सूरा अज़-जुख़रुफ़

सूरा अज़-ज़ुख़रुफ़ (इंग्लिश: Az-Zukhruf) इस्लाम के पवित्र ग्रन्थ कुरआन का 43 वां सूरा (अध्याय) है। इसमें 89 आयतें हैं।

नामसंपादित करें

सूरा 'अज़-जुख़रुफ़[1]या सूरा अज़्-ज़ुख़रुफ़[2] का नाम आयत 35 के शब्द ‘वज़्जुख़रुफ़न' (चाँदी और सोने के) से उद्धृत है। मतलब यह है कि यह वह सूरा है जिसमें जुख़रुफ़ शब्द आया है।

अवतरणकालसंपादित करें

मक्कन सूरा अर्थात पैग़म्बर मुहम्मद के मक्का के निवास के समय हिजरत से पहले अवतरित हुई।

इस्लाम के विद्वान मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी लिखते हैं कि इसकी वार्ताओं पर विचार करने से साफ़ महसूस होता है कि यह सूरा भी उसी कालखण्ड में अवतरित हुई है, जिसमें सूरा 40 (अल-मोमिन), सूरा 41 (हा. मीम. अस-सजदा) और सूरा 42 (अश-शूरा) अवतरित हुई। (यह वह समय था) जब मक्का के काफ़िर नबी (सल्ल.) की जान के पीछे पड़े हुए थे।

विषय और वार्ताएँसंपादित करें

मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी लिखते हैं कि;

इस सूरा में बड़े ज़ोर के साथ कुरैश और अरब वालों की उन अज्ञानपूर्ण धारणाओं और अन्धविश्वासों की अलोचना की गई है जिन पर वे दुराग्रह किए चले जा रहे थे और अत्यन्त मज़बूत और दिल में घर करनेवाले तरीके से उनके बुद्धिसंगत न होने को उजागर किया गया है। वार्ता का आरम्भ इस तरह किया गया है कि तुम लोग अपनी दुष्टता के बल पर यह चाहते हो कि इस किताब का अवतरण रोक दिया जाए, किन्तु अल्लाह ने दुष्टताओं के कारण नबियों को भेजना और किताबों को उतारना बन्द नहीं किया है, बल्कि उन ज़ालिमों को विनष्ट कर दिया है जो उनके मार्गदर्शन का रास्ता रोक कर खड़े हुए थे। यही कुछ वह अब भी करेगा । इसके बाद बताया गया है कि वह धर्म क्या है जिसे लोग छाती से लगाए हुए हैं, और वे प्रमाण क्या है जिसके बल-बूते पर वे मुहम्मद (सल्ल.) का मुक़ाबला कर रहे हैं । ये स्वयं मानते हैं कि धरती और आकाश का, और इनका अपना और इनके उपास्यों का स्रष्टा (भी और इनका दाता भी) सर्वोच्च अल्लाह ही है फिर भी दूसरों को अल्लाह के साथ प्रभुत्व में शरीक करने पर हठ किए चले जा रहे हैं। बन्दों को अल्लाह की संतान घोषित करते हैं और (फ़रिश्तों के विषय में ) कहते हैं कि ये अल्लाह की बेटियाँ हैं। उनकी उपासना करते हैं। आख़िर इन्हें कैसे मालूम हुआ कि फ़रिश्ते स्त्रियाँ हैं? इन अज्ञानपूर्ण बातों पर टोका जाता है तो नियति का बहाना पेश करते हैं और कहते हैं कि यदि अल्लाह हमारे इस काम को पसन्द न करता तो हम कैसे इन मूर्तियों की पूजा कर सकते थे। हालाँकि अल्लाह की पसन्द और नापसन्द मालूम होने का माध्यम उसकी किताबें हैं , न कि वे कार्य जो संसार में उसकी इच्छा (उसकी दी हुई छू ) के अन्तर्गत हो रहे हैं। (अपने बड़े बहुदेववाद की पुष्टि में एक प्रमाण यह भी) देते हैं कि बाप-दादा से यह काम ऐसे ही होता चला आ रहा है। मानो इनकी दृष्टि में किसी धर्म के सत्य होने के लिए यह पर्याप्त प्रमाण है। हालाँकि इबराहीम (अलै.) ने जिनकी सन्तान होने पर ही इनका सारा गर्व और इनकी विशिष्टता निर्भर करती है, ऐस अंधे अनुसरण को रद्द कर दिया था जिसका साथ कोई बुद्धिसंगत प्रमाण न देता हो। फिर यदि इन लोगों को पूर्वजों का अनुसरण ही करना था तो इसके लिए भी अपने सबसे अधिक महान पूर्वज इबराहीम और इसमाईल (अलै.) को छोड़कर इन्होंने अपने अत्यन्त अज्ञानी पूर्वजों का निर्वाचन किया। मुहम्मद (सल्ल.) की पैग़म्बरी स्वीकार करने में इन्हें संकोच है तो इस कारण कि उनके पास धन - दौलत, राज्य और प्रतिष्ठा तो है ही नहीं। कहते है कि यदि ईश्वर हमारे यहाँ किसी को नबी बनाना चाहता तो हमारे दोनों नगरों (मक्का और ताइफ़) के बड़े आदमियों में से किसी को बनाता। इसी कारण फ़िरऔन ने भी हज़रत मूसा (अलै.) को हीन जाना था और कहा था कि आकाश का सम्राट अगर मुझ धरती के सम्राट के पास कोई राजदूत भेजता तो उसे सोने के कंगन पहनाकर और फ़रिश्तों की एक सेना उसकी अर्दली में देकर भेजता। यह फ़कीर कहाँ से आ खड़ा हुआ। अन्त में साफ़ - साफ़ कहा गया है कि न ईश्वर की कोई सन्तान है, न आकाश और धरती के प्रभु अलग - अलग हैं, और न अल्लाह के यहाँ कोई ऐसा सिफ़रिशी है जो जान - बूझकर गुमराही अंगीकार करनवालों को उसके दण्ड से बचा सके।

