस मुनि ने उसकी उपेक्षाकर दी। तब कामदेव अपने पुत्र एवं पुत्रियों को आगे कर प्रहार किया, इसकी परवाह मुनि के द्वारा न की गयी। आश्चर्यचकित मार अपनी सेना का स्मरण कर उसकी शान्ति को भंग करने का बहुत ही प्रयास किया जिससे संसार में सद्धर्मीयों के बीच दुःखमय वातावरण हो गया। किन्तु इस प्रकार कामदेव के द्वारा दुष्टता किये जाने पर आकाश से एक जीव विशेष ने आकाशवाणी के माध्यम से कहा, "हे कामदेव! व्यर्थ परश्रिम मत करो। हत्यारापन छोड़ो, शान्त हो जाओ। तुम इसे उसी प्रकार नहीं डिगा सकते हो जिस प्रकार सुमेरु को हवा।" तब उसका वचन सुनकर वह मार महामुनि की अचलता देख निष्फल प्रयास वाला होकर वहाँ से चला गया। उसकी सेना भी वहाँ से लौट गयी। इस प्रकार मार के सेना सहित चले जाने एवं मुनि की विजय होने पर आकाश से सुगन्धित जल युक्त पुष्प वृष्टि हुयी।

चतुर्दश सर्गसंपादित करें

इसके बाद उस ध्यान निपुण ने मार की सेना को धैर्य एवं शान्ति से जीतकर परमतत्व जानने की इच्छा से ध्यान लगाया तथा सब प्रकार की ध्यान विधियों में पूर्ण प्रभुता प्राप्त करके प्रथम प्रहर में अपने पूर्व जन्मों की परम्परा का स्मरण किया। अमुक स्थान में मैं अमुक था। वहाँ से गिरकर यहाँ आया- इस प्रकार हजारों जन्मों को मानो प्रत्यक्ष अनुभव करते हुए स्मरण किया। द्वितीय प्रहर आने पर उस मुनि ने दिव्य चक्षु पाया। तब उसने उस दिव्य चक्षु से अखिल विश्व को देखा। उसने देखा कि नभचरों द्वारा नभचारी एवं जलचरों द्वारा जलचारी तथा स्थलचरों द्वारा स्थलचारी परस्पर सताये जाते हैं।

इस प्रकार विचार कर वह महामुनि संसार के दुःख के कारणों एवं उसके विरोध का सम्यक ज्ञान प्राप्त किया। तदनन्तर उस मुनि ने पूर्व प्रतिज्ञा के अनुसार संसार में शान्ति के उपदेश की इच्छा की। तब उस मुनि के पास दो स्वर्गवासी देवता आये और महामुनि को संसार में उपदेश करने के लिए प्रेरित कर चले गये। तब मुनि ने जगत की मुक्ति के लिए अपना मन लगाया। दिशाओं के देवताओं ने आकर उस मुनि को भिक्षा पात्र दिये। मुनि ने प्रसन्नता पूर्वक उन सबको एक कर लिया। उस समय जाते हुए काफिले के दो सेठों ने उनकी पूजा कर प्रथम भिक्षा कराया। मुनि ने धर्म ग्रहण करने में समर्थ अराड एवं उद्रक को दिवङ्गत जानकर पाँच भिक्षुओं का स्मरण किया और भीमरथ की प्रिय मनोहर धन्य नगरी को जाने लगे। तब मुनि ने काशी जाने की इच्छा की और बोधि वृक्ष के ऊपर अपना शरीर घुमाकर सुदृढ एवं शुभ दृष्टि डाली।

