अश-शूरा

इस्लाम के पवित्र ग्रन्थ कुरआन का 42 वां सूरा या अध्याय है

सूरा अश-शूरा (इंग्लिश: Ash-Shura) इस्लाम के पवित्र ग्रन्थ कुरआन का 42 वां सूरा या अध्याय है। इसमें 53 आयतें हैं।

नामसंपादित करें

 
सूरा अश-शूरा

सूरा 'अश्-शूरा[1]या सूरा अश़्-शूरा[2] का नाम इस सूरह की आयत 38 के वाक्यांश “अपने मामले आपस के परामर्श (अश-शूरा) से चलाते हैं" से उद्धृत है। इस नाम का मतलब यह है कि वह सूरा जिसमें शूरा शब्द आया है।

अवतरणकालसंपादित करें

मक्कन सूरा अर्थात पैग़म्बर मुहम्मद के मक्का के निवास के समय हिजरत से पहले अवतरित हुई।

इस्लाम के विद्वान मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी लिखते हैं कि इसकी विषय-वस्तु पर विचार करने से साफ़ महसूस होता है कि यह सूरा 41 (हा . मीम . अस-सजदा) के पश्चात् संसर्गतः अवतरित हुई होगी , क्योंकि यह एक प्रकार से बिलकुल उसकी अनुपूरक दिखाई देती है। सूरा 41 (हा . मीम . अस-सजदा) कुरैश के सरदारों के अन्धे-बहरे विरोध पर बड़ी गहरी चोटें की गई थीं, उस चेतावनी के तुरन्त पश्चात् यह सूरा अवतरित की गई जिसने समझाने-बुझाने का हक़ अदा कर दिया।

विषय और वार्तासंपादित करें

मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी लिखते हैं कि बात का आरम्भ इस तरह किया गया है कि (मुहम्मद सल्ल. पर ईश-प्रकाशना कोई निराली बात नहीं।) ऐसी ही प्रकाशना इसी प्रकार के आदेश के साथ अल्लाह इससे पहले भी नबियों (उन पर ईश्वर की दया और कृपा हो) पर निरन्तर भेजता रहा है । इसके बाद बताया गया है कि नबी (सल्ल.) केवल बेसुध लोगों को चौकाने और भटके हुओं को रास्ता बताने आया है। (वह ख़ुदा के पैदा किए हुए लोगों के भाग्य का मालिक नहीं बनाया गया है।) उसकी बात न माननेवालों का संप्रेक्षण और उन्हें यातना देना या न देना अल्लाह का अपना काम है। फिर इस समस्या के रहस्य को व्यक्त किया गया है कि अल्लाह ने सारे मनुष्यों को जन्मजात सत्यनिष्ठ क्यों न बना दिया और यह मतभेद की सामर्थ्य क्यों दे दी जिसके कारण लोग विचार और कर्म के हर उल्टे-सीधे रास्ते पर चल पड़ते हैं। इसके बाद यह बताया गया है कि जिस धर्म को मुहम्मद (सल्ल.) प्रस्तु कर रहे हैं, वह वास्तव में है क्या। उसका सर्वप्रथम आधार यह है कि अल्लाह चूंकि जगत् और मानव का स्रष्टा, मालिक और वास्तविक संरक्षक मित्र है, इसलिए वही मानव का शासक भी है और उसी को यह अधिकार प्राप्त है कि मानव को दीन और शरीअत (धर्म और विधि-विधान अर्थात् धारणा और कर्म की प्रणाली) प्रदान करे। दूसरे शब्दों में नैसर्गिक प्रभुत्व की तरह विधि-विधान सम्बन्धी प्रभुत्व भी अल्लाह ही के लिए सुरक्षित है। इसी आधार पर अल्लाह ने आदिकाल से मानव के लिए धर्म निर्धारित किया है। वह एक ही धर्म था जो हरेक युग में समस्त नबियों को दिया जाता रहा । कोई नबी भी अपने किसी अलग धर्म का प्रवर्तक नहीं था। वह धर्म सदैव इस उद्देश्य के लिए भेजा गया है कि धरती पर वही स्थापित और प्रचलित और क्रियान्वित हो। पैग़म्बर ( उन पर ईश - दया और कृपा हो) इस धर्म के मात्र प्रचार पर नहीं, बल्कि उसे स्थापित करने के सेवा-कार्य पर नियुक्त किए हुए थे। मानव - जाति का दूसरा धर्म यही था, किन्तु नबियों के पश्चात् हमेशा यही होता रहा कि स्वार्थी लोग उसके अन्दर अपने स्वेच्छाचार, अहंकार और आत्म प्रदर्शन की भावना के कारण अपने व्यक्तिगत हित के लिए साम्प्रदायिकता खड़ी करके नए - नए धर्म अविष्कृत करते रहे। अब मुहम्मद (सल्ल.) इसलिए भेजे गए हैं कि कृत्रिम पंथों और कृत्रिम धर्मों और मानव - रचित धर्मों की जगह वही वास्तविक धर्म लोगों के समक्ष प्रस्तुत करें और (पूरी दृढ़ता के साथ) उसी को स्थापित करने की कोशिश करें। तुम लोगों को एहसास नहीं है कि अल्लाह के धर्म को छोड़कर अल्लाह के अतिरिक्त दूसरों के बनाए हुए धर्म और क़ानून को ग्रहण करना अल्लाह के मुक़ाबले में कितना बड़ा दुस्साहस है। अल्लाह की दृष्टि में ये निकृष्टतम बहुदेववादी प्रथा और जघन्य अपराध है , जिसका कठोर दण्ड भुगतना पड़ेगा। इस तरह धर्म की एक साफ़ और स्पष्ट धारणा प्रस्तुत करने के पश्चात् कहा गया है कि तुम लोगों को समझाकर सीधे रास्ते पर लाने के लिए जो उत्तम - से - उत्तम उपाय सम्भव था वह प्रयोग में लाया जा चुका। इसपर भी यदि तुम मार्ग न पाओ तो फिर संसार में कोई चीज़ तुम्हें सीधे रास्ते पर नहीं ला सकती। इन यथार्थ तथ्यों को प्रस्तुत करते हुए बीच - बीच में संक्षिप्त रूप में एकेश्वरवाद और परलोकवाद के प्रमाण दिए गए हैं और सांसारिकता के परिणामों से सावधान किया गया है। फिर वार्ता को समाप्त करते हुए दो महत्त्वपूर्ण बाते कही गई हैं:

