मुख्य मेनू खोलें

श्रीभार्गवराघवीयम् (२००२), शब्दार्थ परशुराम और राम का, जगद्गुरु रामभद्राचार्य (१९५०-) द्वारा २००२ ई में रचित एक संस्कृत महाकाव्य है। इसकी रचना ४० संस्कृत और प्राकृत छन्दों में रचित २१२१ श्लोकों में हुई है और यह २१ सर्गों (प्रत्येक १०१ श्लोक) में विभक्त है।[1]महाकाव्य में परब्रह्म भगवान श्रीराम के दो अवतारों परशुराम और राम की कथाएँ वर्णित हैं, जो रामायण और अन्य हिंदू ग्रंथों में उपलब्ध हैं। भार्गव शब्द परशुराम को संदर्भित करता है, क्योंकि वह भृगु ऋषि के वंश में अवतीर्ण हुए थे, जबकि राघव शब्द राम को संदर्भित करता है क्योंकि वह राजा रघु के राजवंश में अवतीर्ण हुए थे। इस रचना के लिए, कवि को संस्कृत साहित्य अकादमी पुरस्कार (२००५) तथा अनेक अन्य पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।[2]

श्रीभार्गवराघवीयम्  
Cover
श्रीभार्गवराघवीयम् (प्रथम संस्करण) का आवरण पृष्ठ
लेखक जगद्गुरु रामभद्राचार्य
देश भारत
भाषा संस्कृत
प्रकार महाकाव्य
प्रकाशक जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय
प्रकाशन तिथि अक्टूबर २१, २००२
मीडिया प्रकार मुद्रित (सजिल्द)
पृष्ठ ५१२ पृष्ठ (प्रथम संस्करण)

महाकाव्य की एक प्रति, कवि की स्वयं की हिन्दी टीका के साथ, जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय, चित्रकूट, उत्तर प्रदेश द्वारा प्रकाशित की गई थी। पुस्तक का विमोचन भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा ३० अक्टूबर २००२ को किया गया था।

अनुक्रम

संरचनासंपादित करें

 
महाकाव्य के विमोचन पर कवि (बाएं) अटल बिहारी वाजपेयी के साथ

जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने इस महाकाव्य की रचना २००२ में अपने छठे छह महीने के पयोव्रत (व्रत जिसमें मात्र दूध का आहार ग्रहण किया जाता है) के समय चित्रकूट में की।[3] कवि ने सर्गों की संख्या के रूप में २१ को कई कारणों से चुना। वे महाकाव्य की रचना २१वीं शताब्दी के प्रारम्भ में कर रहे थे और इसके अतिरिक्त यह २१वीं शताब्दी में रचा जाने वाला प्रथम संस्कृत महाकाव्य था। २१ संख्या महाकाव्य की कथा के साथ भी सम्बद्ध है। रेणुका, परशुराम की माँ, अपनी छाती २१ बार पीटती हैं, जब हैहय राजा उनके पति जमदग्नि की हत्या कर देते हैं। तदुपरान्त परशुराम पृथ्वी पर क्षत्रियों का २१ बार संहार करते हैं। कवि द्वारा एक और उद्धृत कारण यह है कि "लघुत्रयी" और बृहतत्रयी (संस्कृत महाकाव्य) में सम्मिलित पिछले संस्कृत महाकाव्य- मेघदूतम्, कुमारसंभवम्, किरातार्जुनीयम्, रघुवंशम्, शिशुपालवधम् तथा नैषधीयचरितम् क्रमशः २, ८, १८, १९, २० और २२ सर्गो में रचित थे, तथा २१ संख्या इस अनुक्रम से गायब थी।[4][5]कवि कहते हैं कि उन्होंने इस कृति की रचना दोनों रामों – परशुराम एवं राम- के गायन के उद्देश्य से की है, जिनमें प्रथम परशुराम- अवतार, अनुकरणकर्ता और ब्राह्मण हैं एवं द्वितीय राम- अवतारी (अवतार के स्रोत), अनुकरणीय और क्षत्रिय हैं। यद्यपि महाकाव्य में कोई औपचारिक विभाजन नहीं है, कवि संकेत करते हैं कि महाकाव्य के ९ सर्गों के प्रथम भाग में परशुराम के नौ गुणों का वर्णन किया गया है तथा १२ सर्गों के द्वितीय भाग में महाकाव्य के नायक के रूप में वीर और सज्जन (धीरोदात्त) राम मुख्य नारी पात्र सीता के सहित प्रस्तुत किये गए हैं।[4][1]

महाकाव्य के पंद्रह सर्गों में वर्णित अधिकांश घटनाएँ वाल्मीकि रामायण, तुलसीकृत रामचरितमानस, श्रीमद्भागवत, ब्रह्मवैवर्तपुराण, प्रसन्नराघव (जयदेव द्वारा एक नाटक) तथा सत्योपाख्यान सहित अनेक हिंदू ग्रन्थों में पाई जाती हैं। छह सर्गों की कथा कवि की मूल संरचना है।[6]

कथासंपादित करें

 
श्रीभार्गवराघवीयम् के केंद्रीय पात्र, जिस प्रकार सर्ग श्रीभार्गवलक्ष्मणसंवादः में वर्णित हैं। बाएँ से दाएँ – विश्वामित्र, लक्ष्मण, राम, परशुराम और जनक (केंद्र में), सुनयना और सीता (एकदम दाएँ)।

यह महाकाव्य २१ सर्गों में (प्रत्येक १०१ पद्यों के) प्रणीत है। प्रथम नौ सर्गों में परशुराम के अवतार, कैलाश पर्वत पर भगवान शिव से उनका अध्ययन, अपनी मां और तीन भाइयों को मारने के अपने पिता के आदेश का निष्पादन और उनके अनुवर्ती पुनरूत्थान, उनका सहस्रबाहू राजा सहस्रार्जुन के साथ युद्ध, उनके द्वारा क्षत्रिय वंश का पृथ्वी से २१ बार संहार और शिव के पुत्र एवं बुद्धि के देवता गणेश के साथ उनके युद्ध का रोमांचक वर्णन प्रस्तुत किया गया है। अगले पांच सर्ग राम और उनकी पत्नी सीता के अवतरण और उनकी बाल्यकाल की मधुर बाललीलाओं का वर्णन करते हैं। अंतिम सात सर्ग श्री रामचरित मानस-बालकाण्ड का अनुसरण करते हैं, जो मुनि विश्वामित्र द्वारा दशरथ की राजधानी अयोध्या की यात्रा से प्रारम्भ होते हैं और मिथिला में दशरथ के चारों पुत्रों - जिनमें राम सबसे ज्येष्ठ थे – के विवाह संस्कार के साथ समाप्त होते हैं।[7] २१ सर्गों का सारांश नीचे प्रस्तुत है-

१. श्रीभार्गवावतारोपक्रमः - कवि ज्ञान की देवी सरस्वती, बुद्धि के देवता गणेश, भगवान शिव और उनकी पत्नी पार्वती, परब्रह्म भगवान श्री सीता राम और अंत में दोनों रामों- जो कि प्रस्तुत महाकाव्य कथा के प्रतिपाद्य हैं, की कृपा का आह्वान करते हैं। सातवें मन्वन्तर में सृष्टा देव ब्रह्मा के सातवें पुत्र भृगु ऋषि और उनकी पत्नी ख्याति के यहाँ ऋचीक नामक पुत्र का जन्म होता है। ऋचीक का विवाह क्षत्रिय नरेश गाधि की पुत्री सत्यवती के साथ सपन्न होता है। ऋचीक सत्यवती और उनकी माता के लिए खीर के दो पात्रों का सृजन करते हैं, जो कि क्रमशः ब्राह्मण एवं क्षत्रिय गुणों से युक्त थे। सत्यवती की माता छिपकर पात्र बदल देती है, जिससे कि उनके यहाँ ब्राह्मण गुणों से युक्त पुत्र का जन्म हो। (यही पुत्र बाद में विश्वामित्र बनते हैं।)

माता के इस कृत्य का ज्ञान होने पर, सत्यवती ऋचीक से क्षत्रिय गुणों को उसके पौत्र में स्थानान्तरित करने का अनुरोध करती है, क्योंकि वह एक भयंकर और भीषण पुत्र को जन्म देने में भयभीत हैं। ऋचीक सत्यवती को समझाते हैं और दम्पति जमदग्नि नामक एक पुत्र को जन्म देते हैं। जमदग्नि का विवाह ऋषि रेनू की पुत्री रेणुका से होता है। दम्पति तीन पुत्रों को जन्म देते हैं। चौथे पुत्र के लिये, भगवान श्री राम को प्रसन्न करने हेतु दम्पति तप करते हैं। इसी बीच, हैहय राजा कृतवीर्य के यहाँ अर्जुन नामक एक पुत्र का जन्म होता है। अर्जुन दत्तात्रेय भगवान से वरदान के रूप में एक सहस्र भुजाएँ प्राप्त करता है और सहस्रार्जुन के नाम से विख्यात होता है।

सहस्रार्जुन सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को आतंकित करने लगता है। वह नर्मदा नदी के कल-कल बहते प्रवाह को अवरुद्ध कर देता है, राक्षसराज रावण को हरा कर बंदी बना लेता है (जिसे बाद में पुलस्त्य के अनुरोध पर छोड़ दिया जाता है) और देवताओं से स्वर्ग एवं यज्ञ की हवि छीन लेता है। दु:खी देवता ब्रह्मा के साथ साकेतलोक जाते हैं और भगवान श्रीराम से प्रार्थना करते हैं। श्रीराम देवताओं से कहते हैं कि सहस्रार्जुन का संहार करने के लिये उनका अंश जमदग्नि एवं रेणुका के चतुर्थ पुत्र के रूप में अवतरित होगा। यह अंश निरंकुश एवं अत्याचारी क्षत्रिय जाति का विध्वंस करेगा, समस्त भूमि ऋषि कश्यप को प्रदान करेगा और अंत में मिथिला में उन्हीं में समाहित हो जाएगा। देवता सन्तुष्ट होकर लौट जाते हैं और रेणुका भगवान श्रीराम के उनके गर्भ में प्रवेश करने पर गर्भवती हो जाती हैं।