पञ्चदश सर्गसंपादित करें

जब महात्मा बुद्ध काशी जाने लगे तब मार्ग में किसी अन्तःशुद्ध भिक्षु ने हाथ जोड़कर कहा, "हे सौम्य! आप देदीप्यामान तेज से तत्ववेत्ता की तरह शोभा पा रहे हैं, आप निश्चय ही इन्द्रियों पर स्वामित्व प्राप्त कर चुके हैं। आपका क्या नाम है? किस गुरू से यह उत्तम सिद्धि पाये है? तब भगवान ने बताया, "न मेरा कोई गुरू है, न सम्माननीय है, और न निन्दनीय है। मैने निवार्ण प्राप्त किया है। मुझे धर्म का स्वामी जानो। धर्मभेरी बजाने के लिए मैं काशी जा रहा हूँ। न सुख के लिए, न यश के लिए अपितु आर्तों की रक्षा के लिए। तत्पश्चात् वह भिक्षु मन ही मन प्रशंसा करता हुआ अपने गन्तव्य को चल दिया और महात्मा बुद्ध वहाँ से काशी जाकर महानाम, अश्वजित, वाष्प, कौण्डिन्य एवं भद्रजित नामक ये पाँच भिक्षु जहाँ थे, वहाँ गये। ये लोग उनको देखकर कहने लगे बुद्ध आ रहा है, तपभ्रष्ट है, हम लोग इसका सत्कार नहीं करेंगे। लेकिन भगवान के आने पर वे लोग शिष्य भाव को प्राप्त हो गये लेकिन नाम लेकर बोलना नही छोड़े। तब सुगत ने उन्हें शिष्टाचार एवं धर्म का उपदेश दिया, और पूछा कि क्या तुम लोगों को ज्ञान प्राप्त हुआ। तब मुनियों ने कहा, "हाँ हम सबको अवश्य ज्ञान प्राप्त हुआ।" उन लोगों ने उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की।

षोडश सर्गसंपादित करें

इसके बाद उस सुगत ने मुनियों को दीक्षित किया। तदनन्तर यशनाम कुलपुत्र, जिसके मन में सोई स्त्रियों को देखकर क्षोभ उत्पन्न हुआ था, महात्मा बुद्ध ने उसको उपदेश देकर उसके साथ 54 व्यक्तियों को दीक्षित किया और विचरण करने का आदेश दिया तथा "मैं गया को जाता हूँ" ऐसा कहकर स्वयं भी चल दिया। वहाँ से जाकर सुगत ने मुनिश्रेष्ठ काश्यप को देखा। सुगत के निवास योग्य भूमि की याचना करने पर काश्यप ने ईर्ष्यावश मार डालने की इच्छा से वह अग्निशाला दी जिसमें करला सर्प रहता था। उस महासर्प ने शान्त बैठे उसको देखकर विष की ज्वालायें उगली, फिर भी न जलने पर वह महासर्प आश्चर्यचकित हो प्रणाम किया। आश्रम के लोगों में कोलाहल हुआ- "गौतम मर गया", लेकिन प्रातःकाल होने पर सुगत ने काश्य को भिक्षा पात्र में वह सर्प लाकर दिखाया। काश्यप आश्चर्यचकित हो गया। महात्मा बुद्ध ने काश्यप की बुराइयों को उपदेश-जल से धोकर उसे पवित्र किया। काश्यप का मत परिवर्तित होते देखकर औरूबिल्व भी अपने 900 शिष्यों के साथ सौगत धर्म स्वीकार किया। गय और नदी काश्यप के दो छोटे भाई भी इस धर्म को स्वीकार किये। गय-शीर्ष नामक पहाड़ पर सुगत ने तीनों काश्य बन्धुओं सहित अपने शिष्यों को निर्वाण का उपदेश किया। इसके बाद सुगत अपने पूर्व वचन के अनुसार तीन काश्यपों के साथ मगध राज्य को कृतार्थ करने के लिए राजगृह पधारे। सुगत को आते देख मगधराज ने आगे बढ़ नगरवासियों के साथ स्वागत किया। काश्यप को शिष्टता प्राप्त देख नगरवासियों में आश्चर्य हुआ। सुगत के आदेशानुार काश्यप ने नगरवासियों के सामने "मैं शिष्यता प्राप्त कर लिया हूँ, यही धर्म श्रेष्ठ है" ऐसा कह आकाश में उड़ गया। वह कहीं बजली की तरह चमका, कहीं बादल की तरह बरषा, कभी एक ही साथ दोनों काम किया। इस प्रकार यह निश्चय होने के बाद कि यह गौतम ही सर्वश्रेष्ठ धर्मज्ञ है, महात्मा बुद्ध ने धर्म का उपदेश किया। इस प्रकार मगध राज तथा सभी नगर वासी उस उपदेशामृत का पानकर कृतार्थ हो परमपद को प्राप्त किये।