एक यह कि मुहम्मद (सल्ल.) को अपने जीवन के आरम्भिक 40 वर्षों मे किताब की धारणा से बिलकुल रहित और ईमान की समस्याओं और वार्ताओं से नितान्त अनभिज्ञ रहना , और फिर अचानक इन दोनों चीज़ों को लेकर संसार के समक्ष आ जाना आपके नबी होने का स्पष्ट प्रमाण है। दूसरे यह कि ईश्वर ने यह शिक्षा तमाम नबियों की तरह आप (सल्ल.) को भी तीन तारीक़ों से दी है— एक प्रकाशना, दूसरे परदे के पीछे से आवाज़ और तीसरे फ़रिश्ते के द्वारा संदेश। यह इसलिए स्पष्ट किया गया, ताकि विरोधी लोग यह मिथ्यारोपण न कर सके कि नबी (सल्ल.) ईश्वर से उसके सम्मुख होकर बात करने का दावा कर रहे हैं।

सुरह "अश-शूरा" का अनुवादसंपादित करें

बिस्मिल्ला हिर्रह्मा निर्रहीम अल्लाह के नाम से जो दयालु और कृपाशील है।

सूरए यूरा

सूरए अश शूरा मक्का में नाजि़ल हुआ और इसकी (53) तिरपन आयतें है

ख़ुदा के नाम से शुरू करता हूँ जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है

हा मीम (1)

ऐन सीन काफ़ (2)

(ऐ रसूल) ग़ालिब व दाना ख़़ुदा तुम्हारी तरफ़ और जो (पैग़म्बर) तुमसे पहले गुज़रे उनकी तरफ़ यूँ ही वही भेजता रहता है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है ग़रज़ सब कुछ उसी का है (3)

और वह तो (बड़ा) आलीशान (और) बुज़ुर्ग है (4)

(उनकी बातों से) क़रीब है कि सारे आसमान (उसकी हैबत के मारे) अपने ऊपर वार से फट पड़े और फ़रिश्ते तो अपने परवरदिगार की तारीफ़ के साथ तसबीह करते हैं और जो लोग ज़मीन में हैं उनके लिए (गुनाहों की) माफी माँगा करते हैं सुन रखो कि ख़़ुदा ही यक़ीनन बड़ा बक्शने वाला मेहरबान है (5)

और जिन लोगों ने ख़़ुदा को छोड़ कर (और) अपने सरपरस्त बना रखे हैं ख़़ुदा उनकी निगरानी कर रहा है (ऐ रसूल) तुम उनके निगेहबान नहीं हो (6)