सुरह "अज़्-ज़ुख़रुफ़ का अनुवादसंपादित करें

अल्लाह के नाम से जो दयालु और कृपाशील है।

इस सूरा का प्रमुख अनुवाद:

क़ुरआन की मूल भाषा अरबी से उर्दू अनुवाद "मौलाना मुहम्मद फ़ारूक़ खान", उर्दू से हिंदी "मुहम्मद अहमद" [3] ने किया।

इस सूरह में सफ़र की दुआसंपादित करें

सफ़र की दुआ अज-ज़ुख़रुफ़ (43), 13-14 में है।

मूल अरबी "بِسْمِ اللهِ وَالْحَمْدُ لِلَّهِ سُبْحَانَ الَّذِيْ سَخَّرَ لَناَ هَذَا وَمَا كُنَّا لَهُ مُقرِنِيْنَ وإِنَّا إِلَى رَبِّناَ لمُنْقَلِبُوْنَ"

(उच्चारण: "सुब्हानल्लज़ी-सख्खर-लना-हाज़ा-वमा-कुन्ना-लहू-मुक़रिनीन-व-इन्ना-इला-रब्बीना लमुनक़लिबुन")

का अर्थ है: "वो पाक(अल्लाह) है जिसने इसको (सफर) हमारे काबू में कर दिया और हम में ताक़त ना थी की इसको(सफर) काबू में कर लेते और हमको अपने रब(अल्लाह) की तरफ ही लौट कर जाना है"। यह दुआ यात्रा पर निकलने से पहले पढ़ी जाती है।

पिछला सूरा:
अश-शूरा
क़ुरआन अगला सूरा:
अद-दुख़ान
सूरा 43

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इन्हें भी देखेंसंपादित करें

सन्दर्भ:संपादित करें

  1. अनुवादक: मौलाना फारूक़ खाँ, भाष्य: मौलाना मौदूदी. अनुदित क़ुरआन - संक्षिप्त टीका सहित. पृ॰ 701 से.
  2. "सूरा अज़्-ज़ुख़रुफ़ का अनुवाद (किंग फ़हद प्रेस)". https://quranenc.com. मूल से 22 जून 2020 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 13 जुलाई 2020. |website= में बाहरी कड़ी (मदद)
  3. "Az-Zukhruf सूरा का अनुवाद". http://tanzil.net. मूल से 25 अप्रैल 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 15 जुलाई 2020. |website= में बाहरी कड़ी (मदद)

बाहरी कडियाँसंपादित करें

इस सूरह का प्रसिद्ध अनुवादकों द्वारा किया अनुवाद क़ुरआन प्रोजेक्ट पर देखें Az-Zukhruf 43:1