२. दीक्षा-रेणुका को गर्भ के भार की कोई प्रतीति नहीं होती और वे गर्भावस्था के किसी भी प्रकार के कष्ट को अनुभव नहीं करतीं। जमदग्नि रेणुका का पुंसवन संस्कार करते हैं, जो कि पारंपरिक रूप से गर्भावस्था के आठवें माह सम्पन्न होता है। रेणुका के लिये समस्त शुभ शकुन दृष्टिगोचर होते हैं। सप्तर्षि उन्हें आशीष प्रदान करते हैं और नवग्रह उनके अनुकूल हो जाते हैं। रेणुका वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया, जो कि अक्षय तृतीया के नाम से प्रसिद्ध है, को एक बालक को जन्म देती हैं। देवताओं और ऋषि-मुनियों में अपार हर्ष छा जाता है। भृगु के आदेश पर, जमदग्नि बालक का नाम राम रखते हैं। राम को परशुराम भी कहा जाता है क्योंकि उन्हें परशु (फरसा) का खिलौना अत्यंत प्रिय है। बालक शेर और चीते जैसे जंगली पशुओं को भी पालतू बना लेता है और उनके संग क्रीड़ा करता है।

पांच वर्ष पश्चात बालक के दस संस्कार सम्पन्न किए जाते हैं। इसके उपरान्त परशुराम का उपनयन (यज्ञोपवीत) संस्कार किया जाता है। ब्रह्मा उन्हें यज्ञोपवीत का पवित्र धागा प्रदान करते हैं, शिव बालक को गायत्री मंत्र की दीक्षा देते हैं और परशुराम रेणुका से भिक्षा की याचना करते हैं। सर्ग का समापन परशुराम द्वारा अपने गुरु शिव से विद्याध्ययन हेतु कैलाश पर्वत पर प्रस्थान करने की घटना के साथ होता है।

 
कैलाश पर्वत पर शिव एवं पार्वती, जहाँ परशुराम गुरूपसत्तिः सर्ग में अध्ययन करते हैं।

३. गुरूपसत्तिः-भगवान् शिव परशुराम का कैलाश पर स्वागत करते हैं। शिव अपने शिष्य को अपना समस्त ज्ञान प्रदान करने का निश्चय करते हैं। शिव परशुराम से कहते हैं कि वे उन्हें भगवान श्रीराम का अवतार समझते हैं, जो कि समस्त विद्याओं में पहले से ही निष्णात हैं, किन्तु संसार के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत करने के लिये गुरु के यहाँ अध्ययन कर रहे हैं। परशुराम की शिक्षा प्रारम्भ होती है। परशुराम गुरु से एक बार सुन कर ही समस्त वैदिक मन्त्रों में सिद्धता प्राप्त कर लेते हैं। शिव उन्हें सभी अठारह विद्याओं का अध्ययन कराते हैं। परशुराम शिव की एक आदर्श शिष्य की भांति प्रातःकाल शीघ्र उठकर, अपने गुरु के लिये जल एवं भोज्य पदार्थ लाकर, शिव और उनकी पत्नी पार्वती को हर प्रकार से प्रसन्न करके सेवा करते हैं।

परशुराम का समावर्तन संस्कार (विद्यार्थी जीवन का समापन) शिव द्वारा कराया जाता है, जो अपने शिष्य को आशीर्वचन देते हैं कि अठारह विद्याएँ सदैव उनके साथ रहें, उनके शस्त्र सदैव अमोघ हों। शिव उन्हें क्रुद्ध रूप धारण करने का आदेश देते हैं, जब श्रीराम मिथिला में शिवधनुष पिनाक को तोड़ें। इसके अतिरिक्त शिव परशुराम को अपने बाण और धनुष श्रीराम को समर्पित करने और श्रीराम के अवतारी रूप में अपने अवतार को लय करने का आदेश देते हैं। अपने शेष जीवन में उन्हें महेन्द्र पर्वत पर तप करने का आदेश दिया जाता है। अन्त में शिव कहते हैं कि परशुराम सावर्णि मनु के आठवें मन्वन्तर में सप्तर्षियों में से एक ऋषि होंगे, जिस प्रकार उनके पिता जमदग्नि वैवस्वत मनु के सातवें मन्वन्तर में एक ऋषि हैं। परशुराम शिव को प्रणाम करते हैं और उनसे जाने की अनुमति माँगते हैं।

४. समावर्तनम्-चौथे सर्ग का अधिकांश भाग प्रकृति विशेषत: वर्षा ऋतु एवं जंगल में जमदग्नि के आश्रम के वर्णन से सम्बन्धित है। भगवान शिव परशुराम को अपने माता-पिता के यहाँ लौटने की अनुमति दे देते हैं। जब परशुराम विदा ले रहे होते हैं, शिव श्रीराम अवतार परशुराम से उन्हें क्षमा करने को कहते हैं, यदि उन्होंने गुरु के रूप में उन्हें आदेश देते हुए किसी भी प्रकार से उनका कोई असम्मान किया हो। यह सुनकर परशुराम की आँखों में आँसू भर आते हैं। शिव और उनकी अर्धांगिनी पार्वती को नमस्कार कर एवं उनके पुत्रों गणेश और कार्तिकेय से मिलकर परशुराम अपने घर लौटने के लिए प्रस्थान करते हैं।

परशुराम अपने घर की ओर लौट रहे हैं और इसी बीच वर्षा ऋतु प्रारम्भ हो जाती है- यह कथाक्रम ४४ श्लोकों (४.७–४.५०) में प्रस्तुत किया गया है। परशुराम जमदग्नि के आश्रम में प्रवेश करते हैं, जो कि २१ श्लोकों (४.६१–४.८१) में वर्णित है। जमदग्नि और रेणुका अपने पुत्र को वापिस आया हुआ देखकर अत्यंत आनन्दित होते हैं। परशुराम आश्रम में रहना प्रारम्भ कर देते हैं और अपने सुन्दर कार्यों और चरित्र द्वारा आश्रम के समस्त ऋषि मुनियों के मन को मोह लेते हैं।

५. पित्राज्ञापालनम्-जमदग्नि परशुराम से विवाह करने और जीवन के द्वितीय चरण गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का आग्रह करते हैं। परशुराम सम्मानपूर्वक इस अनुरोध को अस्वीकार कर देते हैं और कहते हैं कि वे सदैव गृहस्थ जीवन के बंधन से दूर रहना चाहते हैं। एक सुबह, रेणुका जल लेने के लिए एक सरोवर पर जाती है। वहाँ वह गन्धर्वराज चित्ररथ को अपनी पत्नी के संग सरोवर के जल में विहार करते हुए देखती है। रेणुका चित्ररथ को देखकर आकृष्ट हो जाती है और उसके सम्बन्ध में कल्पनाएँ करती हुई घर लौटती है। जमदग्नि यह बात समझ जाते हैं और अपने तीनों बड़े पुत्रों को अपनी माता का वध करने का आदेश देते हैं, जो उनके अनुसार अपने व्यभिचारी विचारों से अपवित्र हो चुकी है। जब तीनों पुत्र उनके आदेश का पालन करने से मना कर देते हैं, तो परशुराम से जमदग्नि यह कार्य करने को कहते हैं।

परशुराम अपने पिता के आदेश एवं माता के ऋण- इनमें से एक के चयन को लेकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं। उनके मानस पटल पर स्मृति शास्त्र स्मरण हो उठते हैं, जो उद्घोषणा कर रहे हैं कि माता पिता से दस गुना अधिक महान होती है। अत्यन्त विचार मंथन करने के पश्चात वे अपने पिता की आज्ञा पालन करने का निश्चय करते हैं। परशुराम अपनी माता और तीनों भाइयों के सिर पृथक कर देते हैं। जमदग्नि परशुराम के आज्ञा पालन से सन्तुष्ट होकर उनसे दो वरदान मांगने को कहते हैं। परशुराम प्रथम वर में चारों के पुनर्ज्जीवन की माँग करते हैं और दूसरे वर के रूप में उन सभी को वध की विस्मृति हो जाने की याचना करते हैं। प्रसन्न जमदग्नि उन्हें दोनों वर प्रदान कर देते हैं एवं रेणुका और उसके तीनों पुत्र मानों सोए हुए से जाग उठते हैं। इस प्रकार परशुराम अपने पिता को सन्तुष्ट करते हैं और अपनी माता के प्राणों को वापिस ले आते हैं।

 
सहस्रार्जुनवधः सर्ग में परशुराम सहस्रार्जुन की भुजाएँ काट देते हैं।

६. सहस्रार्जुनवधः-परशुराम वेदों का अध्यापन प्रारम्भ कर देते हैं। वे ब्राह्मणों की एक गोष्ठी का आयोजन करते हैं, जिसमें वे ब्राह्मणों के हेतु अपरिहार्य गुणों के सम्बन्ध में विवेचन करते हैं और उनसे अपने कर्तव्यों का कदापि उल्लंघन न करने को कहते हैं। इसके पश्चात वे एक निर्जन वन में तपस्या करने के लिए चले जाते हैं। सहस्रार्जुन जमदग्नि ऋषि के आश्रम पर आता है, जबकि परशुराम यहाँ से दूर गए हुए हैं। जमदग्नि उसकी और उसकी सेना का स्वागत कामधेनु गौ की सेवाओं द्वारा करते हैं। सहस्रार्जुन जमदग्नि से कामधेनु उसे देने का आग्रह करता है और कहता है कि राजा का अपनी प्रजा की समस्त सम्पत्ति पर अधिकार होता है। जब जमदग्नि उसके आग्रह को अस्वीकार कर देते हैं, तो सहस्रार्जुन कामधेनु को बलपूर्वक अपनी राजधानी महिष्मति (महेश्वर, मध्य प्रदेश) ले जाता है। परशुराम जब लौटते हैं तो यह समाचार जानकर क्रोधित हो उठते हैं और अकेले ही कामधेनु को वापिस लाने के लिए महिष्मति चल पड़ते हैं। महिष्मति पहुँचकर वे सहस्रार्जुन को युद्ध के लिए ललकारते हैं, जिसे सहस्रार्जुन स्वीकार कर लेता है। परशुराम युद्ध में सहस्रार्जुन की सारी सेना का संहार कर देते हैं।

इसके पश्चात परशुराम और सहस्रार्जुन के बीच एक भीषण युद्ध प्रारम्भ होता है, जिसमें दोनों दिव्य बाणों का प्रयोग करते हैं। तब परशुराम निश्चय करते हैं कि उन्होंने सहस्रार्जुन को युद्ध के रंगमंच पर बहुत देर मनोरंजन करने का अवसर प्रदान कर दिया है। परशुराम तुरन्त अपने पांच सौ धनुषों का एक साथ संधान करते हैं। फिर वे सहस्रार्जुन के रथ का विध्वंस कर देते हैं। तब सहस्रार्जुन परशुराम के साथ द्वन्द्व युद्ध करते हुए उन पर प्रहार करता है। अपने परशु का प्रयोग सहस्रार्जुन का सिर काटने के लिए करने से पूर्व, परशुराम उसकी समस्त भुजाओं को अपने परशु से काट फेंकते हैं। देवता सहस्रार्जुन के आतंक का नाश करने के लिए परशुराम की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हैं। परशुराम विजयी होकर एवं कामधेनु को साथ लेकर अपने आश्रम लौटते हैं और सभी उनका प्रसन्न ह्रदय से स्वागत करते हैं।