और हमने तुम्हारे पास अरबी क़़ुरआन यूँ भेजा ताकि तुम मक्का वालों को और जो लोग इसके इर्द गिर्द रहते हैं उनको डराओ और (उनको) क़यामत के दिन से भी डराओ जिस (के आने) में कुछ भी शक नहीं (उस दिन) एक फरीक़ (मानने वाला) जन्नत में होगा और फरीक़ (सानी) दोज़ख़ में (7)

और अगर ख़़ुदा चाहता तो इन सबको एक ही गिरोह बना देता मगर वह तो जिसको चाहता है (हिदायत करके) अपनी रहमत में दाखि़ल कर लेता है और ज़ालिमों का तो (उस दिन) न कोई यार है और न मददगार (8)

क्या उन लोगों ने ख़़ुदा के सिवा (दूसरे) कारसाज़ बनाए हैं तो कारसाज़ बस ख़़ुदा ही है और वही मुर्दों को जि़न्दा करेगा और वही हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है (9)

और तुम लोग जिस चीज़ में बाहम एख़्तेलाफ़ात रखते हो उसका फैसला ख़ुदा ही के हवाले है वही ख़ुदा तो मेरा परवरदिगार है मैं उसी पर भरोसा रखता हूँ और उसी की तरफ़ रूजू करता हूँ (10)

सारे आसमान व ज़मीन का पैदा करने वाला (वही) है उसी ने तुम्हारे लिए तुम्हारी ही जिन्स के जोड़े बनाए और चारपायों के जोड़े भी (उसी ने बनाए) उस (तरफ़) में तुमको फैलाता रहता है कोई चीज़ उसकी मिसल नहीं और वह हर चीज़ को सुनता देखता है (11)

सारे आसमान व ज़मीन की कुन्जियाँ उसके पास हैं जिसके लिए चाहता है रोज़ी को फराख़ कर देता है (जिसके लिए) चाहता है तंग कर देता है बेशक वह हर चीज़ से ख़ूब वाकि़फ़ है (12)

उसने तुम्हारे लिए दीन का वही रास्ता मुक़र्रर किया जिस (पर चलने का) नूह को हुक्म दिया था और (ऐ रसूल) उसी की हमने तुम्हारे पास वही भेजी है और उसी का इबराहीम और मूसा और ईसा को भी हुक्म दिया था (वह) ये (है कि) दीन को क़ायम रखना और उसमें तफ़रक़ा न डालना जिस दीन की तरफ़ तुम मुशरेकीन को बुलाते हो वह उन पर बहुत याक़ ग़ुज़रता है ख़़ुदा जिसको चाहता है अपनी बारगाह का बरगुज़ीदा कर लेता है और जो उसकी तरफ़ रूजू करे (अपनी तरफ़ (पहुँचने) का रास्ता दिखा देता है (13)

और ये लोग मुतफ़र्रिक़ हुए भी तो इल्म (हक़) आ चुकने के बाद और (वह भी) महज़ आपस की जि़द से और अगर तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से एक वक़्ते मुक़र्रर तक के लिए (क़यामत का) वायदा न हो चुका होता तो उनमें कबका फैसला हो चुका होता और जो लोग उनके बाद (ख़़ुदा की) किताब के वारिस हुए वह उसकी तरफ़ से बहुत सख़्त शुबहे में (पड़े हुए) हैं (14)

तो (ऐ रसूल) तुम (लोगों को) उसी (दीन) की तरफ़ बुलाते रहे जो और जैसा तुमको हुक्म हुआ है (उसी पर क़ायम रहो और उनकी नफ़सियानी ख़्वाहिशों की पैरवी न करो और साफ़ साफ़ कह दो कि जो किताब ख़़ुदा ने नाजि़ल की है उस पर मैं ईमान रखता हूँ और मुझे हुक्म हुआ है कि मैं तुम्हारे एख़्तेलाफात के (दरमेयान) इन्साफ़ (से फ़ैसला) करूँ ख़़ुदा ही हमारा भी परवरदिगार है और वही तुम्हारा भी परवरदिगार है हमारी कारगुज़ारियाँ हमारे ही लिए हैं और तुम्हारी कारस्तानियाँ तुम्हारे वास्ते हममें और तुममें तो कुछ हुज्जत (व तक़रार की ज़रूरत) नहीं ख़़ुदा ही हम (क़यामत में) सबको इकट्ठा करेगा (15)