सप्तदश सर्गसंपादित करें

राजा विम्बसार ने वेणु वन में निवास के लिए बुद्ध ने निवेदन किया। महात्मा बुद्ध उस वन में शान्तचित्त हो रहने लगे। एक दिन अश्वजित नामक जितेन्द्रिय भिक्षु भिक्षा के लिए नगर में गया। रास्ते में जाते हुए उस भिक्षु को देखकर शारद्वती पुत्र कापिलेय सन्यासी ने बहुत से शिष्यों के साथ उससे कहा- हे सौम्य! तुम्हारे इस नवीन वेष को देखकर मेरा मन आश्चर्य में है। आपका गुरू कौनहै? उसकी शिक्षा क्या है? तब अश्वजित ने कहा मेरे गुरु महात्मा बुद्ध हैं। उनकी शिक्षा में भली प्रकार नहीं बता सकता क्योंकि मैं अभी नया हूँ लेकिन संक्षेप में सुनो। इस प्रकार कह उस अश्वजित ने सभी धर्मो को कारण से उत्पन्न होने वाला तथा निरोध और निरोध मार्ग की व्याख्या की। पहली बार ऐसा सुन वह ब्राह्मणश्रेष्ठ बड़ा प्रभावित हुआ। अश्वजित ने अपने धर्म का उपदेश किया। वह ब्राह्मण उसके साथ सुगत के पास आया। अश्वजित ने इनका परिचय बता प्रयोजन कहा। तदनन्तर सुगत ने भी धर्म का उपदेश किया। अश्वजित और मौद्गल्यायन ये दोनेा मुनि को प्रणाम कर क्रमशः नैतिक पद को प्राप्त किये। एक और काश्यपवंशीय धनी ब्राह्मण अपनी पत्नी और सम्पत्ति का त्यागकर शरणागत ग्रहण की।

अष्टादश सर्गसंपादित करें

कोशल देश का सुदत्त नाम का विख्यात राजा मुनि के निवास को जनकर उनके पास आया। और दण्ड की भांति गिरकर प्रणाम किया। मुनि ने कहा हे राजन! तुम नैष्ठिक पद पाने के अधिकारी हो। जगत में बारम्बार जन्म, जरा एवं मृत्यु के दुःख को देखते हुए मुक्ति के लिए प्रयत्नशील हो जाओ। इस प्रकार सुगत ने राजा को उपदेश दिया। राजा उपदेश से परमपद का लाभ प्राप्त कर मुनि से विनम्र भाव से बोला, "हे मानद! मैं अपनी श्रावस्ती में आपके निवास के लिए विहार (मठ) बनवाना चाहता हूँ। अतः आप मुझ दीन पर कृपाकर वहाँ निवास कर हमें कृतार्थ करें। इस प्रकार राजा के कहने पर मुनि ने कहा, "जो अन्न दान देता है वह बल देता है, जो वस्त्र देता है वह सौन्दर्य देता है, किन्तु जो मुनियों को निवास देता है वह 'सब प्रकार का दान कर दिया' ऐसा कहलाता है। इस प्रकार वह स्वीकृति प्रदान की। स्वीकृति पाकर प्रसन्न राजा उपतिष्य के साथ वहाँ से चला गया। राजा ने जेतवन में जाकर जेत से खरीदने की इच्छा से प्रार्थना की। देने की न इच्छा वाला जेत बिहार की बात सुन तैयार हो गया। राजा ने विपुल धन देकर उस वन को खरीदकर शीघ्र ही उपतिष्य के निर्देशन में बिहार निर्माण प्रारम्भ करा दिया। वह विहार उस राजा के शक्ति की, उसके वैभव की, एवं उसके ज्ञान की, कीर्ति के समान हुआ।

उन्नीसवाँ सर्गसंपादित करें

ज्ञान के द्वारा अनेकों शास्त्रज्ञों को जीतकर महात्मा बुद्ध राजगृह से अपने पिता के नगर में गये। पुत्र के आने का समाचार सुनकर राजा नगरवासियों के साथ आया। काषाय वस्त्र में देख राजा को बड़ा दुःख हुआ। जब बुद्ध ने देखा कि मेरे पिता मुझे पुत्र ही मानते हैं, तब यो तुरन्त योग बल से आकाश में उड़ गये। वहां वो कहीं बिजली की तरह चमके, कहीं मेघ की तरह बरषे। सब लोग आश्चर्यचकित हो गये। आकाश में स्थित हो उन्होंने उपदेश दिया। राजा से कहा कि हे राजन! पुत्रशोक त्यागकर धर्मानन्द प्राप्त करें। उस समय बहुत से लोगों ने घर त्यागने का निश्चय किया। अनेक राजकुमार कृमिल, नन्द, उपनन्द, अनिरुद्ध, आनन्द, देवदत्त, उपालि तथा राजा शुद्धोदन भी भाइयों पर राज्यभार छोड़ सौगत मत को ग्रहण किया। उन दीक्षितों तथा पुरवासियों के साथ बुद्ध नगर में गये। नगर की स्त्रियाँ विलाप करते हुए उन्हें देख रही थीं लेकिन बुद्ध अनासक्त भाव से भिक्षा लेकर न्यग्रोध वन को चले गये।