७. तीर्थाटनम्-जमदग्नि परशुराम को सहस्रार्जुन के संहार से उद्वेलित उनके मस्तिष्क की शान्ति हेतु भारत के विभिन्न पवित्र स्थलों की तीर्थयात्रा करने का परामर्श देते हैं। परशुराम सर्वप्रथम चित्रकूट, अयोध्या, मथुरा, वृन्दावन, हरिद्वार, मायापुरी (कनखल), काशी, कांची, रंगनाथ (श्रीरंगम), अवन्तिका (उज्जैन) और द्वारिका स्थित वैष्णव तीर्थस्थलों की यात्रा करते हैं। इसके उपरान्त वे शैव तीर्थस्थलों- सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकाल, ॐकारेश्वर, वैद्यनाथ, भीमाशंकर, काशी विश्वनाथ, त्र्यम्बकेश्वर, केदारनाथ, नागेश्वर, रामेश्वर एवं घुश्मेश्वर के द्वादश ज्योतिर्लिंग – की यात्रा करते हैं। इसके पश्चात वे पुष्कर की तीर्थयात्रा करते हैं। अन्त में वे प्रयाग पहुँचते हैं और संगम में स्नान करते हैं। सर्ग के अन्त में कवि टिपण्णी करते हैं कि इन समस्त स्थानों की यात्रा कर, परशुराम भारत की सम्पूर्ण भूमि को एक तीर्थस्थल बना देते हैं।

८. न्यस्तदण्डम्-जबकि परशुराम अपनी तीर्थयात्रा पर हैं, सहस्रार्जुन के पुत्र- हैहय राजकुमार अपने पिता के वध का प्रतिशोध लेने के लिए जमदग्नि के आश्रम पर आक्रमण कर देते हैं। राजकुमार प्रत्येक वस्तु और व्यक्ति जो उनके रास्ते में आता है, को नष्ट कर देते हैं। वे गहन ध्यान में मग्न जमदग्नि का शीश काट लेते हैं और उसे अपने साथ महिष्मति ले जाते हैं। जब परशुराम लौटते हैं तो वे आश्रम को शवों से आच्छादित पाते हैं। तभी उन्हें जमदग्नि के धड़ के समीप रेणुका करुण क्रंदन करती हुई दिखाई पड़ती है। परशुराम को देखकर रेणुका २१ बार अपनी छाती पीटकर विलाप करती हुई कहती है कि परशुराम के अभी तक जीवित रहते हुए हैहय राजाओं ने उनके पति को कैसे मार डाला?

परशुराम जमदग्नि के धड़ को तेल से भरी एक नौका में रखते हैं और रेणुका से पिता के शरीर की सुरक्षा करने को कहते हैं, जब तक वह वापिस न लौट आएँ। क्रुद्ध परशुराम अकेले ही महिष्मति जाते हैं और हैहयों को ललकारते हैं। वे उनकी समस्त सेना का संहार कर देते हैं और हैहय वंश का सम्पूर्ण विनाश कर देते हैं। फिर वे जमदग्नि के कटे शीश को लाकर धड़ से जोड़ देते हैं, जिससे जमदग्नि पुनर्जीवित हो उठते हैं। रघु एवं यदु वंशों को छोड़कर, परशुराम क्षत्रिय जाति का २१ बार पृथ्वी से संहार कर देते हैं। परशुराम १२००० राजाओं का वध कर कुरुक्षेत्र में रक्त के पांच विशाल कुण्ड बना देते हैं। अन्त में, कश्यप ऋषि के कहने पर, परशुराम अपने क्रोध का परित्याग कर देते हैं और सम्पूर्ण विजित भूमि कश्यप को दे देते हैं। तत्पश्चात वे तपश्चर्या करने के लिए महेन्द्र पर्वत पर चले जाते हैं।

९. एकदन्तनाशनम्-महेन्द्र पर्वत पर परशुराम भगवान शिव के मंगलकारी रूप का ध्यान करते हैं और निश्चय करते हैं कि उनका परशु मात्र शिव दर्शन के उपरान्त ही शान्ति प्राप्त कर सकेगा। जब परशुराम कैलाश पहुँचते हैं, तो प्रवेश द्वार पर उन्हें शिव पुत्र गणेश मिलते हैं। गणेश परशुराम से प्रतीक्षा करने के लिए कहते हैं क्योंकि शिव अभी सांयकालीन संध्या संस्कार में तल्लीन हैं। परशुराम क्रोधित हो जाते हैं और अपने पराक्रम एवं परशु का बखान करने लगते हैं। गणेश प्रत्युत्तर में उनके परशु की हँसी उड़ाने लगते हैं, जिसका प्रयोग उनकी स्वयं की माता एवं क्षत्रिय शिशुओं के वध के लिए किया गया था। परशुराम और भी अधिक कुपित हो जाते हैं और बल प्रयोग कर अन्दर जाने का प्रयास करने लगते हैं, किन्तु गजानन गणेश उन्हें अपनी सूँड से पीछे फेंक देते हैं।

परशुराम अपना परशु फेंककर गणेश को क्षति पहुँचाने का प्रयत्न करते हैं, जिससे गणेश का बाँया दांत टूट जाता है। शिव के भूत परशुराम को मारने के लिए उन पर आक्रमण कर देते हैं, किन्तु गणेश उन्हें रोक देते हैं। तभी माता पार्वती आती हैं और परशुराम को अपने गुरु-पुत्र का दांत तोड़ने के लिए डांटती हैं। वह कुपित होकर परशुराम को श्राप देती हैं कि उनका परशु राम में उसी प्रकार तिरोहित हो जाएगा, जिस प्रकार बिजली बादलों में अन्तर्निहित हो जाती है और उनके धनुष बाण उनके प्राणों के साथ राम में समाहित हो जाएंगे। फिर वह कहती हैं कि एकदन्त गणेश, जिन्होंने अपने दांत टूटने का प्रतिशोध न लेकर स्वयं पर नियंत्रण रखा, सर्वत्र पूजित होंगे। परशुराम पार्वती को प्रसन्न करते हैं और गणेश से क्षमा-याचना करते हैं। तदनन्तर वे भगवान शिव को नमस्कार कर अपने आश्रम वापिस लौट आते हैं।

१०. श्रीराघवावतारप्रतिज्ञानम्-परशुराम महेन्द्र पर्वत पर लौट आते हैं और अपने गत कार्य कलापों का विश्लेषण करते हैं। वे अपने क्रोध में किए हुए कार्यों पर अत्यन्त पश्चाताप का अनुभव करते हैं और अपने भूतकाल में किए समस्त वधों का प्रायश्चित करने के लिए तपस्या करने का संकल्प लेते हैं। वे भगवान श्रीराम के सुन्दर रूप का ध्यान करने लगते हैं।

सहस्रार्जुन के मारे जाने और परशुराम द्वारा अपने शस्त्रों का त्याग कर दिए जाने पर, रावण की शक्ति को चुनौती देने वाला अब संसार में कोई भी शूरमा नहीं है। अतएव वह सम्पूर्ण धरा को त्रास देने लगता है- वह कैलाश पर्वत उठा लेता है, आठों दिग्गजों को सताने लगता है, इन्द्र का राज्य जीत लेता है और धर्माचरण करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को आतंकित करने लगता है। रावण के अत्याचार को सहन करने में असमर्थ होकर, पृथ्वी एक गौ का रूप धारण करती है और रुदन करती हुई सुमेरु पर्वत के पास जाती है। ब्रह्मा पृथ्वी एवं शिव के संग वार्तालाप करते हैं। तत्पश्चात ब्रह्मा भगवान श्री सीताराम जी के दर्शन हेतु साकेतलोक गमन करते हैं। वह रावण संहार हेतु भगवान श्रीराम से अवतार लेने की प्रार्थना करते हुए उनकी ३१ पद्यों (१०.५६–१०.८६) में अत्यन्त सुन्दर स्तुति करते हैं। श्रीराम उन्हें आश्वासन देते हुए कहते हैं कि वे शीघ्र ही राम के रूप में और अपने तीन विष्णु अंशों के संग- क्षीरसागरवासी विष्णु भरत के रूप में, वैकुण्ठवासी विष्णु लक्ष्मण रूप में और श्वेतद्वीपवासी विष्णु शत्रुघ्न के रूप में-अवतार लेंगे। जब ब्रह्मा आश्वस्त होकर लौट जाते हैं, राम सीता से स्वयं अवतार लेने के पश्चात उनसे भी अवतरित होने का निवेदन करते हैं। तदुपरांत वे अयोध्या में कौशल्या के पुत्र के रूप में जन्म लेने का निश्चय करते हैं।

 
श्रीराघवावतरणम् सर्ग में राजा दशरथ के यहाँ चार पुत्र उत्पन्न होते हैं।

११. श्रीराघवावतरणम्- सर्ग के प्रथम पंद्रह श्लोक सरयू नदी के तट पर स्थित अयोध्या नगरी के गौरव का गुण-गान करते हैं। महाराज दशरथ अयोध्या के राज्य का शासन कर रहे हैं, किन्तु अनेक वर्षों के पश्चात भी उन्हें कोई पुत्र उत्पन्न नहीं हुआ है। वे अपने गुरु वशिष्ठ के समीप जाते हैं और उनके समक्ष अपने ह्रदय की अपूर्ण अभिलाषा व्यक्त करते हैं। वशिष्ठ उन्हें शीघ्र ही चार पुत्रों के जन्म लेने का आश्वासन देते हैं। अश्वमेध, विश्वजित और राजसूय यज्ञ को सम्पन्न करने के पश्चात, वशिष्ठ दशरथ के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ कराने के लिए ऋषि ऋष्यशृंग को आमंत्रित करते हैं। यज्ञ की समाप्ति पर अग्निदेव खीर का एक पात्र लेकर प्रकट होते हैं। दशरथ खीर का आधा भाग कौशल्या को देते हैं, चौथाई कैकेयी को एवं दो आठवें भाग सुमित्रा को। तीनों रानियाँ गर्भवती हो जाती हैं।

इसी बीच अनेक देवता वानर परिवारों में अवतरित होते हैं, जिनमें शिव हनुमान के रूप में जन्म लेते हैं। रानियों के गर्भ धारण करने के बारह माह पश्चात, चैत्र शुक्ल पक्ष नवमी (रामनवमी) के मंगलमय दिन भगवान श्रीराम धनुष बाण धारण किए हुए एक षोडशवर्षीय किशोर के रूप में प्रकट होते हैं। कौशल्या की विनती पर वे एक सद्योजात शिशु का रूप धारण कर लेते हैं। कैकेयी भरत को और सुमित्रा दो पुत्रों- लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न को जन्म देती हैं। देवगण और अयोध्या की प्रजा चारों पुत्रों के जन्म पर आनन्द से उत्सव करते हैं। परशुराम महेन्द्र पर्वत पर भगवान राम के बाल रूप का ध्यान करते हुए और उनका गुणगान १६ पद्यों (११.८४–११.९९) में करते हुए हर्ष से रोमांचित हो उठते हैं।

१२. श्रीमैथिल्यवतरणम्-जब दशरथ के चारों पुत्र छठे वर्ष में प्रवेश करते हैं, उनका उपनयन संस्कार सम्पन्न होता है। ऋषि याज्ञवल्क्य के शिष्य राजा शीरध्वज जनक अपने मिथिला राज्य का संचालन एक योगी के सदृश कर रहे हैं। पुण्यारण्य (पुनौरा, सीतामढी) में अपनी पत्नी रानी सुनयना के संग सोमयाग यज्ञ करते हुए, जब राजा जनक स्वर्ण के एक हल से वैशाख शुक्ल पक्ष नवमी (सीतानवमी) को भूमि जोतते हैं, सहसा पृथ्वी फट जाती है और स्वर्ण सिंहासन पर आसीन और अपनी आठ सखियों से परिवेष्टित भगवती जगत्जननी सीता षोडशवर्षीया किशोरी के रूप में पृथ्वी से प्रकट हो जाती हैं। एक आकाशवाणी सीता को जनक की पुत्री उद्घोषित करती है।

नारद मुनि मिथिला में पधारते हैं और सीता की १६ पद्यों (१२.४५–१२.६०) में स्तुति करते हैं। तदुपरांत नारद सीता से एक शिशु का रूप धारण करने की विनती करते हैं। जनक और सुनयना शिशु सीता को अपने महल में ले आते हैं और अपनी पुत्री की भांति उनका लालन-पालन करते हैं। एक बार सीता जनक की राजधानी के पूर्वी भाग में जाती हैं और पिता जनक से पूजन किए जा रहे एक धनुष के सम्बन्ध में पूछती हैं। राजा जनक उन्हें बताते हैं कि यह भगवान शिव द्वारा स्वयं उनके पूर्वज देवरात को प्रदत्त पिनाक नामक शिव-धनुष है। सीता पिता जनक से कहती हैं कि पुरातन वस्तुएं पूजन के बजाय फेंकने योग्य हैं और क्रीड़ा में घोड़ा बनाते हुए उस भारी धनुष को बारम्बार घसीटने लगती हैं। जनक के अनुरोध पर, सीता उस धनुष को- जिसे उठाने में मनुष्य एवं देवता भी असमर्थ थे-उसके स्थान पर वापिस रख देती हैं। परशुराम यह दृश्य महेन्द्र पर्वत पर अपनी समाधि में देखकर मंत्रमुग्ध हो रहे हैं और किशोरी सीता की रूप छवि के दर्शन की अभिलाषा लिये मिथिला की ओर चल पड़ते हैं।

१३. श्रीभार्गवमिथिलागमनम्-अपनी छह वर्ष की वय में भी, सीता की आकृति एक षोडशवर्षीया किशोरी की भांति है। उनके अप्रतिम सौन्दर्य का महाकवि ने १२ पद्यों (१३.९–१३.२०) में वर्णन किया है। जनक को प्रतीति हो गई है कि उनकी कन्या साधारण बालिका होने के स्थान पर भगवान श्री राम की आदि शक्ति है, क्योंकि वह एक शिशु होते हुए भी शिव के भारी धनुष को उठाने में सक्षम है। वह सीता के लिए एक सुयोग्य वर ढूंढने के लिए चिन्तित हो उठते हैं। वेद की ऋचाओं में अवतारवाद के सिद्धान्त का श्रवण करने के पश्चात, वह इस सम्बन्ध में चिन्तन कर रहे हैं, किन्तु उनका ज्ञान और तार्किकता उन्हें इस पर विश्वास नहीं करने देते। अत्यन्त विचार मंथन करने के उपरान्त, वह इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि यह सिद्धान्त सत्य होना चाहिए। उसी समय द्वारपाल मिथिला में परशुराम के आगमन की घोषणा करता है।

राजा जनक परशुराम को प्रणाम करते हैं। जनक को एक सदाचारी राजा समझते हुए, परशुराम उन्हें निरंकुश क्षत्रियों के समान अपने शत्रु के रूप में नहीं देखते हैं। परशुराम उनके समक्ष सीता के दर्शन की अपनी अभिलाषा प्रकट करते हैं। जनक उन्हें यज्ञशाला में ले जाते हैं, जहाँ परशुराम शिव धनुष को खेल का घोड़ा बनाकर घसीटती हुईं और उससे क्रीड़ा करती हुईं भगवती सीता के दर्शन करते हैं। परशुराम जनक से सीता स्वयंवर का आयोजन करने को कहते हैं, जिसमें शिव धनुष को तोड़ने में सक्षम राजकुमार ही सीता के पाणिग्रहण के योग्य हो। तदनन्तर परशुराम भविष्यवाणी करते हैं कि रघु के वंशज श्रीराम ही धनुष का भंजन करेंगे। परशुराम जनक से कहते हैं कि वे पुनः मिथिला में कुपित होने का अभिनय करते हुए आएंगे जिससे कि उन्हें सीता और राम दोनों के दर्शन का बहाना प्राप्त हो सके। सर्ग के अन्त में परशुराम शिशु सीता को प्रणाम करते हैं और उनकी प्रशंसा का गान करने लगते हैं।

१४. श्रीसीतास्तवनम्-यह सम्पूर्ण सर्ग स्तुतिपरक है। परशुराम सीता का स्तुतिगान ९९ पद्यों (१४.१–१४.९९) में करते हैं। इसके उपरान्त वे परमशान्ति का आस्वादन करते हैं और सीता को नमन करने के पश्चात प्रसन्नचित्त महेन्द्र पर्वत की ओर प्रस्थान करते हैं।

 
राम अहल्योद्धरणम् सर्ग में अहिल्या का उद्धार करते हैं।

१५. अहल्योद्धरणम्-अपने मंत्रियों एवं दैवज्ञों के संग मंत्रणा करने के उपरान्त, जनक सीता स्वयंवर का दिन सुनिश्चित करते हैं। इसी बीच अयोध्या में राजा दशरथ अपने पुत्र राम के विवाह के सम्बन्ध में चिन्तित हो उठते हैं। राक्षसी ताड़का मुनि विश्वामित्र के यज्ञ में बारम्बार विघ्न डालती है। विश्वामित्र राजा दशरथ के दरबार में आते हैं और अपने यज्ञ की राक्षसों से रक्षा हेतु राम और लक्ष्मण की याचना करते हैं। राम द्वारा उन्हें छोड़कर जाने के विचार पर, दशरथ हिचकिचाते हैं और स्वयं को नष्टप्राय समझते हैं, किन्तु गुरु वशिष्ठ उन्हें राम और लक्ष्मण को भेजने के लिए मनाते हैं। विश्वामित्र राम एवं लक्ष्मण को अपने वन में ले जाते हैं, जहाँ राम ताड़का का वध करते हैं, जब वह वृक्षों और शिलाओं की वर्षा कर तीनों पर आक्रमण करती है। विश्वामित्र राम एवं लक्ष्मण को बला और अतिबला नामक दो विद्याएँ प्रदान करते हैं, जो उन्हें कुछ खाए, पिए और सोए बिना भी जीवनधारण कराने में सक्षम हैं।

विश्वामित्र अपने समस्त दिव्यास्त्र भी राम को समर्पित कर देते हैं। राम और लक्ष्मण विश्वामित्र के यज्ञ की छह दिवस और छह रात्रि निरन्तर रक्षा करते हैं। सातवें दिन, राक्षस भाई मारीच और सुबाहु एक विशाल सेना के साथ यज्ञ पर आक्रमण करते हैं। राम मारीच को सागर के पार फेंकने के लिए मानवास्त्र का प्रयोग करते हैं, जबकि आग्नेयास्त्र का संधान कर, वे सुबाहु का संहार कर देते हैं। इसी मध्य लक्ष्मण राक्षसों की समूची सेना का विनाश कर देते हैं। विश्वामित्र राक्षसों के भय से मुक्त हो जाते हैं और राम एवं लक्ष्मण को सीता स्वयंवर हेतु मिथिला ले जाने का निश्चय करते हैं। रास्ते में, राम अपने पति गौतम द्वारा अपने व्यभिचारी कृत्य हेतु शापित और शिला के रूप में परिवर्तित अहिल्या को देखते हैं। विश्वामित्र राम को अहिल्या के इतिहास की कथा सुनाते हैं। राम अपने चरण से अहिल्या को स्पर्श करते हैं और अहिल्या अपने शाप एवं पाप से मुक्त हो जाती है। अहिल्या अश्रुपूरित नयनों से राम की वंदना करती है और गौतम के निवासस्थल की ओर प्रस्थान करती है।

१६. श्रीराघवप्रियादर्शनम्-विश्वामित्र, राम और लक्ष्मण के संग मिथिला में पधारते हैं। श्रीराम मिथिला नगरी में पहुँचने पर हर्षोल्लासित हैं, किन्तु अन्य राजा, जो सीता स्वयंवर हेतु आए हुए हैं, राम के आगमन से प्रसन्न नहीं हैं। मिथिला के नागरिक राम का दर्शन कर आनन्दमग्न हो जाते हैं। जब राजा जनक विश्वामित्र से दोनों राजकुमारों के सम्बन्ध में जिज्ञासा प्रकट करते हैं, विश्वामित्र राम एवं लक्ष्मण का जनक से परिचय कराते हैं। जनक दोनों राजकुमारों को अपने महल में ले आते हैं और उनका स्वागत करते हैं। इसके पश्चात लक्ष्मण राम के समक्ष मिथिला नगरी को देखने की इच्छा प्रकट करते हैं और राम गुरु की आज्ञा प्राप्त कर उनके संग चल पड़ते हैं। मिथिला के बालक राम और लक्ष्मण को नगरी में चारों ओर भ्रमण कराते हैं और अन्त में राम का आलिंगन सुख प्राप्त करते हैं। दूसरे दिन बड़ी भोर में राम एवं लक्ष्मण विश्वामित्र की पूजा हेतु पुष्प चयन करने के लिए जनक के राजकीय उद्यान में प्रवेश करते हैं। स्वयंवर के एक दिन पूर्व सीता भी उसी उद्यान में गौरी पूजन के लिए पधारती हैं।

सीता एवं राम एक दूसरे का प्रथम बार दर्शन करते हैं, जब वे उद्यान में सहसा आमने-सामने आ जाते हैं। राम लक्ष्मण से सीता के प्रति अपने आकर्षण के बारे में बताते हैं। वे लक्ष्मण से कहते हैं कि सीता अवश्य ही भविष्य में उनकी पत्नी होंगी क्योंकि उनके मन ने स्वप्न में भी कभी परस्त्री की कामना नहीं की है। तब लक्ष्मण सीता को अपनी भाभी माँ के रूप में प्रणाम करते हैं। उधर सीता अपने ह्रदयमन्दिर में श्रीराम की सुन्दर छवि सँजोकर उसकी आराधना करने लगती हैं और गौरी पूजन के पश्चात अपने महल को लौट आती हैं। श्रीराम एवं लक्ष्मण विश्वामित्र के समीप लौटते हैं और जनक के राजकीय उद्यान के पुष्पों से उनकी अर्चना करते हैं। श्रीराम विश्वामित्र को अपने ह्रदय में सीता के प्रति उत्पन्न आकर्षण के सम्बन्ध में सब कुछ बता देते हैं। विश्वामित्र राम की निश्छलता से प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वचन प्रदान करते हैं और शयन करने के लिए चले जाते हैं। आज राम रात्रि में भी जगे हुए हैं, वे चन्द्रमा के सौन्दर्य की प्रशंसा कर रहे हैं, जो उन्हें बारम्बार सीता के मुखचन्द्र का मधुर स्मरण करा रहा है।

 
राम सीतास्वयंवरम् सर्ग में पिनाक तोड़ते हैं।

१७. सीतास्वयंवरम्-अगले दिन प्रातः श्रीराम एवं लक्ष्मण जागते हैं और विश्वामित्र को प्रणाम करते हैं। तीनों सीता स्वयंवर में एक साथ पधारते हैं। बाल, युवा एवं वृद्ध और मिथिला की नवयौवनाएं श्रीराम की सुन्दर रूपछवि के दर्शन कर आनन्दमुग्ध हो जाती हैं। राजा जनक राम को देखकर मन ही मन प्रार्थना करते हैं कि वह ही शिव धनुष का भंजन करें। सीता स्वयंवर की सभा में उपस्थित लोगों के बारह विभिन्न समूह राम को विभिन्न बारह भावों (रसों) की दृष्टि से युक्त होकर देखते हैं। मिथिला के चारण राजा जनक के प्रण की उद्घोषणा करते हैं कि शिव धनुष पिनाक पर प्रत्यंचा चढ़ाने वाला राजकुमार ही सीता के पाणिग्रहण का अधिकारी होगा। सभा में उपस्थित बाणासुर, रावण और अनेक राजा धनुष को उठाने का प्रयत्न करते हैं किन्तु असफल होते हैं।

तब दस सहस्र राजा एक साथ धनुष को उठाने का प्रयास करते हैं, किन्तु समर्थ नहीं हो पाते। राजा जनक निराश होकर समस्त राजाओं से अपने-अपने घर लौट जाने को कहते हैं। वह कहते हैं कि यदि पृथ्वी वीरों से विहीन हो चुकी है, तो वह सीता को कुँवारी रखना पसंद करेंगे। सभा में जनक के इन शब्दों को सुनकर लक्ष्मण क्रोधित हो उठते हैं, किन्तु श्रीराम अपने नेत्रों के संकेत से उन्हें शान्त कर देते हैं। विश्वामित्र राम को धनुष तोड़ने की आज्ञा देते हैं। श्रीराम धनुष को तृण के समान उठा लेते हैं और उसे तुरन्त दो टुकड़ों में तोड़ डालते हैं। विश्वामित्र द्वारा वैदिक मन्त्रों के स्वरघोष के मध्य सीता राम को जयमाल पहनाती हैं। राजा जनक श्रीराम को नमन करते हुए उनकी स्तुति करते हैं।

१८. श्रीभार्गवलक्ष्मणसंवादः-महेन्द्र पर्वत पर परशुराम जान जाते हैं कि भगवान राम ने मिथिला में पिनाक तोड़ दिया है। वे यह भी समझ जाते हैं कि कुछ दुष्ट राजा शिव धनुष को उठाने में असफल रहने के पश्चात भी सीता को बलपूर्वक ले जाने और राम एवं लक्ष्मण को बंदी बनाने की योजना बना रहे हैं। अपने गुरु के वचनों का स्मरण करते हुए, परशुराम अपनी अंतिम लीला के भाग में क्रोध का अभिनय करते हुए मिथिला की सभा में आते हैं। उनकी उपस्थिति सभा में विराजमान समस्त क्षत्रिय राजाओं को आतंकित कर देती है और वे सभी शान्त हो जाते हैं। जनक परशुराम को प्रणाम करते हैं और सीता से भी उन्हें प्रणाम कराते हैं।

परशुराम अज्ञानता का प्रदर्शन करते हैं और जनक से उनके गुरु का धनुष तोड़ने वाले अपराधी को दिखाने को कहते हैं। राम ससम्मान परशुराम से कहते हैं कि धनुष को तोड़ने वाला उनका (परशुराम का) ही कोई दास होगा और उनकी शरणागति की याचना करते हैं। परशुराम राम से दास की भांति आचरण करने और उनके अपराधी को भीड़ से पृथक करने के आदेश का पालन करने को कहते हैं। परशुराम को राम का अपमान करते देखकर लक्ष्मण तुरन्त क्रुद्ध हो उठते हैं और परशुराम की हँसी उड़ाते हुए उन्हें प्रत्युत्तर देते हैं। दोनों के मध्य एक वाक्-युद्ध प्रारम्भ हो जाता है, जिसमें लक्ष्मण परशुराम की धमकियों का बुद्धिमत्तापूर्ण व्यंग्योक्तिओं द्वारा प्रत्युत्तर देते हैं। जब लक्ष्मण परशुराम का उपहास करते हुए उनकी समस्त धमकियों की बारम्बार प्रत्यालोचना करते हैं, तो परशुराम कुपित होकर अपना परशु उठा लेते हैं और लक्ष्मण को मारने के लिए आगे बढ़ते हैं। उसी समय श्रीराम परशुराम को शान्त करने के लिए बोलना प्रारम्भ कर देते हैं।

१९. श्रीराघवे भार्गवप्रवेशः-श्रीराम परशुराम के क्रोध का अपने विनम्र वचनों से निवारण करते हैं। राम स्वीकार करते हैं कि उन्होंने विश्वामित्र द्वारा आदेश दिए जाने पर ही धनुष तोड़ा है। वे परशुराम को अपना गुरु कहते हैं और स्वयं को उनका शिष्य। राम परशुराम से लक्ष्मण के अपमानजनक वचनों के लिए क्षमा मांगते हैं। जब राम इस प्रकार बोल रहे होते हैं, लक्ष्मण उसी समय परशुराम की ओर देखकर पुनः मुस्कुराने लगते हैं। इससे परशुराम पुनः आगबबूला हो उठते हैं और यह कहते हुए कि वे कोई सामान्य ब्राह्मण नहीं हैं, राम को द्वन्द्व युद्ध के लिए ललकारते हैं। राम परशुराम से सादर निवेदन करते हुए कहते हैं कि द्वन्द युद्ध केवल समकक्षों के मध्य होता है और वह परशुराम के संग द्वन्द्व युद्ध करने के योग्य नहीं हैं। वे परशुराम से कहते हैं कि वह (राम) सर्वशक्तिमान हैं किन्तु फिर भी ब्राह्मणों के दास हैं। तत्पश्चात श्रीराम परशुराम के समक्ष अपने महाविष्णु रूप को प्रकट करते हैं और अपने वक्ष:स्थल पर भृगु के चरण चिह्न के दर्शन कराते हैं। अपने पूर्वज के चरणचिह्न को देखकर परशुराम क्रोध के अभिनय को त्याग देते हैं। वे श्रीराम से शार्ंग नामक विष्णु धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए कहते हैं।

जैसे ही वे शार्ंग धनुष राम को सौंपते हैं, उनका परशु अंतर्धान हो जाता है और उनके समस्त शस्त्र जाकर राम में विलीन हो जाते हैं। उनकी आभा भी श्रीराम में प्रविष्ट हो जाती है। राम वैष्णव धनुष पर प्रत्यंचा का संधान कर उस पर एक बाण चढ़ा लेते हैं। परशुराम का संदेह युक्त अभिनय भी समाप्त हो जाता है। तब परशुराम राम की बारह सुन्दर श्लोकों (१९.६३–१९.७६) में स्तुति करते हैं। श्रीराम परशुराम से कहते हैं कि उनका बाण अमोघ है। वे परशुराम से पूछते हैं कि वे इस बाण का प्रयोग परशुराम की पृथ्वी पर स्वच्छंद विचरण करने की शक्ति को नष्ट करने में करें अथवा परशुराम द्वारा तपस्या से अर्जित फलों को नष्ट करने में करें। श्रीराम परशुराम के समक्ष पुनः अपने महाविष्णु रूप को प्रकट करते हैं और तदुपरांत परशुराम की आज्ञाओं का स्वागत करते हुए उनके चरणों में गिर पड़ते हैं। सभा में समुपस्थित समस्त लोगों के प्रशंसात्मक उद्गारों के मध्य परशुराम राम से अपने चरणों से उठने के लिए कहते हैं और उनका आलिंगन कर लेते हैं। फिर वे राम से विचरण शक्ति के स्थान पर अपने तप से प्राप्त फलों को नष्ट करने को कहते हैं। श्रीराम ऐसा ही करते हैं। परशुराम उन की स्तुति करने लगते हैं।

२०. श्रीभार्गवकृतराघवस्तवनम्-यह सम्पूर्ण सर्ग स्तवनात्मक है। परशुराम राम की सौ पद्यों (२०.१–२०.१००) में स्तुति करते हैं। स्तवन का समापन करते हुए, परशुराम उनसे अपनी रक्षा की विनती करते हैं, सीता एवं राम से सदैव उनके ह्रदय में निवास करने की याचना करते हैं और अपनी अज्ञानता एवं राम की सर्वज्ञता को स्वीकार करते हैं। तत्पश्चात वे अपने अवतार का समापन करते हैं, आनन्द का आस्वादन करते हैं और राम की प्रशस्ति करके प्रस्थान करते हैं।

 
श्रीराघवपरिणयः सर्ग में दशरथ के चारों पुत्रों का विवाह शीरध्वज एवं कुशध्वज की चार पुत्रियों के साथ सम्पन्न होता है।

२१. श्रीराघवपरिणयः-श्रीराम परशुराम को वापिस महेन्द्र पर्वत पर भेज देते हैं। राम और लक्ष्मण अपने गुरु विश्वामित्र के समीप जाते हैं और उनके चरणों में गिर पड़ते हैं। विश्वामित्र राम को गले से लगा लेते हैं। राजा जनक विश्वामित्र के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं। विश्वामित्र जनक को दशरथ के पास निमन्त्रण भेजने का आदेश देते हैं। जनक के दूत अयोध्या पहुँचते हैं और दशरथ को मिथिला में आमंत्रित करने से पूर्व उनके समक्ष राम एवं लक्ष्मण की उपलब्धियों का वर्णन करते हैं। राजा दशरथ विवाह वर-यात्रा का नेतृत्व करते हैं और भरत उसको क्रमबद्ध व्यवस्थित करते हैं। जब वरयात्रा मिथिला पहुँचती है, राम एवं लक्ष्मण पिता दशरथ के चरणों में गिर जाते हैं। दशरथ दोनों पुत्रों का आलिंगन करते हैं। तत्पश्चात दोनों भाई गुरु वशिष्ठ को प्रणाम करते हैं। अन्त में वे अपने भाईयों भरत एवं शत्रुधन से और अपने मित्रों से मिलते हैं।

मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष पंचमी (विवाह पंचमी) की शुभ तिथि आ गई है, जो कि श्रीराम एवं सीता के विवाह हेतु सुनिश्चित की गई है। इस मंगलमय अवसर पर सीता को उनकी सखियों ने सुसज्जित कर दिया है। श्रीराघवेन्द्र सरकार सुन्दर वरवेश में घोड़े पर आसीन होकर विवाह मण्डप में पधार रहे हैं। राजा जनक सीता एवं राम का पाणिग्रहण संस्कार सम्पन्न कर रहे हैं। जनक की दूसरी पुत्री तथा उनके अनुज कुशध्वज की दोनों पुत्रियों का विवाह राम के तीनों भाईयों के संग हो रहा है। मांडवी का भरत से, उर्मिला का लक्ष्मण से और श्रुतिकीर्ति का शत्रुघ्न से विवाह होता है। मिथिला और अयोध्या के लोग आनन्दोल्लास से झूम रहे हैं। अयोध्यावासी नववधुओं को लेकर घर प्रस्थान करते हैं, जिन्हें मिथिला द्वारा अश्रुपूरित विदाई दी जाती है। सर्ग के अंतिम पद्यों (२१.९७–२१.९९) में, महाकवि विवाहोपरांत रामायण की शेष घटनाओं को अत्यन्त संक्षेप में प्रस्तुत करते हैं। चारों भाई अपनी वधुओं के साथ अयोध्या आते हैं और माताएँ आनन्दमग्न हो जाती हैं। राम अगले बारह वर्ष अयोध्या में व्यतीत करते हैं और इसके पश्चात कैकयी की आज्ञाओं का अनुसरण करते हुए वन के लिए प्रस्थान करते हैं। राम सीता का हरण करने वाले रावण का संहार करते हैं, सुग्रीव एवं हनुमान के साथ अयोध्या पुनः वापिस आते हैं और पुनः परशुराम द्वारा नमन किए जाते हैं।

काव्यात्मक विशेषताएँसंपादित करें

अलंकारसंपादित करें

श्रीभार्गवराघवीयम् में प्रयुक्त अलंकारों की एक विस्तृत सूची दिनकर द्वारा प्रस्तुत की गई है।[8] महाकाव्य में प्रयुक्त अलंकारों के कतिपय उदाहरण नीचे प्रस्तुत हैं।

अनुप्राससंपादित करें

परशुराम कृत सीता स्तुति से अनुप्रास अलंकार का एक सुन्दर उदाहरण (१४.२८), जिसमें ११ शब्द निरन्तर समान वर्णों से प्रारम्भ होते हैं।[9][10]

रामप्राणप्रिये रामे रमे राजीवलोचने।
राहि राज्ञि रतिं रम्यां रामे राजनि राघवे ॥

हे श्रीराम को प्राणों के समान प्रिय, प्रसन्नमुख वाली, श्रीराम की अविच्छिन्न शक्ति, कमल के पुष्प के समान सुन्दर नेत्रों वाली महारानी सीते! मुझे राजाधिराज श्रीराम राघवेन्द्र सरकार के प्रति प्रेमनिर्भरा सुन्दर भक्ति प्रदान कीजिए। ॥१४.२८॥

यमक के साथ मिश्रित अनुप्रास के प्रयोग के दो उदाहरण (६.३ और १६.८४) छठे और सोलहवें सर्गों में दर्शनीय हैं।[9][11]

स ब्रह्मचारी निजधर्मचारी स्वकर्मचारी च न चाभिचारी।
चारी सतां चेतसि नातिचारी स चापचारी स न चापचारी ॥

उन ब्रह्मचर्य के कठोर व्रत का पालन करने वाले, अपने शास्त्रोनुमोदित धर्म एवं कर्तव्यों का आचरण करने वाले परशुराम ने कदापि किसी के प्रति अभिचरण नहीं किया। उन्होंने संतों एवं सज्जनों के पवित्र हृदयों में विचरण किया और धर्म शास्त्रों की मर्यादाओं का कदापि अतिक्रमण नहीं किया। उन्होंने अपने धनुष के साथ विचरण करते हुए भी कदापि किसी को क्षति पहुँचाने का आचरण नहीं किया। ॥ ६ .३ ॥

वीक्ष्य तां वीक्षणीयाम्बुजास्यश्रियं
स्वश्रियं श्रीश्रियं ब्रह्मविद्याश्रियम्।
धीधियं ह्रीह्रियं भूभुवं भूभुवं
राघवः प्राह सल्लक्षणं लक्ष्मणम् ॥

जिनके मुख का सौन्दर्य एक सुन्दर कमल की भांति प्रस्फुटित हो रहा था, उन दीप्ति की भी दीप्ति, लक्ष्मी की भी लक्ष्मी (समृद्धि), ब्रह्मविद्या की आधारभूता, बुद्धिदेवी की भी बुद्धि, नम्रता की भी विनम्रता, पृथ्वी की भी पृथ्वी (धारक), पृथ्वी की पुत्री, सुन्दर लक्षणों से सुशोभित, अपनी उन महालक्ष्मी (सीता) का अवलोकन करते हुए श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा। ॥ १६.८४ ॥

रूपकसंपादित करें

प्रस्तुत पद्य (६.९७) में, यज्ञ कर रहे एक पुजारी के रूपक के माध्यम से कवि परशुराम द्वारा सहस्रार्जुन के वध का पाठकों के ह्रदय में मनोहारी चित्रांकन करते हैं।[9][12]

धनुःस्रुगभिमेदुरे भृगुपकोपवैश्वानरे
रणांगणसुचत्वरे सुभटराववेदस्वरे।
शराहुतिमनोहरे नृपतिकाष्ठसंजागरे
सहस्रभुजमध्वरे पशुमिवाजुहोद्भार्गवः ॥

युद्ध के उस भीषण यज्ञ में– जिसमें धनुष एक सुन्दर करछुल था, परशुराम का क्रोध प्रज्ज्वलित अग्नि था, रणभूमि चतुष्कोणीय वेदिका थी, वीर सैनिकों का क्रंदन वैदिक मन्त्रों का गान था, परशुराम के शर सुन्दर आहुतियाँ थे और क्षत्रिय राजा काष्ठ समिधा थे – परशुराम ने सहस्रार्जुन की यज्ञ-पशु की भांति बलि दे दी। ॥ ६.९७॥

महायमकसंपादित करें

यमक अलंकार संस्कृत एवं प्राकृत भाषा में एक ऐसा अलंकार है, जिसमें समान शब्द एक से अधिक बार प्रयुक्त होता है, किन्तु प्रत्येक शब्द का अपना एक विशेष अर्थ होता है। महाकाव्य के तीसरे सर्ग से उद्धृत निम्नलिखित पद्य (३.२६) में चार चरण हैं, किन्तु एक ही अक्षर से चार विभिन्न अर्थों का तात्पर्य निकलता है, जिनमें से एक-एक अर्थ की प्रत्येक चरण के लिए कवि ने सुन्दर संयोजना की है।[9][13] इस प्रकार संपूर्ण काव्य में प्रयुक्त चतुर्विध यमक के प्रयोग को महायमक भी कहते हैं।

ललाममाधुर्यसुधाभिरामकं ललाममाधुर्यसुधाभिरामकम्।
ललाममाधुर्यसुधाभिरामकं ललाममाधुर्यसुधाभिरामकम् ॥

उन्हें, जो (भगवान् शंकर) भाल पर त्रिपुण्ड के सौन्दर्य से शोभायमान हो रहे थे और जिनके आराध्य देव भगवान श्रीराम थे, उन्हें, जो आभूषणों की शोभा की धुरी (नवोदित चन्द्र के रूप में) धारण कर रहे थे और जो इस आनन्द से मनोहारी दृष्टिगत हो रहे थे, उन्हें जो अपनी श्रेष्ठता की शक्ति के साथ धर्म के दायित्व के वाहक एवं रक्षक बने हुए थे; और उन्हें, जिन्हें वृषभ (जो धर्म का प्रतीक है) के चिह्न की दीप्ति के आनन्द के कारण भगवान श्रीराम की शरण प्रदान की गई थी। ॥ ३.२६ ॥

मुद्रासंपादित करें

मुद्रा अलंकार में, पद्य रचना के लिए प्रयुक्त छंद का पद्य में उसके नाम के वर्णन द्वारा संकेत किया जाता है। प्रस्तुत महाकाव्य में इस अलंकार का सात विभिन्न छंदों के साथ आठ बार प्रयोग किया गया है, जैसा कि नीचे प्रदर्शित है।

पद्य छंद चरण मूलपाठ मुद्रा शब्द का अर्थ
८.१०० शिखरिणी निजारामो रामो विलसति महेन्द्रे शिखरिणि पर्वत पर
११.८३ शिखरिणी जगौ द्यष्टौ भक्त्या रघुतिलककीर्तीः शिखरिणीः शिखरिणी पद्य
१२.४५ आर्य आर्ये रघुवरभार्ये हे भद्र स्त्री!
१६.७६ स्रग्विणी भव्यनीलाम्बरा स्त्रीवरा स्रग्विणी माला धारण करना
१७.९७ शार्दूलविक्रीडित त्रैलोक्ये च विजृम्भितं हरियशःशार्दूलविक्रीडितम् एक शेर की भांति अभिनय
१७.१०० पृथ्वी नमोऽस्त्विति समभ्यधाद्रघुवराय पृथ्वीपतिः ॥ पृथ्वी
१९.८५ पुष्पिताग्रा त्रिजगति राम रमस्व पुष्पिताग्राम् पुष्पित
२०.९१ कनकमंजरी कनकमंजरीकान्तिवल्लरी- स्वर्णलता

छंदशास्त्रसंपादित करें

कवि ने ४० संस्कृत और प्राकृत छंदों का प्रयोग किया है, जो इस प्रकार हैं- अचलधृति (गीत्यार्या), अनुष्टुप छ्न्द, आर्या, इन्दिरा (कनकमंजरी), इन्द्रवज्रा, इन्द्रवंशा, उपजाति, उपेन्द्रवज्रा, उपोद्गता (मालभारिणी अथवा वसन्तमालिका, उपच्छन्दसिक का एक प्रकार), कवित्त, किरीट (मेदुरदन्त, सपादिका का एक प्रकार), कोकिलक (नार्कुटिक), गीतक, घनाक्षरी, तोटक, दुर्मिला (द्विमिला, सपादिका का एक प्रकार), दोधक, द्रुतविलम्बित, नगस्वरूपणी (पंचचामर), पुष्पिताग्रा (उपच्छन्दसिक का एक प्रकार), पृथ्वी, प्रहर्षिणी, भुजंगप्रयात, मत्तगजेन्द्र (सपादिका का एक प्रकार), मन्दाक्रान्ता, मालिनी, रथोद्धता, वंशस्थ, वसन्ततिलका, शार्दूलविक्रीडित, शालिनी, शिखरिणी, शट्पद, सुन्दरी (वैतालिक अथवा वैतालीय), सुरभि (उपच्छन्दसिक का एक प्रकार), स्रग्धरा, स्रग्विणि, स्वागता, हरिगीतक और हरिणी।

लघुक्षरी श्लोकसंपादित करें

श्रीभार्गवराघवीयम् के सातवें सर्ग में अचलधृति (गीत्यार्या) छंद में रचित सात पद्य (७.११–७.१७) हैं, जिनमें केवल संस्कृत के लघु अक्षरों का प्रयोग किया गया है। कवि टिप्पणी करते हैं कि परशुराम विनम्रता एवं संकोच का अनुभव करते हुए चित्रकूट के वनों की प्रशंसा केवल लघु अक्षरों में करते हैं।[14] यहाँ दो उदाहरण द्रष्टव्य हैं -

त्रिजगदवन हतहरिजननिधुवन
निजवनरुचिजितशतशतविधुवन।
तरुवरविभवविनतसुरवरवन
जयति विरतिघन इव रघुवरवन ॥
मदनमथन सुखसदन विधुवदन-
गदितविमलवरविरुद कलिकदन।
शमदमनियममहित मुनिजनधन
लससि विबुधमणिरिव हरिपरिजन ॥

हे त्रिलोक के रक्षक, हरिभक्तों के नश्वर सुखों का हरण करने वाले, अपनी जलराशि की शोभा से सहस्रों चंद्रमाओं की दीप्ति को जीतने वाले, अपने तरुवरों के वैभव से देवताओं के नन्दन वन को भी विनत करने वाले एवं रघु के वंशजों में सर्वश्रेष्ठ भगवान श्री राम के प्रिय चित्रकूट वन! आप वैराग्य के गहन कोष के सदृश विराजित हो रहे हैं। ॥ ७.११॥
हे काम का मर्दन करने वाले भगवान शिव के सुख धाम, चन्द्रमा के समान मुख वाले भगवान श्री राम द्वारा स्वयं जिनकी विमल एवं श्रेष्ठ विरुदावलियों का गान किया गया है, कलि के दुर्गुणों का भंजन करने वाले, शम, दम एवं नियम जैसे गुणों से मण्डित, मुनिजनों के लिए सम्पत्ति स्वरुप, भगवान श्री राम के प्रिय परिजन चित्रकूट! आप देवताओं की चिन्तामणि के सदृश दीप्तिमान हो रहे हैं। ॥ ७.१२॥

संस्कृत में प्राकृत छन्दों का प्रयोगसंपादित करें

महाकाव्य के बीसवें सर्ग में ६३ संस्कृत पद्य (२०.१–२०.६३) प्राकृत छन्दों में रचित हैं। इन छन्दों में किरीट (मेदुरदन्त, सपादिका का एक प्रकार), घनाक्षरी, दुर्मिला (द्विमिला, सपादिका का एक प्रकार), मत्तगजेन्द्र (सपादिका का एक प्रकार), शट्पद, हरिगीतक मुख्य हैं। पद्यों की भाषा संस्कृत है, किन्तु छन्द एवं छंदशास्त्र के नियम प्राकृत छंदशास्त्र का अनुसरण करते हैं। घनाक्षरी छंद में प्रणीत निम्न पद्य (२०.१३) के प्रत्येक चरण में ३२ अक्षर हैं।

अशरणशरण प्रणतभयदरण
धरणिभरहरण धरणितनयावरण
जनसुखकरण तरणिकुलभरण
कमलमृदुचरण द्विजांगनासमुद्धरण।
त्रिभुवनभरण दनुजकुलमरण
निशितशरशरण दलितदशमुखरण
भृगुभवचातकनवीनजलधर राम
विहर मनसि सह सीतया जनाभरण ॥

हे अशरणों को शरण प्रदान करने वाले, आपको प्रणाम करने वालों के भव-भय का भंजन करने वाले, धरा से दुष्टों के भार का हरण करने वाले, पृथ्वी की पुत्री सीता का वरण करने वाले, अपने भक्तों के लिए सुख के कारणभूत, सूर्यवंश के पोषक, कमल के पुष्प के सदृश कोमल चरण वाले, द्विजपत्नी अहिल्या का उद्धार करने वाले, त्रिलोक के भरणकर्ता, दैत्यों के कुल का विध्वंस करने वाले, तीक्ष्ण बाणों को धारण करने वाले, युद्ध में रावण का वध करने वाले, मुझ भृगुवंशी परशुराम रूपी चातक हेतु नवीन मेघ के समान, भक्तों के आभूषण रूप श्रीराम! आप सीताजी के सहित मेरे मन में विहार कीजिए। ॥ २०.१३॥

रससंपादित करें

श्रीभार्गवराघवीयम् का अंगी रस वीर रस है। पूर्वरचित महाकाव्यों की भांति श्रीभार्गवराघवीयम् में भरत मुनि द्वारा प्रतिपादित आठों रस विद्यमान हैं। ये रस हैं- शृंगार रस, वीर रस, हास्य रस, रौद्र रस, करुणा रस, वीभत्स रस, भयानक रस एवं अद्भुत रस। इसके अतिरिक्त श्रीभार्गवराघवीयम् में मम्मट द्वारा प्रतिपादित नवां रस शान्त रस और तीन नवीन रस भक्ति, वात्सल्य एवं प्रेयस भी दृष्टिगोचर होते हैं।

भागवत पुराण के दशम सर्ग एवं श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड के समान, श्रीभार्गवराघवीयम् के सत्रहवें सर्ग के बारह पद्यों (१७.४२–१७.५३) में समस्त बारह रस अपने सन्दर्भों के साथ प्रयुक्त किए गए हैं।[15] यहाँ कवि वर्णन करते हैं कि मिथिला की सभा में लोगों के विभिन्न समूह राम को किस दृष्टि से देखते हैं, प्रत्येक समूह इन बारह रसों में से एक-एक रस की अनुभूति करता है। यहाँ प्रस्तुत सन्दर्भ रामचरितमानस के समान ही है।.

एकाक्षरी श्लोकसंपादित करें

श्रीभार्गवराघवीयम् के बीसवें सर्ग में तीन एकाक्षरी श्लोकों (२०.९२–२०.९४) की रचना की गई है, जिनमें मात्र एक व्यंजन का प्रयोग किया गया है।[16]

कः कौ के केककेकाकः काककाकाककः ककः।
काकः काकः ककः काकः कुकाकः काककः कुकः ॥
काककाक ककाकाक कुकाकाक ककाक क।
कुककाकाक काकाक कौकाकाक कुकाकक ॥
लोलालालीललालोल लीलालालाललालल।
लेलेलेल ललालील लाल लोलील लालल ॥

परब्रह्म (कः) [श्री राम] पृथ्वी (कौ) और साकेतलोक (के) में [दोनों स्थानों पर] सुशोभित हो रहे हैं। उनसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में आनन्द निःसृत होता है। वह मयूर की केकी (केककेकाकः) एवं काक (काकभुशुण्डि) की काँव-काँव (काककाकाककः) में आनन्द और हर्ष की अनुभूति करते हैं। उनसे समस्त लोकों (ककः) के लिए सुख का प्रादुर्भाव होता है। उनके लिए [वनवास के] दुःख भी सुख (काकः) हैं। उनका काक (काकः) [काकभुशुण्डि] प्रशंसनीय है। उनसे ब्रह्मा (ककः) को भी परमानन्द की प्राप्ति होती है। वह [अपने भक्तों को] पुकारते (काकः) हैं। उनसे कूका अथवा सीता (कुकाकः) को भी आमोद प्राप्त होता है। वह अपने काक [काकभुशुण्डि] को पुकारते (काककः) हैं और उनसे सांसारिक फलों एवं मुक्ति का आनन्द (कुकः) प्रकट होता है। ॥ २०.९२॥
हे मेरे एकमात्र प्रभु ! आप जिनसे [जयंत] काक के (काककाक) शीश पर दुःख [रूपी दण्ड प्रदान किया गया] था; आप जिनसे समस्त प्राणियों (कका) में आनन्द निर्झरित होता है; कृपया पधारें, कृपया पधारें (आक आक)। हे एकमात्र प्रभु! जिनसे सीता (कुकाक) प्रमुदित हैं; कृपया पधारें (आक)। हे मेरे एकमात्र स्वामी! जिनसे ब्रह्माण्ड (कक) के लिए सुख है; कृपया आ जाइए (आक)। हे भगवन (क)! हे एकमात्र प्रभु ! जो नश्वर संसार (कुकक) में आनन्द खोज रहे व्यक्तियों को स्वयं अपनी ओर आने का आमंत्रण देते हैं; कृपया आ जाएँ, कृपया पधारें (आक आक)। हे मेरे एकमात्र नाथ ! जिनसे ब्रह्मा एवं विष्णु (काक) दोनों को आनन्द है; कृपया आ जाइए (आक)। हे एक ! जिनसे ही भूलोक (कौक) पर सुख है; कृपया पधारें, कृपया पधारें (आक आक)। हे एकमात्र प्रभु ! जो (रक्षा हेतु) दुष्ट काक द्वारा पुकारे जाते हैं (कुकाकक); [कृपया पधारें।] ॥ २०.९३॥
हे एकमात्र प्रभु! जो अपने घुँघराले केशों की लटों की एक पंक्ति के साथ (लोलालालीलल) क्रीड़ारत हैं; जो कदापि परिवर्तित नहीं होते (अलोल); जिनका मुख [बाल] लीलाओं में श्लेष्मा से परिपूर्ण है (लीलालालाललालल); जो [शिव धनुर्भंग] क्रीड़ा में पृथ्वी की सम्पत्ति [सीता] को स्वीकार करते हैं (लेलेलेल); जो मर्त्यजनों की विविध सांसारिक कामनाओं का नाश करते हैं (ललालील), हे बालक [रूप राम] (लाल)! जो प्राणियों के चंचल प्रकृति वाले स्वभाव को विनष्ट करते हैं (लोलील); [ऐसे आप सदैव मेरे मानस में] आनन्द करें (लालल)। ॥ २०.९४॥

अन्य संस्कृत महाकाव्यों के साथ तुलनासंपादित करें

पिछले महाकाव्यों के साथ तुलना में इस महाकाव्य की कुछ विशेषताओं को नीचे दिया गया है-

महाकाव्य रचयिता दिनांकित सर्गों की संख्या श्लोकों की संख्या प्रयोग किये गए छन्दों की संख्या प्रत्येक सर्ग के अंत में आया शब्द
कुमारसम्भवम् कालिदास ५ सी. शती ६१३
भट्टिकाव्यम् भट्टि ७ सी. शती २१ १६०२
रघुवंशम् कालिदास ५ सी. शती १९ १५७२ २१
किरातार्जुनीयम् भारवि ६ सी. शती १८ १०४० १२ लक्ष्मी
शिशुपालवधम् माघ महाकवि ७/८ सी. शती २० १६४५ १६ श्री
नैषधीयचरितम् श्रीहर्ष १२ सी. शती २२ २८२८ १९ निसर्गोज्ज्वल
श्रीभार्गवराघवीयम् रामभद्राचार्य २१ सी. शती २१ २१२१ ४० श्री

स्वागतसंपादित करें

 
कवि सोमनाथ चटर्जी द्वारा श्री वाणी अलंकरण पुरस्कार से सम्मानित किए जाते हुए

आलोचनात्मक टिप्पणियाँसंपादित करें

अभिराज राजेन्द्र मिश्र, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व उप-कुलाधिपति एवं संस्कृत में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित, महाकाव्य की प्रस्तावना में लिखते हैं कि ऐसे समय में जहाँ संस्कृत की व्यापकता दुर्लभ है, अनेक कृतियाँ गत वर्षों में प्रकाशित हुईं हैं, जो संस्कृत महाकाव्य की पारम्परिक विशेषताओं से रहित हैं और जिनमें अनेक स्थलों पर व्याकरणीय अशुद्धियाँ दृष्टिगोचर होती हैं। उनके विचारानुसार श्रीभार्गवराघवीयम् इनमें एक अपवाद स्वरुप है। वे आगे कहते हैं कि यह महाकाव्य ऋषि परम्परा का पोषण करता है और इसके प्रणयन से आधुनिक संस्कृत साहित्य वस्तुतः धन्य हो गया है।.[17]

योगेशचन्द्र दुबे, संस्कृत प्रवक्ता एवं विभागाध्यक्ष, जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय[18] ग्रन्थ के प्रारम्भ में प्रकाशकीय में लिखते हैं कि उनके विचार से श्रीभार्गवराघवीयम् माघ, भारवि, श्रीहर्ष एवं कालिदास की महाकाव्य रचनाओं से भी अधिक प्रकृष्ट गुणों एवं विशेषताओं से युक्त है।.[19] प्रकाशकीय के अन्त में वे एक रूपक प्रस्तुत करते हैं।-[20]

इस महाकाव्य रूपी प्रयाग में लघुत्रयी रूपी गंगा, वृहतत्रयी रूपी यमुना एवं रामभद्राचार्य की गिरा रूपी सरस्वती के साथ त्रिवेणी संगम समुपस्थित हो गया है।

डॉ॰ वागीश दिनकर, संस्कृत प्रवक्ता एवं विभागाध्यक्ष, आर.एस.एस.पी.जी. कालिज (गाज़ियाबाद)[21] एवं महाकाव्य पर श्रीभार्गवराघवीयम् मीमांसा आलोचना के लेखक, अपनी आलोचना के अन्त में इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि श्रीभार्गवराघवीयम् वृहतत्रयी के साथ चतुष्टयी के रूप में गणनीय है।[22]

श्रीभार्गवराघवीयम् महाकाव्य वेदार्थ के उपबृंहण का उत्तम निदर्शन है, इसकी रचना करके महाकवि जगद्गुरु श्रीरामभद्राचार्य कालिदास एवं तुलसीदास की तरह अजर-अमर यशःशरीर के भागी होंगे। ... यह उत्तमोत्तम महाकाव्य पूर्वविरचित त्रयी को "चतुष्टयी" संज्ञा से सनाथ करने में सक्षम है।

अन्यत्र, पुरस्कार सन्दर्भों और मीडिया में, यह कृति “कालजयी” एवं “अभूतपूर्व” कहकर प्रशंसित की गई है।[1][23]

सम्मान एवं पुरस्कारसंपादित करें

कवि को इस महाकाव्य की रचना के लिए २००२ से अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। इनमें से कुछ पुरस्कार निम्न हैं-

  • २००७. प्रकाशित संस्कृत रचनाओं हेतु के.के.बिरला फाउंडेशन द्वारा सोलहवाँ वाचस्पति पुरस्कार, पुरस्कार की घोषणा २००८ में की गई थी[24]
  • २००६. बाणभट्ट पुरस्कार, मध्य प्रदेश संस्कृत बोर्ड, भोपाल[1]
  • २००५. संस्कृत साहित्य अकादमी पुरस्कार[2]
  • २००५. रामकृष्ण जयदयाल डालमिया फाउंडेशन द्वारा "श्री वाणी अलंकरण पुरस्कार"।[25]यह पुरस्कार तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी द्वारा २००६ में प्रदान किया गया था।

टिप्पणियाँसंपादित करें

  1. संस्थान, के. के. बिड़ला. "वाचस्पति पुरस्कार २००७" (PDF). मूल (PDF) से जुलाई १३, २०११ को पुरालेखित. अभिगमन तिथि मार्च ८, २०११.
  2. "Sahitya Akademi Awards 2005". National Portal of India. 2005. मूल से January 24, 2008 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 24 अप्रैल 2011.
  3. दिनकर २००८, प्र. १२७.
  4. रामभद्राचार्य २००२, प्रप्र. -.
  5. रामभद्राचार्य २००२, प्र. .
  6. दिनकर २००८, प्र. ११६.
  7. दिनकर २००८, प्रप्र. ११६–१२७.
  8. दिनकर २००८, प्रप्र. १८६–१८७
  9. दिनकर २००८, प्रप्र. १८६–१८७.
  10. रामभद्राचार्य २००२, पृष्ठ. ३१७.
  11. रामभद्राचार्य २००२, प्रप्र. ११९, ३७७.
  12. रामभद्राचार्य २००२, पृष्ठ. १३९.
  13. रामभद्राचार्य २००२, पृष्ठ. ५६.
  14. Rambhadracharya 2002, pp. 141–143.
  15. Dinkar 2008, p. 233.
  16. Rambhadracharya 2002, pp. 481–485.
  17. Rambhadracharya 2002, Introduction: ... महाकाव्यान्यद्यापि भूयस्त्वेन प्रणीयन्ते। परन्तु न क्वचिल्लक्ष्यन्ते काव्यगुणाः। व्याकरणदोषाः पदे पदे मनःक्लेशान् जनयन्ति। ... मन्ये श्रीभार्गवराघवीयमहाकाव्यमिदं तस्य विपर्ययस्यापवादो भविष्यति। ...परन्तु महाकाव्यमिदमार्षपरम्परां पुष्णाति। ... धन्यतामुपयाति रचनयाऽनयाऽर्वाचीनसंस्कृतसाहित्यम्।
  18. "Faculties". Jagadguru Rambhadracharya Handicappped University. अभिगमन तिथि June 5, 2011.
  19. Rambhadracharya 2002, p. bha: माघे किराते ननु नैषधीये रघौ कुमारेऽपि च ये विशेषाः। तेभ्योऽधिकाः जाग्रति रामभद्राचार्योद्भवे भार्गवराघवीये ॥ (Whatever special qualities are in Māgha's work, in Kirātārjunīya, in the Naiṣadhīya work, in the Raghu work and in the Kumāra work – more than them arise in this nascent Śrībhārgavarāghavīyam work of Rāmbhadrācārya)
  20. Rambhadracharya 2002, p. bha: लघुत्रयीबृहत्त्रय्योर्गंगायमुनयोरिव। रामभद्रसरस्वत्या संगमोऽस्मिन् प्रयागके ॥
  21. "Faculty". RSS (PG) College. अभिगमन तिथि May 25, 2011.
  22. Dinkar, p. 278: श्रीभार्गवराघवीयम् महाकाव्य वेदार्थ के उपबृंहण का उत्तम निदर्शन है, इसकी रचना करके महाकवि जगद्गुरु श्रीरामभद्राचार्य कालिदास एवं तुलसीदास की तरह अजर-अमर यशःशरीर के भागी होंगे। ... यह उत्तमोत्तम महाकाव्य पूर्वविरचित त्रयी को "चतुष्टयी" संज्ञा से सनाथ करने में सक्षम है।
  23. "Rambhadracharya selected for 'Vachaspati Puraskar'". United News of India. February 19, 2008. अभिगमन तिथि June 11, 2011.
  24. HT Correspondent (February 20, 2008). "Birla Foundation awards announced". हिन्दुस्तान टाइम्स. अभिगमन तिथि May 16, 2011.
  25. Lok Sabha, The Office of Speaker. "Speeches". अभिगमन तिथि March 8, 2011.

सन्दर्भसंपादित करें

  • दिनकर, डॉ॰ वागीश (२००८). श्रीभार्गवराघवीयम् मीमांसा [श्रीभार्गवराघवीयम् का अन्वेषण]. दिल्ली: देशभारती प्रकाशन. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-8-19-082766-9.
  • रामभद्राचार्य, स्वामी (अक्टूबर ३०, २००२). श्रीभार्गवराघवीयम् (संस्कृतमहाकाव्यम्) [श्रीभार्गवराघवीयम् (एक संस्कृत महाकाव्य)] (संस्कृत में). चित्रकूट, उत्तर प्रदेश, भारत: जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय. |year= / |date= mismatch में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें