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सीआईडी (धारावाहिक)

भारतीय हिन्दी धारावाहिक


सीआईडी सोनी चैनल पर प्रसारित होने वाला हिन्दी भाषा का एक धारावाहिक है, जिसे भारत का सबसे लंबा चलने वाला धारावाहिक होने का श्रेय प्राप्त है। अपराध व जासूसी शैली पर आधारित इस धारावाहिक में शिवाजी साटम, दयानन्द शेट्टी और आदित्य श्रीवास्तव मुख्य किरदार निभा रहे हैं। इसके सर्जक, निर्देशक और लेखक बृजेन्द्र पाल सिंह हैं। इसका निर्माण फायरवर्क्स नामक कंपनी ने किया है जिसके संस्थापक बृजेन्द्र पाल सिंह और प्रदीप उपूर हैं।

सीआईडी
C.I.D. (TV series).png
सीआईडी १९वें वर्ष के दौरान
शैली अपराध कथा, लड़ाई, नाटक, हास्य, डरावना, प्रेम
प्रारूप प्रक्रियात्मक पुलिस
सर्जक बृजेन्द्र पाल सिंह
लेखक बृजेन्द्र पाल सिंह, श्रीराम राघवन, श्रीधर राघवन, रजत अरोड़ा,
निर्देशक बृजेन्द्र पाल सिंह, राजन वाघधरे, सीबा मिश्रा, संतोष शेट्टी, सलिल सिंह, नितिन चौधरी
सितारे नीचे देखें
निर्माण का देश भारत
भाषा(एं) हिन्दी
सत्र संख्या
प्रकरणों की संख्या २६ अप्रैल २०१५ को १,२२१ हुआ।
निर्माण
कार्यकारी निर्माता
  • सतीश दुबे
  • शाश्वन्त जैन
  • राजेन्द्र पाटिल
  • विकास कुमार
निर्माता बृजेन्द्र पाल सिंह, प्रदीप उपूर
संपादक केदार गोतागे, भक्ति मायालों, शचिन्द्र वत्स
छायांकन बृजेन्द्र पाल सिंह, राकेश सारंग
प्रसारण अवधि ४२ - ४४ मिनट
निर्माण कंपनी फायरवर्क्स
प्रसारण
मूल चैनल सोनी
मूल प्रसारण २१ जनवरी १९९८ – वर्तमान
कालक्रम
संबंधित कार्यक्रम सीआईडी: स्पेशल ब्यूरो
बाह्य सूत्र
आधिकारिक जालस्थल

२१ जनवरी १९९८ से शुरु होकर यह धारावाहिक अब तक लगातार चल रहा है। इसका प्रसारण प्रत्येक शनिवार और रविवार को रात १० बजे होता है। इसका पुनः प्रसारण सोनी पल चैनल पर रात ९ बजे होता है जिसमें इसके पुराने प्रकरण दिखाये जाते हैं। इस धारावाहिक ने २१ जनवरी २०१८ को अपने प्रसारण के २० वर्ष पूर्ण किये और २१वें वर्ष में प्रवेश किया। इससे पहले, २७ सितम्बर २०१३ को इस धारावाहिक ने अपनी १०००वीं कड़ी पूरी की। इस धारावाहिक को कई अन्य भाषाओं में भी भाषांतरित किया गया है।

अनुक्रम

कहानी

इस धारावाहिक की जासूसी कहानियाँ मुंबई अपराध अनुसंधान विभाग द्वारा आपराधिक मामलों की गुत्थी सुलझाने से संबंधित हैं। इसका संचालन एसीपी प्रद्युम्न (शिवाजी साटम) करते हैं, जो अपने दायित्व के कारण अपने अपराधी बेटे नकुल (राहील आज़म) को गोली मार देते हैं। वरिष्ठ निरीक्षक विरेन (आशुतोष गोवरिकर) के बच्चे को खेलते समय एक व्यक्ति सामने आने वाली गाड़ी से बचा लेता है जिसमें बच्चे को तो कुछ नहीं होता है, लेकिन उस व्यक्ति को चोट लग जाती है। विरेन उसे अपने घर लाकर उसे दवाई लगाते हुए उसका धन्यवाद करता है। बाद में विरेन को पता चलता है कि जिस व्यक्ति ने उसके बेटे की जान बचाई थी, वह एक अपराधी है। जैसे ही उस व्यक्ति को पता चल जाता है कि उसका राज खुल गया है, वैसे ही वह व्यक्ति विरेन के परिवार को अपने कब्जे में ले लेता है। वह विरेन से कहता है कि यदि वह सही सलामत किसी दूसरे शहर में उसे नहीं ले जा पाया तो वह उसके परिवार को मार देगा। विरेन मजबूरी में उसकी बात मान लेता है। हालांकि बाद में उसे ऐसा करना सही नहीं लगता और वह सारी बात सीआईडी को बता देता है। उस अपराधी की सहायता करने के कारण वह अपने आप को दोषी मानने लगता है और सीआईडी से बाहर जाने की सोचता है। हालांकि एसीपी प्रद्युम्न उसे ऐसा करने से रोक देता है और कहीं दूसरे स्थान पर उसका तबादला कर देता है।