बीसवाँ सर्गसंपादित करें

महात्मा बुद्ध कपिलवस्तु में कुछ समय निवास करके प्रसेनजित के रम्य नगर में गये, वहाँ से जेतवन को गये। वहाँ राजा सुदत्त ने कलश में जल लेकर, तथागत की पूजा कर, जेतवन उन्हें दे दिया। उस समय दर्शन की इच्छा से राजा प्रसेनजित वहाँ आया ओर प्रणाम कर कहा, हे दयासिंधो! मुझ अधम को निरन्तर आपका दर्शन होता रहे। हे साधो! मैं राग और राजधर्म से अत्यन्त पीड़ित हूँ। इस प्रकार प्रसेनजित की बात सुन, बुद्ध ने उसको उपदेश दिया तथा कहा, "सद्धर्म में मन लगाओ, साधुओं का सत्संग करो।" इस प्रकार मुनि का उपदेश ग्रहण कर राज्य को नश्वर समझकर वह राजा श्रावस्ती को लोटे गया।

पण्डितों एवं राजा के अनुरोध पर सौगत चमत्कार दिखाते हुए आकाश में सूर्य की तरह उदित हुए। इस प्रकार आश्चर्यजनक शक्तियों का प्रदर्शन कर महात्मा बुद्ध अपनी माता को धर्म की दीक्षा देने के लिए स्वर्ग चले गये। वहाँ दीक्षा देकर उन्होंने चातुर्मास किया एवं देवों से भिक्षा ग्रहण कर फिर पृथ्वी की ओर प्रस्थान किया।

इक्कीसवाँ सर्गसंपादित करें

स्वर्ग में अपनी माता तथा देवों को दीक्षा देने के बाद तथागत ने अन्य दीक्षा पाने योग्य लोगों को दीक्षित करने के लिए पृथ्वी पर भ्रमण किया। भ्रमण में अनेक राजाओं, यक्षों और ब्राह्मणों को अपने धर्म में दीक्षित किया जिससे उनकी प्रतिष्ठा बहुत बढ़ गयी। बुद्ध की इस बृद्धि को देख ईर्ष्यावश देवदत्त संघ में फूट डाल दिया। उनको मार डालने की इच्छा से एक हाथी, जो मतवाला था, को ललकारा। लोगों में हाहाकार मच गया, लेकिन वह मतवाला होथी सुगत के पास जाकर शान्त हो गया। सुगत ने उसके मस्तक पर हाथ फेरा। सुगत ने गंधार नगर में रहनेवाले एक विषधर को भी विषहीन और जितेन्द्रिय बना दिया। इस प्रकार मुनि ने अजातशत्रु आदि अनेक राजाओं नर-नारियों को दीक्षित एवं अद्भुत चमत्कार कर संसार में एक नयी धर्मधारा प्रवाहित की। देवदत्त निन्दित कार्य कर विगर्हणा को प्राप्त हुआ।

वैराग्य का कारणसंपादित करें

बुद्ध के वैराग्यप्राप्ति का कारण था? इसका उत्तर राजकुमार के प्रथम विहार के समय मार्ग में जाते हुए वृद्ध को देखकर सारथी से पूछा गया प्रशन और सारथी द्वारा दिया गया उत्तर में मिल सकता है-

क एष भोः सूत! नरोऽभ्युपेतः ? केशैः सितैर्यष्टिविषक्तहस्तः।
भ्रूसंवृताक्षः शिथिलानतांगः , किं विक्रियैषा प्रकृतिर्यदृच्छा ॥ बुद्धच. ३-२८
(हे सारथि! सफेद बालों से युक्त, लाठी पर टिके हुए हाथ वाला, भौंहों से ढके हुए नेत्रों वाला, ढीले और झुके हुए अंगों वाला, सामने आया हुआ यह मनुष्य कौन है? क्या यह विकार है अथवा स्वाभाविक रूप है अथवा यह कोई संयोग है?)

सारथी ने इसका समुचित उत्तर दिया-

रूपस्य हन्त्री व्यसनं बलस्य, शोकस्य योनिर्निधनं रतीनाम्।
नाशः स्मृतीनां रिपुरिन्द्रियाणाम् एषा जरा नाम ययैष भग्नः ॥ बुद्धच. ३-३०
(यह रूप का विनाश करने वाला, बल के लिए संकटस्वरूप, दुःख की उत्पत्ति का मूल कारण, कामसुखों को समाप्त करने वाला, स्मृति को नष्ट करने वाला, इन्द्रियों का शत्रु बुढ़ापा है, जिसके द्वारा यह पुरुष टूट गया है।)

सारथी ने पुनः कहा-

पीतं ह्यनेनापि पयः शिशुत्वे, कालेन भूयः परिमृष्टमुर्व्याम्।
क्रमेण भूत्वा च युवा वपुष्मान्, क्रमेण तेनैव जरामुपेतः ॥ बुद्धच. ३-३१
(निश्चय ही इसने भी बचपन में दूध पीया है, समय के अनुसार पृथ्वी पर लोट लगायी है और क्रम से सुन्दर शरीर वाला युवा होकर उसी क्रम में बुढ़ापे को प्राप्त किया है। तात्पर्य यह है कि इस (वृद्ध) की ऐसी अवस्था अकस्मात् ही नहीं हो गयी है, वरन् एक निश्चित कम-जन्म, बाल्यावस्था, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था, अधेड़ावस्था, वृद्धावस्था के अनुसार हुई है।)

जब राजकुमार द्वितीय विहार पर बाहर निकले तब उन्हीं देवताओं ने एक रोगी मनुष्य का सृजन कर उनके सामने दर्शाया। उसे देखकर गौतम ने सूत से पूछा-

स्थूलोदरः श्वासचलच्छरीरः स्रस्तांसबाहुः कृशपाण्डुगात्रः।
अम्बेति वाचं करुणं ब्रुवाणः परं समाश्लिष्य नरः क एषः? ॥
(मोटे पेट वाला, साँस लेने से काँपते हुए शरीर वाला, झुके हुए ढीले कन्धे और भुजा वाला, दुर्बल और पीले शरीर वाला, दूसरे का सहारा लेकर 'हाय माता!' इस प्रकार के करुणापूर्ण वचन कहता हुआ यह मनुष्य कौन है?)

तब सूत ने उनसे कहा, " रोगाभिधानः सुमहाननर्थः" इति। (रोगग्रस्त होना महान अनर्थ है।)

राजकुमार के तृतीय विहार के समय देवताओं ने एक नया दृष्य प्रस्तुत किया जिसमें एक मृत मनुष्य के शव को चार मनुष्य उठा कर ले जा रहे थे। राजकुमार ने पूछा, ये चार लोग क्या ले जा रहे हैं? सूत ने उत्तर दिया-

बुद्धीन्द्रियप्राणगुणैर्वियुक्तः सुप्तो विसंज्ञः तृणकाष्ठभूतः।
संवर्ध्य संरक्ष्य च यत्नवद्भिः प्रियाप्रियैस्त्यज्यत एष कोऽपि॥
(बुद्धि, इन्द्रियों, पुराणों और गुणों से बिछुड़ा हुआ महानिन्द्रा में सोया हुआ, चेतना से शून्य, तृण और काष्ठ के समान निर्जीव, यह कोई (मृत मनुष्य) यत्न करने वाले प्रिय और अप्रिय लोगों के द्वारा अच्छी तरह बाँधकर और भली-भाँति रक्षा करके (सदा के लिए) छोड़ा जा रहा है।)

यह सुनकर गौतम का मन दुख से भर गया।

सन्दर्भसंपादित करें

  1. S. Beal, Fo,sho,haig-tsan-kuig, intro.P.XXXII
  2. सेक्रेड बुक्स आफ दि इस्ट, भाग-14 पृ0-32
  3. बुद्धिस्ट फिलास्फी पृ0-227
  4. बुद्धचरित

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें