भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में स्थित बरेली जनपद राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ तक के राष्ट्रीय राजमार्ग के बीचों-बीच स्थित है। प्राचीन काल से इसे बोलचाल में बांस बरेली का नाम दिया जाता रहा और अब यह बरेली के नाम से ही पहचाना जाता है। इस जनपद का शहर महानगरीय है। यह उत्तर प्रदेश में आठवां सबसे बड़ा महानगर और भारत का ५०वां सबसे बड़ा शहर है। बरेली उत्तराखंड राज्य से सटा जनपद है। इसकी बहेड़ी तहसील उत्तराखंड के ऊधमसिंह नगर की सीमा के निकट है।रामगंगा नदी के तट पर बसा यह शहर प्राचीन रुहेलखंड का राजधानी मुख्यालय रहा है। बरेली का राज्य दर्जा प्राप्त महात्मा ज्योतिबा फूले रुहेलखंड विश्विद्यालय होने की वजह से उच्च शिक्षा के लिए इस विश्वविद्यालय का अधिकार क्षेत्र बरेली और मुरादाबाद मंडल के जिन नौ जिलों तक विस्तारित है, वे जिले ही प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौर में रुहेलखंड का हिस्सा रहे। ऐसे में आज भी बरेली को रुहेलखंड का मुख्यालय ही माना जाता है।महाभारत काल में बरेली जनपद की तहसील आंवला का हिस्सा पांचाल क्षेत्र हुआ करता था। ऐसे में इस शहर का ऐतिहासिक महत्व भी है। धार्मिक महत्व के चलते बरेली का खास स्थान है। नाथ सम्प्रदाय के प्राचीन मंदिरों से आच्छादित होने के कारण बरेली को नाथ नगरी भी कहा जाता है। शहर में विश्व प्रसिद्ध दरगाह आला हजरत स्थापित है,जो सुन्नी बरेलवी मुसलमानों की आस्था का प्रमुख केंद्र है।इसलिए बरेली को "बरेली शरीफ"/शहर ए आला हज़रत भी कहते हैं।ख्वाजा क़ुतुब भी यहीँ है। और खानकाह नियाजिया भी इसी शहर में है। राधेश्याम रामायण के प्रसिद्ध रचयिता पंडित राधेश्याम शर्मा कथावाचक इसी शहर के थे। मठ तुलसी स्थल भी इसी शहर में है। देश-प्रदेश के प्राचीन और प्रमुख महाविद्यालयों में शुमार बरेली कॉलेज का भी ऐतिहासिक महत्व है। देश के भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान और भारतीय पक्षी अनुसंधान संस्थान इस शहर के इज्जतनगर में बड़े कैंपस में स्थापित हैं। बॉलीवुड फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री प्रियंका चौपड़ा और पर्दे की कलाकर दिशा पाटनी बरेली से ही हैं।चंदा मामा दूर के...जैसी बाल कविता के रचयिता साहित्यकार निरंकार देव सेवक भी बरेली के ही थे। बरेली पत्रकारिता के शीर्ष स्तम्भ चन्द्रकान्त त्रिपाठी की कर्मस्थली है। वर्तमान में बरेली से केंद्रीय मंत्रिमंडल में संतोष गंगवार श्रम राज्य मंत्री स्वतन्त्र प्रभार के रूप में हैं। उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्रिमंडल में बरेली कैंट के विधायक राजेश अग्रवाल वित्त मंत्री(अगस्त2019तक) और आंवला से विधायक धर्मपाल सिंह सिंचाई मंत्री के रूप में बरेली का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

बरेली
नाथ नगरी/शहर ए आला हज़रत
ऊपर से दक्षिणावर्त: अहिच्छत्र के अवशेष, बरेली रेलवे स्टेशन, रामगंगा बैराज, बरेली नगर का दृश्य, बियाबानी कोठी, दरगाह-ए-अला हज़रत और द फ्रीविल बैपटिस्ट चर्च
ऊपर से दक्षिणावर्त: अहिच्छत्र के अवशेष, बरेली रेलवे स्टेशन, रामगंगा बैराज, बरेली नगर का दृश्य, बियाबानी कोठी, दरगाह-ए-अला हज़रत और द फ्रीविल बैपटिस्ट चर्च
समय मंडल: आईएसटी (यूटीसी+५:३०)
देश Flag of India.svg भारत
राज्य उत्तर प्रदेश
ज़िला बरेली
महापौर उमेश गौतम
जनसंख्या 8,98,167[1] (2011 के अनुसार )
क्षेत्रफल
ऊँचाई (AMSL)

• 268 मीटर (879 फी॰)

निर्देशांक: 28°21′50″N 79°24′54″E / 28.364°N 79.415°E / 28.364; 79.415

इतिहाससंपादित करें

प्राचीन इतिहाससंपादित करें

वर्तमान बरेली क्षेत्र प्राचीन काल में पांचाल राज्य का हिस्सा था। महाभारत के अनुसार तत्कालीन राजा द्रुपद तथा द्रोणाचार्य के बीच हुए एक युद्ध में द्रुपद की हार हुयी, और फलस्वरूप पांचाल राज्य का दोनों के बीच विभाजन हुआ। इसके बाद यह क्षेत्र उत्तर पांचाल के अंतर्गत आया, जहाँ के राजा द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा मनोनीत हुये। अश्वत्थामा ने संभवतः हस्तिनापुर के शासकों के अधीनस्थ राज्य पर शासन किया। उत्तर पांचाल की तत्कालीन राजधानी, अहिच्छत्र के अवशेष बरेली जिले की आंवला तहसील में स्थित रामनगर के समीप पाए गए हैं। स्थानीय लोककथाओं के अनुसार गौतम बुद्ध ने एक बार अहिच्छत्र का दौरा किया था। यह भी कहा जाता है कि जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ को अहिच्छत्र में कैवल्य प्राप्त हुआ था।

छठी शताब्दी ईसा पूर्व में, बरेली अब भी पांचाल क्षेत्र का ही हिस्सा था, जो कि भारत के सोलह महाजनपदों में से एक था।[2] चौथी शताब्दी के मध्य में महापद्म नन्द के शासनकाल के दौरान पांचाल मगध साम्राज्य के अंतर्गत आया, तथा इस क्षेत्र पर नन्द तथा मौर्य राजवंश के राजाओं ने शासन किया।[3] क्षेत्र में मिले सिक्कों से मौर्यकाल के बाद के समय में यहाँ कुछ स्वतंत्र शासकों के अस्तित्व का भी पता चलता है।[4][5] क्षेत्र का अंतिम स्वतंत्र शासक शायद अच्युत था, जिसे समुद्रगुप्त ने पराजित किया था, जिसके बाद पांचाल को गुप्त साम्राज्य में शामिल कर लिया गया था।[6] छठी शताब्दी के उत्तरार्ध में गुप्त राजवंश के पतन के बाद इस क्षेत्र पर मौखरियों का प्रभुत्व रहा।

सम्राट हर्ष (६०६-६४७ ई) के शासनकाल के समय यह क्षेत्र अहिच्छत्र भुक्ति का हिस्सा था। चीनी तीर्थयात्री ह्वेन त्सांग ने भी लगभग ६३५ ई में अहिच्छत्र का दौरा किया था। हर्ष की मृत्यु के बाद इस क्षेत्र में लम्बे समय तक अराजकता और भ्रम की स्थिति रही। आठवीं शताब्दी की दूसरी तिमाही में यह क्षेत्र कन्नौज के राजा यशोवर्मन (७२५- ५२ ईस्वी) के शासनाधीन आया, और फिर उसके बाद कई दशकों तक कन्नौज पर राज करने वाले अयोध राजाओं के अंतर्गत रहा। नौवीं शताब्दी में गुर्जर प्रतिहारों की शक्ति बढ़ने के साथ, बरेली भी उनके अधीन आ गया, और दसवीं शताब्दी के अंत तक उनके शासनाधीन रहा। गुर्जर प्रतिहारों के पतन के बाद क्षेत्र के प्रमुख शहर, अहिच्छत्र का एक समृद्ध सांस्कृतिक केंद्र के रूप में प्रभुत्व समाप्प्त होने लगा। राष्ट्रकूट प्रमुख लखनपाल के शिलालेख से पता चलता है कि इस समय तक क्षेत्र की राजधानी को भी वोदमायुत (वर्तमान बदायूं) में स्थानांतरित कर दिया गया था।

स्थापना तथा मुगल कालसंपादित करें

लगभग १५०० ईस्वी में क्षेत्र के स्थानीय शासक राजा जगत सिंह कठेरिया ने जगतपुर नामक ग्राम को बसाया था,[7] जहाँ से वे शासन करते थे - यह क्षेत्र अब भी वर्तमान बरेली नगर में स्थित एक आवासीय क्षेत्र है। १५३७ में उनके पुत्रों, बांस देव तथा बरल देव ने जगतपुर के समीप एक दुर्ग का निर्माण करवाया, जिसका नाम उन दोनों के नाम पर बांस-बरेली पड़ गया। इस दुर्ग के चारों ओर धीरे धीरे एक छोटे से शहर ने आकार लेना शुरू किया। १५६९ में बरेली मुगल साम्राज्य के अधीन आया,[7] और अकबर के शासनकाल के दौरान यहाँ मिर्जई मस्जिद तथा मिर्जई बाग़ का निर्माण हुआ। इस समय यह दिल्ली सूबे के अंतर्गत बदायूँ सरकार का हिस्सा था। १५९६ में बरेली को स्थानीय परगने का मुख्यालय बनाया गया था।[8] इसके बाद विद्रोही कठेरिया राजपूतों को नियंत्रित करने के लिए मुगलों ने बरेली क्षेत्र में वफादार अफगानों की बस्तियों को बसाना शुरू किया।

शाहजहां के शासनकाल के दौरान बरेली के तत्कालीन प्रशासक, राजा मकरंद राय खत्री ने १६५७ में पुराने दुर्ग के पश्चिम में लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर एक नए शहर की स्थापना की।[9] इस शहर में उन्होंने एक नए किले का निर्माण करवाया, और साथ ही शाहदाना के मकबरे, और शहर के उत्तर में जामा मस्जिद का भी निर्माण करवाया।[10] मकरंदपुर, आलमगिरिगंज, मलूकपुर, कुंवरपुर तथा बिहारीपुर क्षेत्रों की स्थापना का श्रेय भी उन्हें, या उनके भाइयों को दिया जाता है। १६५८ में बरेली को बदायूँ प्रांत की राजधानी बनाया गया। औरंगजेब के शासनकाल के दौरान और उसकी मृत्यु के बाद भी क्षेत्र में अफगान बस्तियों को प्रोत्साहित किया जाता रहा। इन अफ़गानों को रुहेला अफ़गानों के नाम से जाना जाता था, और इस कारण क्षेत्र को रुहेलखण्ड नाम मिला।

रुहेलखण्ड राज्यसंपादित करें

औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद दिल्ली के मुगल शासक कमजोर हो गये तथा अपने राज्य के जमींदारों, जागीरदारों आदि पर उनका नियन्त्रण घटने लगा। उस समय इस क्षेत्र में भी अराजकता फैल गयी तथा यहाँ के जमींदार स्वतन्त्र हो गये। इसी क्रम में, रुहेलखण्ड भी मुगल शासन से स्वतंत्र राज्य बनकर उभरा, और बरेली रुहेलखण्ड की राजधानी बनी। १७४० में अली मुहम्मद रुहेलखण्ड शासक बने, और उनके शासनकाल में रुहेलखण्ड की राजधानी बरेली से आँवला स्थानांतरित की गयी। १७४४ में अली मुहम्मद ने कुमाऊँ पर आक्रमण किया, और राजधानी अल्मोड़ा पर कब्ज़ा कर लिया,[11] और सात महीनों तक उनकी सेना अल्मोड़ा में ही रही। इस समय में उन्होंने वहां के बहुत से मंदिरों को नुकसान भी पहुंचाया। हालाँकि अंततः क्षेत्र के कठोर मौसम से तंग आकर, और कुमाऊँ के राजा द्वारा तीन लाख रुपए के हर्जाने के भुगतान पर, रुहेला सैनिक वापस बरेली लौट गये। इसके दो वर्ष बाद मुग़ल सम्राट मुहम्मद शाह ने क्षेत्र पर आक्रमण किया, और अली मुहम्मद को बन्दी बनाकर दिल्ली ले जाया गया।[11] एक वर्ष बाद, १७४८ में अली मुहम्मद वहां से रिहा हुए, और वापस आकर फिर रुहेलखण्ड के शासक बने, परन्तु इसके एक वर्ष बाद ही उनकी मृत्यु हो गयी, और उन्हें राजधानी आँवला में दफना दिया गया।[11]

 
बरेली में स्थित हाफिज रहमत खान का मकबरा, मई १७८९

अली मुहम्मद के पश्चात उनके पुत्रों के संरक्षक, हाफ़िज़ रहमत खान रुहेलखण्ड के अगले शासक हुए।[11] इसी समय में फर्रुखाबाद के नवाब ने रुहेलखण्ड पर आक्रमण कर दिया, परन्तु हाफ़िज़ रहमत खान ने उनकी सेना को पराजित कर नवाब को मार दिया।[11] इसके बाद वह उत्तर की ओर सेना लेकर बढ़े, और पीलीभीत और तराई पर कब्ज़ा कर लिया।[11] फर्रुखाबाद के नवाब की मृत्यु के बाद अवध के वज़ीर सफदरजंग ने उनकी संपत्ति को लूट लिया, और इसके कारण रुहेलखण्ड और फर्रुखाबाद ने एक साथ संगठित होकर सफदरजंग को हराया, इलाहाबाद की घेराबन्दी की, और अवध के एक हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया।[11] इसके परिमाणस्वरूप वजीर ने मराठों से सहायता मांगी, और उनके साथ मिलकर आँवला के समीप स्थित बिसौली में रुहेलाओं को पराजित किया।[11] उन्होंने चार महीने तक पहाड़ियों की तलहटी में रुहेलाओं को कैद रखा; लेकिन अहमद शाह दुर्रानी के आक्रमण के समय उपजे हालातों में दोनों के बीच संधि हो गयी, और हाफिज खान पुनः रुहेलखण्ड के शासक बन गये।[11]

१७५४ में जब शुजाउद्दौला अवध के अगले वज़ीर बने, तो हाफिज भी रुहेलखण्ड की सेना के साथ उन पर आक्रमण करने निकली मुगल सेना में शामिल हो गये, लेकिन वज़ीर ने उन्हें ५ लाख रुपये देकर खरीद लिया।[12] १७६१ में हाफ़िज़ रहमत खान ने पानीपत के तृतीय युद्ध में अफ़ग़ानिस्तान तथा अवध के नवाबों का साथ दिया, और उनकी संयुक्त सेनाओं ने मराठों को पराजित कर उत्तर भारत में मराठा साम्राज्य के विस्तार को अवरुद्ध कर दिया।[12] अहमद शाह के आगमन, और शुजाउद्दौला के ब्रिटिश सत्ता से संघर्षों का फायदा उठाकर हाफ़िज़ ने उन वर्षों के दौरान इटावा पर कब्ज़ा किया, और लगातार अपने शहरों को मजबूत करने के साथ-साथ और नए गढ़ों की स्थापना करते रहे।[12] १७७० में, नजीबाबाद के रुहेला शासक नजीब-उद-दौला सिंधिया और होल्कर मराठा सेना के साथ आगे बढ़े, और उन्होंने हाफ़िज़ खान को हरा दिया, जिस कारण हाफ़िज़ को अवध के वज़ीर से सहायता मांगनी पड़ी।[12]

शुजाउद्दौला ने मराठों को ४० लाख रुपये का भुगतान किया, और वे रुहेलखण्ड से वापस चले गए।[12] इसके बाद, अवध के नवाब ने हाफ़िज़ खान से इस मदद के लिए भुगतान करने की मांग की। जब हाफ़िज़ उनकी यह मांग पूरी नहीं कर पाए, तो उन्होंने ब्रिटिश गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स और उनके कमांडर-इन-चीफ, अलेक्जेंडर चैंपियन की सहायता से रुहेलखण्ड पर आक्रमण कर दिया। १७७४ में दौला और कंपनी की संयुक्त सेना ने हाफ़िज़ को हरा दिया, जो मीराँपुर कटरा में युद्ध में मारे गए, हालाँकि अली मुहम्मद के पुत्र, फ़ैजुल्लाह ख़ान युद्ध से बचकर भाग गए।[12] कई वार्ताओं के बाद उन्होंने १७७४ में ही शुजाउद्दौला के साथ एक संधि की, जिसके तहत उन्होंने सालाना १५ लाख रुपये, और ९ परगनों को अपने शासनाधीन रखा, और शेष रुहेलखण्ड वज़ीर को दे दिया।[12]

१७७४ से १८०० तक रुहेलखण्ड प्रांत अवध के नवाब द्वारा शासित था। अवध राज में सआदत अली को बरेली का गवर्नर नियुक्त किया गया था।[12] १८०१ तक, ब्रिटिश सेना का समर्थन करने के लिए संधियों के कारण सब्सिडी बकाया हो गई थी। कर्ज चुकाने के लिए, नवाब सआदत अली खान ने १० नवंबर १८०१ को हस्ताक्षरित संधि में रुहेलखण्ड को ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया।[12]

कम्पनी शासनसंपादित करें

१८०१ में बरेली समेत पूरा रुहेलखण्ड क्षेत्र ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधिपत्य में आया था, और तत्कालीन गवर्नर जनरल के भाई हेनरी वेलेस्ली को बरेली में स्थित आयुक्तों के बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। १८०५ में एक पिंडारी, अमीर खान ने रुहेलखण्ड पर आक्रमण किया, लेकिन उसे बाहर खदेड़ दिया गया। इसके बाद इस क्षेत्र को दो जिलों में व्यवस्थित किया गया - मुरादाबाद तथा बरेली, जिनमें से बाद वाले जिले का मुख्यालय बरेली नगर में था। नगर में इस समय कई नए आवासीय और व्यावसायिक क्षेत्रों का गठन किया गया, और इसे नैनीताल, पीलीभीत, मुरादाबाद तथा फर्रुखाबाद से जोड़ने वाली सड़कों का निर्माण हुआ। १८११ में नगर के दक्षिण की ओर नकटिया नदी के पश्चिम में बरेली छावनी की स्थापना की गयी, जहाँ एक छोटे से दुर्ग का निर्माण किया गया था। छावनी क्षेत्र में उस समय पूरे नगर से कहीं अधिक भवन थे।

कम्पनी शासनकाल के दौरान, जिले भर में कम्पनी के विरुद्ध असंतोष की भावना थी। १८१२ में राजस्व की मांग में भारी वृद्धि, और फिर १८१४ में एक नए गृह कर के लागू होने से अंग्रेजों के खिलाफ काफी आक्रोश हुआ। "व्यापार अभी भी ठप्प पड़ा था, दुकानें बंद हो गईं और कई लोग करों के उन्मूलन की मांग के साथ न्यायालय के पास इकट्ठे हुए।" मजिस्ट्रेट डेम्बलटन, जो पहले से ही अलोकप्रिय थे, ने एक कोतवाल को मूल्यांकन करने का आदेश देकर स्थिति को और बिगाड़ दिया। फलस्वरूप कैप्टन कनिंघम के नेतृत्व में सिपाहियों और विद्रोही जनता के बीच हुई झड़प में, लगभग तीन से चार सौ लोग मारे गए। १८१८ में ग्लिन को बरेली के मजिस्ट्रेट और कार्यवाहक न्यायाधीश, और साथ ही बुलंदशहर के संयुक्त मजिस्ट्रेट के रूप में तैनात किया गया था। बरेली जिले के कुछ हिस्सों से १८१३-१४ में शाहजहाँपुर जिले का, जबकि १८२४ में बदायूँ जिले का गठन किया गया।

१८५७ का विद्रोहसंपादित करें

बरेली १८५७ के विद्रोह का एक प्रमुख केंद्र था। मेरठ से शुरू हुए विद्रोह की खबर १४ मई १८५७ को बरेली पहुंची। इस समय उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में दंगे हुए, और बरेली, बिजनौर और मुरादाबाद में मुसलमानों ने मुस्लिम राज्य के पुनरुद्धार का आह्वान किया। ३१ मई को जब अंग्रेज सिपाही चर्च में प्रार्थना कर रहे थे, तब तोपखाना लाइन में सूबेदार बख्त खान के नेतृत्व में १८वीं और ६८वीं देशज रेजीमेंट ने विद्रोह कर दिया, और सुबह ११ बजे कप्तान ब्राउन का मकान जला दिया गया। इसके बाद ६८वीं पैदल सेना ने अपनी लाइन के पास के यूरोपियनों पर आक्रमण किया। छोटी-छोटी टुकड़ियां अलग-अलग बंगलों की ओर चल पड़ीं जबकि बाकी बचे सिपाहियों ने इधर-उधर भागना चाहने वाले अंग्रेजों को पकड़ने का प्रबंध किया। इस हमले से डरे-सहमे यूरोपियन लोग घुड़सवारों की लाइन की ओर दौड़े और वहां जाते ही नेटिव घुड़सवार रेजिमेंट को विद्रोहियों पर आक्रमण करने का आदेश दिया गया, पर उस रेजिमेंट ने भी विद्रोह कर दिया। छावनी में विद्रोह सफल होने की सूचना शहर में फैलते ही जगह-जगह अंग्रेजों पर हमले शुरू हो गए, और शाम चार बजे तक बरेली पर क्रांतिकारियों का कब्जा हो चुका था। इस दिन १६ अंग्रेज अफसरों को मौत के घाट उतार दिया गया, जिनमें ब्रिगेडियर सिवाल्ड, कप्तान ब्राउन, सार्जेंट वाल्डन, कैप्टन कर्बी, लेफ्टिनेंट फ्रेजर, सेशन जज रेक्स, कर्नल ट्रूप, कैप्टन रॉबर्टसन और जेलर हैंस ब्रो आदि शामिल थे। बचे हुए लोग नैनीताल की तरफ भाग गए, जिनमें से लगभग बत्तीस अधिकारी नैनीताल तक सही-सलामत पहुंच सके।[13][14]

अंग्रेजी निशान उतार फेंककर बरेली में स्वतंत्रता का हरित ध्वज फहराते ही नेटिव तोपखाने के मुख्य सूबेदार बख्त खान ने सारी नेटिव सेना का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया।[15] फिर उन्होंने अंतिम रुहेला शासक हाफ़िज़ रहमत खान के पोते, खान बहादुर खान के नाम का जयघोष करके दिल्ली के बादशाह के सूबेदार की हैसियत से रुहेलखंड का शासन भी अपने हाथ में लिया। बरलेी में स्थित यूरोपियनों के घर-द्वारो को जलाकर, लूटकर भस्म करने के बाद फिर कैद किए गए यूरोपियनों को खानबहादुर ने अपने सामने बुलवायां और उनकी जांच के लिए एक कोर्ट नियुक्त किया। इन अपराधियों में बदायूँ प्रांत के लेफ्टिनेंट गवर्नर के दामाद- डाॅ ‘हे’, बरेली के सरकारी काॅलेज के प्रिंसिपल डाॅ. कर्सन और बरेली के जिला मजिस्ट्रेट भी थे। अलग-अलग आरोपों के कारण इन सभी को फांसी का दंड सुनाया गया और छह यूरोपियन लोगों को तुरंत फांसी पर चढ़ा दिया गया। इस तरह अपना सिंहासन पक्का जमाने के बाद खान बहादुर ने सारा रुहेलखंड स्वतंत्र होने का समाचार दिल्ली भेजा और फिर बख्त खान के नेतृत्व में सभी सैनिक दिल्ली की ओर चल दिए। विद्रोह के सफल होने के बाद पहली जून को विजय जुलूस निकाला गया और कोतवाली के समीप एक ऊंचे चबूतरे पर खान बहादुर खान को बैठाकर उनकी ताजपोशी की गई, और जनता की उपस्थिति में उन्हें बरेली का नवाब घोषित कर दिया गया।[15] इसके बाद खानबहादुर ने सारा रुहेलखंड स्वतंत्र हो जाने का समाचार दिल्ली भेजा। ११ माह तक बरेली आजाद रहा। इस अवधि के दौरान खान बहादुर खां ने शोभाराम को अपना दीवान बनाया,[15] १ जून १८५७ को बरेली में फौज का गठन किया गया, और स्वतंत्र शासक के रूप में बरेली से चांदी के सिक्के जारी किए।

१३ मई १८५८ को ब्रिटिश सेना की ९वीं रेजिमेंट ऑफ़ फुट के कमांडर, कॉलिन कैंपबेल, प्रथम बैरन क्लाइड ने बरेली पर आक्रमण कर दिया, और ९३ वीं (सदरलैंड) हाईलैंडर्स के कप्तान विलियम जॉर्ज ड्रमंड स्टुअर्ट की सहायता से लड़ाई में विजय प्राप्त कर ब्रिटिश शासन बहाल किया। कुछ विद्रोहियों को पकड़ लिया गया और उन्हें मौत की सजा दी गई। परिमाणस्वरूप १८५७ का विद्रोह बरेली में भी विफल हो गया। खान बहादुर खान नेपाल भाग निकले, लेकिन नेपाल नरेश जंग बहादुर ने उन्हें हिरासत में लेकर अंग्रेजों के सुपुर्द कर दिया।[16] 1 जनवरी 1858 को उन्हें मुकदमे के लिए बरेली लाकर छावनी में रखा गया।[16] मुकदमा 1 फरवरी को शुरू हुआ, जिसमें उन्हें मौत की सजा सुनाई गई और २४ फरवरी १८६० को कोतवाली में फांसी दे दी गई।[17] उन्हें पुरानी जिला जेल के सामने दफन किया गया जहां आज भी उनकी मजार है। खान बहादुर खान के अतिरिक्त २५७ अन्य क्रांतिकारियों को भी कमिश्नरी के समीप एक बरगद के पेड़ के नीचे फांसी दे दी गयी।[18]

ब्रिटिश राजसंपादित करें

१८५८ में जब बरेली पुनः ब्रिटिश शासन के अंतर्गत आया, तो छावनी क्षेत्र में नियमित ब्रिटिश सैन्य टुकड़ियों की तैनाती की गयी।[19] छावनी तब मुख्य रूप से तीन भागों में बंटी हुई थी; पूर्वी भाग में भारतीय इन्फैंट्री लाइनें स्थित थी, मध्य भाग में ब्रिटिश इन्फैंट्री लाइनें और एक भारतीय बटालियन थी, जबकि अर्टिलरी लाइनों को पश्चिमी भाग में तैनात किया गया था।[19] छावनी तथा नगर के बीच काफी खली क्षेत्र था, जिस पर रेस कोर्स या पोलो ग्राउंड में अतिक्रमण किये बिना २ या अधिक बटालियनें रह सकती थी। अगले कुछ सालों में इस क्षेत्र पर सिविल लाइन्स क्षेत्र बसाया गया, जिसमें तब केवल ब्रिटिश अफसर रहा करता थे।[20]

भूगोलसंपादित करें

जलवायुसंपादित करें

बरेली की जलवायु आर्द्र उपोष्णकटिबंधीय जलवायु (कोपेन जलवायु वर्गीकरण: सीएफए) है। यहाँ का वार्षिक औसत तापमान २५°C है। वर्ष के सबसे गर्म माह, जून में औसत तापमान ३२.८°C रहता है, जबकि १५°C औसत तापमान के साथ जनवरी वर्ष का सबसे ठंडा महीना होता है। बरेली में औसतन १०३८.९ मिमी वर्षा होती है। जुलाई में सर्वाधिक - औसतन ३०७.३ मिमी औसत वर्षा होती है, जबकि नवंबर में सबसे कम - लगभग ५.१ मिमी औसत वर्षा होती है। वर्ष भर में औसतन ३७.७ दिन वर्षा होती है - सबसे अधिक १०.३ दिनों तक अगस्त में, और सबसे कम ०.५ दिनों तक नवंबर में। हालांकि पूरे साल बारिश होती है, परन्तु फिर भी गर्मियों में सर्दियों की तुलना में वर्षा अधिक होती है।

बरेली के जलवायु आँकड़ें
माह जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितम्बर अक्टूबर नवम्बर दिसम्बर वर्ष
उच्चतम अंकित तापमान °C (°F) 29.4
(84.9)
34.0
(93.2)
41.6
(106.9)
45.5
(113.9)
46.7
(116.1)
47.3
(117.1)
46.0
(114.8)
40.6
(105.1)
38.7
(101.7)
38.3
(100.9)
36.1
(97)
30.0
(86)
47.3
(117.1)
औसत उच्च तापमान °C (°F) 21.6
(70.9)
24.0
(75.2)
30.6
(87.1)
36.8
(98.2)
43.9
(111)
45.6
(114.1)
33.9
(93)
32.6
(90.7)
33.0
(91.4)
32.3
(90.1)
28.0
(82.4)
23.2
(73.8)
32.13
(89.83)
औसत निम्न तापमान °C (°F) 8.3
(46.9)
10.4
(50.7)
15.2
(59.4)
20.9
(69.6)
25.1
(77.2)
27.0
(80.6)
26.1
(79)
25.8
(78.4)
24.4
(75.9)
19.3
(66.7)
12.7
(54.9)
9.3
(48.7)
18.71
(65.67)
निम्नतम अंकित तापमान °C (°F) 0.6
(33.1)
0.0
(32)
5.0
(41)
11.1
(52)
16.1
(61)
18.9
(66)
17.4
(63.3)
20.9
(69.6)
16.7
(62.1)
8.9
(48)
5.1
(41.2)
1.7
(35.1)
0
(32)
औसत वर्षा मिमी (inches) 22.9
(0.902)
25.3
(0.996)
14.5
(0.571)
8.9
(0.35)
19.3
(0.76)
106.4
(4.189)
307.0
(12.087)
290.9
(11.453)
186.1
(7.327)
44.9
(1.768)
3.9
(0.154)
9.7
(0.382)
1,039.8
(40.939)
स्रोत #1: भारत मौसम विज्ञान विभाग (१९०१-२०००)[21]
स्रोत #2: भारत मौसम विज्ञान विभाग (२०१० तक उच्चतम तथा न्यूनतम रिकॉर्ड तापमान)[22]

जनसांख्यिकीसंपादित करें

वर्ष जन.
1847 92,208
1853 1,01,507 10.1%
1865 1,05,649 4.1%
1872 1,02,982 −2.5%
1881 1,13,417 10.1%
1891 1,21,039 6.7%
1901 1,33,167 10.0%
1911 1,29,462 −2.8%
1921 1,29,459 −0.0%
1931 1,44,031 11.3%
1941 1,92,688 33.8%
1951 2,08,083 8.0%
1961 2,72,828 31.1%
1971 3,26,106 19.5%
1981 4,49,425 37.8%
1991 5,90,661 31.4%
2001 7,20,315 22.0%
2011 9,04,797 25.6%
Source: १८४७-१८६५ - बरेली डिस्ट्रिक्ट गजेटियर १९११[23]
१८७२-१८९१ – इम्पीरियल गजेटियर आफ़ इण्डिया[24]
१९०१-२०११ – डिस्ट्रिक्ट सेन्सस हैंडबुक[25]:६१२

२०११ की भारत की जनगणना के अनुसार बरेली नगर की जनसंख्या ९,०३,६६८ है, जिसमें नगर निगम के अधिकार क्षेत्र के बाहर स्थित कुछ हिस्सों की जनसंख्या जोड़ने पर यह ९,०४,७९७ हो जाती है।[26] २००१ में नगर की जनसंख्या ७,२०,३१५ थी तथा २००१-२०११ के दशक में नगर की जनसंख्या वृद्धि दर २.३१ % रही।[27] बरेली नगर, बरेली छावनी तथा इसके आस-पास बसे कुछ छोटे-मोटे नगर मिलकर बरेली महानगर क्षेत्र का निर्माण करते हैं, २०११ की जनगणना के अनुसार जिसकी जनसंख्या ९,८५,७५२ है। जनसंख्या के आधार पर बरेली राज्य का आठवाँ तथा देश का ५०वां सबसे बड़ा नगर है।[26]

कुल १०६.४३ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले बरेली नगर में २०११ की जनगणना के अनुसार १,६६,४४७ परिवार निवास करते हैं,[25]:६१२ तथा नगर का जनसंख्या घनत्व ८५०१ व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है,[25]:६१४ जो कि राज्य के औसत घनत्व – ८२८ व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर से अधिक है। कुल जनसंख्या में से पुरुषों की संख्या ४,७७,५१५ (कुल जनसंख्या का ५२.८ %) है,[27] जबकि महिलाओं की संख्या ४,२७,२८२ (कुल जनसंख्या का ४७.२ %) है,[27] और इस प्रकार नगर का लिंगानुपात ८९५ महिलाएं प्रति १००० पुरुष है,[25]:६१४ जो कि राज्य के औसत लिंगानुपात – ९१२ महिलाएं प्रति १००० पुरुष से कम है। २००१ में नगर का लिंगानुपात ८९६ महिलाएं प्रति १००० पुरुष था तथा २००१-२०११ के दशक में नगर में इसमें एक अंक की गिरावट आयी।[25]:६१४ शहर में ० से ६ वर्ष की उम्र के बच्चों की संख्या १,०७,३२३ है, जो नगर की कुल जनसंख्या का ११.८८ % है। कुल बच्चों में से ५६,५२३ लड़के हैं, जबकि शेष ५०,८०० लड़कियां हैं।[26]

२०११ की जनगणना के अनुसार नगर की कुल जनसंख्या में से ७१,२१६ लोग (कुल जनसंख्या का ०.८ %) अनुसूचित जातियों से सम्बन्ध रखते हैं।[28] इनमें ३७,७६३ पुरुष हैं, और ३३,४५३ महिलाएं हैं।[28] इसके अतिरिक्त अनुसूचित जनजातियों से सम्बन्ध रखने वाले लोगों की संख्या २,७७१ (कुल जनसंख्या का ०.००३ %) है; पुरुषों की संख्या १,४५८ है, जबकि महिलाओं की संख्या १,३५३ है।[28] नगर में स्थित झुग्गियों की संख्या २४,९११ है। इन झुग्गियों में १,४४,०९७ लोग निवास करते हैं, जो शहर की कुल जनसंख्या का लगभग १५.९३ % है।[26] बरेली में साक्षर लोगों की संख्या ५,४३,५१५ हैं जिनमें ३,०५,८०५ पुरुष हैं जबकि २,३७,७१० महिलाएं हैं,[28] और इस प्रकार नगर की औसत साक्षरता दर ६८.२५ % है,[28] जो कि राज्य की औसत साक्षरता दर – ७९ % से कम है। पुरुष और महिला साक्षरता दर क्रमशः ७२.७४ % और ६३.२३ % है।[28]

२०११ की जनगणना के अनुसार बरेली की कुल जनसंख्या में से ३,०३,३९२ लोग कार्य गतिविधियों में संलग्न हैं, जिनमें १,९७,९२५ पुरुष और ३७,८११ महिलाएं हैं।[28] इनमें से २,३५,७३६ लोगों ने (कुल क्रमिकों का ७७.७ %) अपने काम को मुख्य कार्य (६ महीने से अधिक समय तक रोजगार या कमाई प्रदान करने वाले कार्य) के रूप में वर्णित किया, जबकि शेष ६७,६५६ लोग (कुल क्रमिकों का २२.३ %) ६ महीने से कम समय के लिए आजीविका प्रदान करने वाली सीमांत गतिविधि में शामिल हैं।[27] नगर में १३,९४९ लोग कृषि से जुड़े हुए हैं - ४,७६६ लोग कृषक (भूमि मालिक या सह-स्वामी) हैं, जबकि ९,१७३ लोग इनके खेतों में काम करने वाले मजदूर हैं।[28] इसके अतिरिक्त २७,८५५ लोग घरेलू उद्योग में लिप्त हैं, जबकि १,९३,९३२ लोगों ने अन्य कार्यों को अपनी आजीविका का साधन बताया।[28]

बरेली में धर्म (२०११)[26]
धर्म अनुयायियों का प्रतिशत
हिन्दू धर्म
  
58.58%
इस्लाम धर्म
  
38.80%
सिख धर्म
  
0.90%
ईसाई धर्म
  
0.78%
अन्य†
  
0.93%

५८.५८ % अनुयायियों के साथ हिन्दू धर्म बरेली शहर में बहुसंख्यक धर्म है।[26] इस्लाम धर्म शहर में दूसरा सबसे लोकप्रिय धर्म है, जिसके लगभग ३८.८० % अनुयायी हैं।[26] बरेली में, ईसाई धर्म का ०.७८ % लोगों द्वारा, जैन धर्म का ०.०५ % लोगों द्वारा, सिख धर्म का ०.९० % लोगों द्वारा और बौद्ध धर्म का ०.९० % लोगों द्वारा द्वारा पालन किया जाता है।[26] इसके अतिरिक्त, शहर की कुल जनसंख्या में से लगभग ०.०३ % लोग उपरोक्त से अलग किसी 'अन्य धर्म' का, जबकि लगभग ०.८१ % लोग किसी विशेष धर्म का पालन नहीं करते हैं।[26]

नगर में बोली जाने वाली प्रमुख भाषाएँ हिन्दी तथा उर्दू हैं, जो कि उत्तर प्रदेश राज्य की आधिकारिक भाषाएँ भी हैं।[29] शेष भारत की ही तरह यहाँ भी अंग्रेजी भाषा अच्छी तरह बोली-समझी जाती है। नगर क्षेत्र में मुख्यतः मानक हिन्दी का ही चलन है, हालाँकि आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों में खड़ीबोली तथा कुछ हद तक ब्रजभाषा का भी प्रभाव मिलता है। नगर में अन्य कम बोली जाने वाली भाषाओं में पंजाबी और कुमाऊँनी प्रमुख हैं, जो इन क्षेत्रों से आये अप्रवासी समुदायों द्वारा बोली जाती हैं।

परिवहनसंपादित करें

बरेली नगर रेलवे तथा सड़क मार्ग द्वारा देश के महत्त्वपूर्ण भागों से सम्बद्ध है। ये भारत की राजधानी नई दिल्ली से 265km है और उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ से 256km है।

रेल मार्गसंपादित करें

बरेली में छह रेलवे स्टेशन हैं:-

इनमें से तीन स्टेशन - बरेली जंक्शन, रामगंगा तथा सी॰ बी॰ गंज उत्तर रेलवे के मुरादाबाद मण्डल के अंतर्गत, जबकि शेष तीन उत्तर-पूर्व रेलवे के इज्जतनगर मण्डल के अंतर्गत आते हैं, जिसका मुख्यालय इज्जत नगर में ही स्थित है। बरेली जंक्शन, चनेहटी तथा सी॰ बी॰ गंज लखनऊ-मुरादाबाद रेलवे लाइन पर, रामगंगा बरेली-चंदौसी लूप पर जबकि बरेली सिटी तथा इज्जतनगर बरेली-काठगोदाम रेलवे लाइन पर स्थित हैं। बरेली जंक्शन नगर का सबसे बड़ा रेलवे स्टेशन है।

वाराणसी को लखनऊ से जोड़ने के बाद अवध व रुहेलखण्ड रेलवे ने लखनऊ के पश्चिम में रेलवे सेवाओं का विस्तार करना शुरू किया। इसी क्रम में लखनऊ से संडीला और फिर हरदोई तक रेलवे लाइन का निर्माण १८७२ में पूरा हुआ।[30] १८७३ में बरेली तक की लाइन पूरी हुई,[30] और उसी वर्ष इस रेलवे स्टेशन का निर्माण हुआ। इससे पहले १८७२ में मुरादाबाद से चंदौसी को जोड़ने वाली एक लाइन भी बन चुकी थी, और फिर १८७३ में ही इसे भी बरेली तक बढ़ा दिया गया।[30] रामपुर होते हुए बरेली-मुरादाबाद कॉर्ड १८९४ में बनकर तैयार हुआ था।[30] कालांतर में इसे मुख्य लाइन, तथा पुरानी लाइन को चंदौसी लूप कहा जाने लगा। १८९४ में एक ब्रांच लाइन चंदौसी से अलीगढ़ तक बनाई गयी थी।[31]

१८८४ में दो मीटर गेज सेक्शन बनाए गए; भोजीपुरा से बरेली (१२ मील लम्बा) १ अक्टूबर १८८४ को खोला गया, और पीलीभीत से भोजीपुरा (२४ मील) १५ नवंबर १८८४ को खोला गया। ये दोनों बरेली-पीलीभीत प्रांतीय राज्य रेलवे का हिस्सा थे। १ जनवरी १८९१ को इसका विलय लखनऊ-सीतापुर प्रांतीय राज्य रेलवे के साथ कर लखनऊ-बरेली रेलवे की स्थापना की गयी थी। सन् १८८३-८४ में भोजीपुरा और काठगोदाम के बीच भी रेलमार्ग बिछाया गया था। ६६ मील लंबा यह रेलमार्ग "रुहेलखंड व कुमाऊँ रेलवे" द्वारा संचालित एक निजी रेलमार्ग था। रुहेलखंड व कुमाऊँ रेलवे द्वारा बरेली से दक्षिण की ओर भी रेलमार्ग बिछाया गया - कासगंज एक्सटेंशन लाइन नामक यह रेलमार्ग १८८५ में सोरों तक, और १९०६ में कासगंज तक बनकर तैयार हुआ था।[32]

वायु मार्गसंपादित करें

बरेली में एक विमानक्षेत्र स्थित है; नैनीताल रोड पर इज्जत नगर में स्थित त्रिशूल वायुसेना बेस नामक यह विमानक्षेत्र वास्तव में भारतीय वायु सेना द्वारा नियंत्रित एक सैन्य हवाई अड्डा है। इस विमानक्षेत्र का एक सिविल एन्क्लेव पीलीभीत बाय-पास रोड पर मयूर वन चेतना केंद्र के पास बनाया गया है, जहाँ से केंद्र सरकार की उड़ान योजना के तहत लखनऊ और दिल्ली के लिए उड़ानों का संचालन जाएगा। एएआई और डीजीसीए के निर्देशानुसार, हवाई अड्डे पर एटीआर के साथ ७२ सीटर विमान संचालित होंगे। बरेली विमानक्षेत्र का उद्घाटन उत्तर प्रदेश राज्य के नागरिक उड्डयन मंत्री नंद गोपाल नंदी और केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार द्वारा १० मार्च २०१९ को किया गया था।

आंतरिक परिवहनसंपादित करें

बरेली नगर में सिटी बस सेवा शुरुआत उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम द्वारा कुतुबखाना - रेलवे जंक्शन मार्ग पर की गई थी।[33] वर्ष १९६० में कुल ४ बसें नगरीय मार्गों पर चलती थी, और १९६४ में ६ नयी बसें लायी गयी, जिससे इनकी कुल संख्या बढ़कर १० हो गयी।[34] १९६३-६४ तक बस सेवाओं का विस्तार कोहाड़ापीर से भोजीपुरा और फतेहगंज तक किया जा चुका था।[33] १९७० के दशक के अंत तक छह निजी बसें यूपीएसआरटीसी के नियंत्रण में चल रही थी, जिनमें प्रतिदिन औसतन ५००० यात्री सफर करते थे।[35] परन्तु धीरे-धीरे शहर की सड़कों पर ट्रैफिक बढ़ने और छोटे वाहनों के आ जाने से रोडवेज की यह बस सेवा घाटे में जाने लगी, और फिर वर्ष १९९० में इसे बन्द कर दिया गया। बन्द होने से पहले इस सेवा के अंतर्गत बसें कुतुबखाना से जंक्शन, सदर कैंट, सेंथल, नवाबगंज, फरीदपुर और फतेहगंज पश्चिमी को संचालित होती थीं।[36]

सरकार, प्रशासन तथा सुविधाएंसंपादित करें

नगर प्रशासनसंपादित करें

बरेली के नगरपालिका बोर्ड का गठन २४ जून १८५८ को १८५० के उत्तर-पश्चिम प्रांत और अवध अधिनियम XXVI के तहत किया गया था। तब यह एक नगरपालिका समिति थी, जिसका गठन जिला मजिस्ट्रेट की अध्यक्षता में मनोनीत सदस्यों द्वारा होता था। नौ मनोनीत सदस्यों में से सात ब्रिटिश होते थे। जिलाधिकारी भी एक अंग्रेज ही होते थे। बाद में, १८६८ के उत्तर-पश्चिम प्रांत और अवध नगर सुधार अधिनियम ('६८ का अधिनियम VI) ने वैकल्पिक सिद्धांत की सिफारिश की। यह विधिवत लागू किया गया था। हालाँकि, जिला मजिस्ट्रेट फिर भी इस समिति के अध्यक्ष बने रहे। वर्ष १८६८ तक सदस्यों को सरकार द्वारा नामित किया जाता रहा था, जब वैकल्पिक सिद्धांत को आंशिक रूप से अपना नहीं लिया गया / २७ सदस्य चुनाव प्रक्रिया द्वारा आते थे, और ९ को नामांकित किया जाता था। यह प्रणाली १९०० तक जारी रही जब १९०० के अधिनियम के तहत, नामित सदस्यों की संख्या ६ हो गई और निर्वाचित सदस्य १८ हो गए। १९१६ के नगरपालिका अधिनियम द्वारा नामांकित सदस्यों को घटाकर ३ किया गया और निर्वाचित सदस्यों को बढ़ाकर १९ किया गया। १९६३ में इसमें फिर फेरबदल हुए; कुल ४८ सदस्यीय समिति के सभी सदस्य अब निर्वाचित होकर आते थे, और नामांकन की प्रणाली को समाप्त कर दिया गया। आम तौर पर बोर्ड का कार्यकाल ४ वर्ष का होता है।।[37]

बैंकिंग का व्यवसाय १८८२ में शुरू हुआ था, भारतीय स्टेट बैंक की तीन शाखाएं (पूर्व में इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया) १९२३ में खोली गई थीं, शहर के स्वामित्व वाले 'बरेली कॉर्पोरेशन बैंक' की स्थापना १९२८ में हुई थी और इसे आसपास के शहरों जैसे शाहजहांपुर, पीलीभीत और आगरा में भी खोला गया था। इलाहाबाद बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा और पंजाब नेशनल बैंक की शाखाएं बाद में आईं।[35]

चिकित्सासंपादित करें

बरेली में ३४३ निजी अस्पातल है, जबकि १५ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, और १८ अर्बन हेल्थ पोस्ट है। इनके अतिरिक्त नगर में एक जिला अस्पताल, एक जिला महिला अस्पताल और एक मानसिक चिकित्सालय भी है।[38]

संस्कृतिसंपादित करें

पर्व / त्यौहारसंपादित करें

 
उत्तरायणी मेला बरेली, २०१९

बरेली में लगने वाले प्रमुख मेलों में रामगंगा का चौबारी मेला, बरेली क्लब में लगने वाला उत्तरायणी मेला, नरियावल का मेला और कैण्ट का दशहरा मेला इत्यादि प्रमुख हैं। चौबारी मेला प्रतिवर्ष चौबारी ग्राम के समीप रामगंगा तट पर लगता है। यह मेला कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा-स्नान के अवसर पर लगता है। इस मेले का सबसे बड़ा आकर्षण नखाड़ घोड़ो का बाजार होता है, जिसमें दूर-दराज के क्षेत्रों से लोग अपने घोड़ों का सौदा करने और खरीदने आते हैं।[39] तीन दिवसीय उत्तरायणी मेला भी प्रतिवर्ष बरेली क्लब मैदान में 'उत्तरायणी जनकल्याण समिति' द्वारा आयोजित किया जाता है। मेला १३ से १५ जनवरी तक मकर संक्रान्ति के अवसर पर लगता है। मेले का मुख्य आकर्षण यहाँ कुमाऊँनी तथा गढ़वाली भाषा में होने वाले सांस्कृतिक आयोजन हैं, जिनमें पहाड़ी क्षेत्र के कई प्रमुख कलाकार प्रदर्शन देते हैं।[40][41][42]

चौबारी मेले के बाद नगर का दूसरा सबसे बड़ा मेला नरियावल स्थित माता शीतला के मंदिर परिसर में गुप्त नवरात्र के अवसर पर लगता है। यह मेला लगभग १५ दिनों तक चलता है, जिसमें आस पास के गांवों के ग्रामीणों के अतिरिक्त दूर-दराज के जनपदों से भी श्रद्धालु मां के दर्शन और पूजन को आते हैं। मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडव कुंती के साथ एक रात्रि यहां पर पहुंचे थे। उस समय गांव का नाम नरबलगढ़ था तथा नरबलि नामक एक दैत्य यहाँ निवास करता था, जो प्रतिदिन गांव से एक मानव की बलि लेता था। यह बात जब पांडवों को पता चली, तो भीम ने इसका विरोध कर दैत्य को युद्ध के लिए ललकारा, जिसने भीम की चुनौती को स्वीकार कर लिया। युद्ध से पहले भीम ने अपने भाइयों के साथ यहां माता शीतला की पूजा अर्चना कर आशीर्वाद लिया, और फिर युद्ध में नरबल को मार दिया।[43]

अर्थव्यवस्थासंपादित करें

 
परसाखेड़ा औद्योगिक क्षेत्र में फैक्ट्रियां

यह शहर कृषि उत्पादों का व्यापारिक केंद्र है और यहाँ कई उद्योग, चीनी प्रसंस्करण, कपास ओटने और गांठ बनाने आदि भी हैं। लकड़ी का फ़र्नीचर बनाने के लिए यह नगर काफ़ी प्रसिद्ध है। इसके निकट दियासलाई, लकड़ी से तारपीन का तेल निकालने के कारख़ाने हैं। यहाँ पर सूती कपड़े की मिलें तथा गन्धा बिरोजा तैयार करने के कारख़ाने भी है।

१८२० के दशक में बरेली के तत्कालीन मजिस्ट्रेट ग्लिन ने गुलाम याह्या को बरेली के 'कारीगरों, निर्माण और उत्पादन के उनके साधनों के नाम, और उनकी पोशाक और शिष्टाचार' के बारे में लिखने के लिए कहा था। याह्या के शोध के अनुसार बरेली और उसके आसपास रहने वाले लोगों की आजीविका के सबसे लोकप्रिय साधन थे - कांच का निर्माण, कांच की चूड़ियों का निर्माण, लाख की चूड़ियों का निर्माण, क्रिम्पिंग, चने भूनना, तारें बनाना, चारपाइयां बुनना, सोने और चांदी के धागों का निर्माण, किराने की दुकानें चलाना, आभूषण बनाना और कबाब बेचना।[44]

शहर में व्यापार और वाणिज्य, परिवहन और अन्य सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों का त्वरित विकास बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में रुहेलखण्ड व कुमाऊँ रेलवे के निर्माण के बाद हुआ।[45] सदी के पहले दशक में ही नगर में नेशनल ब्रेवरी कम्पनी, एक माचिस की फैक्ट्री, एक बर्फ की फैक्ट्री और एक भाप-चालित आटा चक्की की स्थापना हुई।[46] १९१९ में इज्जत नगर में इंडियन वूल प्रोडक्ट्स लिमिटेड की स्थापना हुई, जहाँ बड़े स्तर पर कत्था निकाला जाता था। नगर के केन्द्र से ८ किमी दूर स्थित सी॰ बी॰ गंज में भी इंडियन टरपेंटाइन & रोजिन (१९२४ में स्थापित) और वेस्टर्न इंडियन मैच कम्पनी (विमको; १९३८ में स्थापित) जैसे कई उद्योग स्थापित हुए थे। नेकपुर में १९३२ में एचआर शुगर फैक्ट्री की स्थापना हुई थी। इस सब की बदौलत बरेली १९४० के दशक में क्षेत्र का एक प्रमुख औद्योगिक तथा व्यापारिक क्षेत्र बनकर उभरा, शहर के कोने-कोने में कई बैंकों और शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना हुई।[47]

भारत की स्वतन्त्रता के बाद बरेली का औद्योगिक विकास जारी रहा, और शहामतगंज तथा नई बस्ती में खांड़सारी, फर्नीचर, अभियंत्रण, तेल निष्कर्षण तथा बर्फ से संबंधित लघु उद्योग आकार लेने लगे। १९५६ में सी॰ बी॰ गंज, १९६० में परसाखेड़ा और १९६४ में भोजीपुरा में यूपी स्टेट इंडस्ट्रीयल डेवलपमेंट कारपोरेशन (यूपीएसआइडीसी) द्वारा औद्योगिक क्षेत्र बसाए गए।[48] सी॰ बी॰ गंज और इज्जत नगर इस समय तक क्रमशः नगर के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र तथा औद्योगिक-सह-परिवहन केन्द्र के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर चुके थे, जबकि शहामतगंज तथा किले की मंडियां बरेली तथा आस-पास के क्षेत्र की सबसे बड़ी मंडियां थी।[49] १९६० और १९७० के दशक तक कुतुबखाना-रेलवे जंक्शन रोड पर स्थित आवासीय क्षेत्रों के इर्द-गिर्द कई बाज़ार बनने लगे, जिनमें सुभाष मार्किट, चौपुला, पंजाबी तथा किशोर मार्किट प्रमुख थे।[50] १९७१ की जनगणना के अनुसार बरेली प्रथम श्रेणी का सिटी बोर्ड था, और महत्व के आधार पर इसे राज्य में ९वें स्थान पर रखा गया था।[37] यहाँ की अर्थव्यवस्था औद्योगिक सह-सेवा क्षेत्र पर निर्भर थी; बड़ी संख्या में श्रमिक उन गतिविधियों में लगे हुए थे, जो उद्योग या तृतीयक क्षेत्रों से निकटता से संबंधित थे।[37]

१९९० के दशक का अंत होते होते नगर में कई उद्योग बन्द हो गए। अप्रैल १९९८ में इंडियन टरपेंटाइन & रोजिन फैक्ट्री (आइटीआर) और सितंबर १९९८ में नेकपुर की चीनी मिल बंद हो गई।[48] उप्र. शुगर कारपोरेशन के अधीन इस गन्ना फैक्ट्री को वर्ष १९९६ में ही लक्ष्य से अधिक उत्पादन करने के लिए गोल्ड मेडल मिला था। १५ जुलाई १९९९ फतेहगंज पश्चिमी स्थित रबड़ फैक्ट्री भी बंद हो गई।[48] फैक्ट्री के उत्पाद पूरे एशिया के देशों में प्रसिद्ध थे, और लगभग दो हजार लोग इस फैक्ट्री में सेवाएं दे रहे थे। सीबीगंज स्थित विमको फैक्ट्री, जहां से पूरे देश भर में माचिस की सप्लाई होती थी, वर्ष २०१४ में बंद हो गई।[48]

शिक्षासंपादित करें

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय से ही, बरेली राजनीतिक जागरूकता और राजनीतिक प्रेरणा का केंद्र रहा है।[51] नगर में ३ विश्वविद्यालय हैं: महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय, बरेली अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय और इन्वर्टिस विश्वविद्यालय। इसके अतिरिक्त मार्च २०२० में तीन अन्य संस्थानों को (सिद्घि विनायक, फ्यूचर इंस्टीट्यूट और एसआरएमएस को) उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा निजी विश्वविद्यालय का प्रमाणपत्र दिया गया,[52] जिससे यहाँ स्थित विश्वविद्यालयों की संख्या ६ हो गयी। बरेली में स्थित उच्च शिक्षा के अन्य संस्थानों में इज्जतनगर में स्थित भारतीय पशुचिकित्सा अनुसंधान संस्थान तथा केन्द्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान शामिल हैं। नगर में तीन निजी मेडिकल कॉलेज हैं, जिनमें राजश्री, एसआरएमएस और रुहेलखंड शामिल हैं। इसके अलावा गंगाशील आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज भी है, लेकिन कोई भी सरकारी मेडिकल कॉलेज नहीं है। बरेली में करीब दो दर्जन प्रबन्धन तथा प्रौद्योगिकी महाविद्यालय हैं। २८९४ बेसिक स्कूल, ४१६ माध्यमिक विद्यालय, ५२ सीबीएसई, ७ आईसीएससी स्कूल हैं।

१९७५ में स्थापित महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय नगर का एकमात्र राजकीय विश्वविद्यालय है।[53] विश्वविद्यालय का अधिकार क्षेत्र बरेली और मुरादाबाद मंडल के नौ जिलों तक विस्तारित है; इन ९ जिलों के सभी राजकीय महाविद्यालय इसी विश्वविद्यालय से सम्बद्ध हैं।

 
बरेली कॉलेज की स्थापना १८३७ में हुई थी।

बरेली कॉलेज नगर का सबसे पुराना महाविद्यालय है। १८३७ में स्थापित इस महाविद्यालय को १८५० में राजकीय महाविद्यालय का दर्जा दिया गया था। अपनी स्थापना के समय यह कलकत्ता विश्वविद्यालय से सम्बद्ध था, बाद में आगरा विश्वविद्यालय से सम्बद्ध हो गया। वर्तमान काल में यह रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय से सम्बद्ध है।

पर्यटनसंपादित करें

माना जाता है कि बरेली के पास स्थित प्राचीन दुर्ग नगर अहिच्छत्र में बुद्ध का आगमन हुआ था। यह जगह बरेली शहर से लगभग 40 किमी है। यहीं पर एक बहुत पुराना किला भी है।

बरेली के मन्दिरों, मस्जिदो,दरगाहो की सूची

1 धोपेश्वर नाथ


यह मन्दिर सदर बाजार में स्थित बहुत खूबसूरत है एवं यह भगवान शिव को समर्पित है

2 तपेश्वरनाथ

भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर रेलवे स्टेशन के नजदीक है


3 त्रवटीनाथ

देखने में बहुत खूबसूरत यह मंदिर शहर के बीचोबीच स्थित है


4 मणिनाथ

यह भी 2 किमी पर स्थित है


5 वनखण्डीनाथ

6अलखनाथ

भगवान शिव को समर्पित यह शहर का सबसे बड़ा मंदिर है इस मंदिर में कई बगीचे एवं मुख्य द्वार पर भगवान हनुमान की विशाल प्रतिमा लगी हुई है

7 पशुपति नाथ

यह है मंदिर छोटा सा परंतु देखने में बहुत खूबसूरत हैइस मंदिर की खास बात यह है कि यह बीच तालाब में बना हुआ है


8.दरगाह आला हजरत


दरगाह-ए-अला हज़रत अहमद रजा खान (1856-1921) की दरगाह है,जो 19वीं शताब्दी के हनीफी इस्लामी विद्वान दरगाह का गुंबद हजरत अल्लामा शाह महमूद जान कादरी द्वारा मैचस्टिक्स के उपयोग के साथ तैयार किया गया था[4]

सन्दर्भसंपादित करें

  1. [1] Official census data of Indian cities as of 2001
  2. Raychaudhuri, H.C. (1972). Political History of Ancient India, Calcutta: University of Calcutta, p.85
  3. Raychaudhuri, H.C. (1972). Political History of Ancient India, Calcutta: University of Calcutta, p.206
  4. Lahiri, B. (1974). Indigenous States of Northern India (Circa 200 B.C. to 320 A.D.) , Calcutta: University of Calcutta, pp.170-88
  5. Bhandare, S. (2006). Numismatics and History: The Maurya-Gupta Interlude in the Gangetic Plain in P. Olivelle ed. Between the Empires: Society in India 300 BCE to 400 CE, New York: Oxford University Press, ISBN 0-19-568935-6, pp.76,88
  6. Raychaudhuri, H.C. (1972). Political History of Ancient India, Calcutta: University of Calcutta, p.473
  7. वसीम, अख्तर (४ जुलाई २०१९). "मुहल्लानामा : पुराना शहर में जगतपुर से पड़ी बरेली की नींव". बरेली: दैनिक जागरण. मूल से 30 जुलाई 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि ३० जुलाई २०१९.
  8. लाल १९८७, पृ - ६
  9. लाल १९८७, पृ - ६
  10. लाल १९८७, पृ - ६
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