और उसी की तरफ़ लौट कर जाना है और जो लोग उसके मान लिए जाने के बाद ख़ुदा के बारे में (ख़्वाहमख़्वाह) झगड़ा करते हैं उनके परवरदिगार के नज़दीक उनकी दलील लग़ो बातिल है और उन पर (ख़ु़दा का) ग़ज़ब और उनके लिए सख़्त अज़ाब है (16)

ख़़ुदा ही तो है जिसने सच्चाई के साथ किताब नाजि़ल की और अदल (व इन्साफ़ भी नाजि़ल किया) और तुमको क्या मालूम शायद क़यामत क़रीब ही हो (17)

(फिर ये ग़फ़लत कैसी) जो लोग इस पर ईमान नहीं रखते वह तो इसके लिए जल्दी कर रहे हैं और जो मोमिन हैं वह उससे डरते हैं और जानते हैं कि क़यामत यक़ीनी बरहक़ है आगाह रहो कि जो लोग क़यामत के बारे में शक किया करते हैं वह बड़े परले दर्जे की गुमराही में हैं (18)

और ख़ुदा अपने बन्दों (के हाल) पर बड़ा मेहरबान है जिसको (जितनी) रोज़ी चाहता है देता है वह ज़ेार वाला ज़बरदस्त है (19)

जो शख़्स आख़ेरत की खेती का तालिब हो हम उसके लिए उसकी खेती में अफ़ज़ाइश करेंगे और दुनिया की खेती का ख़ास्तगार हो तो हम उसको उसी में से देंगे मगर आखे़रत में फिर उसका कुछ हिस्सा न होगा (20)

क्या उन लोगों के (बनाए हुए) ऐसे शरीक हैं जिन्होंने उनके लिए ऐसा दीन मुक़र्रर किया है जिसकी ख़़ुदा ने इजाज़त नहीं दी और अगर फ़ैसले (के दिन) का वायदा न होता तो उनमें यक़ीनी अब तक फैसला हो चुका होता और ज़ालिमों के वास्ते ज़रूर दर्दनाक अज़ाब है (21)

(क़यामत के दिन) देखोगे कि ज़ालिम लोग अपने आमाल (के वबाल) से डर रहे होंगे और वह उन पर पड़ कर रहेगा और जिन्होने ईमान क़़ुबूल किया और अच्छे काम किए वह बेहिष्त के बाग़ों में होंगे वह जो कुछ चाहेंगे उनके लिए उनके परवरदिगार की बारगाह में (मौजूद) है यही तो (ख़़ुदा का) बड़ा फज़ल है (22)

यही (ईनाम) है जिसकी ख़़ुदा अपने उन बन्दों को ख़ुशख़बरी देता है जो ईमान लाए और नेक काम करते रहे (ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं इस (तबलीग़े रिसालत) का अपने क़रातबदारों (एहले बैत) की मोहब्बत के सिवा तुमसे कोई सिला नहीं मांगता और जो शख़्स नेकी हासिल करेगा हम उसके लिए उसकी ख़ूबी में इज़ाफा कर देंगे बेशक वह बड़ा बख्शने वाला क़दरदान है (23)

क्या ये लोग (तुम्हारी निस्बत कहते हैं कि इस (रसूल) ने ख़़ुदा पर झूठा बोहतान बाँधा है तो अगर (ऐसा) होता तो) ख़़ुदा चाहता तो तुम्हारे दिल पर मोहर लगा देता (कि तुम बात ही न कर सकते) और ख़ुदा तो झूठ को नेस्तनाबूद और अपनी बातों से हक़ को साबित करता है वह यक़ीनी दिलों के राज़ से ख़ूब वाकि़फ है (24)

और वही तो है जो अपने बन्दों की तौबा क़ुबूल करता है और गुनाहों को माफ़ करता है और तुम लोग जो कुछ भी करते हो वह जानता है (25)

और जो लोग ईमान लाए और अच्छे अच्छे काम करते रहे उनकी (दुआ) क़़ुबूल करता है फज़ल व क़रम से उनको बढ़ कर देता है और काफ़िरों के लिए सख़्त अज़ाब है (26)

और अगर ख़ुदा ने अपने बन्दों की रोज़ी में फराख़ी कर दे तो वह लोग ज़रूर (रूए) ज़मीन से सरकशी करने लगें मगर वह तो बाक़दरे मुनासिब जिसकी रोज़ी (जितनी) चाहता है नाजि़ल करता है वह बेषक अपने बन्दों से ख़बरदार (और उनको) देखता है (27)

और वही तो है जो लोगों के नाउम्मीद हो जाने के बाद मेंह बरसाता है और अपनी रहमत (बारिश की बरकतों) को फैला देता है और वही कारसाज़ (और) हम्द व सना के लायक़ है (28)

और उसी की (क़ु़दरत की) निशानियों में से सारे आसमान व ज़मीन का पैदा करना और उन जानदारों का भी जो उसने आसमान व ज़मीन में फैला रखे हैं और जब चाहे उनके जमा कर लेने पर (भी) क़ादिर है (29)

और जो मुसीबत तुम पर पड़ती है वह तुम्हारे अपने ही हाथों की करतूत से और (उस पर भी) वह बहुत कुछ माफ़ कर देता है (30)

और तुम लोग ज़मीन में (रह कर) तो ख़ुदा को किसी तरह हरा नहीं सकते और ख़ुदा के सिवा तुम्हारा न कोई दोस्त है और न मददगार (31)

और उसी की (क़़ुदरत) की निशानियों में से समन्दर में (चलने वाले) (बादबानी जहाज़) है जो गोया पहाड़ हैं (32)

अगर ख़ुदा चाहे तो हवा को ठहरा दे तो जहाज़ भी समन्दर की सतह पर (खड़े के खड़े) रह जाएँ बेशक तमाम सब्र और शुक्र करने वालों के वास्ते इन बातों में (ख़ुदा की क़़ुदरत की) बहुत सी निशानियाँ हैं (33)

(या वह चाहे तो) उनको उनके आमाल (बद) के सबब तबाह कर दे (34)

और वह बहुत कुछ माफ़ करता है और जो लोग हमारी निशानियों में (ख़्वाहमाख़्वाह) झगड़ा करते हैं वह अच्छी तरह समझ लें कि उनको किसी तरह (अज़ाब से) छुटकारा नहीं (35)

(लोगों) तुमको जो कुछ (माल) दिया गया है वह दुनिया की जि़न्दगी का (चन्द रोज़) साज़ोसामान है और जो कुछ ख़ुदा के यहाँ है वह कहीं बेहतर और पायदार है (मगर ये) ख़ास उन ही लोगों के लिए है जो ईमान लाए और अपने परवरदिगार पर भरोसा रखते हैं (36)

और जो लोग बड़े बड़े गुनाहों और बेहयाई की बातों से बचे रहते हैं और ग़ुस्सा आ जाता है तो माफ़ कर देते हैं (37)

और जो अपने परवरदिगार का हुक्म मानते हैं और नमाज़ पढ़ते हैं और उनके कुल काम आपस के मशवरे से होते हैं और जो कुछ हमने उन्हें अता किया है उसमें से (राहे ख़ुदा में) ख़र्च करते हैं (38)

और (वह ऐसे हैं) कि जब उन पर किसी किस्म की ज़्यादती की जाती है तो बस वाजिबी बदला ले लेते हैं (39)

और बुराई का बदला तो वैसी ही बुराई है उस पर भी जो शख़्स माफ़ कर दे और (मामले की) इसलाह कर दें तो इसका सवाब ख़ुदा के जि़म्मे है बेशक वह ज़ुल्म करने वालों को पसन्द नहीं करता (40)

और जिस पर ज़़ुल्म हुआ हो अगर वह उसके बाद इन्तेक़ाम ले तो ऐसे लोगों पर कोई इल्ज़ाम नहीं (41)

इल्ज़ाम तो बस उन्हीं लोगों पर होगा जो लोगों पर ज़़ुल्म करते हैं और रूए ज़मीन में नाहक़ ज़्यादतियाँ करते फिरते हैं उन्हीं लोगों के लिए दर्दनाक अज़ाब है (42)

और जो सब्र करे और कुसूर माफ़ कर दे तो बेशक ये बड़े हौसले के काम हैं (43)

और जिसको ख़ुदा गुमराही में छोड़ दे तो उसके बाद उसका कोई सरपरस्त नहीं और तुम ज़ालिमों को देखोगे कि जब (दोज़ख़) का अज़ाब देखेंगे तो कहेंगे कि भला (दुनिया में) फिर लौट कर जाने की कोई सबील है (44)

और तुम उनको देखोगे कि दोज़ख़ के सामने लाए गये हैं (और) जि़ल्लत के मारे कटे जाते हैं (और) कनक्खियों से देखे जाते हैं और मोमिनीन कहेंगे कि हकीक़त में वही बड़े घाटे में हैं जिन्होने क़यामत के दिन अपने आप को और अपने घर वालों को ख़सारे में डाला देखो ज़ुल्म करने वाले दाएमी अज़ाब में रहेंगे (45)

और ख़ुदा के सिवा न उनके सरपरस्त ही होंगे जो उनकी मदद को आएँ और जिसको ख़ुदा गुमराही में छोड़ दे तो उसके लिए (हिदायत की) कोई राह नहीं (46)

(लोगों) उस दिन के पहले जो ख़ुदा की तरफ़ से आयेगा और किसी तरह (टाले न टलेगा) अपने परवरदिगार का हुक्म मान लो (क्यों कि) उस दिन न तो तुमको कहीं पनाह की जगह मिलेगी और न तुमसे (गुनाह का) इन्कार ही बन पड़ेगा (47)

फिर अगर मुँह फेर लें तो (ऐ रसूल) हमने तुमको उनका निगेहबान बनाकर नहीं भेजा तुम्हारा काम तो सिर्फ़ (एहकाम का) पहुँचा देना है और जब हम इन्सान को अपनी रहमत का मज़ा चखाते हैं तो वह उससे ख़ुश हो जाता है और अगर उनको उन्हीं के हाथों की पहली करतूतों की बदौलत कोई तकलीफ़ पहुँचती (सब एहसान भूल गए) बेशक इन्सान बड़ा नाशुक्रा है (48)

सारे आसमान व ज़मीन की हुकूमत ख़ास ख़ुदा ही की है जो चाहता है पैदा करता है (और) जिसे चाहता है (फ़क़त) बेटियाँ देता है और जिसे चाहता है (महज़) बेटा अता करता है (49)

या उनको बेटे बेटियाँ (औलाद की) दोनों किस्में इनायत करता है और जिसको चाहता है बांझ बना देता है बेशक वह बड़ा वाकिफ़कार क़ादिर है (50)

और किसी आदमी के लिए ये मुमकिन नहीं कि ख़ुदा उससे बात करे मगर वही के ज़रिए से (जैसे) (दाऊद) परदे के पीछे से जैसे (मूसा) या कोई फ़रिश्ता भेज दे (जैसे मोहम्मद) ग़रज़ वह अपने एख़्तेयार से जो चाहता है पैग़ाम भेज देता है बेशक वह आलीशान हिकमत वाला है (51)

और इसी तरह हमने अपने हुक्म को रूह (क़ुरआन) तुम्हारी तरफ ‘वही’ के ज़रिए से भेजे तो तुम न किताब ही को जानते थे कि क्या है और न ईमान को मगर इस (क़ुरआन) को एक नूर बनाया है कि इससे हम अपने बन्दों में से जिसकी चाहते हैं हिदायत करते हैं और इसमें शक नहीं कि तुम (ऐ रसूल) सीधा ही रास्ता दिखाते हो (52)

(यानि) उसका रास्ता कि जो आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है (ग़रज़ सब कुछ) उसी का है सुन रखो सब काम ख़ुदा ही की तरफ़ रूजू होंगे और वही फैसला करेगा (53)

सूरए अश शूरा ख़त्म

इस सूरा का प्रमुख अनुवाद:

क़ुरआन की मूल भाषा अरबी से उर्दू अनुवाद "मौलाना मुहम्मद फ़ारूक़ खान", उर्दू से हिंदी "मुहम्मद अहमद" [3] ने किया।

बाहरी कडियाँसंपादित करें

इस सूरह का दूसरे अनुवादकों द्वारा किया अनुवाद क़ुरआन प्रोजेक्ट पर देखें ash-Shura 42:1

पिछला सूरा:
फुस्सीलत
क़ुरआन अगला सूरा:
अज़-ज़ुख़रुफ़
सूरा 42

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सन्दर्भ:संपादित करें

  1. अनुवादक: मौलाना फारूक़ खाँ, भाष्य: मौलाना मौदूदी. अनुदित क़ुरआन - संक्षिप्त टीका सहित. पृ॰ 690 से.
  2. "सूरा अश़्-शूरा का अनुवाद (किंग फ़हद प्रेस)". https://quranenc.com. मूल से 22 जून 2020 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 13 जुलाई 2020. |website= में बाहरी कड़ी (मदद)
  3. "Ash-Shura सूरा का अनुवाद". http://tanzil.net. मूल से 25 अप्रैल 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 13 जुलाई 2020. |website= में बाहरी कड़ी (मदद)

इन्हें भी देखेंसंपादित करें