इसके कुछ दिनों बाद एक मामले का अन्वेषण करते समय सीआईडी को गाड़ी से एक व्यक्ति मिलता है। उसके पहचान पत्र से पता चलता है कि वह पुलिस में काम करता है व उसका नाम अभिजीत (आदित्य श्रीवास्तव) है लेकिन उस व्यक्ति को अपना नाम भी याद नहीं रहता है। वह सीआईडी की कई तरह से मदद करता है जिसके कारण एसीपी प्रद्युम्न उसे सीआईडी से जुड़ने के लिए कहता है। अभिजीत पहले जुड़ने से मना कर देता है लेकिन बाद में मान जाता है। इसी के बाद अभिजीत और दया (दयानन्द शेट्टी) की दोस्ती हो जाती है।

निर्माण

सीआईडी श्रृंखला के निर्माता बृजेन्द्र पाल सिंह हैं, जिन्होंने वर्ष १९७३ में दूरदर्शन पर समाचारों के लिए कैमरामैन के रूप में लगभग दस वर्षों तक कार्य किया। इसी दौरान उनके मन में एक जासूसी धारावाहिक बनाने का विचार आया।[1] उस समय इस प्रकार के जासूसी के धारावाहिक नहीं बनते थे और उनके पास इस प्रकार के धारावाहिक बनाने का कोई ज्ञान भी नहीं था। उन्होंने दूरदर्शन से इस बारे में बात की और साथ-साथ वे अपने नए धारावाहिक की तैयारी में भी लगे रहे। इसी दौरान वे पुलिस की अपराध शाखा का दौरा करने के लिए भी गए। वहाँ उन्होंने कुछ पुलिस अधिकारियों के साथ बातचीत की और उनके द्वारा हल किए गए मामलों और उनकी जासूसी की शैली के विषय में भी अच्छे से जाना।[1] श्रीकांत सिंकर द्वारा लिखित एक जासूसी उपन्यास से भी उन्होंने प्रेरणा ली। इसी दौरान उन्होंने एक रहस्यपूर्ण हत्या पर आधारित "सिर्फ चार दिन" नामक एक फिल्म भी बनाई जिसका प्रसारण दूरदर्शन पर हुआ। दूरदर्शन के लिए ही उन्होंने एक शून्य शून्य नामक एक धारावाहिक भी बनाया जो किसी समय में तीसरा सर्वाधिक प्रसिद्ध कार्यक्रम रहा।[1] मराठी भाषा में भी उन्होंने कई कार्यक्रम बनाए। फिर उन्होंने एक और जासूसी धारावाहिक शृंखला बनाने का कार्य शुरू कर दिया, जो बाद में सी आई डी के रूप में सामने आया।[1] सोनी चैनल १९९४ में प्रारम्भ हुआ जबकि आठ वर्ष पूर्व १९८६ में ही सिंह ने सी आई डी के छह एपिसोड बना लिए थे। फिर जब भारत में सैटेलाइट टेलिविज़न का आगमन हुआ तो सिंह ने इस धारावाहिक के लिए कई चैनलों से बात की, परंतु सोनी ने इस धारावाहिक में अधिक रुचि दिखाई और इसके प्रसारण के लिए सहमति दे दी। इसके बाद सिंह को केवल इस धारावाहिक को बनाने के लिए इसके पात्र और इसके बनाने का स्थान चुनना था।[1][2]

उन्होंने सबसे पहले हिन्दी और मराठी फिल्म अभिनेता शिवाजी साटम को एसीपी प्रद्युम्न के किरदार के लिए चुना[3] जो कि पहले ही कई परियोजनाओं में उनके साथ कार्य कर चुके थे। सीआईडी के निर्माण दल के एक सदस्य संजय शेट्टी ने दयानन्द शेट्टी को पात्रों के चुनाव में हिस्सा लेने का सुझाव दिया था। सिंह उनसे इतने प्रभावित हुए कि पाँच मिनट में ही उन्हें दया के किरदार के लिए चुन लिया। उनका किरदार लोगों के बीच सबसे लोकप्रिय है। आशुतोष गोवरिकर को वरिष्ठ निरीक्षक विरेन की भूमिका के लिए चुना गया किन्तु अपनी फिल्म लगान के निर्देशन के कारण उन्हें इस धारावाहिक को छोड़ना पड़ा।[4] आदित्य श्रीवास्तव को १९९८ में अपराधी का किरदार मिला था, किन्तु अब उन्हें वरिष्ठ निरीक्षक अभिजीत का किरदार दे दिया गया। आदित्य ने राम गोपाल वर्मा की फिल्म सत्या में भी अभिनय किया था जिससे सिंह काफी प्रभावित थे। प्रारम्भ में वे केवल २६ एपिसोड हेतु सीआईडी में काम करने के लिए सहमत हुए थे लेकिन बाद में आगे भी कार्य करने के लिए मान गए।[3] वे २३ जुलाई १९९९ को पहली बार वरिष्ठ निरीक्षक अभिजीत की भूमिका में दिखाई दिये थे। अन्य सभी किरदारों को भी इसी तरह से चुना गया था। शिवाजी साटम, दयानन्द शेट्टी और आदित्य श्रीवास्तव के अलावा अन्य सभी किरदार आते जाते रहते हैं।[2][3]

इस धारावाहिक के पन्द्रह वर्ष पूरे होने के बाद फ़ोर्ब्स पत्रिका के साथ हुए साक्षात्कार में सिंह ने बताया कि प्रारम्भ में हर एपिसोड पर लगभग २ लाख रुपये खर्च आता था, जो कि पन्द्रह वर्ष के दौरान बढ़कर ₹५ लाख हो गया है।[4]

स्थान

इस धारावाहिक का निर्माण का कार्य मुम्बई में शुरू हुआ और मुख्यतः यहीं निर्मित किया जाता है। इसके अनेक भाग भारत के कई अन्य स्थानों में भी बनाए गए हैं। इन स्थानों में दिल्ली, जयपुर, कोलकाता, मनाली, चेन्नई, शिमला, जोधपुर, जैसलमेर, गोवा, पुणे, औरंगाबाद, कोल्हापुर, हिमाचल प्रदेश, केरल और कोच्चि आदि सम्मिलित है।[5][6] दिल्ली के सदर बाजार और जामा मस्जिद में भी इसे बनाने की योजना थी।[7] लेकिन बहुत भीड़ के कारण यह संभव नहीं हो पाया। इसे संगम विहार, दिल्ली हाट और लाजपत नगर इलाके में बनाया गया। इसके बाद आगरा और मथुरा में भी अगले एपिसोड की शूटिंग हुई, जिसका प्रसारण २४ से २६ जुलाई को "मर मिटेंगे" नाम से हुआ।[8] इसके अलावा कुछ भागों का निर्माण विदेशों में भी हुआ है। सीआईडी की आखिरी चुनौती नामक एक छोटी शृंखला को लंदन में भी बनाया गया था जिसमें महेश मांजरेकर ने हरगिज़ डोंगारा नामक अपराधी की भूमिका निभाई। २००४ में ‘सीआईडी’ के तीन प्रकरणों का निर्माण इंग्लैंड में हुआ और २०१० में ८ प्रकरणों का निर्माण स्विटजरलैंड और पेरिस में हुआ था।[9]

प्रसारण

२१ जनवरी १९९८ को रात ९:३० बजे इसका प्रसारण सोनी चैनल पर शुरू हुआ। इस धारावाहिक के २६ प्रकरण होने के पश्चात आदित्य श्रीवास्तव को वरिष्ठ निरीक्षक अभिजीत की भूमिका में दिखाया गया। इसके पश्चात यह अब तक चल रहा है। इसका प्रसारण शुरू में बुधवार को रात ९:३० बजे होता था जिसे बाद में बदलकर शुक्रवार को रात १० बजे कर दिया गया।[10] २१ मई २०१० से इसका प्रसारण शुक्रवार के साथ साथ शनिवार को भी होने लगा।[11] ३ फरवरी २०१३ से इसका प्रसारण शुक्रवार और शनिवार के साथ साथ रविवार को भी होने लगा।[12] मई २०१६ में द कपिल शर्मा शो के कारण इसका प्रसारण कुछ सप्ताह नहीं हुआ। इसके निर्माताओं ने कहा कि द कपिल शर्मा शो नया होने के कारण उसे और लोगों तक पहुंचाने के लिए ऐसा किया गया था और यह भी कहा कि सीआईडी का जल्द ही नए समय पर प्रसारण होगा।[13] ४ जून २०१६ से इसका प्रसारण फिर से शुरू हो गया और इसका समय १० बजे से बदल कर १०:३० हो गया।[14]

इसकी लोकप्रियता को देखते हुए इसे अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवादित किया गया है। इसका तेलुगू संस्करण मां टीवी में और तमिल संस्करण ज़ी तमिल में प्रसारित हो रहा है। इसके अलावा बंगाली में इसकी भिन्न शृंखला निकाली गई है।[15][16] इसे दिसम्बर २००४ में अत्यधिक सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली और यह ३.७ रेटिंग प्राप्त कर पूरे भारत में पहली बार २९वें स्थान पर रहा।[17] टीएएम के अनुसार इसे सितम्बर २०१० में ५.१७ का उच्चतम रेटिंग मिला, जो इसके पिछले कुछ वर्षों का सबसे अधिक रेटिंग है।[18] २०१५ में इस धारावाहिक को ४.१ के आसपास का रेटिंग मिल रहा था।[19][20]

कलाकार

 
(बाएँ से दायें) दया शेट्टी, अंशा सयद, जानवी छेड़ा, शिवाजी साटम, विनीत कुमार और आदित्य श्रीवास्तव
 
(बाएँ से दायें) श्रद्धा मूसले, अंशा सयद, ऋषिकेश पांडे, शिवाजी साटम, नरेंद्र गुप्ता, जानवी छेड़ा और अजय नागरथ
 
(बाएँ से दायें) दया शेट्टी, अक्षय कुमार, सोनाक्षी सिन्हा और शिवाजी साटम
पूर्व किरदार

विशेष उपस्थिति

पुरस्कार एवं कीर्तिमान

विश्व कीर्तिमान

इस धारावाहिक के दल ने ७ नवम्बर, २००४ को मुम्बई में शाम ६:३० से ८:२० बजे तक पूरे १११ मिनट तक बिना कैमरे को बंद किए एक पूरी कहानी बना दी। यह कीर्तिमान लिम्का कीर्तिमान पुस्तक[58] तथा गिनीज विश्व कीर्तिमान पुस्तक में पंजीकृत कर लिया गया था।[59] ७ नवम्बर को बने इस कथांश को ८ नवम्बर को शाम ८ बजे से १० बजे तक दिखाया गया।

इस प्रकार के विश्व कीर्तिमान बनाने का विचार सिंह को इसके ७ से ८ महीने पहले आया था। इससे पहले १९८७ में मराठी कार्यक्रम "एक शून्य शून्य" में फिल्मांकन को बिना रोके २२ मिनट का कार्यक्रम बना दिया था। वर्ष २००२ में उन्होंने इस कीर्तिमान को गिनीज़ विश्व कीर्तिमान पुस्तक में दर्ज करवाने के बारे में सोचा लेकिन उन्हें पता चला कि इसके लिए उन्हें २५ मिनट का बिना रुके कार्यक्रम तैयार करना होगा। उन्होंने इसकी तैयारी शुरू कर दी, लेकिन उनके इस कीर्तिमान को बनाने से पूर्व ही एक रूसी वृत्त फिल्म ने ८८ मिनट तक लगातार फिल्मांकन का कीर्तिमान बना लिया। इसके बाद बीपी सिंह ने इससे भी अधिक लम्बे कीर्तिमान बनाने के बारे में सोचा और 'विरासत' नाम का एक प्रकरण की योजना बनाई। इसके लिए वे उसी समय से इसकी तैयारी में लग गए। इस कीर्तिमान को बनाने के लिए सीआईडी के सभी किरदारों को ९० पन्नों का संवाद याद करना पड़ा और इस कहानी के कैमरामैन नितिन राव को २८ किलो ग्राम के कैमरे को लगातार १११ मिनट तक अपने कंधो पर रखना पड़ा, जिसमें ३ मंजिल के घर में उन्हें ऊपर से नीचे भी कई बार होना पड़ा। इसे बनाने के लिए ३४ लाख रुपए खर्च हुए। यह सीआईडी का सबसे महंगा प्रकरण था। यह एक ऐसे होटल मालिक की कहानी थी, जो भारत में अपना कारोबार समेटने के लिए दक्षिण अफ्रीका से आता है। उसे अपने वारिस की तलाश रहती है। उसकी संपत्ति में हिस्सा पाने की आस में सभी रिश्तेदार होटल में जमा हो जाते हैं। फिर एक के बाद एक खून होना शुरू हो जाता है। इस एपिसोड को कीर्तिमान बनाने के मकसद से ही बनाया गया था। इसमें सीआईडी के निरीक्षकों के अतिरिक्त केके मेनन, राज ज़ुत्शी, अविनाश वधावन, कृतिका देसाई और मुकेश रावल शामिल थे। इसे ७ नवम्बर २००४ को बिना किसी विज्ञापन के रात ८ से १० बजे तक दिखाया गया। इसके बाद सीआईडी का १० बजे का धारावाहिक शुरू हुआ।[60]

पुरस्कार

वर्ष पुरस्कार श्रेणी कलाकार टिप्पणी एवं सन्दर्भ
२००२ भारतीय टेली अकादमी पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ धारावाहिक - नाटक बृजेन्द्र पाल सिंह और प्रदीप उपूर [61]
भारतीय टेली पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ व्यक्तित्व शिवाजी साटम [62]
२००३ भारतीय टेली अकादमी पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ रोमांचक / डरावना धारावाहिक बृजेन्द्र पाल सिंह और प्रदीप उपूर [63]
२००४ भारतीय टेली अकादमी पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ निर्देशक - नाटक बृजेन्द्र पाल सिंह [64]
भारतीय टेली अकादमी पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ रोमांचक / डरावना धारावाहिक सोनी (भारत) [64]
भारतीय टेली अकादमी पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ अभिनय रजत अरोड़ा [64]
भारतीय टेली अकादमी पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ वीडियोग्राफी बृजेन्द्र पाल सिंह [64]
२००५ भारतीय टेली अकादमी पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता - नकारात्मक भूमिका मकरंद देशपांडे [65]
२००९ भारतीय टेली अकादमी पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ रोमांचक / डरावना धारावाहिक बृजेन्द्र पाल सिंह और प्रदीप उपूर [66]
२०१० भारतीय टेली अकादमी पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ रोमांचक / डरावना धारावाहिक बृजेन्द्र पाल सिंह और प्रदीप उपूर [67]
२०१५ भारतीय टेली अकादमी पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ रोमांचक / डरावना धारावाहिक बृजेन्द्र पाल सिंह और प्रदीप उपूर [68]

सीआईडी स्पेशल ब्यूरो

यह सीआईडी का एक विशिष्ट संस्करण था, जिसका प्रसारण एक अलग धारावाहिक के रूप में २७ दिसम्बर २००४ से शुरू हुआ और १६८ एपिसोड प्रसारित होने के बाद ८ अगस्त २००६ में बंद हो गया। यह सोमवार व मंगलवार को रात १०:३० बजे प्रसारित होता था। इसके आधे घंटे पहले, रात १० बजे सीआईडी और उसके आधे घंटे बाद इस धारावाहिक का प्रसारण होता था। इसमें शिवाजी साटम, अनूप सोनी, दयानन्द शेट्टी और आदित्य श्रीवास्तव मुख्य किरदार में थे।[69]

इसकी कहानी के अनुसार "सीआईडी पिछले कई वर्षों से लंबित मामलों की जाँच करने हेतु एक नए दल का गठन करती है, जिसका नाम सीआईडी स्पेशल ब्यूरो रखा जाता है। यह दल बहुत पुराने आपराधिक मामलों की जाँच करती है।" इसमें कई बार सीआईडी की कहानी को भी जोड़ कर दिखाया जाता था। इसी कारण कुछ मामलों में सीआईडी के किरदार सीआईडी स्पेशल ब्यूरो में और सीआईडी स्पेशल ब्यूरो के किरदार सीआईडी में भी दिखते थे।[70]

अन्य पहल

७ जुलाई २००६ को एक राष्ट्रव्यापी खोज कार्य का प्रारम्भ किया गया जिसे सीआईडी ऑपरेशन तलाश नाम दिया गया। इसमें जीतने वाले को एक पुलिस निरीक्षक की भूमिका में कार्य करने का मौका दिया जाना था। १ सितम्बर २००६ को विवेक मशरू को विजेता घोषित किया गया था। इसके बाद कुछ वर्षो तक विवेक एक निरीक्षक की भूमिका में दिखाई दिए।[71] २६ जनवरी २०१० से वीरता को प्रोत्साहित करने और समाज में बहादुरी के कार्यों का सम्मान करने के लिए सीआईडी वीरता पुरस्कार नामक एक पुरस्कार प्रारंभ किया गया। इसे २६ जनवरी २०१० को पहली बार साहस दिखाने वाले लोगों को दिया गया।[72] २३ जनवरी २०११ को दूसरी बार प्रदान किया गया था।[73] बड़ों के वीरता को प्रोत्साहित करने के बाद, बच्चों के लिए भी एक नयी उप-शृंखला सीआईडी छोटे हीरोज नाम से बनायी गई।[74] यह १ फरवरी २०१३ से दिखाया गया। यह शुक्रवार को सीआईडी से एक घंटे पहले ९ बजे से १० बजे रात को दिखाया जाता था। इसमें बच्चों के द्वारा दिखाये गए साहस को दिखाया जाता था।[75] ३० मई २०१२ को एक साक्षात्कार के दौरान बीपी सिंह ने कहा कि वे सीआईडी पर एक फिल्म बनाने जा रहे हैं। इसमें धारावाहिक के कलाकार ही काम करेंगे, लेकिन एक मुख्य खलनायक को बाहर से लिया जाएगा। उन्होंने कहा, सैद्धांतिक रूप से फिल्म को इस वर्ष के अंत तक शुरू हो जाना चाहिए। चैनल के पास इसके अधिकार हैं, यदि चैनल आज अपनी सहमति देता है, तो हम इस पर अगले वर्ष की शुरुआत से काम करना शुरू कर देंगे।[76]

२१ जनवरी २०१५ को सीआईडी ने अपने यात्रा के अठारवें वर्ष में प्रवेश किया। इसे सोनी ने एक उत्सव के रूप में २६ जनवरी २०१५ को एक विशेष कार्यक्रम के रूप में बनाया। जिसमें सोनी पर पूरे दिन सीआईडी का कार्यक्रम दिखाया गया। इसके अलावा बीच बीच में सीआईडी के किरदार व अन्य लोग भी आते थे और अपने व इस धारावाहिक के बारे में बताते थे।[77]

अन्य धारावाहिकों में

सीआईडी के किरदारों ने इस धारावाहिक के अलावा भी अन्य धारावाहिकों में भी अभिनय किया है और अन्य धारावाहिकों के किरदार भी कई बार सीआईडी में आ चुके है। जैसे अदालत के प्रारम्भ में अभिजीत के ऊपर आरोप लगता है कि उसने जोरावर नाम के एक अपराधी पर ६ गोलियां चलाई और हत्या कर दी। इस कारण उसे अदालत में ले जाया जाता है, जिसमें के॰ डी॰ पाठक उसका वकील रहता है। यह सीआईडी और अदालत, दोनों धारावाहिकों में दिखाया जाता है। इसके बाद सीआईडी और के॰ डी॰ पाठक मिल कर इस मामले को सुलझा लेते हैं।[78]

तारक मेहता का उल्टा चश्मा में इसी के कुछ किरदार सीआईडी के धारावाहिक में आते है और उसके कुछ दिन बाद एक अन्य प्रकरण में इस धारावाहिक में सीआईडी के सारे किरदार आ जाते है। जिसमें दयाबेन को एसीपी प्रदूमन का नकली प्रमाणपत्र मिलता है और वह उसे लेकर सीआईडी के कार्यालय में जाती है। जहाँ सीआईडी के दल को पता चलता है की कोई एसीपी प्रद्युम्न के जैसे बनकर कोई गैर-कानूनी कार्य करना चाहता है लेकिन उस अपराधी को पकड़ते समय एक ने जेठालाल का चेहरा बना दिया और वह इस मामले में फंस जाता है। परंतु बाद में पता चलता है कि वह दोषी नहीं है। इसके पश्चात गोकुलधाम में एक नया सदस्य आता है, जिसके पास करोड़ों का हीरा रहता है। जिसे वह बेचना चाहता है। वह गोकुलधाम के लोगों को लालच देता है कि यदि कोई उस हीरे को बेचने में उसकी सहायता करेगा तो वह उसे एक करोड़ रुपये देगा। लेकिन हीरा बेचने से पूर्व ही वो लापता हो जाता है और उसी मामले की जाँच करते हुए सीआईडी वहाँ आती है। पूरे गोकुलधाम में सभी के घरों की तलाशी लेने के बाद उन्हें अय्यर और बबीता जी के घर में वह हीरा मिलता है। वे लोग बबीता और अय्यर को पकड़ लेते हैं। परंतु बाद में पता चलता है कि दोषी कोई और है।[79] इसके साथ-साथ कौन बनेगा करोड़पति में भी सीआईडी के तीनों पात्र (शिवाजी साटम, आदित्य श्रीवास्तव और दयानन्द शेट्टी) जा चुके हैं।[80]

इसके अलावा अदालत व सीआईडी में १२ जुलाई २०१२ को रात १० बजे और रविवार १३ जुलाई २०१२ को रात ७:३० व १० बजे सीआईडी विरुद्ध अदालत नाम से धारावाहिक का प्रसारण हुआ था। इसमें अदालत और सीआईडी दोनों को एक ही कहानी में दिखाया गया। जिसमें दिखाया गया कि डॉ॰ सालुंखे को एक सबूत मिलता है, जिसे दिखाने से पहले ही वह लापता हो जाता है। उसकी गाड़ी डीसीपी चित्रोले के घर के आगे मिलती है और घर की तलाशी में एक लाश भी प्राप्त होती है, जिसे पहले डॉ॰ सालुंखे मानते हैं। सीआईडी को डीसीपी चित्रोले के खिलाफ काफी ठोस सबूत मिलते हैं, इस कारण उसे हिरासत में ले लिया जाता है। अदालत में के॰ डी॰ पाठक उसे बचाने की कोशिश करता है, परंतु सीआईडी उसे दोषी साबित करने का कार्य करती है। आखिरी में के॰ डी॰ पाठक और सीआईडी मिलकर इस मामले को हल कर लेते हैं।[81] इसके बाद २० दिसम्बर २०१४ को ३ घंटे का प्रसारण होता है। इसका निर्देशन सीआईडी के सिबा मित्र और अदालत के रमिन्दर सूरी ने मिल कर किया है। इसे मुम्बई के अलग अलग भागों में बनाया गया, जिसके लिए १५ दिन का समय लग गया।[82] इसका नाम सीआईडी विरुद्ध अदालत - कर्मयुद्ध रखा गया है, जिसमें एक और बार सीआईडी और अदालत साथ में आते हैं।[83] जिसमें एक आश्रम में एसीपी प्रद्युम्न के दोस्त की बेटी का खून हो जाता है।[84] सीआईडी को लगता है कि इसकी हत्या आत्मानन्द ने की है और वहीं के॰ डी॰ पाठक उसे बचाता है।[85] बाद में पता चलता है कि असल में हत्या किरण ने की है।[86]

प्रभाव

सीआईडी धारावाहिक देखने के बाद जनमानस पर अच्छा और बुरा दोनों प्रकार का प्रभाव पड़ा। कुछ लोगों को अपराध करने की इच्छा जागृत हुई तो कुछ लोगों को निशानेबाजी आदि में आगे बढ़ने की भी प्रेरणा मिली। कुछ घटनाएँ निम्नलिखित हैं:-

पाकिस्तान के लाहौर में ३० जून २०१७ को एक ९ वर्षीय लड़की ईमान तनवीर की लाश उसके दादी के घर से प्राप्त हुई। पुलिस को पहले उसकी सौतेली माँ पर शक हुआ, पर बाद में उसे बेगुनाह मान कर पुलिस ने छोड़ दिया।[87] हत्या के चार दिन बाद पुलिस एक बयान जारी किया कि उस लड़की के ११ वर्षीय भाई ने ही ये हत्या की है।[88] उसने पुलिस के सामने कबूल किया कि उसी ने अपनी बहन की हत्या की है। पूछने पर उसने बताया कि उसे सीआईडी देख कर इस हत्या को करने का विचार आया था।[89]

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक युवक ने सीआईडी धारावाहिक देख कर अपनी पत्नी के साथ मिल कर अपने ही अपहरण की झूठी कहानी बना डाली। वह जहाँ काम करता था, उसी के संचालक के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवा दिया। वह मुकदमे से उसे बचा कर उससे पैसे लेने की योजना बना रहा था। लेकिन पुलिस उसके पास पहुँच गई और तब उसकी योजना का पता चला।[90]

१७ वर्षीय निशानेबाज मेहुली घोष ने जापान के प्रतियोगिता में अपना पहला स्वर्ण पदक हासिल किया और केरल में हुए राष्ट्रीय निशानेबाजी प्रतियोगिता में एक ही दिन में आठ स्वर्ण पदक हासिल करने के बाद उनका कहना था कि उन्हें इसकी प्रेरणा सीआईडी धारावाहिक को देखने से मिली।[91]

समीक्षात्मक प्रतिक्रिया

एक दशक से अधिक चलने का कीर्तिमान बनाने के पश्चात भी यह लोकप्रिय धारावाहिक वर्तमान(जनवरी २०१८ में अद्यतन) में भी सोनी पर प्रसारित हो रहा है। इसके कई संवाद जैसे एसीपी प्रद्युमन का "अब तो इसे फाँसी ही होगी" और दया का दरवाजा तोड़ना आदि अत्यधिक लोकप्रिय हो चुके हैं। यह इतना लोकप्रिय हो चुका है कि लोग इस पर कई चुट्कुले भी बना चुके हैं।[92]

दैनिक ट्रिब्यून में दिये एक साक्षात्कार में शिवाजी साटम ने कहा कि "अब यह मेरी पहचान बन गया है। पर यह केवल एक धारावाहिक भर नहीं है। बच्चे और बड़े अब मुझसे सीआईडी के पात्र की तरह व्यवहार करते हैं। उन्हें लगता है कि सचमुच किसी जासूसी करने वाले समूह का हिस्सा हूँ। शायद इसलिए पिछले दो सालों से यह लगातार पुरस्कार जीत रहा है। इसे राष्ट्रपति तक की सराहना मिली है। दरअसल यह आम और ईमानदार लोगों को न्याय दिलाने वाला धारावाहिक है।"[93][94] वहीं रांची एक्सप्रेस ने कहा कि सीआईडी १९९८ से लगातार चल रही है और उसे हमेशा से ही दर्शकों ने पसंद किया। जबकि २००३ में इसी चैनल में शुरू हुए एक धारावाहिक क्राइम पेट्रोल को कम लोकप्रियता के कारण बंद करना पड़ा था। लेकिन अब भी सीआईडी को उतने ही नहीं, उससे भी अधिक दर्शक मिल गए है। वर्तमान में इस धारावाहिक ने हर उम्र वर्ग को अपनी ओर आकर्षित किया है। इसी के कारण अन्य चैनलों में भी आपराधिक धारावाहिकों की संख्या में इजाफा हुआ है।[95] वहीं दयानन्द शेट्टी ने कहा कि "१७ वर्षों से अधिक समय तक एक साथ काम करने से एक जुड़ाव बन गया है। सीआईडी को सबसे अधिक बच्चे पसंद करते है और इसी कारण इसमें हम लोगों ने हास्य बनाने का प्रयास किया है।"[96] टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए दयानन्द शेट्टी ने बताया कि उन्हें अपने कार्यक्रम के बारे में ऑनलाइन चुटकुले पढ़ने में बहुत गर्व महसूस होता है और यह जान कर और भी खुशी होती है कि केवल दया ही नहीं बल्कि इसके अन्य सभी किरदार भी बहुत प्रसिद्ध हैं।[97]

सन्दर्भ

  1. लालवानी, विक्की. ""Soaps are not my domain and I don't think I will be able to direct them well"" (अंग्रेज़ी में). इंडियन टेलिविजन. अभिगमन तिथि ९ जनवरी २००४. नामालूम प्राचल |trans_title= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  2. माथुर, चांदनी (८ अप्रैल २०१४). "सीआईडी: कहानी भारत के सबसे सफल जासूसी धारावाहिक की". टेलीविज़न पोस्ट. अभिगमन तिथि १० जुलाई २०१६.
  3. सेथुरमन, श्रेया (२७ जुलाई २०१२). "Chasing criminals, cracking cases". हिंदुस्तान टाइम्स (अंग्रेज़ी में). मूल से १५ जून २०१५ को पुरालेखित. अभिगमन तिथि १६ जनवरी २०१३. नामालूम प्राचल |trans_title= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  4. रघुनाथ, अभिषेक (२६ अक्टूबर २०१२). "Sony's CID: Fifteen Years and Counting" (अंग्रेज़ी में). फ़ोर्ब्स. अभिगमन तिथि १० जुलाई २०१६. नामालूम प्राचल |trans_title= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  5. "CID team mistook for real one!" (अंग्रेज़ी में). टेली चक्कर. मूल से ६ जुलाई २०१६ को पुरालेखित. अभिगमन तिथि ११ जनवरी २०१३. नामालूम प्राचल |trans_title= की उपेक्षा की गयी (मदद)
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